भारत में शिक्षा समस्यायें व समाधान

                 

यह एक दुःखद स्थिति है कि विश्व में एक समय शिक्षा का समृद्ध केन्द्र माने जाने वाले भारत में शिक्षा की हालत दयनीय है।

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजो की देन है। उनका प्रमुख उद्देश्य युवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना था जिससे वे निष्ठा पूर्वक सरकार की सेवा कर सकें। अतः उनका मुख्य उद्देश्य उनको एक कार्य विशेष के योग्य बनाना था, जो वे जीवन पर्यंत करते रहें। उदाहरण स्वरूप कोई जीवन भर इन्जीनियरिंग, डाक्टर,  वकील अथवा लेखा जोखा करने का काम करेगा। स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयास अवश्य ही किये गये। लेकिन ये प्रयास जैसे यूनिफार्म लागू करना, मध्यान्ह भोजन देना अथवा १०वीं तक बच्चों को फेल नहीं करना सिर्फ अलंकिृत करने जैसे ही माने जाने चाहिये। इससे गुणता में कोई सुधार नहीं आया। एनसीइआरटी द्वारा प्रकाशित अधिकतर पुस्तकें समझने में बच्चों के लिये पहले की अपेक्षा कठिन लगती है। आज सरकारी स्कूल संसाधन की कमी, खराब परीक्षाफल व शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य शासकीय सेवाओं में व्यस्त रखने के लिये अधिक जाने जाते हैं।

इसका परिणाम यह है कि आज निम्न मध्यम वर्ग भी अपने बच्चों को सामर्थ से अधिक फीस देकर निजी स्कूलों में भर्ती करना चाहता है।

अधिकतर निजी संस्थान व्यापार केन्द्र बन चुके हैं। फल स्वरूप राजनेता व उद्योगपतियों का निजी क्षेत्र में लगभग एकाधिकार है। इनका विकृत रूप कोचिंग संस्थानों के रूप में उभर आया है।

इस परिस्थिति के कारणों को खोजने का प्रयास करे तो हमें ये मौलिक कारण मिलेंगें।

१. शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटकना –

वास्तव में देखा जाय तो शिक्षा शब्द का चयन ही गलत है। हमारे मनीषियों ने इसे विद्या ग्रहण करना माना था। उन्होंने इसका उद्देश्य इस श्लोक में सटीक वर्णित किया है।

विद्या ददाति विनयं, विनयाति याति पात्रताम्,

पात्रतात धनमापनोति , धनात  धर्मं ततः सुखम्।

संक्षेप में विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धर्म व सुख मिलते हैं।

मूलतः विद्या हम ग्रहण करते हैं व शिक्षा दी जाती है। स्वेच्छा से ग्रहण की गई ही विद्या है। आज शिक्षा ज्ञान अर्जन के उद्देश्य से भटक कर प्रमाण पत्र व उपाधि अर्जन के मोहजाल में उलझ गई है। इसका सीधा असर देश का भविष्य कहलाने वाले लगभग ३० प्रतिशत बच्चों व युवाओं पर पढ़ता है।

२. स्कूल व उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश –

यह हास्यास्पद स्थिति है कि एक ओर तो स्कूली शिक्षा को आवश्यक किया हुआ है वहीं दूसरी ओर प्रवेश के लिये सबसे निचली कक्षा के लिये भी बच्चों का चयन किया जाता है। यह भी हास्यास्पद है कि कई उच्च शिक्षण संस्थान नियमित शिक्षण आकलन को मानक नहीं मानकर अलग से परीक्षा के आधार पर प्रवेश देती हैं। परिणाम स्वरूप कोचिंग का व्यापार फल फूल रहा है।

३. शिक्षण खर्च का एक छोटा हिस्सा ही शिक्षा खर्च-

सभी शिक्षण संस्थाओं में अन्य प्रभारों के कारण शिक्षा पर कुल शुल्क का सिर्फ १५-२० प्रतिशत ही वास्तव में शिक्षा पर खर्च हो पाता है। बस, पुस्तकों, यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन आदि खर्चे तुलनात्मक रूप से अधिक हैं।

४. स्कूल की दूरी

बच्चों को प्रायः विशेष कर निजी स्कूलों के दूर होने के कारण आने जाने में २-२.३० घन्टे का समय व्यर्थ व थका देने वाला होता है।

५. परीक्षा का मानसिक दबाव

अच्छे नम्बर की होड़ ने परीक्षा को विद्यार्थी के ज्ञान अर्जन का अनुमान लगाने के साधन न होकर एक प्रतियोगिता बना दिया है। जिससे किसी भी प्रकार से दूसरों से आगे निकलने की भावना प्रबल हो गई। परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से गलत उपाय अपनाये जाने लगे। फलतः परीक्षाफल की विश्वसनीयता ही समाप्त हो गई। पुनर्मूल्याकंन परीक्षाओं के चलन ने प्रतियोगिता संस्कृति को और बढ़ावा दिया, जिससे कोचिंग व्यवसाय चल निकला।

६. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा

कुछ शहर व कस्बों के स्कूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो अधिकतर सरकारी स्कूल दुर्व्यवस्था व भ्रष्टाचार के चलते बीमार हालत में ही हैं।

७. शिक्षण लाभ का व्यवसाय

उपरोक्त कारणों ने शिक्षण को एक लाभप्रद व्यवसाय बना दिया। शिक्षा के विस्तार के नामपर निजी संस्थानों को लुभाने के लिये इस क्षेत्र की आय को कर मुक्त घोषित किया गया। फलतः राजनेता व उद्योगपतियों ने इसे अपना गढ़ बना लिया।

पता नहीं स्थिति का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों को ये समस्यायें क्यों नहीं दिखती?

इन मूल समस्याओं से उबरने के लिये शिक्षण व्यवस्था में बड़े व मूल भूत सुधार की जरूररत है। नीचे दिये सुझाव शिक्षा को पुनः ज्ञान अर्जन का साधन बनाने में सहायक हो सकते हैं।

  • पाँच साल तक बच्चों को किसी भी प्रकार के स्कूल में नहीं भेजा जाय। केवल सीमित समय ही टीवी या अन्य उपकरणों के लिये निर्धारित किया जाये। बच्चों में बाहर खेलने व आपस में मिलने जुलने की आदत डालें। प्रेरक कहानियाँ सुनायें। चीजों को साझा करना सिखायें। नौकरी पेशा माता पिताओं के लिये यही सुविधा झूलाघरों में हो।
  • पाँच वर्ष की उम्र में बच्चों को पहली कक्षा में स्कूल में बिना किसी चयन प्रक्रिया के लिया जाये। कक्षा ५ तक मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्माण व भाषा एवं अंक ज्ञान हो। होमवर्क न देकर पुस्तक पठन को प्रोत्साहन दिया जाये। तथा बच्चों की रुचि जानने का प्रयास किया जाये। कम से कम १५ मिनट सामूहिक व्यायाम अवश्य ही करवाया जाये। छोटे व सरल सृजन कार्य करवाये जायें। परीक्षा न लेकर आकलन रिपोर्ट तैयार की जाये। कुल स्कूल समय ४ घन्टे से अधिक न हो।
  • कक्षा ५ से ८ तक भाषा व गणित के साथ अन्य विषय ज्ञान व एक अन्य भाषा जोड़ सकते हैं। विभिन्न प्रकार की कला में कार्य करने का बच्चों को अवसर देकर रुचि का आकलन किया जाये। बच्चों के लिये आगे के लिये संभावित क्षेत्र का आकलन किया जाये। जिला स्तर पर कक्षा ८ की परीक्षा ली जाये। अन्य परीक्षा स्कूल स्तर पर हों। अधिक से अधिक बच्चों को विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर प्रदान किये जायें। स्कूल का कुल समय ६ घन्टे से अधिक न हो। होमवर्क केवल कला संबन्धित कार्य हो।
  • कक्षा ८ के बाद से कुशलता कार्यक्रमों की शुरुआत भी की जाये। जिससे छात्र आगे पढ़ाई अथवा कुशलता में से एक अपनी पसंद अनुसार चुन सकें। कुशलता कार्यक्रमों में उद्यमिता व स्वव्यवसाय स्थापना पर बल दिया जाय। कुशलता कार्यक्रमों से भी उच्च व्यवसायिक शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश का प्रावधान हो।
  • निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के शिक्षण पर प्रतिबन्ध हो। किन्तु निर्धारित कार्यक्रमों में प्रवेश पर उम्र का बन्धन न हो ताकि सभी अपनी योग्यता में सुधार कर सकें।
  • परीक्षाफल में अंकों के अतिरिक्त संक्षिप्त चरित्र वर्णन भी शामिल हो। गलत साधन का प्रयोग दण्डनीय अपराध हो। एक कक्षा में ४० से अधिक बच्चे न हों।
  • सभी निर्धारित कार्यक्रमों के लिये अधिकतम फीस निश्चित की जाये। अन्य किसी प्रकार का शुल्क न लिया जाय।
  • नौकरी के लिये सिर्फ शैक्षणिक योग्यता चयन का आधार हो। अधिकारी वर्ग के लिये इन्टरव्यू लिये जा सकते हैं।
  • सभी स्तर के अध्यापकों को समाज में आदर दिलाने के लिये उन्हे विशेष सामाजिक सुविधा दी जाये। शिक्षण आवश्यक सेवा घोषित की जाये ताकि शिक्षकों से अन्य सेवायें न ली जा सकें व वे हड़ताल पर भी न जा सकें। शिक्षकों के चयन का आधार पढ़ाने में रूचि व चरित्र मुख्य रूप से हो।

