हिन्दु धर्म

(इवाल्यूशन आफ हिन्दुइज्म इन इन्डिया, क्लाउस क्लोस्टरमायर,वन वल्र्ड आक्सफोर्ड पर आधारित)
हिन्दू धर्म किसने स्थापित किया यह ज्ञात नहीं है। जहाँ पश्चिम में हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली माना जाता है, भारत में इसे कई रूपों में देखा जा सकता है।
1. हिन्दु धर्म का उद्गम –
मूल रूप से यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता है। विदेशी लोगों ने इसे हिन्दू धर्म का नाम दिया। मूल रूप में यह सभी वस्तुओं को नियन्त्रित करता है, यह एक व्यापक व समय के साथ अपरिवर्तित नियमों का संग्रह है जो भारतीय समाज का निर्देशन करता है तथा जीवन के सभी पहलुओं का नियन्त्रण करता है। सामान्यतह यह माना जाता है कि 150 वर्ष बीसी में वैदिक आर्य भारत आर्कटिक सर्कल (स्केन्डीनेविया, उक्रेन, पर्सिया, टर्की आदि) से बसने के लिये आये। रिग्वेद की लिपि व जोरोस्ट्रियन एवेस्टा की भाषाओं में काफी समानता है। हाँलाकि रिग्वेद में पुरानी पीढ़ी के लोगों का बाहर से आकर बसने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हिन्दु धर्म के और अधिक पुराने होने के काफी सबूत मिलते है।
2. वेद हिन्दु ग्रन्थ –
हिन्दु धर्म का सर्व प्रथम विवरण श्रुति के रूप में मिलता है। ज्ञान को सिर्फ सुनकर व याद रख कर ही प्राप्त किया जा सकता था। यह ज्ञान भी सिर्फ ऋषि – मुनियों (रिग) तक ही सीमित था। कई हजार वर्षों बाद बाहरी आक्रमण के चलते वेदों को लिपि बद्ध किया गया। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में प्रमुख इस प्रकार है-
– संहिता – रिग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।
– ब्राह्मण – ऐत्रेय आसेवलण्या, तान्डव्य सदविम्सा, तैत्रयी सतपथ, गौपथ आदि।
– उपनिषद – ऐत्रेय, केनाचन्डोग्य, तैत्रयी ईशकथा, प्रश्नमुकुन्द आदि।
रिगवेद के मन्त्र बदले नहीं जा सकते हैं व उनका उपयोग बलि(यज्ञ) में होता है।
यजुर्वेद में यज्ञ विधि का वर्णन है।
सामवेद में वेद रिचाओं प्रभावशाली बनाने के लिये उच्चारण की विधि दी गई है।
अथर्ववेद में तन्त्र व अवतारों का वर्णन है जो यज्ञ से संबन्धित नहीं है।
– स्मृति – मनु, याग्यवल्क, विष्णु आदि
– इतिहास – रामायण व महाभारत
– पुराण 18 महापुराण
– वैष्णव पुराण (सत्व) विष्णु, नारद, भागवत्, गरूड़, पद्म व वराह।
– शैव पुराण (रजस) मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद व अग्नि।
– ब्रह्म पुराण (तमस) ब्राहृा, ब्राहृान्ड, ब्राहृवैवर्त, मार्कन्डेय, भविष्य व वामन।
3. वैदिक जीवन व्यवस्था –
एक हिन्दु अपने जीवन में वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करता है। सामान्य दैनिक
चर्या जैसे सूर्योदय के पहले उठना, नहाना, संन्ध्या व गायत्री जप करना, भोजन करने से पहले ईश्वर को अर्पित करना, गाय को भोजन देना तथा अतिथि को भगवान मानना आदि के अतिरिक्त जीवन की चार अवस्थायें परिभाषित की गई हैं।
– ब्रह्मचर्य – 6-8 वर्ष की आयु से लगभग 18 वर्ष तक गुरु आश्रम में ब्राहृचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना।
– गृहस्थाश्रम – प्रायः यह विवाह पश्चात आरम्भ होता है। यह समय सांसारिक धन (अर्थ व काम) अर्जन का है, किन्तु यह इमानदारी व नियमानुसार होना चाहिये।
– वानप्रस्थाश्रम – जब बच्चे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जाते हैं तब माता पिता परिवारिक जिम्मेदारियों से विरक्त होकर धार्मिक कार्यों में मन लगाने लगाते हैं।
– सन्यासाश्रम – इसमें लोग घर छोड़कर जंगल में तपस्या कर परलोक सुधारने के प्रयास में लग जाते हैं।
समाज को चार वर्णों में बाँटा गया था
ब्राह्मण – समाज के हित में वेदों का अध्ययन व अध्यापन करना तथा यज्ञ पूजा आदि करवाना। जीविका के लिये दान दक्षिणा पर निर्भर रहे हैं।
क्षत्रिय – ये योद्धा व शासक होते हैं, तथा समाज की रक्षा करते हैं। बदले में कर के रूप में दूसरों से धन या सेवा प्राप्त करते है।
वैश्य – ये कृषि, कारीगरी तथा व्यापार आदि से धन अर्जित करे है।
शूद्र – ये लोग अकुशल काम या उच्च वर्ग की सेवा कर बदले में कुछ दन अर्जित कर लेते है।
5. वैदिक रीतिरिवाज
