भारत की अर्थ व्यवस्था

 

इसमें कोई संदेह नहीं की भारत विविधता से भरा विशाल देश है। यहाँ अलग अलग राज्यों की भोगोलिक, नेसर्गिक, सान्सकृतिक,सामाजिक व आर्थिक स्थितियों में भारी अन्तर है। इन कारणों से यहाँ का वित्तीय प्रबन्धन आसान नहीं है। प्रायः हर बजट के पूर्व,  पूरे देश में मंहगाँई व टेक्स की दोहरी मार से ग्रसित लोगों में आशा की किरण सी फूटती है व बजट में मिली छोटी मोटी राहतों की खुशी रेत में गिरी कुछ ओंस की बूंदों की तरह थोड़े समय में गायब हो जाती है। हमारे नेता भारत को विश्व में एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में बताते नहीं थकते। वहीं समाचार पत्र, दूरदर्शन व व्यवसायिक पत्रिकायें वित्त मंत्री द्वारा आर्थिक सुधारों के गुणगान करते नहीं थकते। लेकिन आज भारत की वित्तीय स्थिति की सच्चाई यही है कि करीब 30 प्रतिशत जनता को दो समय का भरपेट भोजन नहीं मिलता है व अधिकतर मध्य वर्ग मँहगाई, भ्रष्टाचार व कालाबजारी से त्रस्त है। पिछले कुछ  दस वर्षों तक सरकार के मुखिया स्वयं एक वित्त विशेषज्ञ थे। अपने पिछले वित्त मंत्री के कार्यकाल में उनके द्वारा शुरु उदारी करण की नीतियों को ही भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक ताकत बन कर उभरने का श्रेय दिया जाता है। यह एक विडम्बना ही है कि इन दस वर्षों में स्थिति बद से बदतर ही हुई है। शायद उनकी भी कुछ मजबूरियाँ होगीं। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार से लोगों की मँहगाई कम करने के लिये कदम उठाने की उम्मीद थी।  यह सरकार फिलहाल कई मौलिक सुधारों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है। इसका परिणाम दीर्घ अवधि में ही दिखाई देगा। निकट भविष्य में अधिक की आशा भी नहीं करनी चाहिये।

आज अधिकतर भारतीय जनता की हालत का कारण समझने के लिये किसी विशेषज्ञ की शायद आवश्यकता भी नहीं है। 50 के दशक में स्कूल में वित्त प्रबन्धन के कुछ मूलभूत सिद्धान्त सिखाये गये थे जो आज भी मुझे अच्छी तरह से याद हैं। उनमें प्रमुख ये हैं –

  1. रोटी, कपड़ा व मकान परिवार की मूल आवश्यकता है।
  2. जरूरी वस्तुओं की कमी होने पर मँहगाई बढ़ती है।
  3. अनावश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से उनकी खपत में कमी आती है।
  4. जितनी चादर हो उतने पैर फैलाओ।
  5. उधार लेकर ऐश मत करो।
  6. भविष्य के लिये थोड़ी थोड़ी बचत अवश्य करो।

लेकिन आज ये मूल सिद्धान्त सरकार व भारतीय शायद भूल गये हैं।

सरकार की बात करें तो मूल आवश्यकता की चीजों पर मँहगाई सबसे अधिक है लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कोई तरीका उनको नहीं सूझता है। कुछ वर्ष पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि भन्डार ग्रहों में अनाज सड़ाने से अच्छा है कि सरकार उस अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट दें। इस पर सरकार की प्रतिक्रिया थी कि यह संभव नहीं है। लेकिन अनाज को भन्डार ग्रहों में सढ़ने से बचाने के लिये भी सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। यदि सरकार अनाज का भन्डारन सही तरीके से नहीं कर पाती है तो फिर अनाज खरीदती ही क्यों है। हर साल सरकार किसानों की मदद के नाम पर न्यूनतम मूल्य जो बाजार भाव से काफी कम होता है निर्धारित करती है। और लाखों करोड़ रूपये में किसानों से अनाज खरीदती है। और उसे सड़ने के लिये छोड़ देती है। सिर्फ अनाज ही क्यों हर साल लाखों टन फल, सब्जियाँ भी सढ़ जाती है। क्या हमारा देश इतनी खाद्य पदार्थों की बरबादी का भार वहन कर सकता है।

