विश्व सरकार

आज पूरी दुनिया में आतंकवाद, आन्तरिक मतभेद, अपराधों की बहुलता व धार्मिक प्रतिद्वन्दिता का माहौल है। अपने आर्थिक, भोगोलिक व अन्य स्वार्थों के चलते कई देशों की सरकारें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में अन्य देशों में अशान्ति का वातावरण पैदा करने का प्रयास करती रहती हैं। एक देश के अपराधी दूसरे देश में शरण लेकर देश के कानून से बचे रह कर अपराधों का संचालन खुले रूप से करते हैं। विभिन्न देशों के अलग अलग कानूनों का ऐसे अपराधी भरपूर लाभ उठाते हैं।
पूरे विश्व में राजनीतिज्ञ इन समस्याओं से निपटने के प्रयास अपने अपने तरीके से कर रहे हैं किन्तु अपराध हैं कि बढ़ते ही जा रहे है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी देश इन समस्याओं से ग्रस्त हैं। अतः आवश्यक है कि सभी देश मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें।
समस्या का समाधान निकालने से पहले इन समस्याओं के कारण ढूँढना आवश्यक है। यूँ तो सामाजिक विचारक कई कारण बतलाते रहतें हैं। लेकिन ये कारण या तो एक क्षेत्र विशेष के लिये लागू होते है अथवा एक संकीर्ण दृष्टि से विश्लेषित सोच की उपज है। यदि हम समूचे मानव समाज की दृष्टि से वृहत विश्लेषण करें तो आज की समस्याओं के मूल में इन कारणों को पायेगें –
1. विध्वंसकारी हथियारों की उपस्थिति से कई क्षेत्रों में भय का वातावरण। कुछ देशों ने वैज्ञानिक व धन बल से संहारक हथियारों का आविष्कार कर उत्पादन करना शुरु किया। इनको शक्ति का प्रतीक बनाकर दूसरे देशों या विरोधी तत्वों को बेच कर अधिक धन अर्जित करने का साधन बनाया। परिमाम स्वरूप कई देश गलत तरीकों से धन अर्जित करने वालों को प्रोत्साहन देकर ये साधन जुटाकर शक्ति बढ़ाने लगे। बढ़ती शक्ति के कारण उपजित अंहकार ने विवादों को बढ़ाया।
2. हथियारों की आसान उपलब्धता ने अपराधियों की ताकत में कई गुना इजाफा किया इस कारण सरकार व अपराधियों में प्रतिद्वन्दिता को बढ़ाया।
3. धार्मिक अनुनायियों की संख्या को वर्चस्व का प्रतीक मानकर भय, लालच व जबरन धर्म परिवर्तन ने एक नयी सामाजिक प्रतिद्वन्दिता को जन्म दिया जिसने आज उन्माद का रूप ले लिया।
4. प्राकृतिक साधनों को सीमित मान कर ताकतवर देशों की विश्व के साधनों को अपने नियन्त्रण में लेने की प्रतिस्पर्धा ने भी विवादों को विश्वव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उपरोक्त कारणों के मद्देनजर यदि हम आज की समस्याओं को देखें तो किसी एक देश के लिये अकेले इन समस्याओं से लड़ना संभव नहीं है। सभी देश मिलकर ही इन समस्याओं से मानव समाज को मुक्त कर सकते है। अतः आवश्यकता है कि सभी तरह की राजनीतिक व भौगोलिक
सीमाओं को तोड़ कर पूरे विश्व में एक सरकार स्थापित कर दी जाये। यह इस प्रकार संभव हो सकता है –
1. संयुक्त राष्ट्रसंघ पहले से ही एक ऐसी संस्था है जिसको विश्व सरकार में परिवर्तित किया सकता है। जरूरत सिर्फ सभी के अधिकार बराबर करने की है। शेष देशों को सदस्यता के लिये आमन्त्रित किया जा सकता है।
2. विश्व सरकार के लिये संविधान कुछ प्रजातन्त्रिय देशों के संविधानों से उपयुक्त अंशों को लेकर आसानी से वनाया जा सकता है। यह सभी पर एक जैसा लागू होगा। आज कल यातायात व संचार माध्यमों से पूरे विश्व में एक सरकार चलाना आसानी से संभव है।

मानव समस्याओं को कम करने के लिये संविधान में निम्न पहलुओं को सम्मलित करना जरूरी है –
1. साधारण हथियारों जैसे बन्दूक (स्वचालित नहीं) व पिस्तौल को छोड़ कर अन्य हथियारों का उत्पादन तुरन्त बन्द कर इन उद्योगों का उपयोग आवश्यक वस्तुओं के निर्माण के लिये किया जाये। वर्तमान हथियारों को शीघ्र नष्ट किया जाये। सीमायें समाप्त हो जाने से इन हथियारों की प्रासंगिकता समाप्त हो जायेगी।
2. प्राकृतिक साधन जहाँ हैं वहाँ रहने वालों की संपत्ति होगें। वहाँ रहने वाले लोग ही उनका विक्रय सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर कर सकेगें।
3. न्यूनतम व अधिकतम आय का अन्तर 10 गुना से अधिक नहीं होगा। इससे अधिक आय पर सरकार का अधिकार होगा। यह आर्थिक विषमता को समाप्त कर सामाजिक सामन्जस्य बढ़ाने के लिये जरूरी है।
4. पूरे विश्व में एक जैसा पाठ्यक्रम होगा, भाषा का माध्यम क्षेत्रानुसार अलग हो सकता है लेकिन एक विश्व भाषा चुनकर सबको जरूर सिखाई जाये। अधिकृत शिक्षण संस्थाओं के अतिरिक्त सभी प्रकार की कोचिंग प्रतिबंधित की जाये।
5. किसीको भी मुफ्त में कुछ नहीं दिया जाये। निशक्तों व दिव्यागों से यथा संभव काम लेकर पारिश्रमिक अक्षमता के अनुपात में अधिक दिया जाये। इससे उनके आत्म सम्मान में वृद्धि होगी।
6. लोगों को अपनी आस्था के अनुसार धर्म पालन करने की स्वतन्त्रता हो। स्कूलों में सभी धर्मों को पढ़ाई में शामिल किया जाये जिससे अपनी आस्था के अनुसार युवा अपना धर्म चुन सकें। किसी भी प्रकार के प्रलोभन देकर, भय से व उकसाकर धर्म परिवर्तन करवाना दंडनीय अपराध हो।
7. सार्वजनिक रूप से किसी की निन्दा करना व अपशब्द कहना दंडनीय अपराध हो।
8. धार्मिक स्थलों की आय पर सरकार का अधिकार हो। रखरखाव व प्रबंधन कर्मचारियों का वेतन तय मानकों से सरकार दे।
9. समाज के लिये हानिकारक विषय वस्तु जैसे दुर्भावना फैलाने वाले भाषण, उत्तेजक चित्र व लेख आदि वेब साइट पर डालना दंडनीय अपराध हो।
इस विश्व सरकार से निम्न लिखित लाभ तो अवश्य ही अपेक्षित हैं –
1. देशों की सीमायें समाप्त हो जाने से सीमा शुल्क (कस्टम) व आव्रजन (माइग्रेशन) की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी जिससे समय व मानव श्रम की बचत होगी।
2. एक संविधान, एक विश्व (कामन) भाषा व एक जैसी शिक्षा होने से सभी सामाजिक श्रेणियों के लोगों का आपसी मेलजोल बढ़ेगा। वैश्विक स्तर पर सामाजिक उन्नति की प्रबल संभावना।
3. बिना रोक टोक अथवा बिना सीमा शुल्क के व्यापार से कीमतों में कमी एवं उपलब्धता में सुधार अपेक्षित।
4. सीमाओं के हट जाने से सीमा सुरक्षा खर्च की बचत का उपयोग लोक कल्याण में किया जाना संभावित।
5. आर्थिक असमानता कम होने से समाज में संतोष में बढ़ोतरी व अपराधों में कमी अपेक्षित।
विश्व सरकार गठन में विभिन्न देशों, विशेष रूप शक्ति संपन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षौ का अहम् बाधक हो सकता है। पूरे विश्व की भलाई के लिये यदि ये अहम् से उपर उठ कर सभी इस दिशा में पहल करें तो हमारे ऋषि मुनियों का वसुधैव कुटुम्बकम का सपना साकार हो सकता है।