यज्ञ (बलि)को आवश्यक माना जाता था। सबसे उत्तम बलि मनुष्य की मानी जाती थी। श्रोत सूत्र सैकड़ों जानवरों की सामूहिक बली के लिये प्रयोग किये जाते थे तथा व्यक्तिगत बलि के लिये गृहसूत्र का प्रयोग होता था। गर्भ में आने से मृत्यु तक सोलह संस्कार शरीर व जीवन की शुद्धता के लिये जरूरी बताये गये है। वैदिक रीति का मुख्य हिस्सा कर्ममार्ग है, कर्म का अर्थ बलि माना गया है। मीमान्सा में इसे न्याय संगत बताया गया है। ब्रााहृणों में बताया गया कि स्वर्ग प्राप्ति के लिये अग्निस्तोमा नामक यज्ञ जरूरी है। उपनिषदों में बलि की निन्दा की गई है तथा कर्मों को महत्ता दी गई है। मनुस्मृति में विभिन्न पापों के लिये अलग अलग योनियों में पुनर्जन्म का वर्णन है।
6. हिन्दु धर्म का सार
हिन्दु धर्म के मुख्य ग्रन्थ पुराण, गीता, महाभारत व रामायण माने जाते है। रिग्वेद में विष्णु (इन्द्र के छोटे भाई) को प्रमुख देव बताया गया है। इनके दस अवतार (मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिम्ह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि) माने गये हैं। हिन्दु धर्म में चार प्रमुख सम्प्रदाय है। श्रीनिवास या रामानुज, ब्राहृ या माधव, कुमार या निम्बारक और रुद्र या विष्णुस्वामी अथवा वल्लभ। शुरुआती मध्ययुग में भारत में शैव संप्रदाय प्रमुख हो गया था। मार्कन्डेय के शिवजनबोध में शिव सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार प्रमुख तत्व हैं। स्वामी (पति), बन्धनों में जकड़ा मनुष्य (पशु) व बन्धन (पाश)। बन्धन कर्मों, माया व अहं का है। इससे मुक्ति के लिये मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करना (विद्या), संस्कारों का पालन (क्रिया), तप (योग) व धार्मिक कार्य करना (कार्य) चाहिये। देवी पूजा हमेशा ही हिन्दु संस्कृति का हिस्सा रहा है। प्रकृति व देवी से हमेशा शक्ति को जोड़ा गया है साथ ही तन्त्र मन्त्र को भी।
7. हिन्दु दार्शनिक खोज
पुरातन काल से ही भारत अपने ज्ञान के लिये जाना जाता रहा है। पारसी, ग्रीक व रोमन यहाँ के साधु सन्यासियों से सीखने को आतुर थे। 18 वीं सदी में जब पहली बार अंग्रेजी में उपनिषदों का अनुवाद हुआ तो योरोपीय विद्वानों ने इन ग्रंथों की खूबसूरती को सराहा।
हिन्दु दार्शिकता की दो धारायें है –
आस्तिक – सान्ख्य योग, न्याय विशेषिका, व वेदान्त (पूर्व व उत्तर मीमान्सा)
नास्तिक – बौद्ध व जैन विचार धारा
8. योग दर्शन
सान्ख्य दुःखो के निवारण में सहायक है। इसके अनुसार पुरुष व प्रकृति (वस्तु) दोनों अलग हैं। इन दोनों का मिलन व्यक्ति को स्वयं की प्रकृति का आभास कराता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्, रज व तम) का हर व्यक्ति में असंतुलित समावेश होता है। सभी दुःखों का कारण ये असन्तुलन ही है। योग के आठ (यम, नियम, आसन, प्रामायाम, प्रत्याहार, ध्यान व मोक्ष) रूपों के पालन से व्यक्ति प्रकृति के आकर्षण से मुक्त हो सकता है।
9. शंकराचार्य व उनका अद्वैत वेदान्त
उपनिषद विशेषकर भद्रायण के वेदान्तसूत्र में काफी बिखरे हुए वाक्यों में है। इनको समझने के लिये व्याख्या करना जरूरी है। 9वीं और 14वीं शताब्दी के बीच वेदान्त की दस शाखायें विकसित हुई, जिनकी स्वयं की व्याख्या (भाष्य व टीका) है। इनमें प्रमुख चार हैं –
– शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त
– रामानुजाचार्य का विशिष्ट वेदान्त
– माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
– वल्लभाचार्य का पुष्टि मार्ग
आदि शंकराचार्य (788- 820 बीसी) हिन्दु धर्म को बुद्ध धर्म के समानान्तर परिभाषित किया। उन्होने जगत को माया नहीं माना। उनके अनुसार ईश्वर के दो रूप थे। एक जिसकी हम पूजा करते हैं (सगुण)। दूसरा परम शक्तिमान निराकार (निर्गुण)। उनके द्वारा रचित विवेक चूड़ामणि के अनुसार बन्धन या मुक्ति स्वयं के मस्तिष्क पर निर्भर है।
मुक्ति के लिये ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत है जिसे सदाचरण, सुखों के त्याग व मुक्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा से ही पाया जा सकता है। आजकल चार शंकराचार्य पीठ (मठ) हैं।
