मनुष्य अपराध क्यों करता है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, ऐसा बचपन से सुनते व पढ़ते आये हैं। किन्तु आज जिस प्रकार अपराधों के किस्से अखबारों व टीवी समाचारों में रोज सुनने को मिलते हैं, उससे तो यही लगता है कि मनुष्य पुनः अपने आदि काल की और लोट रहा है। आज मनुष्य पूरी तरह संवेदन हीन हो कर किसी भी प्रकार अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है। आज सामाजिक बन्धन अथवा कानून उसके इस प्रयास में बाधक नहीं है। बढ़ते अपराध यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि मनुष्य आखिर अपराध करता क्यों है।
मनुष्य की हर गतिविधि मस्तिष्क द्वारा ही संचालित होती है, अतः अपराध का मस्तिष्क से संबंध अवश्य होना चाहिये। मानव मस्तिष्क एक जटिल संरचना है। विशेषज्ञों का मानना है मनुष्य के मस्तिष्क में एक समय में हजारों विचार आते रहते हैं। हमारे दिमाग के बाँये हिस्से का एक बड़ा भाग इन पर नियंत्रण रख कई विचारों को रोकने का कार्य करता है। इस तन्त्र के कमजोर हो जाने अथवा बन्द हो जाने पर मनुष्य विवेक हीन होकर कुछ भी कर सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क के कई भाग सक्रिय व निष्क्रिय होते रहते हैं। यह बहुत कुछ उसके परिवेश व भावों पर निर्भर करता है। कई परिस्तिथियों में मनुष्य अपना विवेक गवाँ बैठता है। संभवतः इसी परिस्थितिवश मनुष्य अपराध कर बैठता है। प्रश्न अब यह उठता है कि आजकल इस तरह की पृवत्ति में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है।

1. ऐसा माना जाता है कि बच्चे तेजी से सीखते हैं। इस काल को बोलचाल की भाषा नाजुक काल भी में कहा जाता है। तेजी से सीखने का प्रमुख कारण बीएनडीएफ (ब्रोन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में पाया जाना है। यह मस्तिष्क के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिषक के उस भाग (न्यूक्लियस बसालिस)को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध भी हो जाता है व सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है। बच्चों पर आजकल बढ़ते बस्तों का बोझ व माता पिता की बच्चों को हर प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने का दबाव भी बीएनडीएफ की मात्रा को प्रभावित कर सकता है जिससे सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जो बच्चे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते वे नकारात्मक मानसिकता के शिकार हो सकते है। अपनी असफलता का कारण दूसरों को मानते हुए
बदले की भावना मन में पाल सकते हैं।
2. मनुष्य के स्वभाव को मस्तिष्क में दो चीजें प्रभावित करती हैं। पहला डोपेमाइन सिस्टम जो मस्तिष्क मे स्थित खुशी के केन्द्र क्रियाशील बनाता है। यह स्थिति उकसाने का कार्य करती है। नशा करने, जुआँ खेलने व अन्य उकसाने वाली गतिविधियाँ डोपेमाइन को बढ़ाने का काम करती हैं। इस मनोदशा में मनुष्य की विवेकशीलता कम हो जाती है। दूसरी आक्सीटोसिन जो चित्त को शान्त करता है, मन में कोमल भावना व विश्वास पैदा करता है। भावनात्मक संबन्ध, रचनात्मक गतिविधियाँ
आक्सीटोसिन को बढ़ाने सहायक होती है। यह स्थिति भूलने में भी मददगार होती है, व दुःख से उबरने में सहायक होती है। आज की आपाधापी की जीवन शैली, बिखरते परिवार व कमजोर सामाजिक संबन्धों के चलते यह स्वाभाविक ही है कि अधिकतर लोगों में डोपेमाइन सिस्टम
अधिक प्रभावी रहता है।
3. आज के सामाजिक परिवेश में जहाँ ऐशोआराम के साधन सुख, संपन्नता व समाज में आदर पाने के मापदन्ड हों। सभी प्रकार के मीडिया ललचाने वाले विज्ञापनों तथा अपराधों व अपराधी के बच निकलने के समाचारों को 24 घन्टे दिखातें हों। तथा सिनेमा, टीवी व इन्टरनेट पर उकसाने वाली जानकारी आसानी से सुलभ हो ऐसे माहोल में निराश मानसिकता व डोपेमाइन अघिकता वाले लोग अपराध में लिप्त हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

अपराध में लिप्त होने के उपरोक्त कारणों को समझने के बाद इस समस्या का निदान आसान हो जाता है। स्कूल, परिवार व समाज अपने परिवेश में भावनात्मक दृढ़ संबन्ध बनाकर इस समस्या के निराकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। सभी प्रकार के मीडिया सकारात्मक प्रकार की
सामग्री को प्राथमिकता देकर लोगों में सही मानसिकता बनाने में सहायक हो सकते हैं। और सबसे अधिक आवश्यकता है प्रारम्भिक शिक्षा में परीक्षा पास करने अथवा बहुत सारे विषय पढ़ाने से अधिक बच्चे के पूरे व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देने की। किताबी ज्ञान से अधिक आवश्कता है दया,
ईमानदारी, मेहनत व लगन से कार्य करने की भावना, टीम भावना, दूसरों की सहायता जैसे मानव मूल्यों के विकास की। साथ ही जरूरत है रुचि अनुसार किसी न किसी प्रकार की कुशलता के विकास की, जिससे वह अपनी प्रारम्भक जीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बन सके। शिक्षा का
विस्तार लोग अपनी रुचि व सुविधा के अनुसार कर सकें इसके लिये उम्र का बन्धन विद्यालय में प्रवेश के लिये नहीं होना चाहिये। कुछ हद तक पत्राचार पाठ्यक्रमों की सुविधा है लेकिन नियमित शिक्षा का अपना अलग महत्व है।

अनश्वरता

 

बचपन में कई बड़े बुजुर्गों व उपदेशकों प्रायः कहते हुए सुना था कि शरीर नश्वर है। जानवरों को मरते व वस्तुओं को टूटते देखकर मन में विश्वास सा बैठ गया था कि पृथ्वी पर कोई भी वस्तु हमेशा के लिये नहीं है। सब नश्वर है अतः किसी भी वस्तु से मोह नहीं करो, ऐसा ही जन साधारण का मन था। परिणाम स्वरूप लोग आपस में मिल बाँट कर खाते थे। समाज आपसी सामन्जस्य था व लोग संतोषमय जीवन व्यतीत करते थे। लोग थोड़े में ही संतोष कर खुश रहते थे।

फिर कुछ बड़ा होने पर विज्ञान में पढ़ाया गया कि पदार्थ (मेटर) अनश्वर है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। पुराने विश्वास को तोड़ने के लिये नये नये तर्क दिये गये। पदार्थ का रूप बदल सकता है जैसे पानी से भाप या लकड़ी से कोयला, लेकिन वह नष्ट नहीं होता है। तर्क सटीक लगे लोगों को मानना पड़ा कि पदार्थ अनश्वर है।लोगों के मानस परिवर्तन ने उनकी जीवन शैली को प्रभावित किया। लोगों में संचय पृवत्ति बढ़ गई। लोग वर्तमान के साथ भविष्य की चिन्ता करने लगे।  पदार्थों ने नया रूप लेना शुरू किया, बाजार में संचय लायक वस्तुओं की बाढ़ सी आगई। संचय का मोह बढ़ने लगा, उदारता सिमटने लगी। समाज में संचित संपत्ति का आदर होने लगा। नये सम्मान के मापदंड़ ने लौगों में सम्मान जनक स्थान पाने के लिये होड़ सी पैदा कर दी। येन केन प्रकारेण संचय की ललक ने भ्रष्टाचार, लूट, चोरी व बेईमानी जैसी बीमारियाँ समाज में पैदा कर दी। नयी आर्थिक व्यवस्था ने समाज को गरीब व अमीर दो धड़ों में बाँट दिया।

कालेज तक आते आते आइन्सटीन का सापेक्षता का सिद्धान्त विज्ञान में पढ़ाया गया। शायद ही कुछ लोगों को ये सिद्धान्त पूरी तरह समझ आया हो। किन्तु इसका एक पहलू कि पदार्थ व उर्जा का आपस का निकट का संबंध है जल्दी ही कई लोगों की समझ में अच्छी तरह आ गया। अधिकतर लोगों ने उर्जा को शक्ति से जोड़ लिया। फिर तो शक्ति संचय की मानों होड़ लग गई। देश, संगठन, एवं व्यक्तिगत स्तर पर शक्ति संचय के प्रयास भी युद्ध स्तर पर किये जाने लगे। देशों को अपनी जनता की रक्षा के लिये शक्ति की जरूरत थी, संगठन को अपना प्रभुत्व दिखाने के लिय व व्यक्तिगत स्तर पर अपनी संचय शक्ति बढ़ाने या संचित धन की रक्षा के लिये। शक्ति संचय की प्रतिस्पर्धा का परिणाम यह रहा कि आज विस्फोटकों का भंडार पूरे भू मंडल को नष्ट करने में सक्षम है। धन संचय व शक्ति संचय के आपसी ताल मेल ने एक ऐसे वर्गों के समूह को जन्म दे दिया है जो अपने स्वयं की विचार धारा को कानून का रूप देकर पूरे राष्ट्र या विश्व पर थोपने में लगे हुए हैं।अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिये इन्हें निर्दोष व असहाय लोगों की निर्मम हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं है। आतंक फैलाना ही इनका एक मात्र उद्देश्य है। वर्चस्व स्थापना की होड़ ने मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर महाशक्तियों ने पृथ्वी पर एकाधिकार मान रखा है।  यह प्रतिस्पर्धा मानवता को कितना गिराने के बाद रुकेगी, कहना मुश्किल है।

इसको रोक पाने का एक मात्र उपाय है नश्वरता के सिद्धान्त की पुनर्स्थापना। हमारे ऋषि मुनियों ने सब कुछ शून्य में मिल जाने की कल्पना की थी, आज उसी विचार धारा को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

शायद कबीर जी ने ऐसी ही स्थिति की कल्पना कर निम्न लिखित दोहे की रचना की होगी –

गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान।

जब आये संतोष धन सब धन धूरि समान।।

जीवन रहस्य (रान्डा बर्न की पुस्तक रहस्य पर आधारित मंजुल पब्लिशिंग हाउस भोपाल, द्वारा प्रकाशित)

प्रायः हर व्यक्ति के जीवन में उतार चड़ाव आते हैं। कई बार परिस्थितियाँ इतनी खराब हो जाती हैं कि चारों ओर अन्धकार दिखाई देने लगता है। आइये ऐसा क्यों होता है इसे समझने का प्रयास करते है।
1. ब्रम्हांड में सभी लोगों के लिये पर्याप्त मात्रा में इच्छित वस्तुएें उपलब्ध हैं। इनका मिलना अथवा न मिलना हमारे सोच पर निर्भर है। हमारे विचारों के अनुरूप हम ब्राम्हांड में सकारात्मक अथवा नकारात्मक तरंगे प्रेषित करते है। सकारात्मक सोच इच्छित वस्तुओं को हमारी ओर आकर्षित करती है तथा नकारात्मक सोच उनको हमसे दूर। उदाहरण के तौर पर मेरे पास ये वस्तु नहीं है यह एक नकारात्मक विचार है। मेरे पास यह वस्तु आयेगी यह एक सकारात्मक विचार है।
1.सकारात्मक व नकारात्मक विचार पहचानने का सबसे सरल उपाय है अपने भावों को पहचानना। जब आप अच्छा महसूस करते हैं तब आप सकरात्मक सोच रहे होते हैं। तथा जब आप बुरा महसूस करते हैं तो नकारात्मक सोच रहे होते हैं।
सुखद यादें, सुन्दर प्राकृतिक दृश्य अथवा पसन्दीदा संगीत सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में सहायक हैं। प्रेम भाव सबसे शक्तिशाली सकारात्मक सोच है। इसे आप जितना महसूस अथवा प्रेषित करेगें उतने ही अधिक सकारात्मक संदेश आप ब्रम्हांड में भेजेगें।
2.रचनात्मक प्रक्रिया के तीन प्रमुख पहलू हैं-
इच्छा करें – इसका मतलब आपको अपने मस्तिष्क में स्पष्टरूप से यह जानना है कि आप क्या चाहते हैं
भरोसा करें – इसका मतलब है कि आपके कार्य, आपके विचार तथा आपकी बातचीत में अपनी वांछित वस्तु को पा लेने का भरोसा दिखना चाहिये।
प्राप्त करें – इसका अर्थ आपको इस प्रकार महसूस करना है जैसा आप अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के बाद महसूस करेगें। रचनात्मक प्रक्रिया को परखने का सबसे सरल उपाय यह है कि आप छोटी छोटी जैसे एक कप चाय अथवा पार्किंग को पाने से कर सकते है। आपका विश्वास पक्का हो जाने पर आप बड़ी वस्तुओं को भी प्राप्त कर सकेगें।
3. उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है। कृतज्ञता सकारात्मक ऊर्जा पैदा करने वाला एक शक्तिशाली उपाय है। धन्यवाद ज्ञापन कृतज्ञता दर्शाने का सबसे सरल तरीका है। इच्छित वस्तुओं की तस्वीर में कल्पना करना तथा इस तरीके अपनी मनचाही वस्तुओं का आनंद महसूस करना सशक्त सकारात्मक ऊर्जा पैदा करते हैं। यह प्रक्रिया दोहराते रहें। रात को सोते समय दिनभर की घटनाओं को याद कें तथा सिर्फ अच्छी चीजों को ही याद रखने का प्रयास करें।
4. आप मान कर चलें कि आप के पास पर्याप्त धन व सुख है। सुपात्र को दान देने व संकट में पड़े लोगों की सहायता में खुशी महसूस करें।
5. सुनिश्चित करें कि आपके कर्म, विचार, शब्द व परिवेश आपकी इच्छाओं का विरोध नहीं करें। स्वयं से प्रेम व सम्मान का व्यवहार करें, तभी आपको ऐसे लोग मिलेंगें जो आपको प्रेम व सम्मान देगें। मिलने वाले लोगों के गुणों पर ध्यान दें। जब आप शक्तियों पर ध्यान देते हैं तो आप स्वयं की ओर शक्ति आकर्षित करते हैं।
6. हँसना व खुश रहना सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है। इस प्रकार की ऊर्जा हमें स्वस्थ रखने के लिये जरूरी है। बुढ़ापे व बीमारी के बारे में समाज में व्याप्त भ्रामक बातों पर ध्यान न दें। सेहत व जोश पर ध्यान केन्द्रित करें।
7. किसी वस्तु का विरोध एक नकारात्मक विचार है। विरोध, समस्याओं व नकारात्मक घटनाओं पर ध्यान देने के बजाय विश्वास, प्रेम, शान्ति, शिक्षा पर मन लगायें। कमी के बजाय प्रचुरता पर ध्यान को केन्द्रित करें। इस प्रकार आप ब्राम्हांड के असीमित साधनों को अपनी ओर आकर्षित
करने की अपनें में सामर्थ पैदा कर सकते हैं।
8. अतीत की मुश्किलों, सामाजिक कुप्रथाओं व सांसकृतिक पंरम्परा के बंधन से मुक्त होकर ही आप उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं जिसके आप हकदार हैं। आपकी शक्ति आपके विचारों में है यह हमेशा याद रखें।
रहस्य संक्षेप-
– आपके जीवन में मन चाही चीजें प्राप्त करने के असीमित अवसर हैं।
– आपको सिर्फ अच्छा महसूस करना है।
– आपकी शक्ति का इस्तेमाल आपकी ओर उर्जा खींचेगा।
– सीमित करने वाले विचारों को छोड़ कर सृजन पर ध्यान दें।
– जिस काम से खुशी मिलती हो वह करें।