नयी पीढ़ी

 

हमेशा से ही बुजुर्गों का यह मानना रहा है कि उनका बचपन अथवा युवावस्था का समय आज की अपेक्षा अधिक अच्छा था। अधिकतर लोग यह मानते हैं कि आज की पीढ़ी आलसी, निरंकुश व संस्कारहीन है। किन्तु यह मूल्यांकन पुराने मानकों पर आधारित है। अपने ३० वर्ष के कार्यकाल, ५ वर्ष तकनीकि कालेजों में अध्यापन काल व सामाजिक एवं पारिवारिक संपर्को के चलते मैंने दो या तीन नयी पीढ़ियों को काफी निकट से समझने का प्रयास किया है। इस अनुभव के आधार पर मैंने इनमें ये विशेषतायें पायीं है:-

१. बुद्धिमान

हर नयी पीढ़ी में बौद्धिक विकास बढ़ता जा रहा है। सीखने की क्षमता में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। तर्क शक्ति बढ़ रही है। इसका प्रमाण जन्म से ही देखने को मिल जाता है। जहाँ पहले नवजात शिशु दो हफ्ते तक आँख भी नहीं खोल पाते थे, आजकल बच्चे पहले दिन से ही नजरें घुमाकर वातावरण का जायजा लेने लगते हैं। दो तीन दिन में तो वे सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को पहचानने लगते हैं।

२. जिज्ञासु

जानने व समझने की पृवत्ति हर पीढ़ी के साथ बढ़ रही है। आजकल की पीढ़ी आधुनिक व सूचना प्राद्योगिक उपकरणों का उपयोग बचपन से ही सहज रूप से कर पहले की अपेक्षा अधिक जानकारी रखती है। उपलब्ध जानकारी का उपयोग वह अच्छी तरह करना भी जानती है। उनका सामान्य ज्ञान ४० वर्ष पूर्व हम उम्र बच्चों की तुलना में कई गुना अधिक है।

३. आत्मविश्वास

नयी पीढ़ी के आत्मविश्वास उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। आज के बच्चे व युवा आसानी से हार स्वीकार नहीं करते। ऐसा कोई काम नहीं जिसके लिये वे कौशिश न करें। उनमें अजनबी से बात करने में न कोई झिझक दिखती है ना ही मंच पर प्रदर्शन का कोई भय। आजकल के बच्चों को चुनौतियाँ पसंद हैं तथा वे जोखिम उठाने के लिये तत्पर रहते हैं।

४. स्वतन्त्र विचार क्षमता

युवा पीढ़ी में अपनी स्वयं की परख क्षमता है। जिससे वे स्वयं अपने लिये अच्छे बुरे का निर्णय लेने में सक्षम हैं। प्रायः उनके निर्णय सही पाये गये हैं। इसके बावजूद वे अनुभवों का आदर करते हैं व जरूरत महसूस होने बड़ो की सलाह लेने में संकोच नहीं करते। हाँलाकि अंतिम निर्णय उनका स्वयं का ही होता है।

५. जीने की कला

नयी पीढ़ी जीवन के हर पल को जीना अधिक अच्छी तरह से जानती है। कोई भी उत्सव व आयोजन हो उसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। गरबा, गणेशोत्सव व दुर्गा पूजन का विस्तार इसका प्रमाण है। पर्यटन में भी युवा वर्ग का बाहुल्य आसानी से देखा जा सकता है।

६. सतत सुधार का प्रयास

नयी पीड़ी हर क्षेत्र में लगातार नये आयाम स्थापित करने में लगी है। गाने का मंच हो या नाच का छोटे छोटे बच्चों के अनूठे अंदाज हैरत में डाल देतें हैं। प्रतिभा खोज के मंच पर कई प्रदर्शन तो असंभव से ही लगते हैं। सतत सुधार व चुनौतियों से जूझना नयी पीढ़ी का स्वभाव बन गया है।

७. प्राथमिकता साफ

नयी पीढ़ी अपनी प्राथमिकता के बारे में अधिकतर दुविधा में नहीं रहती है। वह अच्छी तरह से जानती है कि उन्हें कहाँ जाना है और क्या प्राप्त करना है। किसी की सलाह या दबाव उन्हें अपने मार्ग से नहीं डिगा सकता है।

८. संवाद कुशलता

नयी पीढ़ी प्रायः किसी भी व्यक्ति के सामने अपनी बात सहज व सीधे से रख सकती है। संवाद की यह कुशलता उन्हें जीवन में सामाजिक, व्यवहारिक व कार्य क्षेत्र में सफल होने में बहुत मददगार होती है।

९. उर्जा

नयी पीढ़ी में उर्जा की उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। आज के बच्चे व युवा थकना तो जैसे जानते ही नहीं। सवेरे से देर रात तक उन्हें व्यस्त देखा जा सकता है।

ये ही गुण हैं जो भविष्य के प्रति मानव आशाओं को जीवित रखे हुए हैं। आवश्यकता सिर्फ यह है कि वे अपने मार्ग से न भटकें।

 

 

मनुष्य अपराध क्यों करता है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, ऐसा बचपन से सुनते व पढ़ते आये हैं। किन्तु आज जिस प्रकार अपराधों के किस्से अखबारों व टीवी समाचारों में रोज सुनने को मिलते हैं, उससे तो यही लगता है कि मनुष्य पुनः अपने आदि काल की और लोट रहा है। आज मनुष्य पूरी तरह संवेदन हीन हो कर किसी भी प्रकार अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है। आज सामाजिक बन्धन अथवा कानून उसके इस प्रयास में बाधक नहीं है। बढ़ते अपराध यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि मनुष्य आखिर अपराध करता क्यों है।
मनुष्य की हर गतिविधि मस्तिष्क द्वारा ही संचालित होती है, अतः अपराध का मस्तिष्क से संबंध अवश्य होना चाहिये। मानव मस्तिष्क एक जटिल संरचना है। विशेषज्ञों का मानना है मनुष्य के मस्तिष्क में एक समय में हजारों विचार आते रहते हैं। हमारे दिमाग के बाँये हिस्से का एक बड़ा भाग इन पर नियंत्रण रख कई विचारों को रोकने का कार्य करता है। इस तन्त्र के कमजोर हो जाने अथवा बन्द हो जाने पर मनुष्य विवेक हीन होकर कुछ भी कर सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क के कई भाग सक्रिय व निष्क्रिय होते रहते हैं। यह बहुत कुछ उसके परिवेश व भावों पर निर्भर करता है। कई परिस्तिथियों में मनुष्य अपना विवेक गवाँ बैठता है। संभवतः इसी परिस्थितिवश मनुष्य अपराध कर बैठता है। प्रश्न अब यह उठता है कि आजकल इस तरह की पृवत्ति में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है।

