हमारे भविष्य का आकलन

 

जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है। जिज्ञासा ही विकास का आधार है। इसी जिज्ञासा के चलते हम आज इस मुकाम तक पहुँच पाये हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य में भविष्य के प्रति उत्सुकता रही है। भविष्य जानने की ललक ने ही ज्योतिष, जन्म कुन्डली, हस्त रेखा शास्त्र, न्यूमरालाजी, टेरा कार्ड आदि जैसी कई विधाओं को जन्म दिया। वैज्ञानिकों ने इन विधाओं को पूरी तरह भले ही न स्वीकारा हो, किन्तु विश्व भर में जन मानस पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा है। वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य ही है अतः उन्होंने भी भूत व भविष्य जानने की विधियाँ खोज ही निकाली। विज्ञान में भरोसा रखने वाले इन विधियों का प्रयोग इतिहास, व्यापार व सामाजिक विषयों पर बड़े विश्वास के साथ करते हैं। आईये हम जानने का प्रयास करते हैं कि विज्ञान में विश्वास रखने वाले सामाजिक चिन्तको के अनुसार २०५० में हम कहाँ होगे ?

 १. लोगों का आकलन     

२०१० में पी आर सी (पीइडब्ल्यू रिसर्च सेन्टर) व स्मिथसनियन पत्रिका ने अमेरिका वासियों से किये गये सर्वे में लोगों ने बताया –

  • अधिकतर लोगों ने विज्ञान में उन्नति जारी रहने की बात कही। ८० प्रतिशत लोगों का मानना था कि कम्प्यूटर मनुष्य की तरह बोलने लगेगें।
  • ७०प्रतिशत लोगों का मानना था कि केन्सर का इलाज खोज लिया जायेगा।
  • ६६प्रतिशत लोगों का मानना था कि नकली अंग असली जैसे कार्य करने लगेगें।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि स्पेस यात्रा ४० सालों में सबके लिये सुलभ हो जायेगी।
  • इसके अलावा अधिकतर लोगों का मानना था कि लुप्त प्रजातियोँ को वापस ले आया जायेगा व अन्य ग्रह पर जीवन खोज लिया जायेगा।
  • ४८ प्रतिशत लोगों का मानना था आदमी की नकल बनाई जा सकेगी।
  • ४० प्रतिशत लोगों के अनुसार विचार पढ़ने की तकनीक विकसित हो जायेगी।
  • उर्जा के बारे में अधिकतर लोगों का मानना था कि उर्जा का नया स्रोत खोज लिया जायेगा।  ७२ प्रतिशत लोगो ने उर्जा को गहरी समस्या बताया।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि एक और विश्व युद्ध हो सकता है।
  • भविष्य के बारे में चिन्ता करने वाले लोगों की संख्या १९९९ के १९ प्रतिशत क मुकाबले बढ़कर ३६प्रतिशत हो गई।

२. जनसंख्या

२०५० तक संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि पृथ्वी पर ९.१अरब लोग होगें।यह अनुमान इस तथ्य पर आधारित है कि वर्तमान में जनसंख्या १२ वर्षों में १ अरब बढ़ रही है। जनसंख्या सभी देशों में एक सी नहीं बढ़ कर कुछ देशों मे आबादी काफी घनी हो सकती है। उदाहरण के लिये अफ्रीका की आबादी २ अरब तक पहुँच सकती है। यह सौ वर्षों में लगभग नौ गुना बढ़ौतरी है।

देश परिवर्तन एक गंभीर समस्या बन जायेगी। केनेथ जानसन, न्यू हेम्पशायर विश्व विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर के अनुसार २०५० तक अमेरिका अल्पसंख्यक बहुलता वाला देश बन जायेगा। दि टेलीग्राफ ने एक लेख के माध्यम से बताया कि प्रवासियों के कारण यूरोप पूरी तरह से बदल जायेगा। यह एक टाइम बम है जिसे राजनेता ध्यान नहीं दे रहें।

इसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पढ़ेगा। कुछ देशों जैसे नीदरलेन्ड में इसका प्रभाव दिखने लगा है। यहाँ मुस्लिम विरोधी नेताओं का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।

३. पानी की समस्या:

