वेद साहित्य (विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित)

वेद शब्द विद (ज्ञान) संज्ञा से बना है। इसमें संपूर्ण ज्ञान निहित माना जाता है। वेद संस्कृत भाषा का प्राचीन ग्रंथ है। मूलतः यह लिखित भाषा के उद्भव से पूर्व में श्रुति के रूप में उपलब्ध था जिसमें समय के साथ श्लोक जुड़ते गये। इस कारण इसे स्मृति भी कहा जाता है। महाभारत के अनुसार ब्रह्माजी ने इसे रचा था।
वेदों के चार अंग माने गये हैं। ये हैं –
1. संहिता – मंत्र
2. आरण्यक – बलि व बलि विधियाँ
3. ब्राह्मण – बलि विधियों की व्याख्यायें
4. उपनिषद – ध्यान, आध्यात्म व वैचारिक लेख
कुछ विद्वान पाँचवाँ अंग उपासना को भी मानते हैं।
वेद के श्रुति रूप का उद्भव अधिकतर पाश्चात विद्वान 1500 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानते है। यद्यपि कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार इसका उद्भव 7000 से 5000 वर्ष पूर्व का मानते है। वेदों का श्रुति अथवा स्मृति रूप वर्ष 1000 ई तक प्रचलित रहा ऐसा अनुमान है।
ताड़पत्रों व वृक्षों के तनों से निर्मित छाल पर लिखित होने के कारण लिखित पान्डुलिपि मुश्किल से 150-200 वर्ष तक ही संरक्षित रह पाती थी इसलिये इसकी पहली प्रति कब लिखी गई कहना मुश्किल है। संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वव्द्यालय में 1400 सदी की मूल प्रति उपलब्ध है। किन्तु नेपाल में 11वीं सदी तक की प्रतियाँ उपलब्ध है।
पुरातन विश्वविद्यालयों जैसे नालन्दा, तक्षिला व विक्रमशिला में वेदों व वेदान्गों (वेदों से जुड़े अन्य विषय) की शिक्षा दी जाती थी।
वैदिक साहित्य में चार वेदों के मूल रूप (संहिता) के अतिरिक्त आरण्यक (विभिन्न संस्कारों का वर्णन), ब्राह्मण (संहिता व अनुष्ठानों की विवेचना व विस्तृत वर्णन), तथा उपनिषद् (वेदों पर हुए सम्मेलनों की चर्चाओं का वर्णन) को भी माना जाता है।
वैदिक समय के श्रोता सूत्र व ग्राह्र सूत्र वैदिक साहित्य से अलग हैं किन्तु वैदिक संस्कृति का ही हिस्सा माने गये हैं।
कई उपनिषदों की रचना वैदिक काल (150 वर्ष ई. पूर्व) के बाद हुई है।
आजकल ऋगवेद का सिर्फ एक ही रूप उपलब्ध है जबकि साम, अथर्व व यजुर्वेद के कई रूप उपलब्ध है।
ब्राह्मण, आरण्यक व उपनिषद में संहिताओं की विवेचना व वाद विवाद के रूप में परम ब्राहृ व आत्मा की खोज का दार्शनिक वर्णन सम्मिलित है। यह हिन्दु धर्म की बाद की विचार धारा है। इससे प्रभावित होकर आदि शंकराचार्यजी ने वेदो को कर्म खन्ड व ज्ञान खन्ड की ओर मोड़ दिया।
बाद के वैदिक साहित्य में काफी अंश वैदिक काल के बाद के भी जोड़े गये हैं। मेक्समुलर के अनुसार वैदिक साहित्य को श्रुति व अन्य को स्मृति माना गया है। यह विभाजन स्पष्ट नहीं है, क्योंकि एक ही उपनिषद् के कई संस्करण मिलते है। ब्रााहृण आरण्यक व उपनिषद् का भेद भी समय के साथ क्षीण होता गया।
ऋगवेद –
ऋगवेद संहिता सबसे पुराना है, इसमें 1028 स्तोत्र है तथा 10600 श्लोक है। इन्हें दस मन्डलों में रखा गया है। स्तोत्र वैदिक देवताओं की स्तुतियाँ है। ये रचनायें सप्तसिन्धु (पंजाब) से लेकर उत्तर पश्चिम के भारतीय ऋषियों द्वारा कई शताब्दियों में पूरी की गयीं। अग्नि इन्द्र आदि देवताओं के स्तोत्र श्लोकों की घटती संख्या के आधार पर क्रम में रखे गये हैं। आरम्भ में देवताओं की प्रसंशा से बाद में विषय ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति के प्रश्नों की ओर मुड़ जाता है। ऋगवेद के पौराणिक विवरण, भाष्य व अनुष्ठान मध्य एशिया, इरान व हिन्दकुश (अफगानिस्तान) के साहित्य से काफी मिलते हैं। शायद इसलिये कि इन क्षेत्रों से विद्वान ज्ञान की खोज में भारत आते थे।