ध्यान की विधियाँ (स्वामी आदिश्वरानंदा की मेडीटेशन एन्ड इट्स प्रेक्टिस पर आधारित) अद्वैत आश्रम पब्लिशिंग डिपार्टमेंट

 

सार संक्षेप –

  1. योगा व वेदान्त की विचारधारा के अनुसार, ध्यान अपने उद्देशय से एकीकार होने की मानसिक क्रिया है। धारण करना (उद्देश्य पर केन्द्रित करना) इसकी प्रथम सीढ़ी है, जब यह धारणा सहज व निरन्तर हो जाती है तो वह ध्यान की स्थिति में पहुँच जाती है, तथा मस्तिष्क का बहाव सिर्फ उद्देश्य की ओर रहता है। ध्यान की चरम अवस्था समाधी है जिसमें मस्तिष्क उद्देश्य में लीन हो जाता है।
  2. सभी प्राणियों तीन इच्छायें प्रेरित करती है

– अमरत्व प्राप्ति की इच्छा

– असीमित ज्ञान प्राप्ति की इच्छा

– असीमित आनंद प्राप्ति की इच्छा

हम आशा व निराशा, हर्ष व विशाद, परिश्रम व आँसू तथा जीवन व मृत्यु से इन इच्छाओं की को पूरा करने में लगे रहते हैं।

  1. ध्यान हमें स्वयं को पहचानने में सहायक है। स्वयं को पहचानने की तीन स्थितियाँ है
  2. जब हम ध्यान में समय का ज्ञान खो देतें है।
  3. जब हम आसपास के वातावरण को भूल जाते है।
  4. जब हम हमारी चेतना खो देतें है। इस स्थिति में हम विदेह हो जाते हैं तथा एक असीम आनंद की अनुभूति करते हुए स्वयं के प्रकाश का दर्शन करते हैं।
  5. हमारे शरीर में सात सतहें है –
  6. मूलधारा (रीड़ का सबसे नीचे का भाग
  7. स्वाधिस्थान (जननांग)
  8. मनिपुरा (नाभि)
  9. अनहता (ह्मदय)
  10. विसुद्ध (गला)
  11. अजना (ललाट)
  12. सहरुारा (कपाल)

जब हमारा मस्तिष्क निचली तीन सतहों पर केन्द्रित रहता है तब वह काम व लोभ में लिप्त रहता है। चौथी सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने पर उसे प्रथम आध्यात्मिक ज्ञान का अहसास होता है। पाँचवी सतह पर केन्द्रित करने पर वह अज्ञान व भ्रम से मुक्त हो जाता है। छठी सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने से वह हमेशा ई·ार के दर्शन करता रहता है। सातवीं सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने से अहम नष्ट हो जाता है। इस स्थिति में मनुष्य ब्राहृज्ञानी हो जाता है। यही समाधी की स्थिति है। यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रह सकती क्योंकि इस अवस्था में बाहरी संसार से संबंध कट जाता है।

  1. ध्यान तीन स्थितियों से गुजरता है, ये हैं जागृत, स्वपनावस्था तथा गहन निद्रा अवस्था। इन तीनों स्थितियों में हम हमारा मस्तिष्क सक्रिय रहता है। एक चौथी अवस्था भी है (तुरिया) जिसमें हम आत्मा में लीन हो जाते हैं। यह अवस्था अकल्पनीय है, न हम मस्तिष्क में कल्पना कर सकते हैं, ना ही किसी वस्तु से तुलना कर सकते हैं तथा ना ही इसका वर्णन कर सकते हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क सक्रिय नहीं रहता है।
  2. ध्यान का उद्देश्य हमारे अन्दर ईश्वर को अनुभव करने का है। हमारा मन ही सभी बाहरी दिव्यता दर्शाता है। हमारे मन की शक्ति को केन्द्रित कर ही हम ईश्वर को देख सकते हैं। तर्क, प्रेम, समर्पण व प्राणायाम हमारे मस्तिष्क को नियन्त्रित करते हैं। नियन्त्रित मस्तिष्क ही मन के हर कोने को प्रकाशित करने वाला दीप है।
  3. ध्यान हमारे उल्हास को शांत करता है, हमें शान्ति प्रदान करता है तथा हमें वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखने की क्षमता प्रदान करता है। ध्यान में प्रगति को हम दूर से आने वाली घन्टियों की आवाज, कानों में गूँजते हुए मधुर स्वरों अथवा आसपास तैरते हुए प्रकाश से पहचान सकते हैं।
  4. योग द्वारा दर्शायी ध्यान विधि-

– योग वास्तविकता को पुरुष व प्रकृति में विभाजित करता है। हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, मस्तिष्क व बुद्धि प्रकृति है। पुरुष इन सबसे परे हम स्वयं है। हमारा पुरुष शरीर, इन्द्रियों, मस्तिष्क, बुद्धि व आनंद की पाँच परतों (कोषों) से ढँका रहता है। प्रकृति व पुरुष, मन व पदार्थ मिलकर हमारा व्यक्तित्व व विविधता प्रदान करते है।

– अज्ञानता, अहं, लगाव, घृणा एवं जीवन का मोह हमारे सभी दुःखों का कारण हैं। बार बार दोहरायी गई सोच व विचार हमारे मन व शरीर में बस जातें हैं। ये हमारी आदतों को जन्म देते हैं तथा हमारे व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं, जिन्हें हम संस्कार कहते हैं। ये हमारे चित्त में पाँच अवस्थाओं बस जाते हैं। पहली निष्क्रिय अवस्था। दूसरी सुप्त अवस्था, उचित वातावरण जैसे प्रशंसा व पुरस्कार मिलने पर ये उभर आती हैं तथा दंड आदि के प्रतिकूल वातावरण में नियन्त्रित रहती हैं। तीसरी अवस्था में ये दबी हुई किन्तु ताकतवर रहती हैं। चौथी अवस्था में ये हमारे स्वयं के विपरीत अनुभवों के कारण स्वनियन्त्रण से शिथिल पड़ जाती हैं।

ये स्वप्रयास से पुनर्जीवित की जा सकती हैं। पाँचवीं अवस्था इनसे ऊपर उठने की है जो लगातार ध्यान द्वारा ही संभव है।

– इस प्रकार लगातार ध्यान द्वारा हम आध्यात्मिक संस्कारों को जागृत कर सकते हैं तथा विरोधी संस्कारों को नियंत्रित कर सकते हैं। स्वब्राह्म्य से साक्षातकार कर लेने बाद मानव वृत्ति जैसे इच्छा व ललक समाप्त हो जाती हैं।

– योग के अनुसार कुविचारों को सुविचार से, कुकल्पना को सद्कल्पना से बिना सोचे समझे उद्बोधन को सोच समझकर बोलने से एवं गलत शारीरिक स्थिति को सही शारीरिक स्थिति अपनाकर ही नियन्त्रित किया जा सकता है। इन सबके लिये मस्तिष्क को नियन्त्रण में रखने का प्रयास जरूरी है।

– सफल नियन्त्रण के लिये जरूरी है कि हम हमारे मस्तिष्क को ध्यान की ओर मोड़कर स्वंय को पहचानने का नियन्त्रित प्रयास करें।

– योग हमें आसनों के माध्यम से हमारे उद्वेलित शरीर इन्द्रियों व मन को शान्त करना सिखाता है। प्राणायाम मस्तिष्क को शान्त करता है तथा गलत विचारों व वृत्तियों को नियन्त्रित करने के लिये ध्यान द्वारा आदर्श संस्कारों को विकसित करना सिखाता है।

– योग के अनुसार निम्न लिखित आठ कदम स्वयं को पहचानने के लिये आवश्यक हैं –

  1. यम (अंकुश) द्वारा अहिंसा, सत्य, लालच का त्याग, पुरस्कार अथवा उपकार लेने का त्याग तथा पवित्र आचरण की आदत डालना।
  2. नियम (संयम) स्वच्छता, संतोष, सादगी, धर्म ग्रन्थों का अध्ययन व कर्मों के फल को ईश्वर पर छोड़ देने जैसे पाँच आचरणों का पालन।
  3. आसन यह शरीर को स्थिर व आरामदायक रखने में सहायक है। यह मस्तिष्क को केन्द्रित करने में भी सहायक है। आसन में रीड़ को सीधा रखना चाहिये जिससे ध्यान के समय नाड़ी से प्रवाह ऊपर की ओर उठसके।
  4. प्राणायाम श्वास ब्राम्ह ऊर्जा का भाग है। नियन्त्रित व लयबद्ध श्वास द्वारा मन शान्त हो जाता है।
  5. प्रत्याहरा (वैराग्य) इच्छानुसार इन्द्रियों से विरक्त होना।
  6. धारण, मन को एक वस्तु पर केन्द्रित करना।
  7. ध्यान, इसकी शुरुआत तब होती है जब धारण लगातार व सहज हो जाये।
  8. समाधि, जब ध्यान निरन्तर होकर ध्यान की विषय वस्तु में लीन हो जाये। समाधि दो प्रकार की होती है –

– संप्रज्ञानता मस्तिष्क में प्रश्न उपजते है (सवितर्क) जिनका वह समाधान

सोचता है (सविचारक), तत्पश्चात वह स्वभाविक रूप से निर्विचार होकर आनंद दायी (सानंद) हो जाती है।

– असंप्रज्ञानता यह मस्तिष्क की सभी गतिविधियों पर रोक लगाने के प्रयास से प्राप्त होती है। इसमें मन में सिर्फ अव्यक्त अहसास भर होता है।

  1. वेदान्त में ध्यान –

– वेदान्त के अनुसार ध्यान एक सघन मानसिक उपासना है। इसमें मन को लगातार शास्त्रो द्वारा अनुमोदित किसी पवित्र विषय पर केन्द्रित करना होता है। इससे संबन्धित विषय के विचार प्रवाह ही मन में आते हैं। सभी विरोधाभासी विचार समाप्त होकर अन्त में परम सत्य से साक्षातकार हो जाता है।

– ब्राहृ जो परम सत्य है, जिसे परमात्मा भी कहते हैं वह हम स्वयं हैं। वह स्वयं प्रज्ञ है।

– निर्गुण ब्रह्म स्वयं को समय व अन्तरिक्ष में सगुण ब्रह्म के रूप में व्यक्त करता है। वह एक सृजन कर्ता, पालन कर्ता अथवा विनाश कर्ता का रूप धारण कर लेता है। मनुष्य द्वारा उपासना किये जाने वाले देवताओं के नाम सगुण ब्रह्म को नाम देने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है।

– स्वयं को पहचानने का प्रयास करने वालों को ध्यान लगाने लायक बनने के लिये निम्नलिखित चार अनुशासन का पालन आवश्यक है –

  1. सत्य और भ्रम का अन्तर समझना, सिर्फ ब्रह्म ही सत्य है।
  2. इच्छाओं का त्याग।
  3. मन को नियन्त्रित करना, इन्द्रियों को वश में करना, सांसारिक आनंद से विरक्ति, धीरज रखना, धार्मिक साहित्य में आस्था तथा ब्रह्म में मस्तिष्क को केन्द्रित करना, इन छह गुणों की आदत डालना।
  4. सभी बन्धनों से मुक्त होने की तीव्र इच्छा।

– बीमारी, संशय व अनिर्णय तथा मन की चंचलता स्वयं को पहचान पाने

में रुकावट हैं।

– उपरोक्त चार अनुशासन वेदान्त ध्यान के आधार हैं। इसके अतिरिक्त वेदान्त ध्यान की तीन अवस्थायें वर्णित करता है। ये हैं योग्य गुरु को सुनना, ब्रह्म पर सुने हुए विचारों पर चिन्तन करना तथा ध्यान लगाना यानि सिर्फ चिर ब्रह्म संबन्धी विचारों को निरन्तर मन में रखना तथा अन्य सभी शरीर, मन, इन्द्रियों व अहम संबन्धी विचारों का त्याग करना।

– वेदान्त के अनुसार समाधि दो प्रकार की होती है। एक सविकल्प समाधि जिसमें साधक को ध्यान की विषय वस्तु का ज्ञान रहता है। दूसरी निर्विकल्प