10. कई लोग शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त को बौद्ध धर्म का छिपा रूप मानते थे। 9वीं शताब्दी में श्रीरंगम में नाथमुनि ने तमिल प्रबंधन के भक्त कवियों (अल्वर) को मान्यता देकर उनके गीतों को को पूजा में उपयोग करने की स्वीकृति देदी। पिता द्वारा विरासत में मिली पंकार्ता (पूजा विधि) व इन भक्तिगीतों ने भविष्य के अधिक रूढ़ि वादी श्रीनिवास पन्थ की नींव रखी। उनके विद्वान पौत्र ने कई ग्रन्थों की रचना कर वैष्णव वेदान्त को संगठित किया। अपनी मृत्यु शैया पर रामानुजाचार्या को बुलाकर अपनी तीन इच्छायें पूरी करने का वचन लिया। ये थीं व्यास व परसुराम (विष्णु पुराण के रचियता) मुनियों की प्रतिष्ठा पुनस्र्थापित करना, नम्मालवर (प्रमुख अलवर) के गीतों को जीवित रखना व ब्राहृसूत्र की व्याख्या करना। श्रीरंगम में रामानुजाचार्य ने कई सुधार व पूजा विधि का पुनर्गठन किया। वैष्णव संप्रदाय के विस्तार में उन्हें शैव राजा के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें भागकर मैसूर जाना पड़ा जहां का शासक उनका शिष्य बन गया। बाद में श्रीरंगम लौट कर श्रीरंगम के आचार्योंकी वैषणव वेदान्त मठाधीषों के रूप में स्थापना की। वे 120 वर्षों तक जीवित रहे व ब्राहृसूत्र की आधिकारिक व्याख्या लिखी। उन्होंने वैष्णव मंदिरों पूजा विधि निर्धारित की। आज श्रीनिवास समुदाय कापी बड़ा है तथा दो केन्द्रों में विभाजत है। कान्चीपुरम दक्षिण क्षेत्र के लिये व श्रीरंगम उत्तर क्षेत्र के लिये।
11. माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
माधवाचार्य जी (1238-1317) का जन्म उडीपी गाँव में हुआ। वे पहले अद्वैत वेदान्त के शिक्षक अच्युतप्रेक्षा के शिष्य बने। बावजूद प्रायः मत भिन्नता के वे गुरू का आदर पाने में सफल रहे व उन्हें आनंदतीर्थ नाम मिला। रामानुजाचार्य से अलग उन्होनें स्वयं का द्वैत वेदान्त स्थापित किया। मनुष्य व परमेश्वर में उन्होनें पाँच मुख्य अन्तर बतलाये। दोनों के बीच बिम्ब प्रतिबिम्ब का संबन्ध माना। परमेश्वर मूल रूप है, तथा मनुष्य उसका परावर्तित रूप है। अज्ञान ही बन्धन का कारण है तथा ईश्वर ही उससे मुक्ति दिला सकता है। वे एक प्रभावी लेखक थे तथा रिग्वेद व महाभारत के एक भाग की व्याख्या की। वे विष्णु के प्रबल समर्थक थे तथा विरोधी उनसे भय खाते थे।
12. वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग
वल्लभाचार्य (1481-1533) एक तेलगु ब्रााहृण थे, उन्होंने एक नये वैष्णव वेदान्त पुष्टिमार्ग की स्थापना की। वे भागवत् पुराण को नयी उचाँईयों तक ले गये। उनका मानना था कि संन्यास का अत्यधिक पतन हो चुका है, तथा पूजा पारिवारिक माहौल में की जानी चाहिये। उनके उपदेश का सार था कि ईश्वर की प्रसन्नता के कारण को जाना जा सकता है। पुष्टिमार्ग उदार व सबके लिये खुला है। इसमें ईस्वर के साथ को आनंददायी माना
गया है, तथा नाथ जी (मूर्ती जो वल्लभाचार्य को गिरिराज में मिली थी) की सेवा में विश्वास किया जाता है। बाद में वेदान्त का ज्ञान क्षीण होकर केवल गुरु विशेष की संस्था, पूजा विधि व प्रेरक भक्ति साहित्य का महत्व रह गया।
13. हिन्दु धर्म का अन्य धर्मों से सामना
स्वयं से अलग हुए धर्मों जैसे बौद्ध व जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दु धर्म को 14वीं शताब्दी से मुस्लिम आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अलग हुए धड़ों से मुकाबला जहाँ केवल बहस तक सीमित था, मुसलमानों ने जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने कई मन्दिरों को नष्ट किया तथा उँचे पद सिर्फ मुसलमानों को दिये। हालाकि बाद में अकबर ने हिन्दुओं को बराबर का
स्थान देने का प्रयास किया, लेकिन हिन्दुओं ने अपने को घेरा हुआ पाया फलतः वे कठोर व अन्तर्मुखी हो गये। 15वीं सदी के अन्त तक यूरोप के लोंगों के आक्रमण शुरू होने पर उसे क्रिश्चन मिशनरियों से सामना हुआ। 1857 में ब्रिाटिश साम्राज्य में आने से मिशनरी गतिविधियाँ (प्रोटेस्टेन्ट) काफी बढ़ गई। मिशनरी स्कूल खोले गये क्रिश्चन साहित्य का भारतीय भाषाओं में हुआ तथा चर्चों में धर्म परिवर्तन सभायें होने लगी। उस समय धर्म परिवर्तन साफ तौर पर लाभकारी था तथा ईसाइयों की संख्या लगातार बड़ने लगी। कुछ हिन्दुओं को ईसाइ धर्म की कुछ बातें अच्छी लगी और वे अपनी परंपरा बदलने लगे। राजा राम मोहन राय(1772-1833) ने सती प्रथा उन्मूलन व विधवाओं के जीवन सुधार आरम्भ किया। दयानंद सरस्वती ने ईसाइ धर्म का खुलकर विरोध किया व आर्यसमाज की स्थापना की।