सामवेद –
सामवेद संहिता में 1549 पद हैं। केवल 75 मंत्रों को छोड़ कर सभी ऋगवेद से लिये हैं। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं, पहला राग संग्रह व दूसरा कविता संग्रह की तीन पुस्तकें (अर्सिका)। राग संग्रह अर्सिका का ही गायन रूप है। ऋगवेद के समान सामवेद अग्नि व इन्द्र स्तुति से आरम्भ होकर अमूर्त रूप में ऋगवेद के काफी निकट आ जाता है। श्रुति होने के कारण जल्दी स्मरण होने के लिये शायद इसे गायन रूप दिया गया है। इसमें कई कवितायें एक से अधिक बार लिखी हैं। कोथुमा या रनयानिया एवं जैमिनिया दो रूप ही बचे हैं जो पुजारियों द्वारा गायन के संग्रह हैं।
यजुर्वेद –
यजुर्वेद गद्य मंत्रों का संग्रह है। इस में अनुष्ठान करवाने वाले पंडितो के लिये निर्देशों व मंत्रों का संकलन है जो यज्ञ जैसे अनुष्टान के समय प्रयोग किये जाते थे। सबसे पुराने संकलन में 1875 अनुच्छेद हैं। यजुर्वेद संहिता की भाषा व विषय ऋगवेद से अलग है। यह वैदिक काल के अनुष्ठानों की जानकारी का प्रमुख श्रोत है। इसके कृष्ण व शुक्ल दो रूप हैं। कृष्ण रूप अव्यवस्थित जबकि शुक्ल रूप व्यवस्थित है। शुक्ल रूप में संहिता व ब्राह्मण (संहिता की व्याख्या) अलग अलग है। कृष्ण यजुर्वेद के चार (मैत्रयाणी, कथा, कपिश्थला कथा व तैत्रीय) तथा शुक्ल यजुर्वेद के दो (कण्व व मध्यांदिना) संकलन बचे हैं। यजुर्वेद के बाद के संकलनों में अनुष्ठानों का स्थान अधिकतर उपनिषदों ने ले लिया है जो अलग अलग हिन्दु धाराओं का आधार है।
अथर्व वेद –
अथर्व वेद संहिता अथर्वान व अग्निरस कवियों द्वारा रचित है। इसमें 760 स्तोत्र है, जिसमें से 160 ऋगवेद में भी है। अधिकतर स्तोत्र स्वरबद्ध हैं लेकिन कुछ गद्य में भी है। दो संस्करण पैप्पलदा व आनुक्या अभी बचे हैं। आरम्भिक वैदिककाल मैं इसे वेद नहीं माना गया था, बाद में ईसा से करीब 500 वर्ष पूर्व इसे वेद मान लिया गया (रचना के करीब 400-500 वर्ष बाद)। कुछ विद्वान इसे जादुई फार्मुले वाला वेद मानते हैं जिसे अन्य कई विद्वानों ने गलत बतलाया है। इसकी संहिताओं में तत्कालीन प्रचलित अन्धविश्वासों, राक्षसों द्वारा रोपित रोगों तथा जड़ी बूटियों से बनी दवाईयों की विधियाँ समाहित हैं। केनेथ जिस्क के मतानुसार धार्मिक दवाओं व लोक इलाज के उद्भव का यह सबसे पुराना अभिलेख है। अथर्ववेद संहिता की कई पुस्तकों में जादुई अनुष्ठान रहित दार्शनिक चिन्तन व ब्राह्मविद्या का वर्णन है। यह वैदिक काल की संस्कृति, रीति रिवाज, आस्थाओं, आकांक्षाओं व निराशाओं को दर्शाता है। राजा व शासन के दायित्व व परेशानियाँ भी इसमें सम्मिलित है। काफी ऋचायों में विवाह व दाह संस्कार का वर्णन हैं। इसमें संस्सकारों के अर्थ पर व्याख्या भी मिलती है।
वेदों की भाषा कठिन है, सभी के लिये इन्हैं समझना कठिन है। इन की भाषा टीका, सहित संहिताओं के वर्णन के साथ कल्पित कथायें, दर्शन व किवदंती ब्रााहृणों में मिलते है। हर स्थानीय वैदिक शाखा का अपना ब्राह्मण हुआ करता था। अब केवल 19 (2 रिगवेद, 6 सामवेद, 10 यजुर्वेद व 1 अथर्ववेद संबन्धी) ही बचे हैं। इनकी रचना 700 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानी जाती है। इनके विषयों में एक ही वेद के बारे में भिन्नता पायी जाती है।