जिसमें साधक स्वयं को भूल कर ब्रह्म में लीन हो जाता है।

  1. वेदान्त साधकों को तीन श्रेणियों में बाँटता है। उत्कृष्ट साधक वे हैं जो अज्ञान द्वारा थोपी गई सभी सीमाओं को नकार कर ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करते हैं। मध्यम साधक वे हैं जिन्हें गुरु ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के लिये मन्त्र जाप का निर्देश देतें है। निम्न श्रेणी में वे साधक आते हैं जिन्हें किसी साकार इष्ट को ध्यान में रख कर ऊँ का जाप करने का गुरु निर्देश देते हैं।
  2. वेदान्त के अनुसार ध्यान की विषय वस्तु ये हो सकती हैं –
  3. ईश्वर, जो स्वयं में है तथा महान शिक्षक है

2 ईश्वर, परमब्रह्म

  1. ईश्वर का अवतार
  2. विराट पुरुष, ब्रह्मांडीय पुरुष
  3. ऊँ, गायत्री मंत्र, वेद शलोक जैसे प्रज्ञानम ब्रह्म, अहं ब्रह्मांस्मि, अयं आत्म ब्रह्म, तत् त्वाम असि आदि पवित्र शब्द
  4. कथा उपनिषद् के अनुसार मन व पदार्थ एक ही वस्तु से बने हैं। अलग अलग आवृत्ति की प्राण की तरंगें उसमें ठोस, तरल, अच्छा अथवा बुरा आदि गुणों के रूप में दिखती हैं। तरंगें प्रगट रूप में जैसे किसी चलित वस्तु में, अप्रगट रूप में जैसे सुगंध, प्रकाश अथवा अन्धकार में या अप्रत्यक्ष रूप जैसे आलस्य, अशान्ति व प्रसन्नता के रूप में परिलक्षित हो सकती हैं।
  5. वेदान्त के अनुसार तरंगें तीन समूहों में बाँटी जा सकती हैं –
  6. तामस जैसे आलस्य ये शरीर की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं
  7. राजस जैसे इच्छा अथवा लगाव के कारण मन की अस्थिरता, इससे अहंम पैदा होता है जिस कारण स्वयं के ज्ञान में विकार आ जाता है
  8. सात्विक जैसे मन की शान्ति, यह पवित्र माना जाता है, क्योंकि यह

स्वयं की छबि को सबसे कम विकृत करता है

  1. हमारी तरंगें दूसरों को प्रभावित करती हैं तथा दूसरों से प्रभावित होती हैं। इन तीनों प्रकार की तरंगों का समन्वय हमारा चरित्र निश्चित करता है। तीनों प्रकार की तरंगें हमारे मस्तिष्क में हमेशा रहती हैं। अलग अलग समय में अलग प्रकार की तरंगें प्रबल हो सकती है। पवित्र स्थान सात्विक तरंगों को विकसित करने में सहायक होते हैं। अधिकतर पवित्र स्थल अपनी शान्त प्रकृति खोते जा रहे हैं।
  2. हमारा भोजन हमारे शरीर व मन को प्रभावित करता है, क्योंकि स्वभाव से दोनों पदार्थ हैं। हमारे भोजन का बड़ा हिस्सा मल के रूप में निकल जाता है, मध्य भाग से रक्त बनता है तथा सबसे उत्तम भाग हमारे मस्तिष्क मे चला जाता है। कुछ

खाद्य पदार्थ हममे तामस भाव पैदा करते है कुछ राजस तथा कुछ सात्विक भाव। भौजन की शुद्धता के लिये सामग्री व आध्यात्मिक शुद्धता दोनों जरूरी हैं। भोजन में तीन तरह की अशुद्धियाँ संभव हैं

– जातीय शुद्धि, प्याज व लहसुन उदाहरण के तौर पर उकसाने वाले पदार्थ हैं

– निमित्त अथवा धूल, बेक्टीरिया, थूक आदि से संक्रमणित भोजन

– आश्रय अथवा नैतिक अशुद्धता, इस प्रकार की अशुद्धि किसी अपवित्र, दुराचारी अथवा दुष्ट व्यक्त के बनाने व छूने से आ जाती है।

  1. ध्यान केन्द्रित करने का एक परखी हुई विधि है स्व विश्लेषण द्वारा नकारना है। विश्लेषण व नकारने के सात चरण हैं –
  2. अन्तर्मन में ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र आग पैदा करना। उसमें इच्छाओं,

लगाव व अनिशचित्ताओं की आहुति दें। स्वनियन्त्रण व नियमों का कठोरता से पालन करें

  1. मस्तिष्क को स्वतन्त्रता से भटकने दें। यह आभास कि आप मन को

भटकते हुए देख रहे है, उसका दायरा सिमटकर स्वयं की पहचान पर

केन्द्रित हो कर रह जायेगा

  1. धीरे धीरे सप्रयास हर विचार को पूर्ण चेतन में लीन कर दें
  2. अपने शरीर को रथ, आत्मा को उसका स्वामी, बुद्धि को उसका सारथी

तथा मन को उसकी लगाम मानें। साधक को मस्तिष्क को केन्द्रित कर

स्वयं की पहचान शरीर के अन्दर आत्मा(ब्रह्म) से करनी चाहिये।

  1. आत्मा का प्रकाश शरीर, मन, बुद्धि व आनंद से ढँका रहता है। इन

परतों को हटाकर ही आत्मा को पूरी तरह प्रकाशित देख सकते हैं।

  1. स्वयं को ब्रह्मान्ड का एक हिस्सा माने। शरीर विराट पुरुष का हिस्सा है,

प्राण ब्रह्मान्डीय शक्ति व मस्तिष्क ब्रह्मान्डीय मस्तिष्क का भाग है। आत्मा

ब्रह्मात्मा अथवा स्वयं का भाग है

  1. साधक इन्द्रियों व शारीरिक आनंदों को दोष मान कर इनसे अपने

मन को हटाये। ध्यान के लिये आसन, निश्चित समय,एकान्त व शान्त

वातावरण महत्वपूर्ण हैं।

  1. ध्यान की अन्य विधियाँ हैं –

– स्वयं का विश्लेषण, ये विधि उनके लिये है जो निराकार ब्रह्म पर ध्यान लगाते है। इसमें साधक

  1. स्वयं के अन्दर हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्जवलित होने का अनुभव करता है
  2. भटकते हुए मस्तिष्क पर नजर रखता है
  3. आत्मा की परतों (शरीर, प्राण, मन, बुद्धि व मोक्ष) को नकारता है।
  4. परम ब्रह्म को अपने अन्दर महसूस करता है
  5. स्वयं को ब्रह्मान्ड का हिस्सा मानता है
  6. विरक्ति के विचारों को जगाते हुए भौतिक सुखों से दूर हो जाता है

– रहस्मय उपासना, अपने इष्ट को हृदय में रखकर मानसिक आराधना।

– जप, निर्धारित समय व स्थान पर रोज मंत्रों की निर्णित संख्या में दोहराना

– प्राणायाम अथवा श्वास का नियन्त्रण

  1. प्राणी के श्वास लेने की गति का उसकी जीवित रहने की अवधि से सीधा संबंन्ध है। मनुष्य श्वास गति पहले करीब 12-13 प्रति मिनिट होती थी तथा औसत आयु 100 वर्ष, आजकल 15-16 है तथा आयु 80 वर्ष। इसी प्रकार हाथी की 11-12 आयु 100 वर्ष, कछुए की 4-5 आयु 150 वर्ष, बन्दर की 31-32 आयु 20 वर्ष तथा खरगोश की 38-39 आयु 8 वर्ष।
  2. प्राणायाम पाँच क्रियाओं को प्रभावित करता है –

– प्राण, श्वास क्रिया (इसका स्थान ह्मदय है)

– अपान मल उत्सर्जन क्रिया

– समान पाचन क्रिया

– उदान भोजन, निद्रा व मृत्यु के समय शरीर से प्राण निकलने की क्रिया (इसका स्थान गला है)

– व्यान रक्त संचार क्रिया (इसका स्थान पूरा शरीर है, ये रोग से बचाव करता है

  1. प्राणायाम में श्वास अन्दर खींचने को पूरक (मैं ब्राहृ स्वरूप हूँ विचार लाना), रोके रखने को कुम्भक (ब्रह्म स्वरूप विचार में स्थिरता) तथा बाहर छोड़ने को रेचक (संसार से विरक्ति) कहते है।
  2. प्राणायाम हमारी सुप्त कुन्डालिनी को शुस्मना नाड़ी में ऊपर उठाकर जागृत अवस्था में लाने में सहायक है।
  3. प्राणायाम में पूरक, कुम्भक व रेचक का समय अनुपात 1, 4 व 2 बताया गया है। समय की गणना मन में गिनकर अथवा ऊँ या गायत्री मंत्र की आवृति से की जा सकती है। समय धीरे धीरे बड़ाया जा सकता है। ऊँ के उच्चारण को एक सेकन्ड मानकर साधारण प्रणायाम का समय 12, 48 व 24 सेकन्ड, मध्यम

24, 96 व 48 सेकन्ड तथा गहन 36, 144 व 72 सेकन्ड बताया गया है।

  1. ध्यान की प्रगति के 12 संकेत –
  2. रहस्यमय अनुभूति

साधक अपने अन्दर एक के बाद एक बर्फ गिरना, चमकीले धुँए, तेज हवा, तैरती आग अथवा चमत्कृत कर देने वाली बिजलियाँ आदि महसूस होती है। कभी कभी ध्यान के समय हीरे से निकलते हुए शीतल प्रकाश या चंद्रमा भी दिखता है। इस प्रकार का अहसास ध्यान की प्रगति दर्शाता है।

  1. कुन्डालिनी का ऊपर उठना

वेदान्त के अनुसार 14 लोक होते है। सात उच्च लोक उठते क्रम में हैं भूर् (पृथ्वी), भुव, स्वः (स्वर्ग), महः, जनः तपः व सत्य। निचले सात लोक हैं गिरते क्रम में अताल, विताल, सुताल, रसातल, तलातल, महातल व पाताल। यह सभी लोक मनुष्य के शरीर में स्थित हैं। पृथ्वी को रीड़ के मूल(मूलाधार) में स्थित माना जाता है। ये लोक आध्यात्मिक रूप से कमल के रूप में हर केन्द्र पर महसूस किये जा सकते हैं। मूलाधार पर कमल चार पंखुड़ी वाला होता है तथा सांसारिक इच्छाओं व व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है। दूसरा स्वाधिस्थान (जननांग) सिन्दूरी रंग का छह पंखुड़ी वाला होता है। यह पशु प्रवृत्ति के रूप में परिलक्षित होता है। तीसरा मणिपुरम (नाभि) स्थित घने बादल के रंग का दस पंखुड़ी का होता है। यह भावनओं के रूप में दृश्य को धुँधला करता है। चौथा अनाहत(ह्मदय) स्थित लाल ज्वाला के रंग का बारह पंखुड़ी का होता है। यह आध्यात्मिक व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है। पाचवाँ विसुधा (गला) स्थित भूरे बैंगनी रंग का सोलह पंखुड़ी वाला होता है। यह शुद्धता के रूप में परिलक्षित होता है। छठा अजना (भोहों के मध्य) स्थित दो पंखुड़ी का सफेद रंग का होता है। यह सत्य के रूप में परिलक्षित होता है। सातवाँ सहररा (सिर के ऊपर) स्थित हजार पंखुड़ी वाला चमकीला सफेद रंग का होता है। यह परम सत्य एवं मुक्त्ति के रूप मे परिलक्षित होता है। जैसे जैसे कुन्डालिनी का केन्द्र स्थल ऊपर उठता जाता है साधक के व्यवहार में उसके अनुसार परिवर्तन होने लगते हैं। निचले सात लोकों की स्थिति पैरों में होती है।

  1. क्रिया की शीघ्रता

योग के अनुसार मस्तिष्क पाँच प्रकार के होते हैं। क्षिप्त (अस्थिर), मूढ़ (नासमझ), विक्षिप्त (कभी कभी स्थिर),एकाग्र (केन्द्रित) तथा निरुद्ध (संयत)। आखिरी दो प्रकार के व्यक्ति ही ध्यान करने योग्य होते हैं। प्रगति की चार दशायें होती है। प्रारम्भिक, कौशिश करने की, माहिर व उत्तम। योग व वेदान्त के अनुसार

12 सेकन्ड के लिये विषय पर केन्द्रित करना धारण की एक इकाई है। इसका बारह गुना यानि 144 सेकन्ड ध्यान की एक इकाई है। तथा इसका बारह गुना यानि 1728 सेकन्ड समाधि की एक इकाई है।

  1. वैराग्य की सीमा

वैराग्य की चार अवस्थायें हैं –

  1. यात्मना, इस अवस्था में साधक को भान होता है कि इन्द्रीय सुख अवान्छनीय हैं तथा वह उन्हें त्यागने का प्रयास करता है।
  2. व्यतिरेक, इस अवस्था में उसके समझ में साफ तरह से आ जाता है कि किन इच्छाओं को दबाना है।
  3. एकेन्द्रिय इस अवस्था में साधक सुख, दु:ख, लगाव, आदर एवं अनादर से

ऊपर उठ जाता है।

  1. वशीकर, इस अवस्था में साधक स्वेच्छा से सभी सुखों व कष्टों से दूर रहता है।
  2. एकाग्रता की स्थिति

– इस स्थिति तक पहुँचने पर अन्य सभी विषय वस्तु को छोड़ कर साधक सिर्फ ध्यान की विषय वस्तु में रम जाता है।

  1. ध्यान की स्थिति

ध्यान की चार अवस्थायें है, पहली चुप रहने की, दूसरी बच्चों सी सरलता, तीसरी शिथिलता व चौथी स्वयं को भूल जाना जैसे गहरी नींद।

  1. ध्यान मे डूबने की गहराई

इसको सात सतहों में बाँटा जाता है, जैसे सवितर्क (मन में शंका या प्रश्न होना), निर्वितर्क (निशंक), सविचार ( इन्द्रियों के प्रति चेतना), निर्विचार (अचेतन मन), सानंद (आनंद का अनुभव करना), अस्मिता (स्वयं में ब्रह्म का अनुभव ) एवं समाधि (स्वयं को ब्रह्म मे लीन करना)।