बढ़ती जनसंख्या के लिये पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या होगी। भारत ने अनुमानित खपत दुगुनी हो जाने के हिसाब से प्रबन्ध करने के प्रयास आरम्भ कर दिये हैं। इन्टरनेशनल वाटर एण्ड सेनीटेशन सेनटर के अनुसार अरब देशों में समस्या गंभीर रहेगी।माइक हाईटावर व सुज़ाने पियर्स जो जल विशेषज्ञ है के नेचर में प्रकाशित लेख के अनुसार पानी की उपलब्धता अर्थव्यवसथा के लिये विशेष जरूरत होगी। पानी की पीने के साथ ही उद्योग, कृषि, उर्जा व खनन में बड़ी मात्रा में जरूरत होती है। सरकारों को पानी के सही उपयोग व उचित प्रबन्धन पर ध्यान देना जरूरी है।

४. भौजन की समस्या

९ अरब लोगों के भोजन का प्रबन्ध करना एक बड़ी समस्या बन जायेगी। आज भी करीब १ अरब लोगों को जरूरत के अनुसार भोजन नहीं मिल पाता है। अगले करीब २५ वर्षों खाद्य उत्पादन में लगभग ७० प्रतिशत वृद्धि की जरूरत होगी जो एक कठिन लक्ष्य है। हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि यह संभव हो पायेगा।यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सभी देशों को कृषि क्षेत्र में निवेश व शोध करने की जरूरत है। विकसित व खाद्य बाहुल्य देशों को जरूरत मन्द देशों की सहायता के लिये तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ेगी। भोजन की कमी का सर्वाधिक असर बच्चों के विकास पर पड़ेगा।

 ५. वातावरण

वातावरण संबंधी कई समस्यायें जैसे उजड़ते जंगल, घटती खेती की जमीन, शहरी करण, वायु एवं जल प्रदूषण, कचरा निष्पादन, व मौसम मे तेज बदलाव मनुष्य के लिये गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले मानसूनी जंगल (जो आक्सीजन पैदा करते हैं) आज करीब १.६.एकड़ प्रति सेकन्ड की दर से खत्म हो रहे हैं।

६. सामाजिक समस्यायें:

यह अन्दाजा लगाना मुश्किल है कि अपराधों जैसे चोरी डकैती हत्या या महिलाओं से छेड़छाड़ आदि में कितनी बढ़ौतरी होगी। महामारी जैसी बीमारी फैलने से प्रभावितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की संभावना हो सकती है। तकनीकि विकास आर्थिक अपराधों की गंभीरता बड़ा सकता है। विश्व युद्ध यदि हुआ तो महाविनाशकारी होगा। अब तक की सामाजिक पतन की दशा देखकर तो यही लगता है कि समाज पतन के गर्त की ओर बढ़ता रहेगा।  ७. उम्मीद की किरण :

इन सब समस्याओं के बीच उम्मीद की एक चमकीली किरण नजर आती है वो यह कि मनुष्य हमेशा बदलाव की ओर आकर्षित हुआ है। शायद अगल २५ वर्षों में बुराइयों से ऊब कर अच्छाईयों को अपनाले व समाज में पुनः आपसी प्रेम व भाईचारा स्थापित हो जाये। फिलहाल तो हमें ऐसा ही मान लेना  चाहिये।

 

 

 

 