आरणयक में अनुष्ठानों के वर्णन के साथ सांकेतिक अनुष्ठानों पर वाद विवाद व दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। कुछ विद्वान इसे वन में जाकर अध्ययन करने वाले ग्रन्थ मानते हैं तो अन्य वानप्रस्थाश्रम किये जाने वाले अनुष्ठानों की नियमावली मानते हैं।
उपनिषदों का केन्द्र ब्राहृ व आत्मा की खोज के दर्शन पर केन्द्रित है। इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इन्हें हिन्दू धर्म व संस्कारों का आधार माना जाता है। आरण्यकों को कर्म खंड व उपनिषदों को ज्ञान खंड भी माना जाता है।
ईसा से करीब 100 वर्ष पूर्व वेदांगो का उदय हुआ। इनका उद्देश्य उस समय के लोगों के समझने लायक बनाना था। वेदांगो के 6 विषय उच्चारण, छन्द गायन, व्याकरण, शब्द साधन (व्युत्पत्ति), भाषा विज्ञान, धर्म संस्कार व समय ज्ञान एवं खगोल विद्या थे। वेदांग का उद्भव वैसे तो वैदो के सहायक ज्ञान पाने के लिये हुआ था, किन्तु आगे चलकर यह कला, संस्कृति व हिन्दू दर्शन का आधार बन गया। उदाहरण स्वरूप कल्प वेदांग अध्ययन से धर्म सूत्र होता हुआ धर्म शास्त्र में परिवर्तित हो गया।
परिशिश्ट –
यह वेदों पर सहायक टिप्पणियाँ है जो वैदिक साहित्य का तार्किक व कालक्रम सहित विस्तार है। वैसे तो सभी वेदों के परिशिष्ट हैं किन्तु सर्वाधिक अथर्व वेद पर आधारित हैं।
उपवेद-
इन्हें वेदों के तकनीकी विषय का प्रायोगिक साहित्य माना जाता है। चरणव्यूह के अनुसार चार उपवेद हैं-
1. धनुर्वेद (ऋगवेद आधारित)
2. स्थापत्य (आर्किटेक्ट) वेद (यजुर्वेद आधारित)
3. गंधर्ववेद (नृत्य व गान) (सामवेद आधारित)
4. आयुर्वेद (अथर्ववेद आधारित)
कुछ वैदिक काल के बाद के साहित्य में नाट्य शास्त्र, महाभारत व पुराणों को पाँचवाँ वेद माना गया है। नाट्य शास्त्र के बारे में ऐसा माना जाता है कि शब्द ऋगवेद, गायन सामवेद, भंगिमा यजुर्वेद व भाव अथर्ववेद से लिये गयें हैं।
पुराण-
पुराण लोक कथाओं,किंवदंतियों आदि पर आधारित विविध विषयों का साहित्य है। सभी प्रमुख देवताओं जैसे विष्णु, शिव, देवी आदि के नाम पर 18 महापुराण व 18 पुराण हैं जिनमें 40000 से अधिक स्तोत्र हैं। इसमें भागवत् पुराण का हिन्दू धर्म में अत्यधिक प्रभाव है। पौराणिक साहित्य भक्ति आन्दोलन के साथ घुलमिल गया। द्वैत व अद्वैत दोनों विचार धाराओं में महा पुराणों की व्याख्यायें मिलती है।
पाशचात्य देशों में संस्कृत का अध्ययन सत्रहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में आर्थर शोपेनहाउर ने वेदों की (विशेषकर उपनिषदों) ओर ध्यान आकर्षित किया। संहिताओं का अंग्रेजी रूपान्तरण उन्नीसवीं सदी के अंत तक हो चुका था।
राल्फ टी एच ग्रिफिथ के अनुसार वेद सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जिसके लिये पश्चिम हमेशा पूर्व का ऋणी रहेगा।
पाशचात्य देशों व भारत के वैदिक अध्ययन में एक महत्व पूर्ण अन्तर यह है कि जहाँ भारतीय विद्वानों ने इसे आद्यात्मिक रूप से अध्ययन किया पास्चात्य विद्वानों ने विज्ञान के दृष्टिकोण से इनका अध्ययन किया।
संदर्भ
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वर्मा शिवराम आप्टे- दि प्रेक्टिकल डिक्शनरी, देखिये अपौरुषेय
डी शर्मा – क्लासीकल इन्डियन हिस्ट्री रीडर कोलम्बिया युनिवर्सिटी प्रेस आइबीएसएन पेज 196-197