  1. कुम्भक का अनुभव शारीरिक बैचेनी श्वास अशान्ति में परिलक्षित होती है। श्वास को रोके रखना अन्दर की शान्ति का प्रतीक है। यह तभी प्रभावशील हो सकती है जब अध्यात्म से प्रेरित हो कर अभ्यास किया जाये।
  2. विरक्ति की गहराई

इसकी सात अवस्थायें मानी गई हैं-

– शुभेच्छा, अच्छे व पवित्र लोगों की संगत तथा ज्ञान प्राप्ती की इच्छा

– विचर्ण, ध्यान व स्वनियन्त्रण का प्रयास

– तनुमानस, सांसारिक सुखों से विरक्ति तथा धयान में सहजता

– सत्वपत्ती, उद्देश्य की समझ व अन्य विचारों की क्षीणता

– असमसक्ति, आन्तरिक आनंद का अनुभव इच्छाओं से ऊपर उठना

– पदार्थभाविनि, केवल ध्यान की विषय वस्तु को समर्पण

– तुर्यग, स्वयं में लीन हो जाना

मान्डुक्य उपनिषद के अनुसार पहली तीन जागृत अवस्थायें हैं, चौथी स्वप्नावस्था है, पाँचवीं निद्रावस्था, छठी गहन निद्रावस्था एवं सातवीं परम अनुभूति की मुक्त अवस्था है।

  1. स्वयं को पहचानने की स्थिति

ध्यान का चरम लक्ष्य पर अलग अलग चरणों में पहुँच पाते हैं। पहले चरण में ज्ञात होता है कि सत्य हमारे भीतर ही है। दूसरे चरण में लगाव, द्वेष, व कष्टों से मुक्ति। तीसरे चरण में स्वयं में समाहित हो जाना। चौथे चरण में मुक्त भाव से ब्रह्म व सम्बन्धों के बीच विचरण। पाँचवें चरण में शरीर व मस्तिषक की आवश्यकता समाप्त होने की अनुभूति। छठे चरण में अनुभवों की विस्मृति व सातवें व अन्तिम चरण में आत्मलीन हो जाना।

  1. आध्यात्मिक भावों का अनुभव आध्यात्मिक समर्पण के भावों के आठ स्तर माने जाते हैं। ये हैं अचेतनता, पसीना आना, रोमांच, गला भरआना, कँपकपाहट, पीला पड़ जाना, आँसू आ जाना व मूर्छा। इनकी चार स्थितियाँ मानी गई हैं। पहली सुलगना इसमें 1-2 भावों का अनुभव होता है जिन्हें दबाया जा सकता है। दूसरी चमकना इसमें 2-3 भावों का अनुभव होता है जिन्हें नियन्त्रित किया जा सकता है। तीसरी ज्वलंत इसमें 4-5 भावों का अनुभव होता है जिन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। चौथी प्रज्जव्लित इसमें 5 से अधिक भावों का तीव्र अनुभव होता है।
  2. मानसिक शक्ति एवं उपलब्धि

काफी अधिक ध्यान में प्रगति के उपरान्त उपासक को कई प्रकार एवं विभिन्न तीव्रता की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है। ये हैं –

  1. परोक्ष दर्शन
  2. परोक्ष श्रवण
  3. दूर संवेदन
  4. आत्म ज्ञान
  5. स्वयं को अत्यधिक शक्तिशाली बनाने की क्षमता।
  6. स्वयं को अदृश्य, छोटा अथवा बड़ा करने की क्षमता।
  7. डर, भूख, प्यास आदि पर विजय।

हमारा भारत स्वतन्त्र है

स्कूल में हमें स्वतन्त्र भारत के बारे में पढ़ाया था,
सरकार को जनता के लिये जनता के द्वारा बताया था।
लेकिन वास्तव में मतलब आज समझ में आया है,
सरकार ने सही मायनों में देश को स्वतन्त्र बनाया है।
सरकार कड़े नियम बनाने के लिये स्वतन्त्र है,
किन्तु अपराधी भी अपराध करने को स्वतन्त्र है।
राजनेता विकास के नाम पर जेब भरने को स्वतन्त्र है,
व्यापारी मनचाही कीमत छापने के लिये स्वतन्त्र है।
बाहुबली सरकारी संपत्ति को अपना समझने को स्वतन्त्र है,
धर्म गुरू जनता को बहलाने के लिये स्वतन्त्र है।
अफसर गण मनमानी करने के लिये स्वतन्त्र है,
जनता पैसे से मनचाहा काम करवाने को स्वतन्त्र है।
सरकार ने जनता को असीमित अधिकार दे दिये हैं,
अधिकारों के प्रचार में अपने सारे साधन झोंक दियें है।
जनता को जानकारी हाँसिल करने का अधिकार है।
सभी भारतवासियों को भोजन का अधिकार है।
किसानों को आत्म हत्या का अधिकार है,
व्यापारियों को मिलावट का अधिकार है।
बदमाशों को लूटपाट करने का अधिकार है,
पुलिस को खुली छूट देने अधिकार है।
सभी बच्चों को शिक्षा पाने का अधिकार है,
स्कूलों को मनमानी फीस लेने का अधिकार है।
जन प्रतिनिधियों को हंगामा करने का अधिकार है,
पत्रकारों को पैसे लेकर खबर बनाने का अधिकार है।
जनता को वोट डालने का अधिकार है,
चुनने के बाद नेताओं को वादे भूलने का अधिकार है

भारत में आपदा प्रबन्धन

आपदा कभी भी कह कर नहीं आती है यह एक पुरानी कहावत है। इससे निपटने के लिये संयम, त्वरित निर्णय व युद्ध स्तर पर कार्य क्षमता का होना आवश्यक है। हाल ही में उत्तराखन्ड में जो आपदा आई उसका परिणाम स्तब्ध कर देने वाला था। पूरे देश में अभी तक इस पर बहस जारी है कि आपदा किस कारण से आई। राजनीतिक दोषारोपण भी काफी हुए। यहाँ तक कि न्यायतन्त्र को भी राहत कार्य में दखल देने को मजबूर होना पड़ा। कई राजनेताओं ने इस अवसर का लाभ अपनी छबि सुधारने के लिये भी उठाया। किन्तु हमारे आपदा प्रबन्धन में कहाँ कमी रह गई व हमारे आपदा प्रबन्धन तन्त्र को कैसे और प्रभावी बनाया जाय इस और किसी का ध्यान गया हो ऐसा समाचार देखने सुनने को अभी तक नहीं मिला।
जापान में कुछ समय पूर्व लगभग इसी स्तर की आपदा सुनामी व उसके प्रभाव स्वरूप परमाणु संयन्त्र से रिसाव के रूप में आई थी। जिस कुशलता व गति से सरकार और वहाँ की जनता ने आपदा प्रबन्धन में सहयोग किया उसकी प्रसंशा पूरी दुनिया में हुई थी। क्या हम इससे कुछ सीख नहीं ले सकते।
वैसे तो मेरा अपना तो आपदा प्रबन्धन का कोई अनुभव नहीं है, किन्तु सहज बुद्धि के अनुसार निम्न लिखित बातों पर यदि ध्यान दिया जाये तो हम बेहतर आपदा प्रबन्धन कर सकते है।
आपदायें दो प्रकार की हो सकती हैं। पहली वे आपदायें जिसके लिये किसी न किसी रूप में मनुष्य जिम्मेदार है, जैसे बाँध से अचानक पानी छोड़ना, बाँध का टूट जाना, किसी पुरानी इमारत का गिर जाना,परमाणु संयन्त्र से रिसाव अथवा खुले गड्डे में किसी बच्चे का गिर जाना आदि। दूसरी वे आपदायें जिसके लिये प्रकृति जिम्मेदार है, जैसे तूफान का आना,बाढ़ का आना, भूकम्प का आना अथवा जमीन व पहाड़ खिसकना आदि।
दोनों प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिये सबसे आवश्यक बात है हमारी इन आपदाओं से निपटने की तैयारी। तैयारी में सबसे पहले जरूरत है आपदा क्षेत्र की पहचान। हर क्षेत्र को दोनों प्रकार की आपदाओं की संवेदनशीलता के अनुसार चिन्हित करना जरूरी है। स्थानीय प्रशासन को इसके लिये प्रशिक्षित करना चाहिये तथा इसे कम से कम साल में एक बार पुनर्रीक्षण कर स्थानीय जनता को सूचित करना चाहिये। तैयारी की दूसरी जरूरत हर गाँव व मोहल्ले मे एक दो स्वयंसेवकों की पहचान व उन्हें वहाँ की संभावित आपदा से निपटने के लिये प्रशिक्षित करने की। आसपास के स्वयंसेवको की आपसी जानकारी भी एकदूसरे के पास होने से अतिरिक्त सहायता मिलने में आसानी हो सकती है। प्रशिक्षण में संभावित आपदा का पूर्वाकलन व उससे निपटने के उपायों का समावेश जरूरी है। स्थानीय स्वयंसेवकों के पास आपदा के समय किसको संपर्क करना है उसकी जानकारी व
संपर्क करने का साधन होना आवश्यक है। संभव हो तो एक रेडियो फोन उपलब्ध कराये जायें। स्वयं सेवक अपने पास जरूरत की वस्तुओं की सूची प्रथमिकता के आधार पर बना कर रखें ताकि आपद स्थिति में चूक नहीं हो। हर संभावित आपदा क्षेत्र में आपत्काल में स्थानीय निवासियों के लिये सुरक्षा निर्देश लिखित रूप में दर्शाये जायें व उनके प्रति जागरुकता पैदा की जाये।
इन स्थानीय स्तर की तैयारियों के अतिरिक्त शासकीय स्तर पर भी तैयारियाँ आवश्यक है। शहर व जिला स्तर पर एक संयोजक हो, किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। लेकिन आपदा के समय सिर्फ आपदा प्रबन्धन ही उसकी प्राथमिकता हो इसके लिये उसे किसी अन्य आदेश की आवश्कता न हो। आपात स्थिति में आवश्यक वस्तुएें यथा खाद्य सामग्री, दवायें व यातायात के साधन आदि कहाँ से प्राप्त करना है यह जानकारी उसके पास होनी चाहिये। संयोजक के आपात अधिकारों की जानकारी संभावित स्श्रोतों को होनी चाहिये। वस्तुओं व सेवाओं का उचित मूल्य आपद स्थिति से निपटने पर संयोजक द्वारा चुकाना आवश्यक है। यह धन सरकार प्रदान करे। अन्य सहायता समूहों व मीडिया से समन्वय का कार्य भी सिर्फ संयोजक ही करे। जिला संयोजको के लिये राज्य स्तरीय अधिकारी को आपदा प्रबन्धन की जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। इस अधिकारी के लिये भी आपदा प्रबन्धन प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिये। इस अधिकारी का प्रमुख कार्य आवश्यकतानुसार बाह्र सहायता यथा सेना को बुलाना, हवाई यातायात प्रबन्ध आदि व राज्य व केन्द्र सरकार को स्थिति जानकारी देना व आवश्यक धन उपलब्ध कराना आदि हों। सभी प्रकार की पूर्व चेतावनियों की
जो उस राज्य से संबन्धित हो एक प्रति सीधे राज्य के आपदा प्रबन्धक को भेजना आवश्यक हो।
इन तैयारियों के अतिरिक्त वैज्ञानिक जानकारियाँ एवं विश्लेषण करने वाले विभागों से आपदा संबन्धित तथ्य व जानकारी समय पर संबन्धित राज्य के आपदा प्रबन्धकों को सार रूप में उचित समय सीमा में सीधे भेजी जायें। इन तैयारियों के अलावा सबसे अधिक जरूरी है मानव जनित आपदाओं को रोकना। राज्य व केन्द्र स्तर पर सभी बड़ी योजनाओं की मंजूरी के पहले संभावित खतरों का विश्लेषण व उससे निपटने के उपायों की जानकारी राज्य के आपदा प्रबन्धक के पास अवश्य ही होना जरूरी है। यहाँ यह माना जा रहा है कि योजना की स्वीकृति देते समय संभावित खतरों का विश्लेषण समुचित रूप से किया जाता है व एक सीमा से अधिक खतरे वाली योजनाओं को स्वीकृति प्रदान नहीं की
जाति है। इसी प्रकार स्थानीय मकानों की स्वीकृति स्थानीय संभावित खतरों व मकानों की सुरक्षा के मापदन्डों के अनुसार ही दी जानी चाहिये। ये मापदंड संबन्धित विभागों को विषेशज्ञों की सहायता से राज्य के आपदा प्रबन्धन द्वारा उपलब्ध करवाना चाहिये व आवश्यकता अनुसार। इसके अतिरिक्त स्थानीयप्रसाशनीय स्वयंसेवक स्तर पर निम्न लिखित सावधानियाँ बरती जा सकती है जैसे:-
1. बड़ी इमारतों व मार्केट स्थलों में बिजली, लिफ्ट व आग संबन्धी सुरक्षा उपायों का निर्धारित समय पर आकलन।
2. बाँधों व झीलों में से पानी छोड़ने की पूर्व सूचना जारी करना। यथा संभव ग्राह्र क्षेत्र में वर्षा के अनुसार पहले से आकलन कर धीरे धीरे पानी छोड़ना।
3. धार्मिक अवसरों पर भीड़ की अपेक्षानुसार प्रबन्ध करना ताकि भगदड़ की नौबत न आये।
4 गड्डों को खुला न छोड़ना।
5. पुरानी व ठीक रखरखाव रहित इमारतों पर निगरानी व समय रहते खाली करवाना। आदि।
अन्त में उक्त सभी उपायों को प्रभावी तभी बनाया जा सकता जब शासन तन्त्र में दृढ़ इच्छा शक्ति हो तथा सरकार पर जनता का विश्वास हो।

बीएचईएल का देश के तकनीकी विकास में योगदान

 