ए मेरे वतन के लोगों

26 जनवरी 13 को सवेरे दूरदर्शन पर बताया कि लता जी द्वारा 1963 में सीमा पर गाये हुए इस गाने ने 50 साल पूरे किये। यह गाना देश प्रेम का प्रतीक बन गया है। प्रायः हर राष्ट्रीय पर्व पर यह सुनने को मिल जाता है। यह गाना सुनकर आज भी सीमा पर तैनात सैनिकों के लिये हर देशभक्त नागरिक का मन सम्मान से भर जाता है। लेकिन मेरे मन को इस बार इस गाने ने देश की दशा पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि 66 वर्षों की स्व सत्ता में हम किस मुकाम पर आ पहुँचे हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इन 66 वर्षों में हमने आर्थिक, विज्ञान, कृषि, कला व इन्जीनिरिंग आदि क्षेत्रों तेजी से प्रगति की है। और इस प्रगति का लाभ अधिकांश जनता तक पहुँचा भी है। पिछले कुछ सालों में प्रायः हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार व बेईमानी ने जिस प्रकार पाँव पसारे हैं इस कारण आज प्रायः हर देशभक्त भारतीय अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। नैतिक मूल्यों का यह पतन सारी प्रगति पर ग्रहण के समान है।
पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े बड़े घोटाले उजागर हुए जिनमें सरकार के प्रतिनिधियों की संलिप्तता संन्देह के दायरे में आई। सदनों में इन मुद्दों पर हंगामेदार चर्चायें हुई कुछ मंत्रियों ने त्यागपत्र दिये तो कुछ ने अपने को देने से बचा लिया। हाल ही के कुछ वर्षों में महिलाओं की अस्मिता पर हमले की जैसे बाढ़ आ गई। इसमें भी कुछ नेतागण सदन में अश्लील एमएमएस देखते पकड़े गये तो कुछ नेताओं की रंगरेलियों की सीडी मीडिया में प्रचलित पाई गर्इं।संसद में प्रश्न पूछने के लिये सांसद पैसे लेते हैं। समाचारों पर भी विश्वसनीयता कम होती जा रही है। दलित व अशक्त लोगों पर अत्याचार, हत्यायें व लूटपाट तो आज देश में आम बात है। समाचार चेनलों पर प्रायः सुनने को मिलता है कि करीब करीब सभी पार्टियों से गंभीर अपराध से आरोपित लोग सदन में चुनकर आगयें है, और इनकी संख्या लगभग 30-35 प्रतिशत तक पहुँच चुकि है। नैतिक मूल्यों का यह पतन आज की एक गंभीर समस्या है।
इस नैतिक अवमूल्यन की जिम्मेदार यदि कोई है तो सिर्फ राजनीतिक पार्टियाँ ही हो सकती है फिर वह राष्ट्रीय स्तर की हों अथवा प्रादेशिक स्तर की। सभी पार्टियाँ आज जोड़ तोड़, जातिवाद, भाई भतीजा वाद, साम्प्रदायिकता,धनबल अथवा बाहुबल द्वारा सत्ता हथियाने में व्यस्त हैं। इस प्रकार बनी हुई सरकार से लोग नैतिक आचरण की आशा भी कैसे कर सकते हैं। पिछले वर्ष एक नई आशा की किरण के रूप में अन्ना जी व उनकी टीम ने जन जागरण का काफी हद तक सफल प्रयास किया। लेकिन राजनेताओं ने पूरी ताकत लगा कर आन्दोलन के अग्रणी सदस्यों पर लांछन लगा कर व फूट डाल कर उसे कमजोर कर दिया है। लेकिन यह आन्दोलन देश की जनता व विशेष तौर पर युवाओं को जाग्रत करने में अवश्य ही सफल रहा है। यह इसी का परिणाम था कि दिल्ली में पिछले दिनों एक युवती पर बर्बर हादसे का विरोध करने व न्याय दिलाने के लिये ये युवा स्वतः ही सड़कों पर कई दिनों तक ठिठुरती सर्दी में भी डटे रहे।
युवाओं में आयी यह जाग्रति देश की दशा बदलने में सक्षम है।
प्रजातन्त्र में सत्ता वास्तव में जनता के हाथ में होनी चाहिये लेकिन आज ये राजनीतिक पार्टियों की बन्धक बन कर रह गई है। आज के जागरुक युवा यदि ठान लें तो परिस्थिति में बदलाव ला सकतें है और देश को पार्टियों के मकड़ जाल से मुक्त करा सकते है। आवश्यकता सिर्फ एक प्रयास करने भर की है।
इस वर्ष कुछ राज्यों में व अगले वर्ष केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। युवाओं को चाहिये कि ये इस अवसर का उपयोग एक क्रान्तिकारी बदलाव लाने के लिये करें एवं प्रजातन्त्र को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करें। आज का युवा संचार माध्यम के द्वारा तेजी से आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम है। शक्ति एवं जोश की उसमें कमी नहीं है। अपनी इसी ताकत को वे चुनाव क्रान्ति के रूप में बदल सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि उन्हें हर विधान सभा व लोकसभा के लिये एक इमानदार उम्मीदवार की पहचान करने की। इस उम्मीदवार का चयन बिना किसी जाति,सामाजिक स्तर अथवा गाँव शहर से संबद्धता पर विचार किये बिना अपने क्षेत्र में एक अच्छी छबि व स्वीकारिता के आधार पर ही हो। युवा ही उसके लिये प्रचार करें। प्रचार भी शोर रहित व्यक्तिगत स्तर पर हो। और युवा ही क्षेत्र के मत दाताओं को वोट के लिये निकलने के लिये प्रेरित करें। ये उम्मीदवार निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ें जिसका सिर्फ एक पाइन्ट एजेंडा हो वह सही मायनों में प्रजातन्त्र के मूल्यों की पुनस्र्थापना। आज जिस प्रकार का आक्रोश जन मानस में है उससे इस तरह के प्रयास को जनता का साथ मिलने की पूरी संभावना है। यदि युवा अपने प्रयास में
सफल होते हैं तो यह देश के लिये दूसरी आजादी होगी।