विट्जेल, मिशाइल – वेदास एन्ड उपनिषदास इनः फ्लड 2003 पेज 69, 100-101
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एनेटी विल्के एन्ड ओलिवर मोबस – साउन्ड एन्ड कम्यूनिकेशनः एन एस्थेटिक कल्चरल हिस्ट्री आफ संस्कृत हिन्दुइज्म, वाल्टर डि ग्रुयटर, आइएसबीएन 9783110181593, पेज 381

हिन्दु धर्म

(इवाल्यूशन आफ हिन्दुइज्म इन इन्डिया, क्लाउस क्लोस्टरमायर,वन वल्र्ड आक्सफोर्ड पर आधारित)
हिन्दू धर्म किसने स्थापित किया यह ज्ञात नहीं है। जहाँ पश्चिम में हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली माना जाता है, भारत में इसे कई रूपों में देखा जा सकता है।
1. हिन्दु धर्म का उद्गम –
मूल रूप से यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता है। विदेशी लोगों ने इसे हिन्दू धर्म का नाम दिया। मूल रूप में यह सभी वस्तुओं को नियन्त्रित करता है, यह एक व्यापक व समय के साथ अपरिवर्तित नियमों का संग्रह है जो भारतीय समाज का निर्देशन करता है तथा जीवन के सभी पहलुओं का नियन्त्रण करता है। सामान्यतह यह माना जाता है कि 150 वर्ष बीसी में वैदिक आर्य भारत आर्कटिक सर्कल (स्केन्डीनेविया, उक्रेन, पर्सिया, टर्की आदि) से बसने के लिये आये। रिग्वेद की लिपि व जोरोस्ट्रियन एवेस्टा की भाषाओं में काफी समानता है। हाँलाकि रिग्वेद में पुरानी पीढ़ी के लोगों का बाहर से आकर बसने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हिन्दु धर्म के और अधिक पुराने होने के काफी सबूत मिलते है।
2. वेद हिन्दु ग्रन्थ –
हिन्दु धर्म का सर्व प्रथम विवरण श्रुति के रूप में मिलता है। ज्ञान को सिर्फ सुनकर व याद रख कर ही प्राप्त किया जा सकता था। यह ज्ञान भी सिर्फ ऋषि – मुनियों (रिग) तक ही सीमित था। कई हजार वर्षों बाद बाहरी आक्रमण के चलते वेदों को लिपि बद्ध किया गया। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में प्रमुख इस प्रकार है-
– संहिता – रिग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।
– ब्राह्मण – ऐत्रेय आसेवलण्या, तान्डव्य सदविम्सा, तैत्रयी सतपथ, गौपथ आदि।
– उपनिषद – ऐत्रेय, केनाचन्डोग्य, तैत्रयी ईशकथा, प्रश्नमुकुन्द आदि।
रिगवेद के मन्त्र बदले नहीं जा सकते हैं व उनका उपयोग बलि(यज्ञ) में होता है।
यजुर्वेद में यज्ञ विधि का वर्णन है।
सामवेद में वेद रिचाओं प्रभावशाली बनाने के लिये उच्चारण की विधि दी गई है।
अथर्ववेद में तन्त्र व अवतारों का वर्णन है जो यज्ञ से संबन्धित नहीं है।
– स्मृति – मनु, याग्यवल्क, विष्णु आदि
– इतिहास – रामायण व महाभारत
– पुराण 18 महापुराण
– वैष्णव पुराण (सत्व) विष्णु, नारद, भागवत्, गरूड़, पद्म व वराह।
– शैव पुराण (रजस) मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद व अग्नि।
– ब्रह्म पुराण (तमस) ब्राहृा, ब्राहृान्ड, ब्राहृवैवर्त, मार्कन्डेय, भविष्य व वामन।
3. वैदिक जीवन व्यवस्था –
एक हिन्दु अपने जीवन में वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करता है। सामान्य दैनिक
चर्या जैसे सूर्योदय के पहले उठना, नहाना, संन्ध्या व गायत्री जप करना, भोजन करने से पहले ईश्वर को अर्पित करना, गाय को भोजन देना तथा अतिथि को भगवान मानना आदि के अतिरिक्त जीवन की चार अवस्थायें परिभाषित की गई हैं।
– ब्रह्मचर्य – 6-8 वर्ष की आयु से लगभग 18 वर्ष तक गुरु आश्रम में ब्राहृचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना।