उपरोक्त प्रयत्नों से शिक्षा व्यवस्था को ज्ञान अर्जन के साथ एक अच्छा नागरिक बनाने का माध्यम बनाया जा सकता है।

बुलंदियों तक पहुँचाने वाले 9 चमत्कारी मंत्र (दी सीक्रेट लेटर्स आफ ए मांक हू सोल्ड हिज सफारी पर आधारित) लेखकः राबिन शर्मा, प्रकाशकः जैयको बुक्स

सामाजिक दबावों के चलते हम प्रायः अपनी वान्छित राह से कब भटक जाते हैं
पता ही नहीं चलता है। नीचे लिखे नौ मंत्र हमें सही राह दिखाकर बुलन्दियों को
छूने में मददगार हो सकते हैं।
1. स्वयं को पहचाने –
स्वयं को पहचानना आसान नहीं है। हमें ईश्वर ने सबसे बड़ी देन के रूप में अपनी एक पहचान दी है। हम स्वयं को अपनी जिन्दगी जीने के लिये समर्पित करें यह हमारा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने जैसा होगा। हमें सामाजिक दबाव में न आकर हमें अपने अनुसार, अपने आदर्शों व अपने स्वप्नों को साकार करने प्रयास करते हुए जीना चाहिये। हमें हमारे अन्दर छुपी उम्मीदों, इच्छाओं हमारी ताकत व कमजोरियों को जानने का प्रयास करना चाहिये। हमें मालूम होना चाहिये हम कहाँ तक पहुँचे व किस आरे जा रहे हैं। हमारा हर निर्णय व हर कदम हमारे अपने जीवन को सच्चाई, इमानदारी व केवल अपने अनुसार जीने के समर्पण से निर्धारित होना चाहिये। इस प्रकार हम अवश्य ही उम्मीद से
अधिक सफल जीवन जी सकेगें।
2. डर को गले लगायें –
प्रायः अदृश्य डर का अहसास हमें आगे बढ़ने से रोकता है। इसके चलते हम एक आराम दायक स्थिति में सिमट कर रह जाते हैं। वास्तव यह सबसे कम सुरक्षित स्थिति है. जीवन में सबसे बड़ा खतरा कोई खतरा नहीं उठाना ही है। हम जब हर बार किसी खतरे का सामना करते हैं, तो हमें वह शक्ति वापस मिल जाती है जो हमने डर के कारण खो दी थी। डर के दूसरी ओर हमारी ताकत होती है। हर बार जब हम आगे बढ़ने अथवा उन्नती के लिये कठिनाईयों का सामना करते हैं, डर के बन्धन कमजोर होने लगते हैं। जितना हम डर का सामना करेगें हम अपने को उतना ही मजबूत पायेगें। इस प्रकार निडर व ताकतवर होकर हम अपने सपनों को साकार कर सकेगें।
3. दयालु बने –
जिस प्रकार हमारे शब्द हमारे विचारों को व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार हमारे कर्म हमारे विश्वास को प्रकट करते हैं। चाहे जितना भी नगण्य हो, हमारा किसी के प्रति व्यवहार दर्शाता है कि हम स्वयं व अन्य सभी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। यदि हम किसी का अनादर करते हैं तो स्वयं का अनादर करते हैं। यदि हम किसी पर संदेह करते हैं तो स्वयं पर संदेह करते हैं। यदि हम दूसरों के प्रति कठोर हैं तो स्वयं के प्रति कठोर हैं। यदि हम हमारे आसपास के लोगों की सराहना नहीं कर सकते तो स्वयं को भी नहीं सराह सकते। हर व्यक्ति जिसके संपर्क में हम आते हैं अथवा हम जो भी करते हैं हमें आशा से अधिक दयालु, अपेक्षा से अधिक उदार व जितना संभव हो उससे अधिक सकारात्मक
होना चाहिये। दूसरों से संपर्क का हर क्षण हमारे लिये हमारे उच्च मूल्यों को दर्शाने व हमारी सह्मदयता से प्रभावित करने का एक अवसर है। इस प्रकार हम एक समय एक व्यक्ति बेहतर इन्सान बनाकर विश्व को बेहतर बना सकते हैं।
4. रोज थोड़ा सुधार करें –
हम जिस प्रकार छोटे छोटे काम करते हैं उसी तरह सभी कार्य करते हैं। यदि हम छोटे छोटे काम अच्छी तरह से करते हैं तो बड़े काम में भी उत्कृष्ट ही रहेगें। इस प्रकार उत्कृष्ट निष्पादन हमारी आदत बन जाती है। इससे भी अधिक यह जानना जरूरी है कि हमारा हर प्रयास अगले कदम की आधारशिला है, इस प्रकार हम थोड़ा थोड़ा करके विशाल उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं, हमाराआत्मविश्वास बढ़ता है और हम असाधारण सपनों को साकार कर सकतें है। बुद्धिमान लोग यह समझते हैं हर रोज थोड़ा सा सुधार लम्बे समय में अनअपेक्षित सफलता के शिखर पर पहुँचाते है।