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद, द साइन्स आफ सेल्फ हीलिंग, डा. बसंत लाड़ पर आधारित)

आयुर्वेद एक प्राचीन व प्रभावी भारतीय चिकित्सा पद्धति है। यह न केवल रोगों को ठीक करने के लिये बल्कि एक स्वस्थ एवं सुखमय जीवन शैली का साधन भी हो सकती है। यह निम्न लिखित सिद्धान्तों पर आधारित है।
1. शरीर पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश (ईथर) से बना है।
2. शरीर में तीन प्रकार के दोष हो सकते हैं। ये हैं वात (वायु व ईथर), पित्त (जल व पृथ्वी) व कफ (जल व अग्नि) । हर शरीर में इन तीनों का अनुपात जन्म के समय ही निर्धारित हो जाता है, जिसे प्रकृति कहते है। यह अनुपात ही व्यक्ति का गुण व स्वभाव निर्धारित करता है। निर्धारित अनुपात का असंतुलित हो जाना ही रोगों को जन्म देता है। ये दोष व्यक्ति के शरीर व मन को अलग अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं। संक्षेप में ये प्रभाव निम्नानुसार हैं।
वात – ये मानसिक तंत्र, श्वास तंत्र, इन्द्रियाँ, रस प्रवाह, शरीर संचालन आदि को संचालित करता है। इसके प्रमुख गुण ठंडा, हल्का, अस्थिर, अनियमित, सूखा खुरदरा आदि हैं। इसके बढ़ने से मानसिक तनाव, रक्तचाप, गैस व व्याकुलता बढ़ जाती है। जबकि इसकी कमी मानसिक शिथिलता, कब्ज, रक्त संचय व विचार शून्यता पैदा करती है। वृद्धावस्था मे प्रायः यह बढ़ जाता है।
पित्त – यह पाचन रस (बाइल) को पाचन क्रिया व मेटाबोलिस्म (रस प्रक्रिया) के लिये प्रयोग करता है। इसका संबंध शरीर के तापमान, भूख, प्यास, बुद्धि, अनुभूति, क्रोध, घृणा व ईर्षा से है। यह एन्जाइम्स व हारमोन्स को नियन्त्रित करता है। इसके प्रमुख गुण गर्म,हल्का, तरल, नरम, साफ, रहस्यपूर्ण, तीक्ष्ण व बदबूदार हैं। इसके बढ़ने से छाले, हार्मोन्स का असंतुलन, खुजली, व परेशान करने वाले भाव पैदा होते हैं। इसकी कमी कमजोर पाचन, धीमे मेटाबोलिज्म व समझने की शक्ति में कमी का कारण होती है। 14 से 30 वर्ष की उम्र में इसकी बहुलता रहती है।
कफ – इसका संबंध माँस पेशियों की चिकनाई व पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों में पहुंचाने से है। यह उर्जा संतुलन, शारीरिक चिकनाई, लालच, क्षमा करने की आदत, लगाव, पाने अथवा हावी होने की इच्छा को नियन्त्रित करता है। यह अंगो को पोषित करने वाले द्रव व अंगो बनाने वाली कौषिकाओं का निर्माण करता है। इसके प्रमुख गुण तैलीय, ठंडा, भारी, स्थिर, गाढ़ा व चिकना हैं। इसके बढ़ने से कफ पैदा होता है व घटने से श्वास नली में सूखापन और पेट में जलन होती है।
बचपन में इसकी बहुलता रहती है।
स्वयं के दोष व प्रकृति में व्याप्त वस्तुओं के इन्हीं तीन दोषों का पारस्परिक प्रभाव एक जैसे लोगों का एक ही परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया का कारण है।
3. शरीर में रस, रक्त, माँस पेशियाँ, वसा (फेट), मज्जा (मेरो), अस्थि व शुक्र सात धातुएें होती हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में द्रवों के बहने के लिये तन्त्र होते है जिनहें श्रोत कहते है। उदाहरण स्वरूप प्रानवाह श्रोत, रसवाह श्रोत,रक्तवाह श्रोत आदि।
4. आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति (स्वभाविक गुण) व विकृति ( दोषों के पारस्परिक प्रभाव से आये गुणों में बदलाव) मिलकर स्वास्थ का निर्धारण करतें है। चिकित्सा से पहले प्रकृति व विकृति की जानकारी जरूरी है। यह जानकारी चिकित्सक द्वारा संबन्धित प्रश्न पूछ कर एकत्र की जाती है। विकृति की जानकारी रोग की स्थिति व निहित दोष असंतुलन से जानी जाती है। चिकित्सा का उद्देश्य संतुलन को पुनर्स्थापित करना है। संतुलन बनाये रखना हमारे हाथ में और यही स्वस्थ व सुखी जीवन का आधार है।
5. आयुर्वेद के सिद्धान्त हमें संतुलन बनाये रखने में मार्ग दर्शक का कार्य करते हैं। प्रायोगिक तौर पर हम भोजन, दिनचर्या, तनाव प्रबन्धन तकनीक एवं व्यायाम द्वारा अपने स्वास्थ को नियन्त्रित कर सकते है।
पुरुष व प्रकृति उर्जा के रूप हैं। पुरुष नर शक्ति तथा निर्गुण है, जबकि प्रकृति सगुण। ब्राहृाण्ड प्रकृति की उपज (संतान) है। प्रकृति जन्म देती है जबकि पुरुष इन रचनाओं को उर्जा प्रदान करती है। यह उर्जा सत्व (सुगंध), रजस (गतिविधि) व तमस (जड़ता अथवा इनर्शिया ) तीन प्रकार की होती है। ये तीन उर्जायें जीवन का आधार हैं। प्रकृति में ये संतुलित स्थिति में रहती हैं। इनका संतुलन बिगड़ने पर ये तीनों गुणों के आपसी टकराव से ब्राहृाणड के नष्ट होने की स्थिति आ सकती है। यह विकृति सबसे पहले अंहकार के रूप में प्रगट होती है जो सत्व से मिलकर पाँच इन्द्रियों व पाँच प्रचालन अंगों में आरगेनिक संसार बनाती है। यही अंहकार तमस के साथ मिलकर पाँच भूतों में इनआर्गेनिक संसार बनाती है। रजस उर्जा इन्हें आपस में मिलाने का कार्य करती है। इस प्रकार सत्व व तमस पोटेन्शियल उर्जा हैं जिन्हें कायनेटिक क्रियाशील उर्जा की आवश्कता होती है। हम सत्व को ब्रह्मा (उत्पादक), रजस को विष्णु (पालन कर्ता) व तमस को महेश (विनाश कर्ता) कहते हैं।
5. आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य में धार्मिक, वित्तीय, सृजन व स्वतन्त्रता ये चार प्रवत्तियाँ होती हैं। इन्हें प्राप्त करने का आधार संतुलित स्वास्थ्य है। आयुर्वेद, योग व तन्त्र को भारत में सदियों से इसके लिये अपनाया गया है। आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। योग स्वयं को जान कर सत्य तक पहुँचने का साधन है। तन्त्र उर्जा को नियन्त्रित करने का साधन है। तीनों साधन मनुष्य को दीर्घ आयु, ताजगी व स्वयं को जानने में सहायक हैं। इन तीनों को साधकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचना हर व्यक्ति के लिये संभव नहीं है। किन्तु आयुर्वेद की सहायता हर व्यक्ति स्वस्थ व दीर्घायु हो सकता है। मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के संदर्भ में आयुर्वेद को आधार, योग को शरीर व तन्त्र को मस्तिष्क माना गया है, इस प्रकार ये आपस में एक दूसरे पर निर्भर है।
6. ईथर, वायु, अग्नि, जल, व पृथ्वी ये तत्व क्रमशः श्रवण (जीभ, स्वर तन्त्रि व मुँह), छूने (चर्म व हाथ), देखने ( आँखें व पैर), स्वाद (जीभ व जननांग) व गंध ( नाक व मल मार्ग) की इव्द्रियों से संबंध रखते हैं। वात पित्त व कफ हर प्रकार की शारीरिक व मानसिक गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। सात प्रकार की शारीरिक संरचनायें वात, पित्त, कफ, वात-पित्त, पित्त-कफ, वात-कफ व वात-पित्त-कफ होती हैं। इन सात मूल संरचनाओं के कई रूप सूक्ष्म प्रतिशत से परिवर्तित हो सकते हैं, इस कारण गुणों में विविधता आ जाती है।
