अपने लक्ष्य से भटकते विश्व के धर्म

विश्व के सभी धर्मों का मूल उद्देश्य समाज में आपसी सामंजस्य, प्रेम व सहयोग की स्थापना का ही रहा है। यह बिल्कुल सच है कि समाज के सभी लोगों से समझाबुझा कर अथवा नियमों की अवहेलना करने पर दन्ड का भय दिखाकर समाज के नियमों का पालन नहीं करवाया जा सकता है। स्वभाविक विविधता के चलते समाज में कुछ लोग बुद्धिमान, कुछ दयालु, कुछ दबंग, कुछ आलसी, कुछ मेहनती, कुछ शान्त, कुछ क्रोधी आदि स्वभाव के होते हैं। इन्हीं विविधताओं के चलते समाज में अपराध, टकराव व बिखराव की स्तिथियाँ उत्पन्न होना स्वभाविक है। विभिन्न समाजों ने इस समस्या से निपटने के लिये आरम्भ से ही प्रयास किया है। इसका सबसे आसान उपाय जो लगभग सभी समाजों ने अपनाया वह था नियम बनाने का व नियमों के न मानने पर दन्डित करने का। इसी उपाय ने समाज में एक प्रसाशनिक ढाँचे की नींव रखी जो समय के साथ विकसित होता रहा। इस उपाय में सबसे बड़ी कमी थी पूरे समाज पर नजर रखने की आवश्यकता। समाज के विस्तार के साथ यह उपाय अधिक प्रभावी नहीं रह पाया। परिणाम स्वरूप एक ओर अधिकारी स्वेच्छारी हो गये व दूसरी ओर कानून की नजर से बचकर लोग गलत काम करने लगे। परिणाम स्वरूप समाज में अराजकता बढ़ने लगी। इसी परिस्थिति को सुधारने के लिये सामाजिक चिन्तकों ने धर्म का सहारा लिया। लगभग सभी धर्मों के मूल में इसीलिये ये बातें मूलतः मिलेंगी
1. एक महाशक्ति (ईश्वर) है जो सब देखती है व संसार का संचालन करती है।
2. मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है। यह फल इस जन्म में अथवा अगले जन्म में अवश्य ही मिलता है।
3. सत्य का पालन, जीवों पर दया, दूसरों की सहायता, बड़े बूड़ों व बीमार लोगों की सेवा, बड़ों का आदर करना व समाज के नियमों का पालन करना आदि पुण्य कार्य हैं जिनका फल अच्छा मिलता है।
4. लोभ, क्रोध, घृणा, झूठ बोलना, निर्बल को सताना, दूसरों का हक छीनना आदि पाप है, जिनका फल बुरा मिलता है।
5. ईश्वर हमेशा कमजोर की सहायता करता है। सच्चे मन से स्मरण करने से वह किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य ही करता है।
6. गलती से गलत काम हो जाये उचित प्रायश्चित से उसके परिणाम से मुक्ति मिल सकती है।
7. इस जन्म के कुल कार्यों के अनुसार ही मनुष्य मृत्यु उपरान्त स्वर्ग अथवा नर्क का पात्र होता है।
यह स्वभाविक था कि इस विचारधारा का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाये। इसके लिये प्रचारकों की बड़ी टीम तैयार करने तथा उन्हें प्रशिक्षण देने के लिये संगठन बनाये गये। समाज पर उचित प्रभाव हो इसलिये इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि प्रचारक स्वयं धर्म में विश्वास रखने वाले हों व उसके अनुसार आचरण करें। संगठन सुचारु रूप से चले इसके लिये समाज से स्वेच्छा से दान देने को धर्म पालन का ही एक हिस्सा भी बनाया गया। विचारधारा को सामान्य लोगों की समझ में आसान बनाने के लिये प्रार्थना स्थलों की जगह जगह स्थापना की गई। यही स्थल प्रचार प्रसार का केन्द्र भी बन गये। इस विचारधारा के आशातीत परिणाम सामने आये। सामान्य जनता व प्रशासक वर्ग पर इसका लगभग एकसा प्रभाव देखने