14. पश्चिम सभ्यता का हिन्दु धर्म की प्रतिक्रिया
जहाँ राजा राममोहन राय व महात्मा गाँधी ने पश्चिम विचारधारा के कई बिन्दुओं को स्वीकार किया, सामान्य प्रतिक्रिया उसके विरुद्ध ही थी। राजा राममोहन राय ने पटना के मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी व कम्पनी की नौकरी की वे अपने वैष्णव पिता से अलग हो गये। उन्होंने स्वयं को हिन्दु धर्म के सुधार के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों को बढ़ावा देकर विज्ञान की शिक्षा पर बल दिया। रामकृष्ण परमहंस (1834-1886) गरीब ब्रााहृण परिवार में जन्मे थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगा तथा पिता व भाई की मृत्यु उपरान्त वे काली मठ में पुजारी बन गये। वे देवी के अनन्य भक्त बन गये जनेऊ त्याग कर वे अछूतों में देवी का रूप देख कर उन्हें गले लगाने लगे। उनका सभी धर्मों में विश्वास था तथा उनके उपदेश का केन्द्र था कि ईश्वर ही सब कुछ करता है। धीरे धीरे उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने विवेकानंद में नारायण का रूप देखा जो लोंगो का दुःख दूर करे के लिये आये हैं। उन्होंने विवेकानंद के शरीर पर अपना पैर रखकर उनको ईश्वर के दर्शन की शक्ति दी। बेरोजगारी से परेशान विवेकानंद ने अनुभव किया कि ईश्वर द्वारा दी गई वस्तु, प्रेम, न्याय व दुःख सभी के लिये संसार में अपना स्थान है। उन्होंने अपना जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया।
तीर्थ यात्रा के दौरान कन्याकुमारी में उन्हें समझ में आया कि आजकल के संन्यासी को व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिये जिससे समाज का भला हो सके। इस प्रकार सामाजिक उत्थान के साथ व्यवहारिक शिक्षा के विचार की शुरुआत हुई। 1893 में शिकागो की विश्व धर्म सबा में में अमेरिकन बन्धुओं से अनुरोध किया कि वे भारत में मिशनरी के स्थान पर अध्यापक व तकनीकी विशेषज्ञ भेजे। अपने भाषण के बाद वे सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने गये। फोर्ड की सहाया से स्थापित रामाकृष्ण सान्स्कृतिक केन्द्र में लगातार सम्मेलन व सभायें होती रहती हैं। महातमा गाँधी ने भी ने पश्चिम विचारधारा से प्रभावित होकर छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष किया। वे स्त्रियों के मनोबल व आध्यात्मिक शक्ति में बरोसा रखते थे। इन सभी ने भीतर रह कर ही हिन्दु धर्म में सुधार लाने का प्रयास किया।
उसके उपरान्त हिन्दु धर्म का राजनीति करण शुरू हो गया और वह एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरा। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1909 में पहली हिन्दु राजनीतिक पार्टी हिन्दु
महासभा का गठन किया जो मुस्लिमों की कट्टर विरोधी थी। जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टी दूसरी बड़ी हिन्दु पार्टी है। इसके अतिरिक्त 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 1964 में विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल आदि आक्रमक संगठन बन गये।
16. हिन्दु धर्म के आधुनिक चेहरे
रमन महर्षि(1879-1950), अरविन्दो घोष (1872-1950), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888- 1975), भक्त वेदान्त स्वामी (1896-1977, इस्कान के संस्थापक), श्रीकृष्णप्रेम वैरागी (1895-1965), सत्य सांई बाबा (1926-2011), आनन्दमयी माँ (1896-1983) आदि आधुनिक नाम है जिनके काफी अनुयायी रहे है।
17. हिन्दु धर्म के लिये आज की चुनौती
आज हिन्दु धर्म केवल रस्मों तक सीमित रह गया है। अधिकतर संत व पुजारी ब्राहृ ज्ञान त्याग कर सान्सारिक सुखों में लिप्त रहते हैं। लोग देवी देवताओं की पूजा भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिये करते हैं। ब्राहृ की अथवा स्वयं की खोज की ओर प्रेरित करना ही आज की हिन्दू धर्म के लये सबसे बड़ी चुनौती है।