1. ऐसा माना जाता है कि बच्चे तेजी से सीखते हैं। इस काल को बोलचाल की भाषा नाजुक काल भी में कहा जाता है। तेजी से सीखने का प्रमुख कारण बीएनडीएफ (ब्रोन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में पाया जाना है। यह मस्तिष्क के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिषक के उस भाग (न्यूक्लियस बसालिस)को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध भी हो जाता है व सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है। बच्चों पर आजकल बढ़ते बस्तों का बोझ व माता पिता की बच्चों को हर प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने का दबाव भी बीएनडीएफ की मात्रा को प्रभावित कर सकता है जिससे सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जो बच्चे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते वे नकारात्मक मानसिकता के शिकार हो सकते है। अपनी असफलता का कारण दूसरों को मानते हुए
बदले की भावना मन में पाल सकते हैं।
2. मनुष्य के स्वभाव को मस्तिष्क में दो चीजें प्रभावित करती हैं। पहला डोपेमाइन सिस्टम जो मस्तिष्क मे स्थित खुशी के केन्द्र क्रियाशील बनाता है। यह स्थिति उकसाने का कार्य करती है। नशा करने, जुआँ खेलने व अन्य उकसाने वाली गतिविधियाँ डोपेमाइन को बढ़ाने का काम करती हैं। इस मनोदशा में मनुष्य की विवेकशीलता कम हो जाती है। दूसरी आक्सीटोसिन जो चित्त को शान्त करता है, मन में कोमल भावना व विश्वास पैदा करता है। भावनात्मक संबन्ध, रचनात्मक गतिविधियाँ
आक्सीटोसिन को बढ़ाने सहायक होती है। यह स्थिति भूलने में भी मददगार होती है, व दुःख से उबरने में सहायक होती है। आज की आपाधापी की जीवन शैली, बिखरते परिवार व कमजोर सामाजिक संबन्धों के चलते यह स्वाभाविक ही है कि अधिकतर लोगों में डोपेमाइन सिस्टम
अधिक प्रभावी रहता है।
3. आज के सामाजिक परिवेश में जहाँ ऐशोआराम के साधन सुख, संपन्नता व समाज में आदर पाने के मापदन्ड हों। सभी प्रकार के मीडिया ललचाने वाले विज्ञापनों तथा अपराधों व अपराधी के बच निकलने के समाचारों को 24 घन्टे दिखातें हों। तथा सिनेमा, टीवी व इन्टरनेट पर उकसाने वाली जानकारी आसानी से सुलभ हो ऐसे माहोल में निराश मानसिकता व डोपेमाइन अघिकता वाले लोग अपराध में लिप्त हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

अपराध में लिप्त होने के उपरोक्त कारणों को समझने के बाद इस समस्या का निदान आसान हो जाता है। स्कूल, परिवार व समाज अपने परिवेश में भावनात्मक दृढ़ संबन्ध बनाकर इस समस्या के निराकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। सभी प्रकार के मीडिया सकारात्मक प्रकार की
सामग्री को प्राथमिकता देकर लोगों में सही मानसिकता बनाने में सहायक हो सकते हैं। और सबसे अधिक आवश्यकता है प्रारम्भिक शिक्षा में परीक्षा पास करने अथवा बहुत सारे विषय पढ़ाने से अधिक बच्चे के पूरे व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देने की। किताबी ज्ञान से अधिक आवश्कता है दया,
ईमानदारी, मेहनत व लगन से कार्य करने की भावना, टीम भावना, दूसरों की सहायता जैसे मानव मूल्यों के विकास की। साथ ही जरूरत है रुचि अनुसार किसी न किसी प्रकार की कुशलता के विकास की, जिससे वह अपनी प्रारम्भक जीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बन सके। शिक्षा का
विस्तार लोग अपनी रुचि व सुविधा के अनुसार कर सकें इसके लिये उम्र का बन्धन विद्यालय में प्रवेश के लिये नहीं होना चाहिये। कुछ हद तक पत्राचार पाठ्यक्रमों की सुविधा है लेकिन नियमित शिक्षा का अपना अलग महत्व है।

अनश्वरता

 

बचपन में कई बड़े बुजुर्गों व उपदेशकों प्रायः कहते हुए सुना था कि शरीर नश्वर है। जानवरों को मरते व वस्तुओं को टूटते देखकर मन में विश्वास सा बैठ गया था कि पृथ्वी पर कोई भी वस्तु हमेशा के लिये नहीं है। सब नश्वर है अतः किसी भी वस्तु से मोह नहीं करो, ऐसा ही जन साधारण का मन था। परिणाम स्वरूप लोग आपस में मिल बाँट कर खाते थे। समाज आपसी सामन्जस्य था व लोग संतोषमय जीवन व्यतीत करते थे। लोग थोड़े में ही संतोष कर खुश रहते थे।

फिर कुछ बड़ा होने पर विज्ञान में पढ़ाया गया कि पदार्थ (मेटर) अनश्वर है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। पुराने विश्वास को तोड़ने के लिये नये नये तर्क दिये गये। पदार्थ का रूप बदल सकता है जैसे पानी से भाप या लकड़ी से कोयला, लेकिन वह नष्ट नहीं होता है। तर्क सटीक लगे लोगों को मानना पड़ा कि पदार्थ अनश्वर है।लोगों के मानस परिवर्तन ने उनकी जीवन शैली को प्रभावित किया। लोगों में संचय पृवत्ति बढ़ गई। लोग वर्तमान के साथ भविष्य की चिन्ता करने लगे।  पदार्थों ने नया रूप लेना शुरू किया, बाजार में संचय लायक वस्तुओं की बाढ़ सी आगई। संचय का मोह बढ़ने लगा, उदारता सिमटने लगी। समाज में संचित संपत्ति का आदर होने लगा। नये सम्मान के मापदंड़ ने लौगों में सम्मान जनक स्थान पाने के लिये होड़ सी पैदा कर दी। येन केन प्रकारेण संचय की ललक ने भ्रष्टाचार, लूट, चोरी व बेईमानी जैसी बीमारियाँ समाज में पैदा कर दी। नयी आर्थिक व्यवस्था ने समाज को गरीब व अमीर दो धड़ों में बाँट दिया।

कालेज तक आते आते आइन्सटीन का सापेक्षता का सिद्धान्त विज्ञान में पढ़ाया गया। शायद ही कुछ लोगों को ये सिद्धान्त पूरी तरह समझ आया हो। किन्तु इसका एक पहलू कि पदार्थ व उर्जा का आपस का निकट का संबंध है जल्दी ही कई लोगों की समझ में अच्छी तरह आ गया। अधिकतर लोगों ने उर्जा को शक्ति से जोड़ लिया। फिर तो शक्ति संचय की मानों होड़ लग गई। देश, संगठन, एवं व्यक्तिगत स्तर पर शक्ति संचय के प्रयास भी युद्ध स्तर पर किये जाने लगे। देशों को अपनी जनता की रक्षा के लिये शक्ति की जरूरत थी, संगठन को अपना प्रभुत्व दिखाने के लिय व व्यक्तिगत स्तर पर अपनी संचय शक्ति बढ़ाने या संचित धन की रक्षा के लिये। शक्ति संचय की प्रतिस्पर्धा का परिणाम यह रहा कि आज विस्फोटकों का भंडार पूरे भू मंडल को नष्ट करने में सक्षम है। धन संचय व शक्ति संचय के आपसी ताल मेल ने एक ऐसे वर्गों के समूह को जन्म दे दिया है जो अपने स्वयं की विचार धारा को कानून का रूप देकर पूरे राष्ट्र या विश्व पर थोपने में लगे हुए हैं।अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिये इन्हें निर्दोष व असहाय लोगों की निर्मम हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं है। आतंक फैलाना ही इनका एक मात्र उद्देश्य है। वर्चस्व स्थापना की होड़ ने मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर महाशक्तियों ने पृथ्वी पर एकाधिकार मान रखा है।  यह प्रतिस्पर्धा मानवता को कितना गिराने के बाद रुकेगी, कहना मुश्किल है।