7. वात्त प्रकृति वाले व्यक्ति – पित्त प्रधान व्यक्तियों का शरीर कम विकसित रहता है। उनका सीना सपाट व नसें व धमनियाँ दिखाई देती हैं। उनका रंग गेहुँआ, त्वचा ठंडी, खुरदरी, सूखी व पटी हुई होती है। वे न बहुत अधिक नाटे न अधिक लम्बे होते हैं। वे दुबले व उभरे अस्थि जोड़ वाले होते हैं। उनके कम व काले तिल, कम व घुंघराले बाल होते हैं एवं पलकें पतली व नेत्रों में चमक नहीं होती है। उनकी आँखें छोटी, धंसी हुई व सक्रिय एवं पुतलियाँ सूखी व धुधंली होती हैं. उनके नाखून भुरभुरे व खुरदरे होते है, नाक मुड़ी हुई व उपर उठी हुई होती है। उनकी भूख व पाचन शक्ति बदलती रहती है। वे मीठे, खट्टे व नमकीन के लिये व्याकुल रहते हैं व गर्म पेय पसंद करते है। उन्हें पसीना व पेशाब कम आती है तथा मल सूखा, कठोर व कम होता है। उन्हें नींद कम व उखड़ी हुई आती है। ये सृजनशील, सक्रिय, सावधान व अधीर होते हैं। वे जल्दी जल्दी चलते व बोलते हैं किन्तु जल्दी थक भी जाते हैं। वे जल्दी समझने वाले किन्तु जल्दी भूलने वाले होते हैं। उनका मन अस्थिर, उनमें इच्छा शक्ति, सहन शक्ति, आत्मविश्वास तथा निर्भीकता की कमी होती है। उनकी तर्क शक्ति कमजोर होती है, ये जल्दी घबराने व डरने तथा चिंता करने वाले होते हैं। ये शीघ्र कमाने व खर्च करने की प्रवृत्ति के कारण प्रायः गरीब होते हैं।
पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति – ये मध्यम लम्बाई, दुबले व कोमल शरीर वाले होते हैं। इनका सीना व माँस पेशियाँ भी मध्यम उभार वाली होती हैं। इनके तिल व मस नीले अथवा भूरे लाल रंग के होते हैं। इनका रंग ताम्र वर्ण, हल्का पीला, हल्का लाल या साफ हो सकता है। इनकी त्वचा नरम, हल्की गर्म व कम झुर्रियों वाली होती है। इनके बाल पतले, रेशमी, लाल या भूरे तथा जल्दी सफेद होने अथवा गिरने लगते हैं। इनकी आँखें भूरी या ताम्र वर्ण, तीखीं व पुतलियाँ थोड़ी उभरी हुई व नम होती हैं। इनके नाखून नर्म व नाक तीखी एवं उसका अग्र भाग लालिमा लिये होता है। इनकी शारीरिक गतिविधियाँ, पाचन शक्ति तेज होती है जिससे भूख अधिक लगती है। ये मीठा, कसैला व कड़वा स्वाद पसंद करते हैं व शीतल पेय का आनन्द लेते हैं। इन्हें नींद तोड़ी कम किन्तु गहरी आती है। इनके मल मूत्र की मात्रा अधिक व पीलापन लिये, मल नर्म व पतला होता है। इन्हें पसीना खूब आता है, ये गर्मी, धूप, व अधिक मेहनत सहन नहीं कर पाते। ये बुद्धिमान, जल्दी समझलेने वाले व अच्छे वक्ता होते हैं। इनमें नफरत, जलन व क्रोध की ओर झुकाव होता है तथा ये महत्वाकांक्षी होते हैं व नेतृत्व करना पसंद करते हैं। ये संपत्ति पसंद करने वाले, प्रायः पैसे वाले व वैभव का प्रदर्शन करने वाले होते हैं।