अपने लक्ष्य से भटकते विश्व के धर्म

विश्व के सभी धर्मों का मूल उद्देश्य समाज में आपसी सामंजस्य, प्रेम व सहयोग की स्थापना का ही रहा है। यह बिल्कुल सच है कि समाज के सभी लोगों से समझाबुझा कर अथवा नियमों की अवहेलना करने पर दन्ड का भय दिखाकर समाज के नियमों का पालन नहीं करवाया जा सकता है। स्वभाविक विविधता के चलते समाज में कुछ लोग बुद्धिमान, कुछ दयालु, कुछ दबंग, कुछ आलसी, कुछ मेहनती, कुछ शान्त, कुछ क्रोधी आदि स्वभाव के होते हैं। इन्हीं विविधताओं के चलते समाज में अपराध, टकराव व बिखराव की स्तिथियाँ उत्पन्न होना स्वभाविक है। विभिन्न समाजों ने इस समस्या से निपटने के लिये आरम्भ से ही प्रयास किया है। इसका सबसे आसान उपाय जो लगभग सभी समाजों ने अपनाया वह था नियम बनाने का व नियमों के न मानने पर दन्डित करने का। इसी उपाय ने समाज में एक प्रसाशनिक ढाँचे की नींव रखी जो समय के साथ विकसित होता रहा। इस उपाय में सबसे बड़ी कमी थी पूरे समाज पर नजर रखने की आवश्यकता। समाज के विस्तार के साथ यह उपाय अधिक प्रभावी नहीं रह पाया। परिणाम स्वरूप एक ओर अधिकारी स्वेच्छारी हो गये व दूसरी ओर कानून की नजर से बचकर लोग गलत काम करने लगे। परिणाम स्वरूप समाज में अराजकता बढ़ने लगी। इसी परिस्थिति को सुधारने के लिये सामाजिक चिन्तकों ने धर्म का सहारा लिया। लगभग सभी धर्मों के मूल में इसीलिये ये बातें मूलतः मिलेंगी
1. एक महाशक्ति (ईश्वर) है जो सब देखती है व संसार का संचालन करती है।
2. मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है। यह फल इस जन्म में अथवा अगले जन्म में अवश्य ही मिलता है।
3. सत्य का पालन, जीवों पर दया, दूसरों की सहायता, बड़े बूड़ों व बीमार लोगों की सेवा, बड़ों का आदर करना व समाज के नियमों का पालन करना आदि पुण्य कार्य हैं जिनका फल अच्छा मिलता है।
4. लोभ, क्रोध, घृणा, झूठ बोलना, निर्बल को सताना, दूसरों का हक छीनना आदि पाप है, जिनका फल बुरा मिलता है।
5. ईश्वर हमेशा कमजोर की सहायता करता है। सच्चे मन से स्मरण करने से वह किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य ही करता है।
6. गलती से गलत काम हो जाये उचित प्रायश्चित से उसके परिणाम से मुक्ति मिल सकती है।
7. इस जन्म के कुल कार्यों के अनुसार ही मनुष्य मृत्यु उपरान्त स्वर्ग अथवा नर्क का पात्र होता है।
यह स्वभाविक था कि इस विचारधारा का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाये। इसके लिये प्रचारकों की बड़ी टीम तैयार करने तथा उन्हें प्रशिक्षण देने के लिये संगठन बनाये गये। समाज पर उचित प्रभाव हो इसलिये इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि प्रचारक स्वयं धर्म में विश्वास रखने वाले हों व उसके अनुसार आचरण करें। संगठन सुचारु रूप से चले इसके लिये समाज से स्वेच्छा से दान देने को धर्म पालन का ही एक हिस्सा भी बनाया गया। विचारधारा को सामान्य लोगों की समझ में आसान बनाने के लिये प्रार्थना स्थलों की जगह जगह स्थापना की गई। यही स्थल प्रचार प्रसार का केन्द्र भी बन गये। इस विचारधारा के आशातीत परिणाम सामने आये। सामान्य जनता व प्रशासक वर्ग पर इसका लगभग एकसा प्रभाव देखने को मिला, परिणाम स्वरूप बिना विशेष प्रयास के सामाजिक व्यवस्था में काफी सुधार देखने को मिला। शासक वर्गों को समाज को व्यवस्थित रखने का यह तरीका बहुत आसान लगा। अतः शासक वर्गों ने इन संगठनों को समर्थन व सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। समाज ने भी इस विचार धारा को दिल से स्वीकार किया व इस विचारधारा को न मानने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। कई सदियों तक यह विचारधारा समाज पर स्वनियंत्रण बनाये रखने में सफल रही। अपवाद स्वरूप ही समस्यायें समाज में देखने को मिलती थी जिनकों प्रशासन के लिये नियन्त्रण करना कठिन नहीं था।
शासक वर्गों का वरद हस्त मिलने के साथ ही धार्मिक संगठनों में सत्ता के निकट पहुँच कर अपनी शक्ति बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा होने लगी। यह धर्म को अपने लक्ष्य से भटकाने वाला पहला कदम सिद्ध हुआ। प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने के प्रयास में धर्म प्रतिनिधियों ने शासकों व शक्तिशाली वर्गों के गलत कार्यों को जनता में उचित व जायज बताने का प्रयास किया। बदले में उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप धार्मिक केन्द्र स्वयं एक सत्ता केन्द्र बनने लगे। ऐसे केन्द्र प्रमुख सादगी से हटकर भोग विलास का जीवन जीने लगे। इसका प्रभाव यह रहा कि सत्ता लोलुप व लालची लोग इस ओर आकर्षित होने लगे। इस प्रकार समय के साथ प्रर्थना स्थलों की जगह पूजा स्थलों ने लेली। इन पूजा स्थलों में भेंट चढ़ाना आवश्यक हो गया। पूजा स्थलों का विकास तेजी से हुआ। तथा पाप निवारण तथा स्वर्ग प्राप्ति के लिये नये नये तरीके स्थापित किये गये। इन पर खर्च व्यक्ति की हैसियत देख कर निर्धारित होता था। समाज ने इन उपायों को मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की उम्मीद में सहर्ष स्वीकार किया। कई सदियों तक ये प्रथायें पनपती रहीं। स्वेच्छिक दान से अलग लोभ अथवा भय के कारण दान की प्रथा ने धर्म के प्रति लोगों की आस्था कम करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
उपरोक्त दो महत्वपूर्ण बदलावों ने धर्म के स्वरूप को बदल दिया। प्रतिस्पर्धा ने धर्म के विघटन को बढ़ावा दिया जिससे कई शाखायें व उपशाखायें लगभग सभी धर्मों में स्थापित हो गई धर्म ने लगभग एक व्यापार का स्वरूप ले लिया। अपना व्यापार बढ़ाने के लिये ये प्रतिष्ठान विज्ञापन, प्रवेश शुल्क, विशेष पूजा व प्रसाद व अन्य उत्पादों की बिक्री से अपना व्यवसाय बढ़ाने में व्यस्त हैं।
इन बदलावों का ही परिणाम कि आज धर्म में मन से आस्था रखने वाले व धर्म के मूल सिद्धान्तों का पालन करने वाले लोग समाज में कम ही मिलेंगें। अधिकतर धर्मस्थलों में लोग या तो पर्यटक की तरह अथवा भेंट चढ़ाकर अपने पापों के बोझ से मुक्ति पाने के लिये ही जाते हैं।
धर्म अपने मूल उद्देश्य समाज में सामंजस्य, सद्भावना व सहयोग से बहुत दूर चला गया है यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक स्थलों में बढ़ती भीड़ के बावजूद आज भ्रष्टाचार, बेईमानी, अपराध. आतन्कवाद व अत्याचार की घटनायें रोज बड़ी संख्या में देखने सुनने को मिलते है।