इसको रोक पाने का एक मात्र उपाय है नश्वरता के सिद्धान्त की पुनर्स्थापना। हमारे ऋषि मुनियों ने सब कुछ शून्य में मिल जाने की कल्पना की थी, आज उसी विचार धारा को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

शायद कबीर जी ने ऐसी ही स्थिति की कल्पना कर निम्न लिखित दोहे की रचना की होगी –

गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान।

जब आये संतोष धन सब धन धूरि समान।।

जीवन रहस्य (रान्डा बर्न की पुस्तक रहस्य पर आधारित मंजुल पब्लिशिंग हाउस भोपाल, द्वारा प्रकाशित)

प्रायः हर व्यक्ति के जीवन में उतार चड़ाव आते हैं। कई बार परिस्थितियाँ इतनी खराब हो जाती हैं कि चारों ओर अन्धकार दिखाई देने लगता है। आइये ऐसा क्यों होता है इसे समझने का प्रयास करते है।
1. ब्रम्हांड में सभी लोगों के लिये पर्याप्त मात्रा में इच्छित वस्तुएें उपलब्ध हैं। इनका मिलना अथवा न मिलना हमारे सोच पर निर्भर है। हमारे विचारों के अनुरूप हम ब्राम्हांड में सकारात्मक अथवा नकारात्मक तरंगे प्रेषित करते है। सकारात्मक सोच इच्छित वस्तुओं को हमारी ओर आकर्षित करती है तथा नकारात्मक सोच उनको हमसे दूर। उदाहरण के तौर पर मेरे पास ये वस्तु नहीं है यह एक नकारात्मक विचार है। मेरे पास यह वस्तु आयेगी यह एक सकारात्मक विचार है।
1.सकारात्मक व नकारात्मक विचार पहचानने का सबसे सरल उपाय है अपने भावों को पहचानना। जब आप अच्छा महसूस करते हैं तब आप सकरात्मक सोच रहे होते हैं। तथा जब आप बुरा महसूस करते हैं तो नकारात्मक सोच रहे होते हैं।
सुखद यादें, सुन्दर प्राकृतिक दृश्य अथवा पसन्दीदा संगीत सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में सहायक हैं। प्रेम भाव सबसे शक्तिशाली सकारात्मक सोच है। इसे आप जितना महसूस अथवा प्रेषित करेगें उतने ही अधिक सकारात्मक संदेश आप ब्रम्हांड में भेजेगें।
2.रचनात्मक प्रक्रिया के तीन प्रमुख पहलू हैं-
इच्छा करें – इसका मतलब आपको अपने मस्तिष्क में स्पष्टरूप से यह जानना है कि आप क्या चाहते हैं
भरोसा करें – इसका मतलब है कि आपके कार्य, आपके विचार तथा आपकी बातचीत में अपनी वांछित वस्तु को पा लेने का भरोसा दिखना चाहिये।
प्राप्त करें – इसका अर्थ आपको इस प्रकार महसूस करना है जैसा आप अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के बाद महसूस करेगें। रचनात्मक प्रक्रिया को परखने का सबसे सरल उपाय यह है कि आप छोटी छोटी जैसे एक कप चाय अथवा पार्किंग को पाने से कर सकते है। आपका विश्वास पक्का हो जाने पर आप बड़ी वस्तुओं को भी प्राप्त कर सकेगें।
3. उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है। कृतज्ञता सकारात्मक ऊर्जा पैदा करने वाला एक शक्तिशाली उपाय है। धन्यवाद ज्ञापन कृतज्ञता दर्शाने का सबसे सरल तरीका है। इच्छित वस्तुओं की तस्वीर में कल्पना करना तथा इस तरीके अपनी मनचाही वस्तुओं का आनंद महसूस करना सशक्त सकारात्मक ऊर्जा पैदा करते हैं। यह प्रक्रिया दोहराते रहें। रात को सोते समय दिनभर की घटनाओं को याद कें तथा सिर्फ अच्छी चीजों को ही याद रखने का प्रयास करें।
4. आप मान कर चलें कि आप के पास पर्याप्त धन व सुख है। सुपात्र को दान देने व संकट में पड़े लोगों की सहायता में खुशी महसूस करें।
5. सुनिश्चित करें कि आपके कर्म, विचार, शब्द व परिवेश आपकी इच्छाओं का विरोध नहीं करें। स्वयं से प्रेम व सम्मान का व्यवहार करें, तभी आपको ऐसे लोग मिलेंगें जो आपको प्रेम व सम्मान देगें। मिलने वाले लोगों के गुणों पर ध्यान दें। जब आप शक्तियों पर ध्यान देते हैं तो आप स्वयं की ओर शक्ति आकर्षित करते हैं।
6. हँसना व खुश रहना सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है। इस प्रकार की ऊर्जा हमें स्वस्थ रखने के लिये जरूरी है। बुढ़ापे व बीमारी के बारे में समाज में व्याप्त भ्रामक बातों पर ध्यान न दें। सेहत व जोश पर ध्यान केन्द्रित करें।
7. किसी वस्तु का विरोध एक नकारात्मक विचार है। विरोध, समस्याओं व नकारात्मक घटनाओं पर ध्यान देने के बजाय विश्वास, प्रेम, शान्ति, शिक्षा पर मन लगायें। कमी के बजाय प्रचुरता पर ध्यान को केन्द्रित करें। इस प्रकार आप ब्राम्हांड के असीमित साधनों को अपनी ओर आकर्षित
करने की अपनें में सामर्थ पैदा कर सकते हैं।
8. अतीत की मुश्किलों, सामाजिक कुप्रथाओं व सांसकृतिक पंरम्परा के बंधन से मुक्त होकर ही आप उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं जिसके आप हकदार हैं। आपकी शक्ति आपके विचारों में है यह हमेशा याद रखें।
रहस्य संक्षेप-
– आपके जीवन में मन चाही चीजें प्राप्त करने के असीमित अवसर हैं।
– आपको सिर्फ अच्छा महसूस करना है।
– आपकी शक्ति का इस्तेमाल आपकी ओर उर्जा खींचेगा।
– सीमित करने वाले विचारों को छोड़ कर सृजन पर ध्यान दें।
– जिस काम से खुशी मिलती हो वह करें।