विज्ञान ने विद्युत उर्जा के रूप में मनुष्य की जीवन शैली को उत्कृष्ट बनाने के लिये सबसे बड़ा उपहार दिया है। प्रति व्यक्ति विद्युत उर्जा खपत किसी भी देश के विकास व संपन्नता का पैमाना है। किसी भी देश के विकास को गति देने के लिये विद्युत उर्जा का उपलब्ध होना जरूरी है। अतः यह स्वाभाविक था कि स्वतन्त्रता के बाद भारत की आर्थिक विकास को दिशा देने वाले महान सलाहकारों ने बुनियादी आधार खड़ा करने में विद्युत उर्जा को उचित महत्व दिया। यही कारण था कि 1956 में एचईआईएल (हिन्दुस्तान इलेक्ट्रिकल इन्डस्ट्रीज लिमिटेड) की नींव भोपाल में रखी गई, जो आज देश की एक प्रमुख विद्युत उपकरण उत्पादक व इन्जीनीयरिंग कारपोरेशन बीएचईएल का अंग है। बीएचईएल को स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य भारत को विद्युत उर्जा के उत्पादन, संप्रेषण व उपयोग के सभी क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाना था। अपने लगभग 60 दशकों के सफर में बीएचईएल ने अपने मूल उद्देश्य की पूर्ती का सशक्त प्रयास किया है।
अभी तक 1000 से अधिक हाइड्रो, थर्मल, गैस, न्यूक्लियर आदि विद्युत उत्पादक संयन्त्रों, जिनकी उत्पादन क्षमता लगभग 1,24,000 मेगीवाट है, की पूर्ती के अतिरिक्त बीएचईएल ने देश के औद्योगिक विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें से प्रमुख हैं रिफाईनरी, पेट्रोकेमिकल, फर्टीलाइजर, सीमेन्ट, पेपर, स्टील, माइनिंग, अल्यूमिनीयम व रेल्वेज।
इस प्रक्रिया में बीएचईएल न सिर्फ इन क्षेत्रो में उच्च गुणता के उत्पादों की पूर्ती की वरन स्वयं को को एक वि·ास्तरीय उपकरण डिजाइनर, सिस्टम इन्ट्रीगेटर, प्लान्ट इन्स्टालेशन, फील्ड मेनटेनेन्स आदि क्षेत्रों में एक विशेषज्ञ के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार बीएचईएल ने अपनेआप को ग्राहक की अपनी आवश्यकता के अनुसार एक प्रतिष्ठित समग्र समाधान प्रदान करने वाले एक इन्जीनियरिंग संस्थान के रूप में स्थापित किया।
बीएचईएल की इस उपलब्धी का सबसे प्रमुख कारण है कि उसने कभी भी अपने दायरे को संकुचित न रखकर संपूर्ण प्लान्ट की पर्फारमेन्स को सुधारने पर ध्यान केन्द्रित किया। इस प्रकार बीएचईएल ग्राहकों को अन्य कई संबन्धित क्षेत्रों में समसामयिक तकनीक प्रदान कर सकी। परिणाम स्वरूप जैसे जैसे ग्राहकों की विविधता बढ़ती गई बीएचईएल के तकनीकी क्षेत्र के
दायरे का विस्तार होता रहा। इसी सोच का परिणाम है कि आज बीएचईएल एक छोटे इलेक्ट्रोमेगनेटिक रिले से लेकर 1000 मेगावाट टर्बोजनेरेटर, छोटे से स्पेस ग्रेड के सोलर सेल से लेकर संपूर्ण प्लान्ट के लिये साफिस्टीकेटेड माइक्रोप्रोसेसर बेस्ड कंट्रोल, छोटी मशीन टूल के कंन्ट्रोलर से लेकर संपूर्ण रोलिंग मिल के कंट्रोल, छोटे इलेक्ट्रिक वेहिकल से लेकर पूरे लोकोमोटिव तक बनाने में सक्षम है।
बीएचईएल के विकास के इस सफर को मूलतः चार चरणों में बाँटा जा सकता है
1. प्रथम चरण (1960-70)
इस चरण में हमने विद्युत उर्जा उत्पादन के लिये सभी उपकरण जैसे बायलर, थर्मल व हाइड्रो टरबाइन, ट्रान्सफार्मर, मोटर्स, स्विचगियर आदि के लिये उत्पादन, एरेक्शन, कमीशनिंग व मेन्टेनेन्स के जरूरी लिये कुशलता स्वदेश में सफलतापूर्वक स्थापित की। साथ ही बीएचईएल ने यह भी प्रयास किया कि आवश्यक सामग्री जैसे काÏस्टग, फोर्जिंग, कापर, स्टील, इन्सुलेशन आदि के लिये स्वदेश में ही उत्पादन व प्रोसेसिंग क्षमता विकसित हो।
2. दूसरा चरण (1970 – 85)
इस चरण में देश में ओद्योगिक विकास ने गति पकड़ी, जिसके फल स्वरूप कई प्रकार के प्रोसेस उपकरणों व उनके लिये कन्ट्रोल्स की माँग बढ़ी। साथ ही बड़ी मात्रा में बिजलीघरों से उद्योग केन्द्रों तक पावर प्रेषण की भी जरूरत महसूस की गई। बीएचईएल ने इस चरण में कई नये उत्पाद व तकनीक का सफलतापूर्वक विकास किया। इनमें से प्रमुख है, 400 के वी ट्रन्समिशन सिस्टम उपकरण, ओद्योगिक मोटर्स की बड़ी रेन्ज, प्रोसेस उद्योग के लिये बड़े रेक्टीफायर्स, आइलरिग कन्ट्रोल, रेल ट्रान्पोरटेशन उपकरण व स्टील, सीमेंट, पेपर आदि उद्योगों के लिये ड्राइव कन्ट्रोल्स। इसी चरण में बीएचईएल ने स्टेटिक (थायरिस्टर) कन्ट्रोल का उपयोग कर वेरियेबल स्पीड ड्राइव का भी विकास किया जिससे उत्पादकता व एफिशियेन्सी में गुणात्मक सुधार हुआ।
3.तृतीय चरण (1985 – 90)
इस चरण में बीएचईएल ने विकसित तकनीकों को सुधारने व तकनीकी विकास में स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया। पहले दो चरणों के अनुभव व तकनीकी ज्ञान के आधार पर बीएचईएल आरएन्डी पर जोर देकर अपनी तकनीक में सुधार किये तथा नये क्षेत्रों का विकास किया। इस चरण की
प्रमुख उपलब्धियाँ रही, सेमीकन्डक्टर टेक्नालाजी स्थापित करना, सिरीज व शन्ट काम्पेन्शेसन व एच वी डी सी ट्रान्समिशन। रिन्यूएबल उर्जा तकनीक जैसे विन्ड अथवा सोलर भी इसी चरण की देन है। अन्य क्षेत्र जिनपर ध्यान दिया गया वे है माइक्रोप्रोसेर बेस्ड
कन्ट्रोल, ट्रेनिंग सिमुलेटर्स, वाटर डिसेलिनेशन प्लान्ट, केथोडिक प्रोटेक्शन आदि। इन प्रयासों के चलते बीएचईएल को वि·ा में एक पहचान मिली व बीएचईएल ने कई निर्यात के आदेश वि·ा की अग्रणी कंपनियों से प्रतियोगिता कर हाँसिल किये।
4. चौथा चरण 1991 से आगे
आर्थिक उदारता के इस चरण में बीएचईएल की परिपक्वता को परीक्षा से गुजरना पड़ा। हमारे ग्रहकों के पास दुनियाँ की अच्छी से अच्छी तकनीक प्राप्त करने की स्वतंत्रता थी। बीएचईएल ने इस चरण में भी अपने को अग्रणी बनाये रखा। साधनों की कमी के कारण पुराने प्लान्टो को अपग्रेड करने व उनकी लाइफ बढ़ाने की जरूरत थी बीएचईएल ने उचित तकनीक का विकास किया। तकनीकी विकास का प्रयास आज भी जारी है। कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं।
– गैस बेस्ड पावर प्लान्ट
– पम्प स्टोरेज हाईड्रो स्कीम्स
– फास्ट ब्राीडिंग रियेकटर टरबाईन
– इनट्रीगेटेड गेसिफिकेशन एन्ड कम्बाइन्ड सायकल पावर प्लांट
– सर्कुलेटिंग फ्लुडाइजड बेड बायलर
– सुपर क्रिटिकल टेम्पेरेचर थर्मल प्लान्ट
विकास की इस प्रक्रिया में बीएचईएल ने कई महत्वपूर्ण अनुसन्धान संस्थान व केन्द्र खोलें हैं। जिनमें प्रमुख हैं विकास व अनुसंधान संस्थान हैदराबाद, वेÏल्डग रिसर्च इन्स्टीट्यूट त्रिची, एयर पाल्यूशन केन्द्र रानीपेट, पाल्यूशन कंट्रोल केन्द्र हरद्वार, हाइड्रो लैब भोपाल, सेन्टर फार इलेक्ट्रिक ट्रान्सपोर्ट भोपाल व सिरामिक टेकनालाजी इन्स्टीट्यूट बैंगलौर। विकास व अनुसंधान संस्थान हैदराबाद ने हीट ट्रान्सफर, मेटालर्जी, पावर सिस्टम्स, इलेक्ट्रोनिक्स, ट्रान्समिशन, प्लान्ट लाइफ असेसमेन्ट व एक्सटेन्शन व फेल्युयर एनेलिसिस के क्षेत्रों महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त बीएचईएल के हर प्लान्ट में आवश्यकता अनुसार रिसर्च केन्द्र हैं। बीएचईएल देश का शायद एक मात्र औद्योगिक संस्थान है जो सकल उत्पाद का लगभग 2.5 प्रतिशत आरएन्डडी पर खर्च करता है।
इस से भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीएचईएल लाखों की संख्या मे कुशल कारीगर, विषेशज्ञ इन्जीनियर्स तथा तकनीकी लीडर्स व प्रबन्धक न सिर्फ अपने लिये वरन देश के कई अग्रणी संस्थानों के लिये भी तैयार किये।
यह इसी दूरदर्शिता का परिणाम है कि आज भी बीएचईएल विश्व की अग्रणी इन्जीनीयरिंग व इलेक्ट्रिकल उपकरणों की आपूर्तीकर्ता के रूप में जानी जाती है।

हमारे भविष्य का आकलन

 

जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है। जिज्ञासा ही विकास का आधार है। इसी जिज्ञासा के चलते हम आज इस मुकाम तक पहुँच पाये हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य में भविष्य के प्रति उत्सुकता रही है। भविष्य जानने की ललक ने ही ज्योतिष, जन्म कुन्डली, हस्त रेखा शास्त्र, न्यूमरालाजी, टेरा कार्ड आदि जैसी कई विधाओं को जन्म दिया। वैज्ञानिकों ने इन विधाओं को पूरी तरह भले ही न स्वीकारा हो, किन्तु विश्व भर में जन मानस पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा है। वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य ही है अतः उन्होंने भी भूत व भविष्य जानने की विधियाँ खोज ही निकाली। विज्ञान में भरोसा रखने वाले इन विधियों का प्रयोग इतिहास, व्यापार व सामाजिक विषयों पर बड़े विश्वास के साथ करते हैं। आईये हम जानने का प्रयास करते हैं कि विज्ञान में विश्वास रखने वाले सामाजिक चिन्तको के अनुसार २०५० में हम कहाँ होगे ?

 १. लोगों का आकलन     

२०१० में पी आर सी (पीइडब्ल्यू रिसर्च सेन्टर) व स्मिथसनियन पत्रिका ने अमेरिका वासियों से किये गये सर्वे में लोगों ने बताया –

  • अधिकतर लोगों ने विज्ञान में उन्नति जारी रहने की बात कही। ८० प्रतिशत लोगों का मानना था कि कम्प्यूटर मनुष्य की तरह बोलने लगेगें।
  • ७०प्रतिशत लोगों का मानना था कि केन्सर का इलाज खोज लिया जायेगा।
  • ६६प्रतिशत लोगों का मानना था कि नकली अंग असली जैसे कार्य करने लगेगें।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि स्पेस यात्रा ४० सालों में सबके लिये सुलभ हो जायेगी।
  • इसके अलावा अधिकतर लोगों का मानना था कि लुप्त प्रजातियोँ को वापस ले आया जायेगा व अन्य ग्रह पर जीवन खोज लिया जायेगा।
  • ४८ प्रतिशत लोगों का मानना था आदमी की नकल बनाई जा सकेगी।
  • ४० प्रतिशत लोगों के अनुसार विचार पढ़ने की तकनीक विकसित हो जायेगी।
  • उर्जा के बारे में अधिकतर लोगों का मानना था कि उर्जा का नया स्रोत खोज लिया जायेगा।  ७२ प्रतिशत लोगो ने उर्जा को गहरी समस्या बताया।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि एक और विश्व युद्ध हो सकता है।
  • भविष्य के बारे में चिन्ता करने वाले लोगों की संख्या १९९९ के १९ प्रतिशत क मुकाबले बढ़कर ३६प्रतिशत हो गई।

२. जनसंख्या

२०५० तक संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि पृथ्वी पर ९.१अरब लोग होगें।यह अनुमान इस तथ्य पर आधारित है कि वर्तमान में जनसंख्या १२ वर्षों में १ अरब बढ़ रही है। जनसंख्या सभी देशों में एक सी नहीं बढ़ कर कुछ देशों मे आबादी काफी घनी हो सकती है। उदाहरण के लिये अफ्रीका की आबादी २ अरब तक पहुँच सकती है। यह सौ वर्षों में लगभग नौ गुना बढ़ौतरी है।

देश परिवर्तन एक गंभीर समस्या बन जायेगी। केनेथ जानसन, न्यू हेम्पशायर विश्व विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर के अनुसार २०५० तक अमेरिका अल्पसंख्यक बहुलता वाला देश बन जायेगा। दि टेलीग्राफ ने एक लेख के माध्यम से बताया कि प्रवासियों के कारण यूरोप पूरी तरह से बदल जायेगा। यह एक टाइम बम है जिसे राजनेता ध्यान नहीं दे रहें।

इसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पढ़ेगा। कुछ देशों जैसे नीदरलेन्ड में इसका प्रभाव दिखने लगा है। यहाँ मुस्लिम विरोधी नेताओं का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।

३. पानी की समस्या:

बढ़ती जनसंख्या के लिये पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या होगी। भारत ने अनुमानित खपत दुगुनी हो जाने के हिसाब से प्रबन्ध करने के प्रयास आरम्भ कर दिये हैं। इन्टरनेशनल वाटर एण्ड सेनीटेशन सेनटर के अनुसार अरब देशों में समस्या गंभीर रहेगी।माइक हाईटावर व सुज़ाने पियर्स जो जल विशेषज्ञ है के नेचर में प्रकाशित लेख के अनुसार पानी की उपलब्धता अर्थव्यवसथा के लिये विशेष जरूरत होगी। पानी की पीने के साथ ही उद्योग, कृषि, उर्जा व खनन में बड़ी मात्रा में जरूरत होती है। सरकारों को पानी के सही उपयोग व उचित प्रबन्धन पर ध्यान देना जरूरी है।

४. भौजन की समस्या

९ अरब लोगों के भोजन का प्रबन्ध करना एक बड़ी समस्या बन जायेगी। आज भी करीब १ अरब लोगों को जरूरत के अनुसार भोजन नहीं मिल पाता है। अगले करीब २५ वर्षों खाद्य उत्पादन में लगभग ७० प्रतिशत वृद्धि की जरूरत होगी जो एक कठिन लक्ष्य है। हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि यह संभव हो पायेगा।यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सभी देशों को कृषि क्षेत्र में निवेश व शोध करने की जरूरत है। विकसित व खाद्य बाहुल्य देशों को जरूरत मन्द देशों की सहायता के लिये तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ेगी। भोजन की कमी का सर्वाधिक असर बच्चों के विकास पर पड़ेगा।

 ५. वातावरण

वातावरण संबंधी कई समस्यायें जैसे उजड़ते जंगल, घटती खेती की जमीन, शहरी करण, वायु एवं जल प्रदूषण, कचरा निष्पादन, व मौसम मे तेज बदलाव मनुष्य के लिये गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले मानसूनी जंगल (जो आक्सीजन पैदा करते हैं) आज करीब १.६.एकड़ प्रति सेकन्ड की दर से खत्म हो रहे हैं।

६. सामाजिक समस्यायें:

यह अन्दाजा लगाना मुश्किल है कि अपराधों जैसे चोरी डकैती हत्या या महिलाओं से छेड़छाड़ आदि में कितनी बढ़ौतरी होगी। महामारी जैसी बीमारी फैलने से प्रभावितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की संभावना हो सकती है। तकनीकि विकास आर्थिक अपराधों की गंभीरता बड़ा सकता है। विश्व युद्ध यदि हुआ तो महाविनाशकारी होगा। अब तक की सामाजिक पतन की दशा देखकर तो यही लगता है कि समाज पतन के गर्त की ओर बढ़ता रहेगा।  ७. उम्मीद की किरण :

इन सब समस्याओं के बीच उम्मीद की एक चमकीली किरण नजर आती है वो यह कि मनुष्य हमेशा बदलाव की ओर आकर्षित हुआ है। शायद अगल २५ वर्षों में बुराइयों से ऊब कर अच्छाईयों को अपनाले व समाज में पुनः आपसी प्रेम व भाईचारा स्थापित हो जाये। फिलहाल तो हमें ऐसा ही मान लेना  चाहिये।

 

 

 

 

ए मेरे वतन के लोगों

26 जनवरी 13 को सवेरे दूरदर्शन पर बताया कि लता जी द्वारा 1963 में सीमा पर गाये हुए इस गाने ने 50 साल पूरे किये। यह गाना देश प्रेम का प्रतीक बन गया है। प्रायः हर राष्ट्रीय पर्व पर यह सुनने को मिल जाता है। यह गाना सुनकर आज भी सीमा पर तैनात सैनिकों के लिये हर देशभक्त नागरिक का मन सम्मान से भर जाता है। लेकिन मेरे मन को इस बार इस गाने ने देश की दशा पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि 66 वर्षों की स्व सत्ता में हम किस मुकाम पर आ पहुँचे हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इन 66 वर्षों में हमने आर्थिक, विज्ञान, कृषि, कला व इन्जीनिरिंग आदि क्षेत्रों तेजी से प्रगति की है। और इस प्रगति का लाभ अधिकांश जनता तक पहुँचा भी है। पिछले कुछ सालों में प्रायः हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार व बेईमानी ने जिस प्रकार पाँव पसारे हैं इस कारण आज प्रायः हर देशभक्त भारतीय अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। नैतिक मूल्यों का यह पतन सारी प्रगति पर ग्रहण के समान है।
पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े बड़े घोटाले उजागर हुए जिनमें सरकार के प्रतिनिधियों की संलिप्तता संन्देह के दायरे में आई। सदनों में इन मुद्दों पर हंगामेदार चर्चायें हुई कुछ मंत्रियों ने त्यागपत्र दिये तो कुछ ने अपने को देने से बचा लिया। हाल ही के कुछ वर्षों में महिलाओं की अस्मिता पर हमले की जैसे बाढ़ आ गई। इसमें भी कुछ नेतागण सदन में अश्लील एमएमएस देखते पकड़े गये तो कुछ नेताओं की रंगरेलियों की सीडी मीडिया में प्रचलित पाई गर्इं।संसद में प्रश्न पूछने के लिये सांसद पैसे लेते हैं। समाचारों पर भी विश्वसनीयता कम होती जा रही है। दलित व अशक्त लोगों पर अत्याचार, हत्यायें व लूटपाट तो आज देश में आम बात है। समाचार चेनलों पर प्रायः सुनने को मिलता है कि करीब करीब सभी पार्टियों से गंभीर अपराध से आरोपित लोग सदन में चुनकर आगयें है, और इनकी संख्या लगभग 30-35 प्रतिशत तक पहुँच चुकि है। नैतिक मूल्यों का यह पतन आज की एक गंभीर समस्या है।
इस नैतिक अवमूल्यन की जिम्मेदार यदि कोई है तो सिर्फ राजनीतिक पार्टियाँ ही हो सकती है फिर वह राष्ट्रीय स्तर की हों अथवा प्रादेशिक स्तर की। सभी पार्टियाँ आज जोड़ तोड़, जातिवाद, भाई भतीजा वाद, साम्प्रदायिकता,धनबल अथवा बाहुबल द्वारा सत्ता हथियाने में व्यस्त हैं। इस प्रकार बनी हुई सरकार से लोग नैतिक आचरण की आशा भी कैसे कर सकते हैं। पिछले वर्ष एक नई आशा की किरण के रूप में अन्ना जी व उनकी टीम ने जन जागरण का काफी हद तक सफल प्रयास किया। लेकिन राजनेताओं ने पूरी ताकत लगा कर आन्दोलन के अग्रणी सदस्यों पर लांछन लगा कर व फूट डाल कर उसे कमजोर कर दिया है। लेकिन यह आन्दोलन देश की जनता व विशेष तौर पर युवाओं को जाग्रत करने में अवश्य ही सफल रहा है। यह इसी का परिणाम था कि दिल्ली में पिछले दिनों एक युवती पर बर्बर हादसे का विरोध करने व न्याय दिलाने के लिये ये युवा स्वतः ही सड़कों पर कई दिनों तक ठिठुरती सर्दी में भी डटे रहे।
युवाओं में आयी यह जाग्रति देश की दशा बदलने में सक्षम है।
प्रजातन्त्र में सत्ता वास्तव में जनता के हाथ में होनी चाहिये लेकिन आज ये राजनीतिक पार्टियों की बन्धक बन कर रह गई है। आज के जागरुक युवा यदि ठान लें तो परिस्थिति में बदलाव ला सकतें है और देश को पार्टियों के मकड़ जाल से मुक्त करा सकते है। आवश्यकता सिर्फ एक प्रयास करने भर की है।
इस वर्ष कुछ राज्यों में व अगले वर्ष केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। युवाओं को चाहिये कि ये इस अवसर का उपयोग एक क्रान्तिकारी बदलाव लाने के लिये करें एवं प्रजातन्त्र को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करें। आज का युवा संचार माध्यम के द्वारा तेजी से आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम है। शक्ति एवं जोश की उसमें कमी नहीं है। अपनी इसी ताकत को वे चुनाव क्रान्ति के रूप में बदल सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि उन्हें हर विधान सभा व लोकसभा के लिये एक इमानदार उम्मीदवार की पहचान करने की। इस उम्मीदवार का चयन बिना किसी जाति,सामाजिक स्तर अथवा गाँव शहर से संबद्धता पर विचार किये बिना अपने क्षेत्र में एक अच्छी छबि व स्वीकारिता के आधार पर ही हो। युवा ही उसके लिये प्रचार करें। प्रचार भी शोर रहित व्यक्तिगत स्तर पर हो। और युवा ही क्षेत्र के मत दाताओं को वोट के लिये निकलने के लिये प्रेरित करें। ये उम्मीदवार निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ें जिसका सिर्फ एक पाइन्ट एजेंडा हो वह सही मायनों में प्रजातन्त्र के मूल्यों की पुनस्र्थापना। आज जिस प्रकार का आक्रोश जन मानस में है उससे इस तरह के प्रयास को जनता का साथ मिलने की पूरी संभावना है। यदि युवा अपने प्रयास में
सफल होते हैं तो यह देश के लिये दूसरी आजादी होगी।

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद, द साइन्स आफ सेल्फ हीलिंग, डा. बसंत लाड़ पर आधारित)