को मिला, परिणाम स्वरूप बिना विशेष प्रयास के सामाजिक व्यवस्था में काफी सुधार देखने को मिला। शासक वर्गों को समाज को व्यवस्थित रखने का यह तरीका बहुत आसान लगा। अतः शासक वर्गों ने इन संगठनों को समर्थन व सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। समाज ने भी इस विचार धारा को दिल से स्वीकार किया व इस विचारधारा को न मानने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। कई सदियों तक यह विचारधारा समाज पर स्वनियंत्रण बनाये रखने में सफल रही। अपवाद स्वरूप ही समस्यायें समाज में देखने को मिलती थी जिनकों प्रशासन के लिये नियन्त्रण करना कठिन नहीं था।
शासक वर्गों का वरद हस्त मिलने के साथ ही धार्मिक संगठनों में सत्ता के निकट पहुँच कर अपनी शक्ति बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा होने लगी। यह धर्म को अपने लक्ष्य से भटकाने वाला पहला कदम सिद्ध हुआ। प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने के प्रयास में धर्म प्रतिनिधियों ने शासकों व शक्तिशाली वर्गों के गलत कार्यों को जनता में उचित व जायज बताने का प्रयास किया। बदले में उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप धार्मिक केन्द्र स्वयं एक सत्ता केन्द्र बनने लगे। ऐसे केन्द्र प्रमुख सादगी से हटकर भोग विलास का जीवन जीने लगे। इसका प्रभाव यह रहा कि सत्ता लोलुप व लालची लोग इस ओर आकर्षित होने लगे। इस प्रकार समय के साथ प्रर्थना स्थलों की जगह पूजा स्थलों ने लेली। इन पूजा स्थलों में भेंट चढ़ाना आवश्यक हो गया। पूजा स्थलों का विकास तेजी से हुआ। तथा पाप निवारण तथा स्वर्ग प्राप्ति के लिये नये नये तरीके स्थापित किये गये। इन पर खर्च व्यक्ति की हैसियत देख कर निर्धारित होता था। समाज ने इन उपायों को मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की उम्मीद में सहर्ष स्वीकार किया। कई सदियों तक ये प्रथायें पनपती रहीं। स्वेच्छिक दान से अलग लोभ अथवा भय के कारण दान की प्रथा ने धर्म के प्रति लोगों की आस्था कम करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
उपरोक्त दो महत्वपूर्ण बदलावों ने धर्म के स्वरूप को बदल दिया। प्रतिस्पर्धा ने धर्म के विघटन को बढ़ावा दिया जिससे कई शाखायें व उपशाखायें लगभग सभी धर्मों में स्थापित हो गई धर्म ने लगभग एक व्यापार का स्वरूप ले लिया। अपना व्यापार बढ़ाने के लिये ये प्रतिष्ठान विज्ञापन, प्रवेश शुल्क, विशेष पूजा व प्रसाद व अन्य उत्पादों की बिक्री से अपना व्यवसाय बढ़ाने में व्यस्त हैं।
इन बदलावों का ही परिणाम कि आज धर्म में मन से आस्था रखने वाले व धर्म के मूल सिद्धान्तों का पालन करने वाले लोग समाज में कम ही मिलेंगें। अधिकतर धर्मस्थलों में लोग या तो पर्यटक की तरह अथवा भेंट चढ़ाकर अपने पापों के बोझ से मुक्ति पाने के लिये ही जाते हैं।
धर्म अपने मूल उद्देश्य समाज में सामंजस्य, सद्भावना व सहयोग से बहुत दूर चला गया है यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक स्थलों में बढ़ती भीड़ के बावजूद आज भ्रष्टाचार, बेईमानी, अपराध. आतन्कवाद व अत्याचार की घटनायें रोज बड़ी संख्या में देखने सुनने को मिलते है।