आर्थिक प्रबन्धन के लिये मूलभूत आवश्यकता है संसाधनों का कुशलता पूर्वक उपयोग। मुझे याद है एक बार उस समय प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी ने कहा था कि देश में 1 रुपया खर्च करने पर 15 पैसे का ही लाभ जनता को मिलता है। आज तो यह गिर कर 4 पैसे भी शायद ही रहा हो। इस को सुधारना क्या सरकार का दायित्व नहीं है।

उदारीकरण से आर्थिक प्रगति के गुणगान सरकार व मीडिया करते नहीं थकता है। लेकिन इसके परिणाम का यदि आम जनता पर असर हम देखें तो हमारे बच्चे कोका कोला, पेप्सी, चिप्स व अन्य ऐसी ही वस्तुओं को खाकर अपनी सेहत खराब कर रहें है। अमीर बच्चे तो मोटापे के शिकार हो रहे हैं। वहीं गाँव व गरीब बच्चों के इस प्रकार के शौक ने तो घर की अर्थ व्यवस्था को ही बिगाड़ कर रख दिया है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उदारी करण से पहले जो पेन्ट शर्ट 200-300 रूपये मे मिल जाता था उसकी कीमत अचानक 800-900 रुपये होगई थी। आज कीमत 2500-3000 रुपये है। यही हाल खाद्य पदार्थों पर छपी कीमतों का है। मुझे आश्चर्य हुआ जब एक दुकान दार ने मुझे मैदे का एक पेकेट जिसकी छपी कीमत करीब 40 रु. थी, उसके उसने सिर्फ 22 रु. लिये। क्या ये सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह उत्पादों पर सही मूल्य अंकित करना सुनिश्चित करे। यह आश्चर्य की बात है कि छपे हुए मूल्य से काफी कम मूल्य पर सरकार को उत्पाद शुल्क स्वीकार्य है। यही कारण है कि कई बड़े बड़े शो रूम साल भर 30 से 70 प्रतिशत कीमत की सेल लगाते रहते हैं।

किसी भी अर्थ व्यवस्था में क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कार, पेट्रोल, व अन्य उपकरणों के दाम बढ़ते जाते है और इनकी माँग भी बढ़ती जाती है। सिर्फ कार ही क्यों अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों के साथ माँग भी बढ़ रही है। यह एक बाजारीकरण का जाल है जिसमें सरकार, मीडिया व व्यापारी की साझेदारी है। सरकार व व्यापारी नौकरी पेशा लोगों का वेतन बढ़ा कर बाजार में माँग बढ़ाते हैं व व्यापारी मीडिया की सहायता से बड़े बड़े विज्ञापनों की मदद से ग्राहकों को आकर्षित कर मनचाहा लाभ कमाते हैं और भोगवाद को बढ़ावा देते हैं।

सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का कर्ज है। उधार ले कर घी पीने वालों की तर्ज पर सरकार ने अपने कर्म चारियों के वेतन व सुविधा में लगातार वृद्धि की है लेकिन जिम्मेदारी व कार्य कुशलता में लगातार गिरावट ही आई है। क्या भुगतान व कार्य निष्पादन में समन्वय लाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यही हालत जन प्रतिनिधियों के वेतन, भत्तों, उनको दी जाने वाली विकास निधि पर भी लागू होती है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि 5 वर्ष पूरे करने पर जन प्रतिनिधियों को आजीवन पेन्शन सुविधा का मिलना चाहे काम के नाम पर किसी ने कुछ भी नहीं किया हो।