हमारा भारत स्वतन्त्र है

स्कूल में हमें स्वतन्त्र भारत के बारे में पढ़ाया था,
सरकार को जनता के लिये जनता के द्वारा बताया था।
लेकिन वास्तव में मतलब आज समझ में आया है,
सरकार ने सही मायनों में देश को स्वतन्त्र बनाया है।
सरकार कड़े नियम बनाने के लिये स्वतन्त्र है,
किन्तु अपराधी भी अपराध करने को स्वतन्त्र है।
राजनेता विकास के नाम पर जेब भरने को स्वतन्त्र है,
व्यापारी मनचाही कीमत छापने के लिये स्वतन्त्र है।
बाहुबली सरकारी संपत्ति को अपना समझने को स्वतन्त्र है,
धर्म गुरू जनता को बहलाने के लिये स्वतन्त्र है।
अफसर गण मनमानी करने के लिये स्वतन्त्र है,
जनता पैसे से मनचाहा काम करवाने को स्वतन्त्र है।
सरकार ने जनता को असीमित अधिकार दे दिये हैं,
अधिकारों के प्रचार में अपने सारे साधन झोंक दियें है।
जनता को जानकारी हाँसिल करने का अधिकार है।
सभी भारतवासियों को भोजन का अधिकार है।
किसानों को आत्म हत्या का अधिकार है,
व्यापारियों को मिलावट का अधिकार है।
बदमाशों को लूटपाट करने का अधिकार है,
पुलिस को खुली छूट देने अधिकार है।
सभी बच्चों को शिक्षा पाने का अधिकार है,
स्कूलों को मनमानी फीस लेने का अधिकार है।
जन प्रतिनिधियों को हंगामा करने का अधिकार है,
पत्रकारों को पैसे लेकर खबर बनाने का अधिकार है।
जनता को वोट डालने का अधिकार है,
चुनने के बाद नेताओं को वादे भूलने का अधिकार है

हमारे भविष्य का आकलन

 

जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है। जिज्ञासा ही विकास का आधार है। इसी जिज्ञासा के चलते हम आज इस मुकाम तक पहुँच पाये हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य में भविष्य के प्रति उत्सुकता रही है। भविष्य जानने की ललक ने ही ज्योतिष, जन्म कुन्डली, हस्त रेखा शास्त्र, न्यूमरालाजी, टेरा कार्ड आदि जैसी कई विधाओं को जन्म दिया। वैज्ञानिकों ने इन विधाओं को पूरी तरह भले ही न स्वीकारा हो, किन्तु विश्व भर में जन मानस पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा है। वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य ही है अतः उन्होंने भी भूत व भविष्य जानने की विधियाँ खोज ही निकाली। विज्ञान में भरोसा रखने वाले इन विधियों का प्रयोग इतिहास, व्यापार व सामाजिक विषयों पर बड़े विश्वास के साथ करते हैं। आईये हम जानने का प्रयास करते हैं कि विज्ञान में विश्वास रखने वाले सामाजिक चिन्तको के अनुसार २०५० में हम कहाँ होगे ?

 १. लोगों का आकलन     

२०१० में पी आर सी (पीइडब्ल्यू रिसर्च सेन्टर) व स्मिथसनियन पत्रिका ने अमेरिका वासियों से किये गये सर्वे में लोगों ने बताया –

  • अधिकतर लोगों ने विज्ञान में उन्नति जारी रहने की बात कही। ८० प्रतिशत लोगों का मानना था कि कम्प्यूटर मनुष्य की तरह बोलने लगेगें।
  • ७०प्रतिशत लोगों का मानना था कि केन्सर का इलाज खोज लिया जायेगा।
  • ६६प्रतिशत लोगों का मानना था कि नकली अंग असली जैसे कार्य करने लगेगें।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि स्पेस यात्रा ४० सालों में सबके लिये सुलभ हो जायेगी।
  • इसके अलावा अधिकतर लोगों का मानना था कि लुप्त प्रजातियोँ को वापस ले आया जायेगा व अन्य ग्रह पर जीवन खोज लिया जायेगा।
  • ४८ प्रतिशत लोगों का मानना था आदमी की नकल बनाई जा सकेगी।
  • ४० प्रतिशत लोगों के अनुसार विचार पढ़ने की तकनीक विकसित हो जायेगी।
  • उर्जा के बारे में अधिकतर लोगों का मानना था कि उर्जा का नया स्रोत खोज लिया जायेगा।  ७२ प्रतिशत लोगो ने उर्जा को गहरी समस्या बताया।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि एक और विश्व युद्ध हो सकता है।
  • भविष्य के बारे में चिन्ता करने वाले लोगों की संख्या १९९९ के १९ प्रतिशत क मुकाबले बढ़कर ३६प्रतिशत हो गई।

२. जनसंख्या

२०५० तक संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि पृथ्वी पर ९.१अरब लोग होगें।यह अनुमान इस तथ्य पर आधारित है कि वर्तमान में जनसंख्या १२ वर्षों में १ अरब बढ़ रही है। जनसंख्या सभी देशों में एक सी नहीं बढ़ कर कुछ देशों मे आबादी काफी घनी हो सकती है। उदाहरण के लिये अफ्रीका की आबादी २ अरब तक पहुँच सकती है। यह सौ वर्षों में लगभग नौ गुना बढ़ौतरी है।

देश परिवर्तन एक गंभीर समस्या बन जायेगी। केनेथ जानसन, न्यू हेम्पशायर विश्व विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर के अनुसार २०५० तक अमेरिका अल्पसंख्यक बहुलता वाला देश बन जायेगा। दि टेलीग्राफ ने एक लेख के माध्यम से बताया कि प्रवासियों के कारण यूरोप पूरी तरह से बदल जायेगा। यह एक टाइम बम है जिसे राजनेता ध्यान नहीं दे रहें।

इसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पढ़ेगा। कुछ देशों जैसे नीदरलेन्ड में इसका प्रभाव दिखने लगा है। यहाँ मुस्लिम विरोधी नेताओं का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।

३. पानी की समस्या:

बढ़ती जनसंख्या के लिये पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या होगी। भारत ने अनुमानित खपत दुगुनी हो जाने के हिसाब से प्रबन्ध करने के प्रयास आरम्भ कर दिये हैं। इन्टरनेशनल वाटर एण्ड सेनीटेशन सेनटर के अनुसार अरब देशों में समस्या गंभीर रहेगी।माइक हाईटावर व सुज़ाने पियर्स जो जल विशेषज्ञ है के नेचर में प्रकाशित लेख के अनुसार पानी की उपलब्धता अर्थव्यवसथा के लिये विशेष जरूरत होगी। पानी की पीने के साथ ही उद्योग, कृषि, उर्जा व खनन में बड़ी मात्रा में जरूरत होती है। सरकारों को पानी के सही उपयोग व उचित प्रबन्धन पर ध्यान देना जरूरी है।

४. भौजन की समस्या

९ अरब लोगों के भोजन का प्रबन्ध करना एक बड़ी समस्या बन जायेगी। आज भी करीब १ अरब लोगों को जरूरत के अनुसार भोजन नहीं मिल पाता है। अगले करीब २५ वर्षों खाद्य उत्पादन में लगभग ७० प्रतिशत वृद्धि की जरूरत होगी जो एक कठिन लक्ष्य है। हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि यह संभव हो पायेगा।यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सभी देशों को कृषि क्षेत्र में निवेश व शोध करने की जरूरत है। विकसित व खाद्य बाहुल्य देशों को जरूरत मन्द देशों की सहायता के लिये तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ेगी। भोजन की कमी का सर्वाधिक असर बच्चों के विकास पर पड़ेगा।