आधुनिक समाज और धर्म

विश्व में सभी धर्मों का उद्भव समाज के उत्थान के लिये व मानव मूल्यों की स्थापना के लिये ही हुआ है। यह सामाजिक चिन्तकों द्वारा समाज में आपसी सामंजस्य एवं व्यवस्था को स्थापित करने हेतु बनाई गई एक आचार संहिता है।
समाज की आवश्यकतायें समय के साथ बदलती हैं। लेकिन धर्म का स्वरूप आज भी थोड़े बहुत फेर बदल के साथ पुरातन ही है। अतः आज धर्म को लोग एक परंपरा के रूप में ही लेते हैं। धर्म गुरु भी विश्व भर में इसे इसी रूप में अपने अपने तरीके से आगे बड़ाने का प्रयास कर रहें हैं।
इन प्रयासों में समय के साथ कई विकृतियाँ जैसे अन्धविश्वास, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, धन व बल संग्रह की प्रवृत्ति आदि साफ दिखती हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो धर्म आज एक व्यवसाय हो गया है।
धर्म के पथ प्रदर्शक के रूप में आज भी हजारों वर्ष पूर्व रचित ग्रन्थों को ही माना जाता है। ये धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, कुरान, बाइबल आदि निसंदेह अपने समय के महत्वपूर्ण एवं महान रचनायें हैं। लेकिन आज के सामाजिक संदर्भ में इनका कितना महत्व है इस पर विचार करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
ये आश्चर्य की बात है कि आज के विद्वान इन ग्रन्थों की मीमान्सा तो अपने तरीके से समय समय पर करते रहते है। लेकिन किसी भी विद्वान ने एक नये सिरे इन विषयों पर विचार करने की आवश्कता महसूस नहीं की। यही एक कारण है जिसकी वजह से आज धर्म का मूलभूत आधार जो सामाजिक उत्थान से जुड़ा था वह उससे अलग हो गया है।
ऐसा नहीं है कि समाज सुधार के प्रयास नहीं हो रहें हैं। ऐसे कई महापुरुष हुए हैं और आज भी हैं जिन्होनें अपना संपूर्ण जीवन समाज की उन्नति व सुधार के लिये समर्पित कर दिया है। किन्तु ये प्रयास मानव सेवा को धर्म मान कर किये गये प्रयास हैं और उनका प्रतिफल भी एक सीमित सीमित स्वरूप में ही रहा है।
आज धर्म के नाम पर कई आयोजन करोड़ों रूपये लगा कर विश्व भर में आयोजित किये जातें हैं। लोग उसमे अपना योगदान धन व समय लगा कर देतें भी हैं। लेकिन समाज पर इन आयोजनों का प्रभाव एक सामाजिक मिलन से अधिक कुछ देखने को नहीं मिलता है।
यह भी देखने में आता है कि लोग करोड़ों रूपये खर्च कर कई प्रकार के अनुष्ठान आयोजित करते हैं। इनका उद्देश्य मात्र अपना समाज में महत्व दिखाने अथवा अपना अपराध बोध कम करने के लिये अधिक समाज की भलाई के लिये कम होता है।
आज धार्मिक प्रतिष्ठानों के पास अपार संपदा है एवं धार्मिक गुरु एवं विद्वानों के पास
सभी प्रकार के साधन एवं सुविधायें। लेकिन सामाजिक मूल्य आज इतिहास के निम्नतर स्तर पर हैं। पुराने विद्वानों ने भगवान अथवा ईश्वर को सर्व व्यापी, पाप व पुण्यों का हिसाब रखने वाला व अन्त में मनुष्य को उसके कर्मो के अनुसार दन्ड अथवा पुरस्कार देने वाला स्थापित किया था। लोगों में यह भावना घर कर गई थी कि ईश्वर का न्याय सटीक व बिना किसी भेदभाव के होता है। अतः अधिकतर लोग भगवान अथवा ईश्वर से डरते थे एवं नियन्त्रित आचरण करते थे। इस कारण समाज में एक व्यापक स्तर पर समन्वय व शान्ति बनी रही। यदा कदा कुछ लोग दुराचरण करते थे तो सामाजिक व्यवस्था उसे दण्ड देती थी।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्तिथियों में तेजी से बदलाव आया है। आज शक्ति संपन्न वर्ग यह मानता है कि वह कुछ भी गलत कर सकता है। एक उचित अनुष्ठान अथवा यथोचित भेंट किसी धर्मस्थल पर चढ़ा कर वह ईश्वर से अपने किये की क्षमा माँग सकता है। ईश्वर से क्षमा मिले या नहीं उसका अपराध बोध तो कम अवश्य ही हो जाता है। और वह उससे भी बड़े अनेतिक कार्य की योजना बनाने में लग जाता है। शक्ति व साधन के बल पर प्रायः ये लोग सामाजिक व्यवस्था के दण्ड से भी बच जाते हैं। इस वजह से ईश्वर की निस्पक्षता पर लोगों का विश्वास कम हुआ है। परिणाम स्वरूप शक्ति साधन हीन लोग भी दुराचरण निडर होकर करने लगे है। यही वजह है कि मानव मूल्य आज निम्नतर स्तर पर हैं।
भगवान से क्षमा माँगने अथवा अपने अपराध बोध को दबाने वाले श्रदधालुओं की बढ़ती संख्या के फल स्वरूप ही आजकल धार्मिक स्थलों की संख्या व उनका स्तर तेजी से बढ़ रहा है। और उतनी ही तेजी से बढ़ रही है सामाजिक अपराधों की संख्या एवं उनके आकार।
धर्म व अपराध की एक साथ प्रगति आज के समाज में धर्म की सार्थकता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।
इसलिये आज आवश्कता है धर्म को नये सिरे से परिभाषित करने की। यह सौभाग्य की बात है कि आज धार्मिक संगठन साधन संपन्न है और धार्मिक विद्वानों की भी विश्व में कमी नहीं है। आज जरूरत है तो सिर्फ इतनी कि विश्व भर के विद्वान व धर्म संस्थान मिल कर इस विषय पर ध्यान केन्द्रित करें। और शोध करें एक ऐसे नये धर्म की जो मानव मूल्यों की व एक सभ्य समाज की पुनस्र्थापना में सहायक हो सके।