आज कल गरीब किसानों की भलाई के नाम पर कर्ज माफ करना, गरीबों को मुफ्त में पैसे बाँट कर समाज सेवा की वाह वाह लूटना सरकार के लिये फेशन सा हो गया है। लेकिन क्या ये लोगों को अकर्मण्य होने के लिये प्रेरित नहीं करता हैं। सीधे साधे शब्दों में एक प्रकार से यह सरकारी भीख ही है। सरकार को जरूरतमन्दों की सहायता अवश्य ही करना चाहिये, लेकिन इस प्रकार कि वे स्वावलम्बी बन सकें न कि दया के पात्र। देश की आर्थिक उन्नति सभी के सशक्तीकरण से ही संभव है।

मँहगाई से पिछले कुछ वर्षों से सभी त्रस्त है। खाद्य पदार्थों की बरबादी, वस्तुओं के मूल्यों के नियन्त्रण पर सरकार का अक्षम होना व अपने ही खर्च पूरे करने के लिये करों में लगातार बढ़ोत्री करते रहना तो मँहगाई के कारण है हीं। उससे भी बढ़ा कारण मँहगाई का है कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत। आश्चर्य की बात है कि जब से कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत हुई है उसमें शामिल लगभग सभी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं लेकिन केन्द्रीय मंत्री जी मीडिया में बयान देतें हैं कि मँहगाई का कारण यह नहीं है। क्या यह एक प्रकार की होर्डिंग नहीं है।

बल्कि इसमें तो पड़े पड़े माल के पैसे इधर उधर कर लोग मुनाफा भी कमा लेतें हैं।

रही भ्रष्टाचार की बात तो भ्रष्टाचार मूल कारण तो सरकार से गलत तरीके से काम करवाना ही है। चाहे इसमें दूसरों का हक मारा जाये, अथवा पैसे देने वाले का आर्थिक लाभ हो या फिर कार्य कानून के दायरे से बाहर हो। भ्रष्टाचार की जड़ तो सरकार अथवा सरकारी विभाग ही हैं। मूल (वेतन) से अधिक कमाई के श्रोत को खत्म करने की अपेक्षा हम किसी भी सरकार से कैसे कर सकते है। आश्चर्य नहीं है कि सरकार पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर हजारों के घोटाले का आरोप लगाकर सरकार के प्रतिनिधि उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलने के लिये अयोग्य करार बतला देतें हैं और आरोप छानबीन करने के नाम पर सालों के लिये दब जाते हैं। कोई दृढ़ इच्छा शक्ति व्यक्ति ही शीर्ष पर आकर इससे देश को मुक्ति दिला सकता है।

जहाँ तक आम भारतीय का सवाल है तो भारतीय अर्थ व्ववस्था को सुधारने में वे काफी योगदान कर सकते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि मँहगाई,भ्रष्टाचार व अपव्ययता के लिये हम भी जिम्मेदार है। सिर्फ निम्न लिखित बातों पर ध्यान देने की जरूरत है-

  1. बाजार से चीजें सिर्फ ब्रान्ड देखकर नहीं अपितु उसकी उचित मूल्य व गुणता के आकलन के आधार पर ही खरीदें। अपने देश मे बनी चीजों की अधिक बिक्री से ही देश का विकास संभव है।
  2. जहाँ तक संभव हो मकान के अलावा कोई भी वस्तु उधार अथवा किश्तों पर न लें।
  3. यथा संभव हर माह कुछ बचत अवश्य ही करें।
  4. बच्चों को मँहगीं नही अच्छी शिक्षा दिलवायें।
  5. हर माह बजट बना कर खर्च प्लान करें।
  6. यथा संभव गलत कार्य न करें