– गृहस्थाश्रम – प्रायः यह विवाह पश्चात आरम्भ होता है। यह समय सांसारिक धन (अर्थ व काम) अर्जन का है, किन्तु यह इमानदारी व नियमानुसार होना चाहिये।
– वानप्रस्थाश्रम – जब बच्चे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जाते हैं तब माता पिता परिवारिक जिम्मेदारियों से विरक्त होकर धार्मिक कार्यों में मन लगाने लगाते हैं।
– सन्यासाश्रम – इसमें लोग घर छोड़कर जंगल में तपस्या कर परलोक सुधारने के प्रयास में लग जाते हैं।
समाज को चार वर्णों में बाँटा गया था
ब्राह्मण – समाज के हित में वेदों का अध्ययन व अध्यापन करना तथा यज्ञ पूजा आदि करवाना। जीविका के लिये दान दक्षिणा पर निर्भर रहे हैं।
क्षत्रिय – ये योद्धा व शासक होते हैं, तथा समाज की रक्षा करते हैं। बदले में कर के रूप में दूसरों से धन या सेवा प्राप्त करते है।
वैश्य – ये कृषि, कारीगरी तथा व्यापार आदि से धन अर्जित करे है।
शूद्र – ये लोग अकुशल काम या उच्च वर्ग की सेवा कर बदले में कुछ दन अर्जित कर लेते है।
5. वैदिक रीतिरिवाज
यज्ञ (बलि)को आवश्यक माना जाता था। सबसे उत्तम बलि मनुष्य की मानी जाती थी। श्रोत सूत्र सैकड़ों जानवरों की सामूहिक बली के लिये प्रयोग किये जाते थे तथा व्यक्तिगत बलि के लिये गृहसूत्र का प्रयोग होता था। गर्भ में आने से मृत्यु तक सोलह संस्कार शरीर व जीवन की शुद्धता के लिये जरूरी बताये गये है। वैदिक रीति का मुख्य हिस्सा कर्ममार्ग है, कर्म का अर्थ बलि माना गया है। मीमान्सा में इसे न्याय संगत बताया गया है। ब्रााहृणों में बताया गया कि स्वर्ग प्राप्ति के लिये अग्निस्तोमा नामक यज्ञ जरूरी है। उपनिषदों में बलि की निन्दा की गई है तथा कर्मों को महत्ता दी गई है। मनुस्मृति में विभिन्न पापों के लिये अलग अलग योनियों में पुनर्जन्म का वर्णन है।
6. हिन्दु धर्म का सार
हिन्दु धर्म के मुख्य ग्रन्थ पुराण, गीता, महाभारत व रामायण माने जाते है। रिग्वेद में विष्णु (इन्द्र के छोटे भाई) को प्रमुख देव बताया गया है। इनके दस अवतार (मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिम्ह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि) माने गये हैं। हिन्दु धर्म में चार प्रमुख सम्प्रदाय है। श्रीनिवास या रामानुज, ब्राहृ या माधव, कुमार या निम्बारक और रुद्र या विष्णुस्वामी अथवा वल्लभ। शुरुआती मध्ययुग में भारत में शैव संप्रदाय प्रमुख हो गया था। मार्कन्डेय के शिवजनबोध में शिव सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार प्रमुख तत्व हैं। स्वामी (पति), बन्धनों में जकड़ा मनुष्य (पशु) व बन्धन (पाश)। बन्धन कर्मों, माया व अहं का है। इससे मुक्ति के लिये मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करना (विद्या), संस्कारों का पालन (क्रिया), तप (योग) व धार्मिक कार्य करना (कार्य) चाहिये। देवी पूजा हमेशा ही हिन्दु संस्कृति का हिस्सा रहा है। प्रकृति व देवी से हमेशा शक्ति को जोड़ा गया है साथ ही तन्त्र मन्त्र को भी।
7. हिन्दु दार्शनिक खोज
पुरातन काल से ही भारत अपने ज्ञान के लिये जाना जाता रहा है। पारसी, ग्रीक व रोमन यहाँ के साधु सन्यासियों से सीखने को आतुर थे। 18 वीं सदी में जब पहली बार अंग्रेजी में उपनिषदों का अनुवाद हुआ तो योरोपीय विद्वानों ने इन ग्रंथों की खूबसूरती को सराहा।
हिन्दु दार्शिकता की दो धारायें है –