आज का इंसान आखिर क्या चाहता है

आज का इन्सान आखिर चाहता क्या है

आज हम लोग अपनी उन्नति का बखान करते नहीं थकते। मेडिकल साइन्स वाले कहते
है हमने मनुष्य बनाने का रहस्य जान लिया है। अब हम दिये हुए गुणों के अनुसार मानव
भ्रूण अथवा अन्य किसी भी जानवर का बीज का प्रारूप तैयार कर सकते है। भौतिक
शास्त्री प्रकृति की उत्पत्ति की गुत्थी को सुलझाने का दावा कर रहे हैं। आज हम ब्राम्हांड
के किसी भी कोने में पहुँच सकने का दावा भी करते हैं। सुख सुविधा के सब साधन
जुटाने का काम तो हम निरन्तर कर ही रहें हैं। लेकिन क्या ये प्रयत्न वास्तव में जिस
उद्देश्य से किये गये थे उसे पूरा करने में सहायक हुए है इस पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह
आज लगा हुआ है।

क्या आज लोग दुनिया के किसी भी कोने में पिछले सौ साल की तुलना में अधिक सुखी
व सन्तुष्ट है। ये एक विडम्बना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा व सहुलियत के
साधन बढ़ाने के प्रयास किये उतनी ही उसकी असुरक्षा की भावना व चिन्तायें बढ़ती गई।
विकास की ये विसंगतियाँ लगभग हर क्षेत्र में आज देखने को मिलती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में
आज साधनों के साथ बीमारियाँ बढ़ रही है। सुख सुविधाओं के साथ बैचेनी बढ़ रही है।
संचार साधनों में प्रगति के साथ दिलों की दूरियाँ बढ़ रही हैं। परिवाहन साधनों की प्रगति
के साथ दुर्घटनायें बढ़ रही है। चाँद तक तो हम आज हफ्ते भर में पहुँच सकते हैं लेकिन
पड़ोसी तक पहुँचने में महीनों निकल जाते हैं। ये प्रगति मानव को कहाँ ले जायेगी कह
पाना मुश्किल है।

ये बदलाव क्यों आया इस पर गौर करने की आवश्कता है। यह जरूरत इसलिये है भी
कि यदि हम परिवर्तन की दिशा बदलना चाहें तो हमें क्या करना चाहिये यह हम जान
सकें। आज का समाज जिस ओर अग्रसर है उसके मूल में सोच में आया एक महत्वपूर्ण
बदलाव है। और यह बदलाव है हमारे सोच का स्वयं पर केन्द्रित होना। पहले हमारी सोच
का आधार हुआ करता था त्याग, दूसरों की भलाई, मुसीबत में दूसरों की सहायता, बड़ों
का सम्मान, दया,प्यार आदि आदि। इसके अतिरिक्त लोग समाज में अपनी छबि के प्रति
कफी सचेत रहते थे। अतः पहले प्रायः लोग किसी भी कार्य को करने के पहले सोच को
उपरोक्त आधारों पर तोल लेते थे। समाज के अलावा धर्म की भी मनुष्य के व्यवहार में एक
अहम भूमिका होती थी। लोग भगवान से डरते थे व हर कार्य को पाप व पुण्य के तराजू में
तौल कर निर्णय लेते थे।