 ५. वातावरण

वातावरण संबंधी कई समस्यायें जैसे उजड़ते जंगल, घटती खेती की जमीन, शहरी करण, वायु एवं जल प्रदूषण, कचरा निष्पादन, व मौसम मे तेज बदलाव मनुष्य के लिये गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले मानसूनी जंगल (जो आक्सीजन पैदा करते हैं) आज करीब १.६.एकड़ प्रति सेकन्ड की दर से खत्म हो रहे हैं।

६. सामाजिक समस्यायें:

यह अन्दाजा लगाना मुश्किल है कि अपराधों जैसे चोरी डकैती हत्या या महिलाओं से छेड़छाड़ आदि में कितनी बढ़ौतरी होगी। महामारी जैसी बीमारी फैलने से प्रभावितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की संभावना हो सकती है। तकनीकि विकास आर्थिक अपराधों की गंभीरता बड़ा सकता है। विश्व युद्ध यदि हुआ तो महाविनाशकारी होगा। अब तक की सामाजिक पतन की दशा देखकर तो यही लगता है कि समाज पतन के गर्त की ओर बढ़ता रहेगा।  ७. उम्मीद की किरण :

इन सब समस्याओं के बीच उम्मीद की एक चमकीली किरण नजर आती है वो यह कि मनुष्य हमेशा बदलाव की ओर आकर्षित हुआ है। शायद अगल २५ वर्षों में बुराइयों से ऊब कर अच्छाईयों को अपनाले व समाज में पुनः आपसी प्रेम व भाईचारा स्थापित हो जाये। फिलहाल तो हमें ऐसा ही मान लेना  चाहिये।

 

 

 

 

ए मेरे वतन के लोगों

26 जनवरी 13 को सवेरे दूरदर्शन पर बताया कि लता जी द्वारा 1963 में सीमा पर गाये हुए इस गाने ने 50 साल पूरे किये। यह गाना देश प्रेम का प्रतीक बन गया है। प्रायः हर राष्ट्रीय पर्व पर यह सुनने को मिल जाता है। यह गाना सुनकर आज भी सीमा पर तैनात सैनिकों के लिये हर देशभक्त नागरिक का मन सम्मान से भर जाता है। लेकिन मेरे मन को इस बार इस गाने ने देश की दशा पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि 66 वर्षों की स्व सत्ता में हम किस मुकाम पर आ पहुँचे हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इन 66 वर्षों में हमने आर्थिक, विज्ञान, कृषि, कला व इन्जीनिरिंग आदि क्षेत्रों तेजी से प्रगति की है। और इस प्रगति का लाभ अधिकांश जनता तक पहुँचा भी है। पिछले कुछ सालों में प्रायः हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार व बेईमानी ने जिस प्रकार पाँव पसारे हैं इस कारण आज प्रायः हर देशभक्त भारतीय अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। नैतिक मूल्यों का यह पतन सारी प्रगति पर ग्रहण के समान है।
पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े बड़े घोटाले उजागर हुए जिनमें सरकार के प्रतिनिधियों की संलिप्तता संन्देह के दायरे में आई। सदनों में इन मुद्दों पर हंगामेदार चर्चायें हुई कुछ मंत्रियों ने त्यागपत्र दिये तो कुछ ने अपने को देने से बचा लिया। हाल ही के कुछ वर्षों में महिलाओं की अस्मिता पर हमले की जैसे बाढ़ आ गई। इसमें भी कुछ नेतागण सदन में अश्लील एमएमएस देखते पकड़े गये तो कुछ नेताओं की रंगरेलियों की सीडी मीडिया में प्रचलित पाई गर्इं।संसद में प्रश्न पूछने के लिये सांसद पैसे लेते हैं। समाचारों पर भी विश्वसनीयता कम होती जा रही है। दलित व अशक्त लोगों पर अत्याचार, हत्यायें व लूटपाट तो आज देश में आम बात है। समाचार चेनलों पर प्रायः सुनने को मिलता है कि करीब करीब सभी पार्टियों से गंभीर अपराध से आरोपित लोग सदन में चुनकर आगयें है, और इनकी संख्या लगभग 30-35 प्रतिशत तक पहुँच चुकि है। नैतिक मूल्यों का यह पतन आज की एक गंभीर समस्या है।
इस नैतिक अवमूल्यन की जिम्मेदार यदि कोई है तो सिर्फ राजनीतिक पार्टियाँ ही हो सकती है फिर वह राष्ट्रीय स्तर की हों अथवा प्रादेशिक स्तर की। सभी पार्टियाँ आज जोड़ तोड़, जातिवाद, भाई भतीजा वाद, साम्प्रदायिकता,धनबल अथवा बाहुबल द्वारा सत्ता हथियाने में व्यस्त हैं। इस प्रकार बनी हुई सरकार से लोग नैतिक आचरण की आशा भी कैसे कर सकते हैं। पिछले वर्ष एक नई आशा की किरण के रूप में अन्ना जी व उनकी टीम ने जन जागरण का काफी हद तक सफल प्रयास किया। लेकिन राजनेताओं ने पूरी ताकत लगा कर आन्दोलन के अग्रणी सदस्यों पर लांछन लगा कर व फूट डाल कर उसे कमजोर कर दिया है। लेकिन यह आन्दोलन देश की जनता व विशेष तौर पर युवाओं को जाग्रत करने में अवश्य ही सफल रहा है। यह इसी का परिणाम था कि दिल्ली में पिछले दिनों एक युवती पर बर्बर हादसे का विरोध करने व न्याय दिलाने के लिये ये युवा स्वतः ही सड़कों पर कई दिनों तक ठिठुरती सर्दी में भी डटे रहे।
युवाओं में आयी यह जाग्रति देश की दशा बदलने में सक्षम है।
प्रजातन्त्र में सत्ता वास्तव में जनता के हाथ में होनी चाहिये लेकिन आज ये राजनीतिक पार्टियों की बन्धक बन कर रह गई है। आज के जागरुक युवा यदि ठान लें तो परिस्थिति में बदलाव ला सकतें है और देश को पार्टियों के मकड़ जाल से मुक्त करा सकते है। आवश्यकता सिर्फ एक प्रयास करने भर की है।
इस वर्ष कुछ राज्यों में व अगले वर्ष केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। युवाओं को चाहिये कि ये इस अवसर का उपयोग एक क्रान्तिकारी बदलाव लाने के लिये करें एवं प्रजातन्त्र को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करें। आज का युवा संचार माध्यम के द्वारा तेजी से आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम है। शक्ति एवं जोश की उसमें कमी नहीं है। अपनी इसी ताकत को वे चुनाव क्रान्ति के रूप में बदल सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि उन्हें हर विधान सभा व लोकसभा के लिये एक इमानदार उम्मीदवार की पहचान करने की। इस उम्मीदवार का चयन बिना किसी जाति,सामाजिक स्तर अथवा गाँव शहर से संबद्धता पर विचार किये बिना अपने क्षेत्र में एक अच्छी छबि व स्वीकारिता के आधार पर ही हो। युवा ही उसके लिये प्रचार करें। प्रचार भी शोर रहित व्यक्तिगत स्तर पर हो। और युवा ही क्षेत्र के मत दाताओं को वोट के लिये निकलने के लिये प्रेरित करें। ये उम्मीदवार निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ें जिसका सिर्फ एक पाइन्ट एजेंडा हो वह सही मायनों में प्रजातन्त्र के मूल्यों की पुनस्र्थापना। आज जिस प्रकार का आक्रोश जन मानस में है उससे इस तरह के प्रयास को जनता का साथ मिलने की पूरी संभावना है। यदि युवा अपने प्रयास में
सफल होते हैं तो यह देश के लिये दूसरी आजादी होगी।