आस्तिक – सान्ख्य योग, न्याय विशेषिका, व वेदान्त (पूर्व व उत्तर मीमान्सा)
नास्तिक – बौद्ध व जैन विचार धारा
8. योग दर्शन
सान्ख्य दुःखो के निवारण में सहायक है। इसके अनुसार पुरुष व प्रकृति (वस्तु) दोनों अलग हैं। इन दोनों का मिलन व्यक्ति को स्वयं की प्रकृति का आभास कराता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्, रज व तम) का हर व्यक्ति में असंतुलित समावेश होता है। सभी दुःखों का कारण ये असन्तुलन ही है। योग के आठ (यम, नियम, आसन, प्रामायाम, प्रत्याहार, ध्यान व मोक्ष) रूपों के पालन से व्यक्ति प्रकृति के आकर्षण से मुक्त हो सकता है।
9. शंकराचार्य व उनका अद्वैत वेदान्त
उपनिषद विशेषकर भद्रायण के वेदान्तसूत्र में काफी बिखरे हुए वाक्यों में है। इनको समझने के लिये व्याख्या करना जरूरी है। 9वीं और 14वीं शताब्दी के बीच वेदान्त की दस शाखायें विकसित हुई, जिनकी स्वयं की व्याख्या (भाष्य व टीका) है। इनमें प्रमुख चार हैं –
– शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त
– रामानुजाचार्य का विशिष्ट वेदान्त
– माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
– वल्लभाचार्य का पुष्टि मार्ग
आदि शंकराचार्य (788- 820 बीसी) हिन्दु धर्म को बुद्ध धर्म के समानान्तर परिभाषित किया। उन्होने जगत को माया नहीं माना। उनके अनुसार ईश्वर के दो रूप थे। एक जिसकी हम पूजा करते हैं (सगुण)। दूसरा परम शक्तिमान निराकार (निर्गुण)। उनके द्वारा रचित विवेक चूड़ामणि के अनुसार बन्धन या मुक्ति स्वयं के मस्तिष्क पर निर्भर है।
मुक्ति के लिये ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत है जिसे सदाचरण, सुखों के त्याग व मुक्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा से ही पाया जा सकता है। आजकल चार शंकराचार्य पीठ (मठ) हैं।
10. कई लोग शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त को बौद्ध धर्म का छिपा रूप मानते थे। 9वीं शताब्दी में श्रीरंगम में नाथमुनि ने तमिल प्रबंधन के भक्त कवियों (अल्वर) को मान्यता देकर उनके गीतों को को पूजा में उपयोग करने की स्वीकृति देदी। पिता द्वारा विरासत में मिली पंकार्ता (पूजा विधि) व इन भक्तिगीतों ने भविष्य के अधिक रूढ़ि वादी श्रीनिवास पन्थ की नींव रखी। उनके विद्वान पौत्र ने कई ग्रन्थों की रचना कर वैष्णव वेदान्त को संगठित किया। अपनी मृत्यु शैया पर रामानुजाचार्या को बुलाकर अपनी तीन इच्छायें पूरी करने का वचन लिया। ये थीं व्यास व परसुराम (विष्णु पुराण के रचियता) मुनियों की प्रतिष्ठा पुनस्र्थापित करना, नम्मालवर (प्रमुख अलवर) के गीतों को जीवित रखना व ब्राहृसूत्र की व्याख्या करना। श्रीरंगम में रामानुजाचार्य ने कई सुधार व पूजा विधि का पुनर्गठन किया। वैष्णव संप्रदाय के विस्तार में उन्हें शैव राजा के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें भागकर मैसूर जाना पड़ा जहां का शासक उनका शिष्य बन गया। बाद में श्रीरंगम लौट कर श्रीरंगम के आचार्योंकी वैषणव वेदान्त मठाधीषों के रूप में स्थापना की। वे 120 वर्षों तक जीवित रहे व ब्राहृसूत्र की आधिकारिक व्याख्या लिखी। उन्होंने वैष्णव मंदिरों पूजा विधि निर्धारित की। आज श्रीनिवास समुदाय कापी बड़ा है तथा दो केन्द्रों में विभाजत है। कान्चीपुरम दक्षिण क्षेत्र के लिये व श्रीरंगम उत्तर क्षेत्र के लिये।
11. माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