भारत में आपदा प्रबन्धन

आपदा कभी भी कह कर नहीं आती है यह एक पुरानी कहावत है। इससे निपटने के लिये संयम, त्वरित निर्णय व युद्ध स्तर पर कार्य क्षमता का होना आवश्यक है। हाल ही में उत्तराखन्ड में जो आपदा आई उसका परिणाम स्तब्ध कर देने वाला था। पूरे देश में अभी तक इस पर बहस जारी है कि आपदा किस कारण से आई। राजनीतिक दोषारोपण भी काफी हुए। यहाँ तक कि न्यायतन्त्र को भी राहत कार्य में दखल देने को मजबूर होना पड़ा। कई राजनेताओं ने इस अवसर का लाभ अपनी छबि सुधारने के लिये भी उठाया। किन्तु हमारे आपदा प्रबन्धन में कहाँ कमी रह गई व हमारे आपदा प्रबन्धन तन्त्र को कैसे और प्रभावी बनाया जाय इस और किसी का ध्यान गया हो ऐसा समाचार देखने सुनने को अभी तक नहीं मिला।
जापान में कुछ समय पूर्व लगभग इसी स्तर की आपदा सुनामी व उसके प्रभाव स्वरूप परमाणु संयन्त्र से रिसाव के रूप में आई थी। जिस कुशलता व गति से सरकार और वहाँ की जनता ने आपदा प्रबन्धन में सहयोग किया उसकी प्रसंशा पूरी दुनिया में हुई थी। क्या हम इससे कुछ सीख नहीं ले सकते।
वैसे तो मेरा अपना तो आपदा प्रबन्धन का कोई अनुभव नहीं है, किन्तु सहज बुद्धि के अनुसार निम्न लिखित बातों पर यदि ध्यान दिया जाये तो हम बेहतर आपदा प्रबन्धन कर सकते है।
आपदायें दो प्रकार की हो सकती हैं। पहली वे आपदायें जिसके लिये किसी न किसी रूप में मनुष्य जिम्मेदार है, जैसे बाँध से अचानक पानी छोड़ना, बाँध का टूट जाना, किसी पुरानी इमारत का गिर जाना,परमाणु संयन्त्र से रिसाव अथवा खुले गड्डे में किसी बच्चे का गिर जाना आदि। दूसरी वे आपदायें जिसके लिये प्रकृति जिम्मेदार है, जैसे तूफान का आना,बाढ़ का आना, भूकम्प का आना अथवा जमीन व पहाड़ खिसकना आदि।
दोनों प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिये सबसे आवश्यक बात है हमारी इन आपदाओं से निपटने की तैयारी। तैयारी में सबसे पहले जरूरत है आपदा क्षेत्र की पहचान। हर क्षेत्र को दोनों प्रकार की आपदाओं की संवेदनशीलता के अनुसार चिन्हित करना जरूरी है। स्थानीय प्रशासन को इसके लिये प्रशिक्षित करना चाहिये तथा इसे कम से कम साल में एक बार पुनर्रीक्षण कर स्थानीय जनता को सूचित करना चाहिये। तैयारी की दूसरी जरूरत हर गाँव व मोहल्ले मे एक दो स्वयंसेवकों की पहचान व उन्हें वहाँ की संभावित आपदा से निपटने के लिये प्रशिक्षित करने की। आसपास के स्वयंसेवको की आपसी जानकारी भी एकदूसरे के पास होने से अतिरिक्त सहायता मिलने में आसानी हो सकती है। प्रशिक्षण में संभावित आपदा का पूर्वाकलन व उससे निपटने के उपायों का समावेश जरूरी है। स्थानीय स्वयंसेवकों के पास आपदा के समय किसको संपर्क करना है उसकी जानकारी व
संपर्क करने का साधन होना आवश्यक है। संभव हो तो एक रेडियो फोन उपलब्ध कराये जायें। स्वयं सेवक अपने पास जरूरत की वस्तुओं की सूची प्रथमिकता के आधार पर बना कर रखें ताकि आपद स्थिति में चूक नहीं हो। हर संभावित आपदा क्षेत्र में आपत्काल में स्थानीय निवासियों के लिये सुरक्षा निर्देश लिखित रूप में दर्शाये जायें व उनके प्रति जागरुकता पैदा की जाये।