आधुनिक समाज और धर्म

विश्व में सभी धर्मों का उद्भव समाज के उत्थान के लिये व मानव मूल्यों की स्थापना के लिये ही हुआ है। यह सामाजिक चिन्तकों द्वारा समाज में आपसी सामंजस्य एवं व्यवस्था को स्थापित करने हेतु बनाई गई एक आचार संहिता है।
समाज की आवश्यकतायें समय के साथ बदलती हैं। लेकिन धर्म का स्वरूप आज भी थोड़े बहुत फेर बदल के साथ पुरातन ही है। अतः आज धर्म को लोग एक परंपरा के रूप में ही लेते हैं। धर्म गुरु भी विश्व भर में इसे इसी रूप में अपने अपने तरीके से आगे बड़ाने का प्रयास कर रहें हैं।
इन प्रयासों में समय के साथ कई विकृतियाँ जैसे अन्धविश्वास, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, धन व बल संग्रह की प्रवृत्ति आदि साफ दिखती हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो धर्म आज एक व्यवसाय हो गया है।
धर्म के पथ प्रदर्शक के रूप में आज भी हजारों वर्ष पूर्व रचित ग्रन्थों को ही माना जाता है। ये धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, कुरान, बाइबल आदि निसंदेह अपने समय के महत्वपूर्ण एवं महान रचनायें हैं। लेकिन आज के सामाजिक संदर्भ में इनका कितना महत्व है इस पर विचार करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
ये आश्चर्य की बात है कि आज के विद्वान इन ग्रन्थों की मीमान्सा तो अपने तरीके से समय समय पर करते रहते है। लेकिन किसी भी विद्वान ने एक नये सिरे इन विषयों पर विचार करने की आवश्कता महसूस नहीं की। यही एक कारण है जिसकी वजह से आज धर्म का मूलभूत आधार जो सामाजिक उत्थान से जुड़ा था वह उससे अलग हो गया है।
ऐसा नहीं है कि समाज सुधार के प्रयास नहीं हो रहें हैं। ऐसे कई महापुरुष हुए हैं और आज भी हैं जिन्होनें अपना संपूर्ण जीवन समाज की उन्नति व सुधार के लिये समर्पित कर दिया है। किन्तु ये प्रयास मानव सेवा को धर्म मान कर किये गये प्रयास हैं और उनका प्रतिफल भी एक सीमित सीमित स्वरूप में ही रहा है।
आज धर्म के नाम पर कई आयोजन करोड़ों रूपये लगा कर विश्व भर में आयोजित किये जातें हैं। लोग उसमे अपना योगदान धन व समय लगा कर देतें भी हैं। लेकिन समाज पर इन आयोजनों का प्रभाव एक सामाजिक मिलन से अधिक कुछ देखने को नहीं मिलता है।
यह भी देखने में आता है कि लोग करोड़ों रूपये खर्च कर कई प्रकार के अनुष्ठान आयोजित करते हैं। इनका उद्देश्य मात्र अपना समाज में महत्व दिखाने अथवा अपना अपराध बोध कम करने के लिये अधिक समाज की भलाई के लिये कम होता है।
आज धार्मिक प्रतिष्ठानों के पास अपार संपदा है एवं धार्मिक गुरु एवं विद्वानों के पास
सभी प्रकार के साधन एवं सुविधायें। लेकिन सामाजिक मूल्य आज इतिहास के निम्नतर स्तर पर हैं। पुराने विद्वानों ने भगवान अथवा ईश्वर को सर्व व्यापी, पाप व पुण्यों का हिसाब रखने वाला व अन्त में मनुष्य को उसके कर्मो के अनुसार दन्ड अथवा पुरस्कार देने वाला स्थापित किया था। लोगों में यह भावना घर कर गई थी कि ईश्वर का न्याय सटीक व बिना किसी भेदभाव के होता है। अतः अधिकतर लोग भगवान अथवा ईश्वर से डरते थे एवं नियन्त्रित आचरण करते थे। इस कारण समाज में एक व्यापक स्तर पर समन्वय व शान्ति बनी रही। यदा कदा कुछ लोग दुराचरण करते थे तो सामाजिक व्यवस्था उसे दण्ड देती थी।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्तिथियों में तेजी से बदलाव आया है। आज शक्ति संपन्न वर्ग यह मानता है कि वह कुछ भी गलत कर सकता है। एक उचित अनुष्ठान अथवा यथोचित भेंट किसी धर्मस्थल पर चढ़ा कर वह ईश्वर से अपने किये की क्षमा माँग सकता है। ईश्वर से क्षमा मिले या नहीं उसका अपराध बोध तो कम अवश्य ही हो जाता है। और वह उससे भी बड़े अनेतिक कार्य की योजना बनाने में लग जाता है। शक्ति व साधन के बल पर प्रायः ये लोग सामाजिक व्यवस्था के दण्ड से भी बच जाते हैं। इस वजह से ईश्वर की निस्पक्षता पर लोगों का विश्वास कम हुआ है। परिणाम स्वरूप शक्ति साधन हीन लोग भी दुराचरण निडर होकर करने लगे है। यही वजह है कि मानव मूल्य आज निम्नतर स्तर पर हैं।
भगवान से क्षमा माँगने अथवा अपने अपराध बोध को दबाने वाले श्रदधालुओं की बढ़ती संख्या के फल स्वरूप ही आजकल धार्मिक स्थलों की संख्या व उनका स्तर तेजी से बढ़ रहा है। और उतनी ही तेजी से बढ़ रही है सामाजिक अपराधों की संख्या एवं उनके आकार।
धर्म व अपराध की एक साथ प्रगति आज के समाज में धर्म की सार्थकता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।
इसलिये आज आवश्कता है धर्म को नये सिरे से परिभाषित करने की। यह सौभाग्य की बात है कि आज धार्मिक संगठन साधन संपन्न है और धार्मिक विद्वानों की भी विश्व में कमी नहीं है। आज जरूरत है तो सिर्फ इतनी कि विश्व भर के विद्वान व धर्म संस्थान मिल कर इस विषय पर ध्यान केन्द्रित करें। और शोध करें एक ऐसे नये धर्म की जो मानव मूल्यों की व एक सभ्य समाज की पुनस्र्थापना में सहायक हो सके।

आज का इंसान आखिर क्या चाहता है

आज का इन्सान आखिर चाहता क्या है

आज हम लोग अपनी उन्नति का बखान करते नहीं थकते। मेडिकल साइन्स वाले कहते
है हमने मनुष्य बनाने का रहस्य जान लिया है। अब हम दिये हुए गुणों के अनुसार मानव
भ्रूण अथवा अन्य किसी भी जानवर का बीज का प्रारूप तैयार कर सकते है। भौतिक
शास्त्री प्रकृति की उत्पत्ति की गुत्थी को सुलझाने का दावा कर रहे हैं। आज हम ब्राम्हांड
के किसी भी कोने में पहुँच सकने का दावा भी करते हैं। सुख सुविधा के सब साधन
जुटाने का काम तो हम निरन्तर कर ही रहें हैं। लेकिन क्या ये प्रयत्न वास्तव में जिस
उद्देश्य से किये गये थे उसे पूरा करने में सहायक हुए है इस पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह
आज लगा हुआ है।