माधवाचार्य जी (1238-1317) का जन्म उडीपी गाँव में हुआ। वे पहले अद्वैत वेदान्त के शिक्षक अच्युतप्रेक्षा के शिष्य बने। बावजूद प्रायः मत भिन्नता के वे गुरू का आदर पाने में सफल रहे व उन्हें आनंदतीर्थ नाम मिला। रामानुजाचार्य से अलग उन्होनें स्वयं का द्वैत वेदान्त स्थापित किया। मनुष्य व परमेश्वर में उन्होनें पाँच मुख्य अन्तर बतलाये। दोनों के बीच बिम्ब प्रतिबिम्ब का संबन्ध माना। परमेश्वर मूल रूप है, तथा मनुष्य उसका परावर्तित रूप है। अज्ञान ही बन्धन का कारण है तथा ईश्वर ही उससे मुक्ति दिला सकता है। वे एक प्रभावी लेखक थे तथा रिग्वेद व महाभारत के एक भाग की व्याख्या की। वे विष्णु के प्रबल समर्थक थे तथा विरोधी उनसे भय खाते थे।
12. वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग
वल्लभाचार्य (1481-1533) एक तेलगु ब्रााहृण थे, उन्होंने एक नये वैष्णव वेदान्त पुष्टिमार्ग की स्थापना की। वे भागवत् पुराण को नयी उचाँईयों तक ले गये। उनका मानना था कि संन्यास का अत्यधिक पतन हो चुका है, तथा पूजा पारिवारिक माहौल में की जानी चाहिये। उनके उपदेश का सार था कि ईश्वर की प्रसन्नता के कारण को जाना जा सकता है। पुष्टिमार्ग उदार व सबके लिये खुला है। इसमें ईस्वर के साथ को आनंददायी माना
गया है, तथा नाथ जी (मूर्ती जो वल्लभाचार्य को गिरिराज में मिली थी) की सेवा में विश्वास किया जाता है। बाद में वेदान्त का ज्ञान क्षीण होकर केवल गुरु विशेष की संस्था, पूजा विधि व प्रेरक भक्ति साहित्य का महत्व रह गया।
13. हिन्दु धर्म का अन्य धर्मों से सामना
स्वयं से अलग हुए धर्मों जैसे बौद्ध व जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दु धर्म को 14वीं शताब्दी से मुस्लिम आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अलग हुए धड़ों से मुकाबला जहाँ केवल बहस तक सीमित था, मुसलमानों ने जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने कई मन्दिरों को नष्ट किया तथा उँचे पद सिर्फ मुसलमानों को दिये। हालाकि बाद में अकबर ने हिन्दुओं को बराबर का
स्थान देने का प्रयास किया, लेकिन हिन्दुओं ने अपने को घेरा हुआ पाया फलतः वे कठोर व अन्तर्मुखी हो गये। 15वीं सदी के अन्त तक यूरोप के लोंगों के आक्रमण शुरू होने पर उसे क्रिश्चन मिशनरियों से सामना हुआ। 1857 में ब्रिाटिश साम्राज्य में आने से मिशनरी गतिविधियाँ (प्रोटेस्टेन्ट) काफी बढ़ गई। मिशनरी स्कूल खोले गये क्रिश्चन साहित्य का भारतीय भाषाओं में हुआ तथा चर्चों में धर्म परिवर्तन सभायें होने लगी। उस समय धर्म परिवर्तन साफ तौर पर लाभकारी था तथा ईसाइयों की संख्या लगातार बड़ने लगी। कुछ हिन्दुओं को ईसाइ धर्म की कुछ बातें अच्छी लगी और वे अपनी परंपरा बदलने लगे। राजा राम मोहन राय(1772-1833) ने सती प्रथा उन्मूलन व विधवाओं के जीवन सुधार आरम्भ किया। दयानंद सरस्वती ने ईसाइ धर्म का खुलकर विरोध किया व आर्यसमाज की स्थापना की।
14. पश्चिम सभ्यता का हिन्दु धर्म की प्रतिक्रिया