विज्ञान की प्रगति के साथ मनुष्य की तर्क शक्ति का विकास हुआ, और उसके साथ ही
पाप पुण्य से विश्वास डगमगाने लगा। साथ ही धर्म के पंडितों ने पाप कर्म की काट के
लिये दान, अनुष्ठान आदि उपाय खोज निकाले जिससे लोगों के मन से गलत कार्य करने
के बाद होने वाला अपराध भाव का बोझ दूर नहीं तो कम अवश्य ही होने लगा। शायद
भगवान से डर दूर होने के साथ ही समाज का डर भी नहीं रहा। परिणाम स्वरूप शुरु हुई
धन एवं शक्ति संग्रह की एक ऐसी दौड़, जिसमें कुछ भी करना जायज था। उदेश्य रह
गया तो सिर्फ एक, वह यह कि किसी भी सूरत में मुझे सबसे आगे निकलना हैं। शक्ति व
धन संग्रह की इस दौड़ ने मनुष्य का ध्यान स्वयं पर केन्द्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धन व शक्ति किसके पास कितनी है, यह दिखलाने का एक ही तरीका हो सकता है। वह
है उसका प्रदर्शन। और इस प्रकार शुरु हुआ धन व शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला। कोई
बड़े बड़े मन्दिर बना रहा है तो कोई बड़ी बड़ी धर्मशाला। कोई विशाल धार्मिक आयोजन
कर रहा है तो कोई प्रतिद्वन्दी को नीचा दिखाने का षडयन्त्र रच रहा है। गलत कार्य करने
पर जो दन्ड का विधान प्रशासन ने बनाया है वह भी आज शक्ति व धन के प्रदर्शन के
प्रभाव से नहीं बच पाया और समय के साथ इसने भ्रष्टाचार का विकराल रूप ले लिया।
कहतें हैं कि पाप की कमाई बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। यही कारण है कि आज दुराचार
सड़क पर आ गया है। आज हत्या, लूट व बलात्कार आम है। नैतिकता का इतना
अवमूल्यन हो गया है कि 2-3 साल की बच्ची का भी दुराचार का शिकार होना आम बात
हो गई है। आज शक्ति व धन संग्रह की होड़ व उसके प्रदर्शन में दया, धर्म, परोपकार
आदि मानव मूल्य जो एक सभ्य समाज का आधार हुआ करते थे वह प्रायः लुप्त हो गये
हैं।

ऐसा नहीं कि पहले अनैतिक कार्य करने वाले लोग नहीं होते थे, लेकिन वे कुछ गिने चुने
व मार्ग से भटके लोग ही हुआ करते थे। लोग उन्हे पापी और दुष्ट मान लेते थे और
भरोसा रखते थे कि ईश्वर उनको दन्ड अवश्य ही देगा। उनका उदाहरण देकर वे बच्चों
को गलत राह पर न चलने का पाठ पढ़ाते थे। लेकिन आज चारों ओर अनैतिकता का
साम्राज्य है। और अधिकतर लोग आज यह मानते हैं कि सफलता के लिये धन व शक्ति
का होना जरूरी है, वे किसी भी सूरत में इन्हें पाना चाहते हैं।

अवश्य ही इस प्रकार पायी सफलता अन्दर ही अन्दर व्यक्ति को कचोटती रहती है जिस
कारण बहुत कुछ पा लेने के बावजूद वह सुख एवं सन्तोष महसूस नहीं कर पा रहा है।
आखिर इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या है। समस्या का हल मूल कारण दूर
करने में ही है। आज आवश्यकता है मनुष्य को अपना ध्यान स्व से हटा कर दूसरों पर
केन्द्रित करने की।

एक सीधा सा तरीका हो सकता है सिर्फ इन्तजार करने का। जो हो रहा है उसे होने दें।
मनुष्य का स्वभाव है कि वह कुछ समय बाद हर चीज से ऊब जाता है, और कुछ नया
करना चाहता है। इसकी पूरी संभावना है समय के साथ मूल्य फिर बदलें और फिर समाज
के सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें। हाँ यह सब होने में कितनी सदियाँ लगेगी कह
पाना कठिन है।

दूसरा तरीका वैज्ञानिक हो सकता है। यह सम्भव है कि कुछ वर्षों में विज्ञान में हम इतनी
प्रगति कर लें कि मनुष्य के मस्तिष्क को नियन्त्रित करने का उपाय खोज निकालें। तब
मनुष्य के मस्तिष्क को जैसा चाहे ढाल सकें। यदि मस्तिष्क को भावना शून्य ही कर दिया
जाय तो सुख दुःख से परे एक मशीनी समाज का निर्माण समस्या को जड़ से ही समाप्त
कर देगा।

तीसरा तरीका हो सकता है नये सिरे से भगवान के समकक्ष अथवा उनसे भी बड़कर
एक नयी सर्वव्यापी, निष्पक्ष शक्ति रूप की प्रतिष्ठा जिसका डर मनुष्य के ह्मदय में पुनः बैठ
सके।

यह डर मनुष्य को अपने विवेक का उपयोग दूसरों की भलाई के लिये प्रेरित करेगा और
पुनः एक ऐसे समाज जिसमें हर व्यक्ति दूसरों की भलाई एवं उन्नति के बारे में सोचे व
अपने कर्मों का आधार बनाये। निश्चित ही ऐसे समाज में अमन चैन के अतिरिक्त कुछ
और हो ही नहीं सकता है।