कफ प्रकृति वाले व्यक्ति – इनका शरीर अच्छा विकसित होता है किन्तु इनमें मोटापे की अधिक संभावना रहती है। इनका सीना चौड़ा व तना हुआ होता है। मांस पेशियाँ अच्छी विकसित होती हैं। ये गोरे व चमकदार होते हैं व त्वचा तैलीय,चमकदार, नर्म, ठंडी व पीलापन लिये होती है। इनकी आँखें गहरी काली या नीली,चमकीली, आकर्षक व पुतलियाँ सफेद होती है। इनकी भूख सामान्य, पाचन क्रिया कुछ धीमी होती है तथा ये कम खाते हैं। इन्हें तीखा,कड़वा व कसैला स्वाद पसंद आता है, मल नरम व पीलापन लिये होता है। ये धीरे चलते हैं। इनकी नींद गहरी व लम्बी होती है। ये प्रायः स्वस्थ, प्रसन्न शांत, सहनशील क्षमावान व स्नेही होते हैं। ये थोड़े लालची, चाहने वाले व हक जताने वाले होते हैं। ये समझने में कुछ समय लगाते है किन्तु बाद में याद रखते हैं। ये धन कमाते हैं व एकत्र करते हैं.
8. तीन प्रकार का प्रभाव निम्नानुसार होता है-
सत्व – सुगंध, समझ, पवित्रता, स्पष्टता, करूणा व प्रेम। इस प्रवृत्ति वालों का शरीर स्वस्थ व व्यवहार एवं चेतन्य शुद्ध होता है। वे आस्तिक, ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले तथा पवित्र लोग होते हैं।
रजस – गतिविधि, आक्रमकता व बहिर्मुखता। रजस दिमाग वाले कामुक सोच के होते हैं। इस प्रवृत्ति के लोग व्यापार, धन, अधिकार, गौरव व पद को महत्व देते हैं। वे धन का उपभोग पसंद करते हैं व बहिर्मुखी होते है। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं किन्तु आस्था बदलते सकते हैं तथा राजनीति करने वाले होते हैं।
तमस – अज्ञान, जड़ता, भारीपन, सुस्ती। इस प्रवृत्ति के लोग आलसी, स्वार्थी व दूसरों को हानि पहुँचाने वाले होते हैं। वे नास्तिक होते हैं व प्रायः दूसरों का आदर नहीं करते हैं। वे अहंकारी होते हैं।
9. स्वास्थ्य सामान्य स्थिति है व रोग असामान्य। शरीर के अन्दर की स्थिति का बाहरी वातावरण से लगातार पारस्परिक प्रभाव होता है। जब ये दोनों असंतुलित हो जाते हैं तो रोग हो जाता है। आन्तरिक स्थिति को बदलकर संतुलन लाया जा सकता है। आयुर्वेद इसका मार्ग बतलाता है।
सामान्य स्थिति में मल मूत्र व पसीने का संतुलन होता है, इन्द्रियाँ ठीक से कार्य करती हैं व शरीर, मन व चेतन्य आपसी सामन्जस्य एकरूप से कार्य करते हैं। रोग व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कफ प्रकृति के लोगों को कफ जनित रोग जैसे टांसिल्सस, साइनसाइटिस, दमा,व फेफड़ों में जमाव आदि प्रायः होते हैं.
पित्त प्रकृति के लोगों को पित्त जनित रोग गालब्लेडर, लीवर, एसिडिटी, छाले, चर्म संबंधी व सूजन आदि रोग प्रायः होते हैं।
वात प्रकृति के लोगों को वात जनित रोग जैसे गैस, पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द, लकवा, व नसों का दर्द आदि रोग प्रायः होते हैं।
खान पान, जीवन शैली, व वातावरण यदि उसी दोष से मिलता हो तो वे असंतुलन पैदा कर पहले शारीरिक स्तर पर और बाद में मानसिक स्तर पर विकृति पैदा करते हैं। जैसे वात डर, तनाव व निराशा का कारक है। पित्त क्रोध, घृणा व जलन तथा कफ अधिकार, लालच, व मोह के कारक हैं। इस प्रकार भोजन, आदतों व वातावरण का हमारे शारीरिक व मानसिक रोगों से सीधा संबंध है।
10. तीनों दोषों की हानि अमा (टाक्सिन्स) को पैदा करते जो पूरे शरीर में फैलकर कमजोर स्थानों पर जमा हो जाते हैं, जहाँ वे रोग पैदा करते हैं।