आयुर्वेद एक प्राचीन व प्रभावी भारतीय चिकित्सा पद्धति है। यह न केवल रोगों को ठीक करने के लिये बल्कि एक स्वस्थ एवं सुखमय जीवन शैली का साधन भी हो सकती है। यह निम्न लिखित सिद्धान्तों पर आधारित है।
1. शरीर पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश (ईथर) से बना है।
2. शरीर में तीन प्रकार के दोष हो सकते हैं। ये हैं वात (वायु व ईथर), पित्त (जल व पृथ्वी) व कफ (जल व अग्नि) । हर शरीर में इन तीनों का अनुपात जन्म के समय ही निर्धारित हो जाता है, जिसे प्रकृति कहते है। यह अनुपात ही व्यक्ति का गुण व स्वभाव निर्धारित करता है। निर्धारित अनुपात का असंतुलित हो जाना ही रोगों को जन्म देता है। ये दोष व्यक्ति के शरीर व मन को अलग अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं। संक्षेप में ये प्रभाव निम्नानुसार हैं।
वात – ये मानसिक तंत्र, श्वास तंत्र, इन्द्रियाँ, रस प्रवाह, शरीर संचालन आदि को संचालित करता है। इसके प्रमुख गुण ठंडा, हल्का, अस्थिर, अनियमित, सूखा खुरदरा आदि हैं। इसके बढ़ने से मानसिक तनाव, रक्तचाप, गैस व व्याकुलता बढ़ जाती है। जबकि इसकी कमी मानसिक शिथिलता, कब्ज, रक्त संचय व विचार शून्यता पैदा करती है। वृद्धावस्था मे प्रायः यह बढ़ जाता है।
पित्त – यह पाचन रस (बाइल) को पाचन क्रिया व मेटाबोलिस्म (रस प्रक्रिया) के लिये प्रयोग करता है। इसका संबंध शरीर के तापमान, भूख, प्यास, बुद्धि, अनुभूति, क्रोध, घृणा व ईर्षा से है। यह एन्जाइम्स व हारमोन्स को नियन्त्रित करता है। इसके प्रमुख गुण गर्म,हल्का, तरल, नरम, साफ, रहस्यपूर्ण, तीक्ष्ण व बदबूदार हैं। इसके बढ़ने से छाले, हार्मोन्स का असंतुलन, खुजली, व परेशान करने वाले भाव पैदा होते हैं। इसकी कमी कमजोर पाचन, धीमे मेटाबोलिज्म व समझने की शक्ति में कमी का कारण होती है। 14 से 30 वर्ष की उम्र में इसकी बहुलता रहती है।
कफ – इसका संबंध माँस पेशियों की चिकनाई व पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों में पहुंचाने से है। यह उर्जा संतुलन, शारीरिक चिकनाई, लालच, क्षमा करने की आदत, लगाव, पाने अथवा हावी होने की इच्छा को नियन्त्रित करता है। यह अंगो को पोषित करने वाले द्रव व अंगो बनाने वाली कौषिकाओं का निर्माण करता है। इसके प्रमुख गुण तैलीय, ठंडा, भारी, स्थिर, गाढ़ा व चिकना हैं। इसके बढ़ने से कफ पैदा होता है व घटने से श्वास नली में सूखापन और पेट में जलन होती है।
बचपन में इसकी बहुलता रहती है।
स्वयं के दोष व प्रकृति में व्याप्त वस्तुओं के इन्हीं तीन दोषों का पारस्परिक प्रभाव एक जैसे लोगों का एक ही परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया का कारण है।
3. शरीर में रस, रक्त, माँस पेशियाँ, वसा (फेट), मज्जा (मेरो), अस्थि व शुक्र सात धातुएें होती हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में द्रवों के बहने के लिये तन्त्र होते है जिनहें श्रोत कहते है। उदाहरण स्वरूप प्रानवाह श्रोत, रसवाह श्रोत,रक्तवाह श्रोत आदि।
4. आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति (स्वभाविक गुण) व विकृति ( दोषों के पारस्परिक प्रभाव से आये गुणों में बदलाव) मिलकर स्वास्थ का निर्धारण करतें है। चिकित्सा से पहले प्रकृति व विकृति की जानकारी जरूरी है। यह जानकारी चिकित्सक द्वारा संबन्धित प्रश्न पूछ कर एकत्र की जाती है। विकृति की जानकारी रोग की स्थिति व निहित दोष असंतुलन से जानी जाती है। चिकित्सा का उद्देश्य संतुलन को पुनर्स्थापित करना है। संतुलन बनाये रखना हमारे हाथ में और यही स्वस्थ व सुखी जीवन का आधार है।
5. आयुर्वेद के सिद्धान्त हमें संतुलन बनाये रखने में मार्ग दर्शक का कार्य करते हैं। प्रायोगिक तौर पर हम भोजन, दिनचर्या, तनाव प्रबन्धन तकनीक एवं व्यायाम द्वारा अपने स्वास्थ को नियन्त्रित कर सकते है।
पुरुष व प्रकृति उर्जा के रूप हैं। पुरुष नर शक्ति तथा निर्गुण है, जबकि प्रकृति सगुण। ब्राहृाण्ड प्रकृति की उपज (संतान) है। प्रकृति जन्म देती है जबकि पुरुष इन रचनाओं को उर्जा प्रदान करती है। यह उर्जा सत्व (सुगंध), रजस (गतिविधि) व तमस (जड़ता अथवा इनर्शिया ) तीन प्रकार की होती है। ये तीन उर्जायें जीवन का आधार हैं। प्रकृति में ये संतुलित स्थिति में रहती हैं। इनका संतुलन बिगड़ने पर ये तीनों गुणों के आपसी टकराव से ब्राहृाणड के नष्ट होने की स्थिति आ सकती है। यह विकृति सबसे पहले अंहकार के रूप में प्रगट होती है जो सत्व से मिलकर पाँच इन्द्रियों व पाँच प्रचालन अंगों में आरगेनिक संसार बनाती है। यही अंहकार तमस के साथ मिलकर पाँच भूतों में इनआर्गेनिक संसार बनाती है। रजस उर्जा इन्हें आपस में मिलाने का कार्य करती है। इस प्रकार सत्व व तमस पोटेन्शियल उर्जा हैं जिन्हें कायनेटिक क्रियाशील उर्जा की आवश्कता होती है। हम सत्व को ब्रह्मा (उत्पादक), रजस को विष्णु (पालन कर्ता) व तमस को महेश (विनाश कर्ता) कहते हैं।
5. आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य में धार्मिक, वित्तीय, सृजन व स्वतन्त्रता ये चार प्रवत्तियाँ होती हैं। इन्हें प्राप्त करने का आधार संतुलित स्वास्थ्य है। आयुर्वेद, योग व तन्त्र को भारत में सदियों से इसके लिये अपनाया गया है। आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। योग स्वयं को जान कर सत्य तक पहुँचने का साधन है। तन्त्र उर्जा को नियन्त्रित करने का साधन है। तीनों साधन मनुष्य को दीर्घ आयु, ताजगी व स्वयं को जानने में सहायक हैं। इन तीनों को साधकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचना हर व्यक्ति के लिये संभव नहीं है। किन्तु आयुर्वेद की सहायता हर व्यक्ति स्वस्थ व दीर्घायु हो सकता है। मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के संदर्भ में आयुर्वेद को आधार, योग को शरीर व तन्त्र को मस्तिष्क माना गया है, इस प्रकार ये आपस में एक दूसरे पर निर्भर है।
6. ईथर, वायु, अग्नि, जल, व पृथ्वी ये तत्व क्रमशः श्रवण (जीभ, स्वर तन्त्रि व मुँह), छूने (चर्म व हाथ), देखने ( आँखें व पैर), स्वाद (जीभ व जननांग) व गंध ( नाक व मल मार्ग) की इव्द्रियों से संबंध रखते हैं। वात पित्त व कफ हर प्रकार की शारीरिक व मानसिक गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। सात प्रकार की शारीरिक संरचनायें वात, पित्त, कफ, वात-पित्त, पित्त-कफ, वात-कफ व वात-पित्त-कफ होती हैं। इन सात मूल संरचनाओं के कई रूप सूक्ष्म प्रतिशत से परिवर्तित हो सकते हैं, इस कारण गुणों में विविधता आ जाती है।
7. वात्त प्रकृति वाले व्यक्ति – पित्त प्रधान व्यक्तियों का शरीर कम विकसित रहता है। उनका सीना सपाट व नसें व धमनियाँ दिखाई देती हैं। उनका रंग गेहुँआ, त्वचा ठंडी, खुरदरी, सूखी व पटी हुई होती है। वे न बहुत अधिक नाटे न अधिक लम्बे होते हैं। वे दुबले व उभरे अस्थि जोड़ वाले होते हैं। उनके कम व काले तिल, कम व घुंघराले बाल होते हैं एवं पलकें पतली व नेत्रों में चमक नहीं होती है। उनकी आँखें छोटी, धंसी हुई व सक्रिय एवं पुतलियाँ सूखी व धुधंली होती हैं. उनके नाखून भुरभुरे व खुरदरे होते है, नाक मुड़ी हुई व उपर उठी हुई होती है। उनकी भूख व पाचन शक्ति बदलती रहती है। वे मीठे, खट्टे व नमकीन के लिये व्याकुल रहते हैं व गर्म पेय पसंद करते है। उन्हें पसीना व पेशाब कम आती है तथा मल सूखा, कठोर व कम होता है। उन्हें नींद कम व उखड़ी हुई आती है। ये सृजनशील, सक्रिय, सावधान व अधीर होते हैं। वे जल्दी जल्दी चलते व बोलते हैं किन्तु जल्दी थक भी जाते हैं। वे जल्दी समझने वाले किन्तु जल्दी भूलने वाले होते हैं। उनका मन अस्थिर, उनमें इच्छा शक्ति, सहन शक्ति, आत्मविश्वास तथा निर्भीकता की कमी होती है। उनकी तर्क शक्ति कमजोर होती है, ये जल्दी घबराने व डरने तथा चिंता करने वाले होते हैं। ये शीघ्र कमाने व खर्च करने की प्रवृत्ति के कारण प्रायः गरीब होते हैं।
पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति – ये मध्यम लम्बाई, दुबले व कोमल शरीर वाले होते हैं। इनका सीना व माँस पेशियाँ भी मध्यम उभार वाली होती हैं। इनके तिल व मस नीले अथवा भूरे लाल रंग के होते हैं। इनका रंग ताम्र वर्ण, हल्का पीला, हल्का लाल या साफ हो सकता है। इनकी त्वचा नरम, हल्की गर्म व कम झुर्रियों वाली होती है। इनके बाल पतले, रेशमी, लाल या भूरे तथा जल्दी सफेद होने अथवा गिरने लगते हैं। इनकी आँखें भूरी या ताम्र वर्ण, तीखीं व पुतलियाँ थोड़ी उभरी हुई व नम होती हैं। इनके नाखून नर्म व नाक तीखी एवं उसका अग्र भाग लालिमा लिये होता है। इनकी शारीरिक गतिविधियाँ, पाचन शक्ति तेज होती है जिससे भूख अधिक लगती है। ये मीठा, कसैला व कड़वा स्वाद पसंद करते हैं व शीतल पेय का आनन्द लेते हैं। इन्हें नींद तोड़ी कम किन्तु गहरी आती है। इनके मल मूत्र की मात्रा अधिक व पीलापन लिये, मल नर्म व पतला होता है। इन्हें पसीना खूब आता है, ये गर्मी, धूप, व अधिक मेहनत सहन नहीं कर पाते। ये बुद्धिमान, जल्दी समझलेने वाले व अच्छे वक्ता होते हैं। इनमें नफरत, जलन व क्रोध की ओर झुकाव होता है तथा ये महत्वाकांक्षी होते हैं व नेतृत्व करना पसंद करते हैं। ये संपत्ति पसंद करने वाले, प्रायः पैसे वाले व वैभव का प्रदर्शन करने वाले होते हैं।
कफ प्रकृति वाले व्यक्ति – इनका शरीर अच्छा विकसित होता है किन्तु इनमें मोटापे की अधिक संभावना रहती है। इनका सीना चौड़ा व तना हुआ होता है। मांस पेशियाँ अच्छी विकसित होती हैं। ये गोरे व चमकदार होते हैं व त्वचा तैलीय,चमकदार, नर्म, ठंडी व पीलापन लिये होती है। इनकी आँखें गहरी काली या नीली,चमकीली, आकर्षक व पुतलियाँ सफेद होती है। इनकी भूख सामान्य, पाचन क्रिया कुछ धीमी होती है तथा ये कम खाते हैं। इन्हें तीखा,कड़वा व कसैला स्वाद पसंद आता है, मल नरम व पीलापन लिये होता है। ये धीरे चलते हैं। इनकी नींद गहरी व लम्बी होती है। ये प्रायः स्वस्थ, प्रसन्न शांत, सहनशील क्षमावान व स्नेही होते हैं। ये थोड़े लालची, चाहने वाले व हक जताने वाले होते हैं। ये समझने में कुछ समय लगाते है किन्तु बाद में याद रखते हैं। ये धन कमाते हैं व एकत्र करते हैं.
8. तीन प्रकार का प्रभाव निम्नानुसार होता है-
सत्व – सुगंध, समझ, पवित्रता, स्पष्टता, करूणा व प्रेम। इस प्रवृत्ति वालों का शरीर स्वस्थ व व्यवहार एवं चेतन्य शुद्ध होता है। वे आस्तिक, ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले तथा पवित्र लोग होते हैं।
रजस – गतिविधि, आक्रमकता व बहिर्मुखता। रजस दिमाग वाले कामुक सोच के होते हैं। इस प्रवृत्ति के लोग व्यापार, धन, अधिकार, गौरव व पद को महत्व देते हैं। वे धन का उपभोग पसंद करते हैं व बहिर्मुखी होते है। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं किन्तु आस्था बदलते सकते हैं तथा राजनीति करने वाले होते हैं।
तमस – अज्ञान, जड़ता, भारीपन, सुस्ती। इस प्रवृत्ति के लोग आलसी, स्वार्थी व दूसरों को हानि पहुँचाने वाले होते हैं। वे नास्तिक होते हैं व प्रायः दूसरों का आदर नहीं करते हैं। वे अहंकारी होते हैं।
9. स्वास्थ्य सामान्य स्थिति है व रोग असामान्य। शरीर के अन्दर की स्थिति का बाहरी वातावरण से लगातार पारस्परिक प्रभाव होता है। जब ये दोनों असंतुलित हो जाते हैं तो रोग हो जाता है। आन्तरिक स्थिति को बदलकर संतुलन लाया जा सकता है। आयुर्वेद इसका मार्ग बतलाता है।
सामान्य स्थिति में मल मूत्र व पसीने का संतुलन होता है, इन्द्रियाँ ठीक से कार्य करती हैं व शरीर, मन व चेतन्य आपसी सामन्जस्य एकरूप से कार्य करते हैं। रोग व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कफ प्रकृति के लोगों को कफ जनित रोग जैसे टांसिल्सस, साइनसाइटिस, दमा,व फेफड़ों में जमाव आदि प्रायः होते हैं.
पित्त प्रकृति के लोगों को पित्त जनित रोग गालब्लेडर, लीवर, एसिडिटी, छाले, चर्म संबंधी व सूजन आदि रोग प्रायः होते हैं।
वात प्रकृति के लोगों को वात जनित रोग जैसे गैस, पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द, लकवा, व नसों का दर्द आदि रोग प्रायः होते हैं।
खान पान, जीवन शैली, व वातावरण यदि उसी दोष से मिलता हो तो वे असंतुलन पैदा कर पहले शारीरिक स्तर पर और बाद में मानसिक स्तर पर विकृति पैदा करते हैं। जैसे वात डर, तनाव व निराशा का कारक है। पित्त क्रोध, घृणा व जलन तथा कफ अधिकार, लालच, व मोह के कारक हैं। इस प्रकार भोजन, आदतों व वातावरण का हमारे शारीरिक व मानसिक रोगों से सीधा संबंध है।
10. तीनों दोषों की हानि अमा (टाक्सिन्स) को पैदा करते जो पूरे शरीर में फैलकर कमजोर स्थानों पर जमा हो जाते हैं, जहाँ वे रोग पैदा करते हैं।