5. अच्छे से अच्छा जीवन जियें व अच्छे से अच्छा काम करें –
कोई भी काम छोटा नहीं होता है। हर परिश्रम हमारी प्रतिभा दर्शाने , एक कलाकृति बनाने, व हमारी क्षमता दिखाने का एक मौका होता है। हमें पिकासो की तरह लगन, समर्पण, दिल से व उत्कृष्टता से हमारा काम करना चाहिये। इस प्रकार न केवल हमारी उत्पादकता दूसरों के लिये प्रेरणा स्त्रोत बन जायेगी बल्कि हमारे आसपास के लोगों के जीवन को भी प्रभावित करेगी। जीवन को सुन्दरतम तरीके से जीने का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हम वही करें जो हमारे लिये मायने रखता हो, तथा उसमें इतनी दक्षता प्राप्त कर लें कि देखने वाले हम पर से नजर नहीं हटा पायें।
6. अपना वातावरण स्वयं चुनें –
हम अपने आप को हमारे आसपास के वाताववरण से अलग नहीं कर सकते हैं। इसलिये हमें हमेशा सचेत रहना चाहिये कि हम किस वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रभावित हों। यह एक बुद्धिमता की निशानी है कि हम वही जगह चुनें जो हमें प्रोत्साहित करे अथवा उर्जा प्रदान करे व ऐसे लोगों का साथ चुनें जो हमारा उत्साह वर्धन करे व प्रगति में सहायक हों। हमारे कार्य स्थल या व्यक्तिगत जीवन में यही सकारात्मक मित्र अथवा साथी हमे हमारे चरम उत्कर्ष तक पहुँचाने में मददगार होगें।
7. छोटी छोटी खुशशियों का आनंद लें –
अधिकतर लोग उनके लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण जीवन में क्या है तभी जान पाते है जब बहुत देर हो चुकी होती है, तब वे इस बारे मे कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वे अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय को ऐसी चीजों को प्राप्त करने में लगा देतें है जिसका महत्व अंत में नगण्य है। समाज हमें हमारे जीवन को भौतिक वस्तुओं से भर लेने की ओर आकर्षित करता है, किन्तु हमारा अन्तस
जानता है कि वास्तविक खुशी वही है जो हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाये व हमें आगे बढ़ने में सहायता करे। हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ कितनी ही अनुकूल अथवा कठिन हों, हम सभी के पास ढेरों छोटी छोटी खुशियाँ बिखरी रहती है जिनको हम गिन सकते हैं। जैसे ही हम इन खुशियों का हिसाब रखने लगते है हमारा जीवन खुशियों से भर जाता है। हमारा मन आभार से भर जाता है, व
हमारा हर दिन एक बड़ा उपहार सा लगने लगता है।
8. जीवन का लक्ष्य प्रेम है –
हम कितना अच्छा जीवन जीते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आपके मन में कितना प्यार है। हमारा दिल दिमाग से अधिक समझदार है, उस पर भरोसा करें व उसकी बात मानें।
9. क्षमता से बड़े लक्ष्य को पाने का प्रयास करें –
पृथ्वी पर कोई भी अतिरिक्त व्यक्ति जीवित नहीं है, हममें से हरएक किसी न किसी उद्देश्य अथवा कार्य विशेष से यहाँ है। इसलिये अपने स्वयं व उनके लिये जिन्हें आप बहुत प्रेम करते हैं अपने जीवन को सुन्दरतम बनाईये। खुश रहें और जीवन का खूब आनंद लें। सिर्फ अपनी शर्तों पर सफलता प्राप्त करें, ना कि समाज द्वारा सुझाई गई शर्तों पर। इससे भी अधिक जरूरी है कि अपने आप को
महत्वपूर्ण बनायें। स्वयं को उपयोगी बनायें, व अधिक से अधिक लोगों की सहायता करें। इस प्रकार हम में से हरएक साधारण जीवन से असाधारण उँचाईयों  तक पहुँच सकते हैं व एक मिसाल कायम कर सकतें हैं।