जहाँ राजा राममोहन राय व महात्मा गाँधी ने पश्चिम विचारधारा के कई बिन्दुओं को स्वीकार किया, सामान्य प्रतिक्रिया उसके विरुद्ध ही थी। राजा राममोहन राय ने पटना के मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी व कम्पनी की नौकरी की वे अपने वैष्णव पिता से अलग हो गये। उन्होंने स्वयं को हिन्दु धर्म के सुधार के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों को बढ़ावा देकर विज्ञान की शिक्षा पर बल दिया। रामकृष्ण परमहंस (1834-1886) गरीब ब्रााहृण परिवार में जन्मे थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगा तथा पिता व भाई की मृत्यु उपरान्त वे काली मठ में पुजारी बन गये। वे देवी के अनन्य भक्त बन गये जनेऊ त्याग कर वे अछूतों में देवी का रूप देख कर उन्हें गले लगाने लगे। उनका सभी धर्मों में विश्वास था तथा उनके उपदेश का केन्द्र था कि ईश्वर ही सब कुछ करता है। धीरे धीरे उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने विवेकानंद में नारायण का रूप देखा जो लोंगो का दुःख दूर करे के लिये आये हैं। उन्होंने विवेकानंद के शरीर पर अपना पैर रखकर उनको ईश्वर के दर्शन की शक्ति दी। बेरोजगारी से परेशान विवेकानंद ने अनुभव किया कि ईश्वर द्वारा दी गई वस्तु, प्रेम, न्याय व दुःख सभी के लिये संसार में अपना स्थान है। उन्होंने अपना जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया।
तीर्थ यात्रा के दौरान कन्याकुमारी में उन्हें समझ में आया कि आजकल के संन्यासी को व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिये जिससे समाज का भला हो सके। इस प्रकार सामाजिक उत्थान के साथ व्यवहारिक शिक्षा के विचार की शुरुआत हुई। 1893 में शिकागो की विश्व धर्म सबा में में अमेरिकन बन्धुओं से अनुरोध किया कि वे भारत में मिशनरी के स्थान पर अध्यापक व तकनीकी विशेषज्ञ भेजे। अपने भाषण के बाद वे सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने गये। फोर्ड की सहाया से स्थापित रामाकृष्ण सान्स्कृतिक केन्द्र में लगातार सम्मेलन व सभायें होती रहती हैं। महातमा गाँधी ने भी ने पश्चिम विचारधारा से प्रभावित होकर छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष किया। वे स्त्रियों के मनोबल व आध्यात्मिक शक्ति में बरोसा रखते थे। इन सभी ने भीतर रह कर ही हिन्दु धर्म में सुधार लाने का प्रयास किया।
उसके उपरान्त हिन्दु धर्म का राजनीति करण शुरू हो गया और वह एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरा। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1909 में पहली हिन्दु राजनीतिक पार्टी हिन्दु
महासभा का गठन किया जो मुस्लिमों की कट्टर विरोधी थी। जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टी दूसरी बड़ी हिन्दु पार्टी है। इसके अतिरिक्त 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 1964 में विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल आदि आक्रमक संगठन बन गये।
16. हिन्दु धर्म के आधुनिक चेहरे
रमन महर्षि(1879-1950), अरविन्दो घोष (1872-1950), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888- 1975), भक्त वेदान्त स्वामी (1896-1977, इस्कान के संस्थापक), श्रीकृष्णप्रेम वैरागी (1895-1965), सत्य सांई बाबा (1926-2011), आनन्दमयी माँ (1896-1983) आदि आधुनिक नाम है जिनके काफी अनुयायी रहे है।
17. हिन्दु धर्म के लिये आज की चुनौती
आज हिन्दु धर्म केवल रस्मों तक सीमित रह गया है। अधिकतर संत व पुजारी ब्राहृ ज्ञान त्याग कर सान्सारिक सुखों में लिप्त रहते हैं। लोग देवी देवताओं की पूजा भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिये करते हैं। ब्राहृ की अथवा स्वयं की खोज की ओर प्रेरित करना ही आज की हिन्दू धर्म के लये सबसे बड़ी चुनौती है।