पित्त पेट में अग्नि (जठराग्नि) जो अमलीय होती है तथा भोजन को पचाने व पोषक तत्वों को ग्रहण करने के लिये आवश्यक है। इसका संबंध वात से भी है क्योंकि वायु शरीर की अग्नि प्रज्वलित कर अग्नि को शरीर के हर कोष तक पहुँचाती है। इस तरह पोषक तत्व हर कोष तक पहुँचते हैं जो उनके रख रखाव व प्रतिरोध तंत्र के लिये जरूरी है। अग्नि अनचाहे बेक्टिरिया व अमा को पेट व आतों में नष्ट करती है। इस प्रकार वह इन अंगों की रक्षा करती है। शारीरिक गतिविधियाँ, दीर्घायु, बुद्धि, समझ आदि अग्नि पर निर्भर है। अग्नि के सही प्रकार से कार्य करने से शरीर ठीक प्रकार से संचालित होता है। यदि त्रिदोषों में अससंतुलन होता है तो उसका सीधा असर अग्नि पर पड़ता है व निरोध क्षमता कमजोर हो जाती है। इस कारण भोजन ठीक से पच नहीं पाता व बड़ी आँत में चिपचिपे व बदबूदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। यह अमा रक्त कोषिकाओं को बन्द कर देता है और अंततः टाक्सिन्स में बदल जाता है। समय के साथ ये टाक्सिन्स शरीर के कमजोर भागों में जमा हो होकर अंगों में अवरोध, निष्क्रिययता व कमजोरी पैदा करते हैं। अंततः यह मधुमेह, जोड़ के दर्द या ह्मदय के रोग जैसी बीमारियों के रूप में प्रगट होता है।
11. सब रोगों की जड़ अमा है। जीभ पर सपेद पर्त अमा की अधिक मात्रा में उपस्थिति दर्शाती है। अधिक सक्रिय अग्नि भी हानिकारक होती है। यह पोषक तत्वों को जला देती है जिससे दुर्बलता जाती है व निरोध शक्ति कम हो जाती है।
टाक्सिन्स भावनात्मक कारणों जैसे दबाये हुए गुस्से, डर, चिन्ता से भी पैदा हो सकते हैं। इससे गैस बनने से अंगों में दर्द हो सकता है। अतः भावों व नैसर्गिक तकाजे जैसे छींक आदि को दबाना नहीं चाहिये।
मंद अग्नि से एलर्जी भी हो सकती है। पित्त प्रकृति वालों को पित्त कारक भोजन जैसे गर्म व मसालेदार खाने से बचना चाहिये, घृणा व गुस्सा दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। कफ प्रकृति वालों को कप कारक भोजन जैसे दूध उत्पाद खाने से बचना चाहिये, लगाव व लालच दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार हमें भावों को दबाने के बजाय अपने से अलग पहचान कर मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिये।
आयुर्वेद के अनुसार तीनों मलों (मल, मूत्र व पसीने) का सही उत्सर्जन स्वास्थ के लिये जरूरी है। इनका उत्सर्जन संबंधित अंगों के सही प्रकार से कार्य करते रहने के लिये जरूरी है। पानी पीने की मात्रा, भोजन का प्रकार, बाह्र तापक्रम, मानसिक व शारीरिक स्थिति मलों के उत्सर्जन को प्रभावित करते है।
12. रोगी की जाँच – आयुर्वेद में रोगी की जाँच प्रायः नाड़ी, मूत्र व अंगों के द्वारा की जाती है। इनमें प्रमुख हैं –
नाड़ी – नाड़ी की जाँच तीन उँगलियों तर्जनी (वात दोष), मध्यमा (पित्त दोष) व अनामिका (कफ दोष) से की जाती है। तीनों नाड़ियों की एक सी चाल तीनों दोषों का संतुलन दर्शाती है। किसी नाड़ी का तेज व धीमा होना संबंधित दोष की अधिकता व कमी दर्शाती है।
सीधे हाथ की ऊपर वाली वात नाड़ी तेज हो तो बड़ी आँत व नीचे वाली हो तो फेफड़े में जमाव, इसी प्रकार ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी गाल ब्लेडर नीचे वाली तेज लीवर एवं ऊपर वाली तेज कफ नाड़ी ह्मदय संबंधी (पेरी कार्डियम) समस्या दर्शाती है।
बाँये हाथ की वात नाड़ी ऊपर वाली तेज हो तो छोटी आँत व नीचे वाली ह्मदय, ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी पेट तथा नीचे वाली तेज स्प्लीन एवं ऊपर की तेज कफ नाड़ी ब्लेडर व नीचे वाली तेज किडनी की समस्या दर्शाती है। (हल्के से छूने से ऊपर वाली नाड़ी व दबा कर छूने से नीचे वाली नाड़ी की गति पता चलती है)।
अलग अलग समय नाड़ी गति बदलती रहती है। नाड़ी की जाँच की योग्यता प्रशिक्षण व अभ्यास के बाद ही आती है।
मूत्र परीक्षण – मूत्र का नमूना सवेरे बीच धारा से साफ पात्र में लेना चाहिये।
रंग – कालापन लिये भूरा वात दोष, गहरा पीला पित्त दोष, धुन्धला कफ दोष एवं लाल रंग रक्त दोष बतलाता है। सामान्य रंग हल्का पीला होता है।
बर्तन में एक बूँद तिल के तेल की डालें —
यदि बूँद फैलती है तो उपचार आसान
यदि बूँद बीच तक डूबती है तो उपचार कठिन
यदि बूँद नीचे बैठ जाती है तो उपचार बहुत कठिन
यदि बूँद लहरों में फैलती है तो वात दोष
यदि बूँद कई रंगों में फैलती है तो पित्त दोष
यदि बूँद कई मोती जैसी बूँदो में फैलती है तो कफ दोष
बदबूदार मूत्र टाक्सिन्स की उपस्थिति व मीठी सुगंध मधुमेह दर्शाता है। मूत्र त्याग के समय जलन पथरी व कम मूत्र उच्त रक्तचाप का द्योतक है।
आयुर्वेद के अनुसार सवेरे बीच की धार का मूत्र प्राकृतिक रेचक (मुलायम करने वा) व टाक्सिन्स को नष्ट करने वाला है। सवेरे इसका एक कप सेवन लाभकारीहै।
पसीना – पसीना चर्बी तंतों से पैदा होता है तथा शरीर का तापमान बनाये रखने के लिये जरूरी है। यह त्वचा नर्म व उसकी लचक एवं रंग बनाये रखता है। अधिक पसीने से संक्रमण (फफूँदीय) हो सकता है तथा कम पसीना सूखी व दरार वाली त्वचा कर देता है।
मूत्र व पसीना दोनों का संबंध किडनी से है, स्वस्थ शरीर में दोनों का संतुलन जरूरी है। एक के बढ़ने से दूसरे की मात्रा कम हो जाती है।
जीभ, आखों, चेहरे, होंठ व नाखून का अध्ययन भी रोग समझने में सहायक है
जीभ की जाँच – हल्का पीलापन खून की कमी, पीला रंग गालब्लेडर में बाइल अधिक व किडनी की समस्या। नीलापन ह्मदय रोग। सफेद रंग टाक्सिन्स की संबंधित अंगों में अधिकता। जीभ का अंगों से संबंन्ध इस प्रकार है –
पीछे बाँयें बाँयीं किडनी, बीच आँत व दाँयें दाँयीं किडनी
मध्य भाग बाँयें स्प्लीन, बीच पेन्क्रिया व पेट व दाँयें लीवर
आगे बाँयें बाँयां फेफड़ा , बीच ह्मदय व दाँयें दाँयां फेफड़ा
उभार व गड्डे संबंधित अंगों की खराबी दर्शाते हैं।
इसके अतिरिक्त भावों का संबंध भी दोषों व अंगों से है। जैसे डर का वात व किडनी से, क्रोध का पित्त व लीवर से तथा लालच एवं ईर्षा का कफ व ह्मदय एवं स्प्लीन से।
13. आयुर्वेद के अनुसार व्यक्ति के गुणों का संबंध उसकी गतिविधियों से है। गुण अन्तर्निहित शक्ति है जबकि गतिविधि गत्यामक शक्ति। चरक ने इनके दस विपरीत जोड़ों की पहचान की है (कुल 20 गुण)। वात, पित्त व कफ के अपने अलग गुण होते है –
वात – हल्का, सूक्ष्म, सूखा, चलित, खुरदरा व ठंडा। पतझड़ के मौसम में प्रभाव बढ़ जाता है।
पित्त – गर्म, सूखा, गतिशील व व्याप्त हो जाने वाला (भेदक)। गर्मी में प्रभाव बढ़ जाता है।
कफ – द्रवीय, भारी, ठंडा, चिपकने वाला व धुन्धला। सर्दी में प्रभाव बढ़ जाता है।
इनके गुणों से विपरीत खाद्य पदार्थ लगातार लेने से असंतुलन पैदा होता है।
चरक द्वारा पहचाने गुण व उनके प्रभाव इस प्रकार हैं –
1. गुरु (भारी) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। पौषक तत्व बढ़ाता है किन्तु साथ ही भारीपन, शिथिलता व आलस्य का कारक है।
2. लघु (हल्का) कफ कम करता है व वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है। पाचन में सहायक, मोटापा कम करने वाला, सफाई करने वाला हे। ताजगी, सतर्कता व जागरुकता बढ़ाता है।
3. धीमा (मवा) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। शिथिलता, धीमी कार्य गति, ढिलाई व सुस्ती कारक है।
4. तेज (तीक्ष्ण) कफ घटाता है व वात पित्त बढ़ाता है। छाले व फोडे फुन्सी का कारण है। शरीर पर तुरन्त असर करता है। कुशाग्रता व समझ बढ़ाता है।
5. ठंडा (शीतल) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त घटाता है। सर्दी, अकड़न, बेहोशी, डर, जकड़ाव व संवेदनहीनता कारक है।
6. ऊष्ण वात व कफ घटाता है एवं पित्त व अग्नि बढ़ाता है। गर्मी, पाचन क्रिया, प्रक्षालन, फैलाव, सूजन, क्रोध व घृणा पैदा करता है।
7. तैलीय (स्निग्ध) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। चिकनापन, नमी, चिकनाई (घर्षण कम करना), शक्ति बढ़ाता है एवं लगाव व प्रेम में सहायक।
8. सूखा (रुक्ष) वात व अग्नि बढ़ाता है पित्त व कफ घटाता है। शुष्कता, समावेश कब्जियत व घबराहट बढ़ाता है।
9. चिपचिपा (स्लक्षणा) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। चिकनापन, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
10. खारा वात व अग्नि बढ़ाता है व पित्त व कफ घटाता है। त्वचा व हड्डी में दरार, असावधानी व दृढ़ता बढ़ाता है।
11. कुन्द (सनर) कफ बढ़ाता है व वात पित्त व अग्नि घटाता है। मजबूती, गाढ़ापन व शक्ति वर्धक।
12. द्रव पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। गलाने वाला, द्रवीकरण करने वाला है तथा लार वर्धक, करुणा वर्धक व संगकता वर्धक है।
13. नर्म (म्रुआ) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। कोमलता, नजाकत, तनावहीनता, मृदुता, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
14. कठोर (कठिन) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त एवं अग्नि घटाता है। कठोरता, शक्ति, दृढ़ता, संवेदनहीनता व स्वार्थपरता बढ़ाता है।
15. स्थिर कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। स्थिरता, रुकावट, सहारा, कब्ज व विश्वास को बढ़ावा देता है।
16. चल वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है व कफ घटाता है। गति, कंपन, अधीरता व अनास्था बढ़ाता है।
17. सूक्ष्म (कोमल) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। सूक्ष्म कौषिकाओं मे पहुँचने वाला तथा भावनाओं व संवेदवशीलता बढ़ाने वाला।
18 स्थूल (ठोस) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। रुकावट व मोटापा बढ़ाता है।
19. धुन्धला कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। हड्डी की दरारों को भरने वाला व समझ व कल्पना शक्ति को कम करने वाला।
20. साफ (विसद) कफ घटाता है व वात, पित्त एवं अग्नि बढ़ाता है। शान्त करने वाला व अकेलापन एवं भटकाव पेदा करने वाला।
14. पंच तत्वों का संबंध भी अंगों से होता है। ईथर का दिमाग से, हवा का फेफड़ों से, अग्नि का आँत से, पानी का किडनी से एवं पृथ्वी का ह्मदय से।
15. आयर्वेद में कई रोगों जैसे छाती में बलगम, आँत में बाइल, पेट में गैस आदि की अधिकता को दूर करने के लिये पंचकर्मो का प्रयोग निर्धारित है। इससे शरीर, मस्तिष्क व भावों की सफाई की जाती है। ये पाँच क्रियायें हैं – वमन, रेचक (पेट साफ करने वाली औषधी), दवायुक्त वस्ति (एनिमा), नाँक में दवा डालना व रक्त शुद्धि।
16. आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ रहने के लिये सही खानपान जरूरी है। इसके अलावा स्वस्थ दिनचर्या, योग व श्वास के व्यायाम महत्वपूर्ण हैं। आध्यात्मिक कार्य प्रणाली की समझ समरसता व सुख दायक होती है।
भोजन व्यक्तिगत प्रकृति के अनुकूल होना चाहिये। अपनी प्रकृति व विभिन्न खाद्य पदार्थों का संबंध जानकर ही सही खानपान निर्धारित किया जा सकता है।
इसमें स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा व कसैला) तथा प्रकार (भारी, हल्का, गर्म या ठंडा असर कारक, तैलीय अथवा सूखा आदि)का ध्यान रखना चाहिये। भौजन चुनने में मौसम का भी ध्यान रखना जरूरी है।
मार्ग दर्शन के लिये सामान्य दिशा निर्देश यहाँ संक्षेप में दिये हैं। व्यक्ति विषेश को अपने दोष की अधिकता, एलर्जी, अग्नि की प्रबलता व मौसम को ध्यान में रखते हुए स्वयं निर्धारित करना चाहिये।
1. वात प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये अधिक मात्रा में मेवे, सेव, तरबूज,आलू, टमाटर,बैंगन, आइसक्रीम, माँस, मटर व हरा सलाद हानिकारक हैं। इसके विपरीत मीठे फल, अवाकेडो, नारियल, ब्रााउन चाँवल, लाल पत्ता गोभी, केले, अंगूर, चेरी व संतरे लाभ दायक हैं।
2 पित्त प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये मसालेदार भोजन, मूँगफली का मक्खन, खट्टे फल, केले, पपीता, टमाटर,व लहसुन अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत आम, संतरे, नाशपाती, आलूबुखारा, अंकुरित व हरा सलाद, सूर्यमुखी के बीज, मशरूम व शतावरी (एक प्रकार की साग) लाभ दायक हैं।
3 कफ प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये केले, तरबूज, नारियल, खजूर, पपीता, अनानास व डैरी उत्पाद अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत मेवे, अनार, क्रेनबेरी, बासमती चाँवल, अंकुरित सलाद, व चिकन लाभ दायक हैं।
भौजन तन,मन व चेतन का पौषक है, सही ढ़ग से भौजन करना महत्वपूर्ण है। भौजन सीधे बैठकर, एकाग्र मन से ( टीवी, बातचीत व पुस्तकों के व्यवधान रहित) व प्यार से स्वाद लेकर व चबाकर करना चाहिये।
पेट में तिहाई मात्रा भौजन, तिहाई पानी व तिहाई हवा की होना चाहिये। पानी का शरीर में संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। फलों के रस के रूप में भी पानी ले सकते हैं किन्तु भौजन के साथ नहीं। भौजन के बीच थोड़ा थोड़ा पानी अमृत समान होता है। यह पाचन में सहायक होता है।
शरीर में अपनी जरूरत के अनुसार विटामिन्स पैदा करने की क्षमता है। प्रकृति व अग्नि की स्थिति समझे बिना बाह्य विटामिन्स का सेवन शरीर में विटामिन्स की अधिकता (हाइपरविटामिनोसिस) का कारण बन सकता है।