इन स्थानीय स्तर की तैयारियों के अतिरिक्त शासकीय स्तर पर भी तैयारियाँ आवश्यक है। शहर व जिला स्तर पर एक संयोजक हो, किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। लेकिन आपदा के समय सिर्फ आपदा प्रबन्धन ही उसकी प्राथमिकता हो इसके लिये उसे किसी अन्य आदेश की आवश्कता न हो। आपात स्थिति में आवश्यक वस्तुएें यथा खाद्य सामग्री, दवायें व यातायात के साधन आदि कहाँ से प्राप्त करना है यह जानकारी उसके पास होनी चाहिये। संयोजक के आपात अधिकारों की जानकारी संभावित स्श्रोतों को होनी चाहिये। वस्तुओं व सेवाओं का उचित मूल्य आपद स्थिति से निपटने पर संयोजक द्वारा चुकाना आवश्यक है। यह धन सरकार प्रदान करे। अन्य सहायता समूहों व मीडिया से समन्वय का कार्य भी सिर्फ संयोजक ही करे। जिला संयोजको के लिये राज्य स्तरीय अधिकारी को आपदा प्रबन्धन की जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। इस अधिकारी के लिये भी आपदा प्रबन्धन प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिये। इस अधिकारी का प्रमुख कार्य आवश्यकतानुसार बाह्र सहायता यथा सेना को बुलाना, हवाई यातायात प्रबन्ध आदि व राज्य व केन्द्र सरकार को स्थिति जानकारी देना व आवश्यक धन उपलब्ध कराना आदि हों। सभी प्रकार की पूर्व चेतावनियों की
जो उस राज्य से संबन्धित हो एक प्रति सीधे राज्य के आपदा प्रबन्धक को भेजना आवश्यक हो।
इन तैयारियों के अतिरिक्त वैज्ञानिक जानकारियाँ एवं विश्लेषण करने वाले विभागों से आपदा संबन्धित तथ्य व जानकारी समय पर संबन्धित राज्य के आपदा प्रबन्धकों को सार रूप में उचित समय सीमा में सीधे भेजी जायें। इन तैयारियों के अलावा सबसे अधिक जरूरी है मानव जनित आपदाओं को रोकना। राज्य व केन्द्र स्तर पर सभी बड़ी योजनाओं की मंजूरी के पहले संभावित खतरों का विश्लेषण व उससे निपटने के उपायों की जानकारी राज्य के आपदा प्रबन्धक के पास अवश्य ही होना जरूरी है। यहाँ यह माना जा रहा है कि योजना की स्वीकृति देते समय संभावित खतरों का विश्लेषण समुचित रूप से किया जाता है व एक सीमा से अधिक खतरे वाली योजनाओं को स्वीकृति प्रदान नहीं की
जाति है। इसी प्रकार स्थानीय मकानों की स्वीकृति स्थानीय संभावित खतरों व मकानों की सुरक्षा के मापदन्डों के अनुसार ही दी जानी चाहिये। ये मापदंड संबन्धित विभागों को विषेशज्ञों की सहायता से राज्य के आपदा प्रबन्धन द्वारा उपलब्ध करवाना चाहिये व आवश्यकता अनुसार। इसके अतिरिक्त स्थानीयप्रसाशनीय स्वयंसेवक स्तर पर निम्न लिखित सावधानियाँ बरती जा सकती है जैसे:-
1. बड़ी इमारतों व मार्केट स्थलों में बिजली, लिफ्ट व आग संबन्धी सुरक्षा उपायों का निर्धारित समय पर आकलन।
2. बाँधों व झीलों में से पानी छोड़ने की पूर्व सूचना जारी करना। यथा संभव ग्राह्र क्षेत्र में वर्षा के अनुसार पहले से आकलन कर धीरे धीरे पानी छोड़ना।
3. धार्मिक अवसरों पर भीड़ की अपेक्षानुसार प्रबन्ध करना ताकि भगदड़ की नौबत न आये।
4 गड्डों को खुला न छोड़ना।
5. पुरानी व ठीक रखरखाव रहित इमारतों पर निगरानी व समय रहते खाली करवाना। आदि।
अन्त में उक्त सभी उपायों को प्रभावी तभी बनाया जा सकता जब शासन तन्त्र में दृढ़ इच्छा शक्ति हो तथा सरकार पर जनता का विश्वास हो।