क्या आज लोग दुनिया के किसी भी कोने में पिछले सौ साल की तुलना में अधिक सुखी
व सन्तुष्ट है। ये एक विडम्बना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा व सहुलियत के
साधन बढ़ाने के प्रयास किये उतनी ही उसकी असुरक्षा की भावना व चिन्तायें बढ़ती गई।
विकास की ये विसंगतियाँ लगभग हर क्षेत्र में आज देखने को मिलती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में
आज साधनों के साथ बीमारियाँ बढ़ रही है। सुख सुविधाओं के साथ बैचेनी बढ़ रही है।
संचार साधनों में प्रगति के साथ दिलों की दूरियाँ बढ़ रही हैं। परिवाहन साधनों की प्रगति
के साथ दुर्घटनायें बढ़ रही है। चाँद तक तो हम आज हफ्ते भर में पहुँच सकते हैं लेकिन
पड़ोसी तक पहुँचने में महीनों निकल जाते हैं। ये प्रगति मानव को कहाँ ले जायेगी कह
पाना मुश्किल है।

ये बदलाव क्यों आया इस पर गौर करने की आवश्कता है। यह जरूरत इसलिये है भी
कि यदि हम परिवर्तन की दिशा बदलना चाहें तो हमें क्या करना चाहिये यह हम जान
सकें। आज का समाज जिस ओर अग्रसर है उसके मूल में सोच में आया एक महत्वपूर्ण
बदलाव है। और यह बदलाव है हमारे सोच का स्वयं पर केन्द्रित होना। पहले हमारी सोच
का आधार हुआ करता था त्याग, दूसरों की भलाई, मुसीबत में दूसरों की सहायता, बड़ों
का सम्मान, दया,प्यार आदि आदि। इसके अतिरिक्त लोग समाज में अपनी छबि के प्रति
कफी सचेत रहते थे। अतः पहले प्रायः लोग किसी भी कार्य को करने के पहले सोच को
उपरोक्त आधारों पर तोल लेते थे। समाज के अलावा धर्म की भी मनुष्य के व्यवहार में एक
अहम भूमिका होती थी। लोग भगवान से डरते थे व हर कार्य को पाप व पुण्य के तराजू में
तौल कर निर्णय लेते थे।

विज्ञान की प्रगति के साथ मनुष्य की तर्क शक्ति का विकास हुआ, और उसके साथ ही
पाप पुण्य से विश्वास डगमगाने लगा। साथ ही धर्म के पंडितों ने पाप कर्म की काट के
लिये दान, अनुष्ठान आदि उपाय खोज निकाले जिससे लोगों के मन से गलत कार्य करने
के बाद होने वाला अपराध भाव का बोझ दूर नहीं तो कम अवश्य ही होने लगा। शायद
भगवान से डर दूर होने के साथ ही समाज का डर भी नहीं रहा। परिणाम स्वरूप शुरु हुई
धन एवं शक्ति संग्रह की एक ऐसी दौड़, जिसमें कुछ भी करना जायज था। उदेश्य रह
गया तो सिर्फ एक, वह यह कि किसी भी सूरत में मुझे सबसे आगे निकलना हैं। शक्ति व
धन संग्रह की इस दौड़ ने मनुष्य का ध्यान स्वयं पर केन्द्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धन व शक्ति किसके पास कितनी है, यह दिखलाने का एक ही तरीका हो सकता है। वह
है उसका प्रदर्शन। और इस प्रकार शुरु हुआ धन व शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला। कोई
बड़े बड़े मन्दिर बना रहा है तो कोई बड़ी बड़ी धर्मशाला। कोई विशाल धार्मिक आयोजन
कर रहा है तो कोई प्रतिद्वन्दी को नीचा दिखाने का षडयन्त्र रच रहा है। गलत कार्य करने
पर जो दन्ड का विधान प्रशासन ने बनाया है वह भी आज शक्ति व धन के प्रदर्शन के
प्रभाव से नहीं बच पाया और समय के साथ इसने भ्रष्टाचार का विकराल रूप ले लिया।
कहतें हैं कि पाप की कमाई बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। यही कारण है कि आज दुराचार
सड़क पर आ गया है। आज हत्या, लूट व बलात्कार आम है। नैतिकता का इतना
अवमूल्यन हो गया है कि 2-3 साल की बच्ची का भी दुराचार का शिकार होना आम बात
हो गई है। आज शक्ति व धन संग्रह की होड़ व उसके प्रदर्शन में दया, धर्म, परोपकार
आदि मानव मूल्य जो एक सभ्य समाज का आधार हुआ करते थे वह प्रायः लुप्त हो गये
हैं।

ऐसा नहीं कि पहले अनैतिक कार्य करने वाले लोग नहीं होते थे, लेकिन वे कुछ गिने चुने
व मार्ग से भटके लोग ही हुआ करते थे। लोग उन्हे पापी और दुष्ट मान लेते थे और
भरोसा रखते थे कि ईश्वर उनको दन्ड अवश्य ही देगा। उनका उदाहरण देकर वे बच्चों
को गलत राह पर न चलने का पाठ पढ़ाते थे। लेकिन आज चारों ओर अनैतिकता का
साम्राज्य है। और अधिकतर लोग आज यह मानते हैं कि सफलता के लिये धन व शक्ति
का होना जरूरी है, वे किसी भी सूरत में इन्हें पाना चाहते हैं।

अवश्य ही इस प्रकार पायी सफलता अन्दर ही अन्दर व्यक्ति को कचोटती रहती है जिस
कारण बहुत कुछ पा लेने के बावजूद वह सुख एवं सन्तोष महसूस नहीं कर पा रहा है।
आखिर इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या है। समस्या का हल मूल कारण दूर
करने में ही है। आज आवश्यकता है मनुष्य को अपना ध्यान स्व से हटा कर दूसरों पर
केन्द्रित करने की।

एक सीधा सा तरीका हो सकता है सिर्फ इन्तजार करने का। जो हो रहा है उसे होने दें।
मनुष्य का स्वभाव है कि वह कुछ समय बाद हर चीज से ऊब जाता है, और कुछ नया
करना चाहता है। इसकी पूरी संभावना है समय के साथ मूल्य फिर बदलें और फिर समाज
के सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें। हाँ यह सब होने में कितनी सदियाँ लगेगी कह
पाना कठिन है।

दूसरा तरीका वैज्ञानिक हो सकता है। यह सम्भव है कि कुछ वर्षों में विज्ञान में हम इतनी
प्रगति कर लें कि मनुष्य के मस्तिष्क को नियन्त्रित करने का उपाय खोज निकालें। तब
मनुष्य के मस्तिष्क को जैसा चाहे ढाल सकें। यदि मस्तिष्क को भावना शून्य ही कर दिया
जाय तो सुख दुःख से परे एक मशीनी समाज का निर्माण समस्या को जड़ से ही समाप्त
कर देगा।

तीसरा तरीका हो सकता है नये सिरे से भगवान के समकक्ष अथवा उनसे भी बड़कर
एक नयी सर्वव्यापी, निष्पक्ष शक्ति रूप की प्रतिष्ठा जिसका डर मनुष्य के ह्मदय में पुनः बैठ
सके।

यह डर मनुष्य को अपने विवेक का उपयोग दूसरों की भलाई के लिये प्रेरित करेगा और
पुनः एक ऐसे समाज जिसमें हर व्यक्ति दूसरों की भलाई एवं उन्नति के बारे में सोचे व
अपने कर्मों का आधार बनाये। निश्चित ही ऐसे समाज में अमन चैन के अतिरिक्त कुछ
और हो ही नहीं सकता है।