पित्त पेट में अग्नि (जठराग्नि) जो अमलीय होती है तथा भोजन को पचाने व पोषक तत्वों को ग्रहण करने के लिये आवश्यक है। इसका संबंध वात से भी है क्योंकि वायु शरीर की अग्नि प्रज्वलित कर अग्नि को शरीर के हर कोष तक पहुँचाती है। इस तरह पोषक तत्व हर कोष तक पहुँचते हैं जो उनके रख रखाव व प्रतिरोध तंत्र के लिये जरूरी है। अग्नि अनचाहे बेक्टिरिया व अमा को पेट व आतों में नष्ट करती है। इस प्रकार वह इन अंगों की रक्षा करती है। शारीरिक गतिविधियाँ, दीर्घायु, बुद्धि, समझ आदि अग्नि पर निर्भर है। अग्नि के सही प्रकार से कार्य करने से शरीर ठीक प्रकार से संचालित होता है। यदि त्रिदोषों में अससंतुलन होता है तो उसका सीधा असर अग्नि पर पड़ता है व निरोध क्षमता कमजोर हो जाती है। इस कारण भोजन ठीक से पच नहीं पाता व बड़ी आँत में चिपचिपे व बदबूदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। यह अमा रक्त कोषिकाओं को बन्द कर देता है और अंततः टाक्सिन्स में बदल जाता है। समय के साथ ये टाक्सिन्स शरीर के कमजोर भागों में जमा हो होकर अंगों में अवरोध, निष्क्रिययता व कमजोरी पैदा करते हैं। अंततः यह मधुमेह, जोड़ के दर्द या ह्मदय के रोग जैसी बीमारियों के रूप में प्रगट होता है।
11. सब रोगों की जड़ अमा है। जीभ पर सपेद पर्त अमा की अधिक मात्रा में उपस्थिति दर्शाती है। अधिक सक्रिय अग्नि भी हानिकारक होती है। यह पोषक तत्वों को जला देती है जिससे दुर्बलता जाती है व निरोध शक्ति कम हो जाती है।
टाक्सिन्स भावनात्मक कारणों जैसे दबाये हुए गुस्से, डर, चिन्ता से भी पैदा हो सकते हैं। इससे गैस बनने से अंगों में दर्द हो सकता है। अतः भावों व नैसर्गिक तकाजे जैसे छींक आदि को दबाना नहीं चाहिये।
मंद अग्नि से एलर्जी भी हो सकती है। पित्त प्रकृति वालों को पित्त कारक भोजन जैसे गर्म व मसालेदार खाने से बचना चाहिये, घृणा व गुस्सा दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। कफ प्रकृति वालों को कप कारक भोजन जैसे दूध उत्पाद खाने से बचना चाहिये, लगाव व लालच दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार हमें भावों को दबाने के बजाय अपने से अलग पहचान कर मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिये।
आयुर्वेद के अनुसार तीनों मलों (मल, मूत्र व पसीने) का सही उत्सर्जन स्वास्थ के लिये जरूरी है। इनका उत्सर्जन संबंधित अंगों के सही प्रकार से कार्य करते रहने के लिये जरूरी है। पानी पीने की मात्रा, भोजन का प्रकार, बाह्र तापक्रम, मानसिक व शारीरिक स्थिति मलों के उत्सर्जन को प्रभावित करते है।
12. रोगी की जाँच – आयुर्वेद में रोगी की जाँच प्रायः नाड़ी, मूत्र व अंगों के द्वारा की जाती है। इनमें प्रमुख हैं –
नाड़ी – नाड़ी की जाँच तीन उँगलियों तर्जनी (वात दोष), मध्यमा (पित्त दोष) व अनामिका (कफ दोष) से की जाती है। तीनों नाड़ियों की एक सी चाल तीनों दोषों का संतुलन दर्शाती है। किसी नाड़ी का तेज व धीमा होना संबंधित दोष की अधिकता व कमी दर्शाती है।
सीधे हाथ की ऊपर वाली वात नाड़ी तेज हो तो बड़ी आँत व नीचे वाली हो तो फेफड़े में जमाव, इसी प्रकार ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी गाल ब्लेडर नीचे वाली तेज लीवर एवं ऊपर वाली तेज कफ नाड़ी ह्मदय संबंधी (पेरी कार्डियम) समस्या दर्शाती है।
बाँये हाथ की वात नाड़ी ऊपर वाली तेज हो तो छोटी आँत व नीचे वाली ह्मदय, ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी पेट तथा नीचे वाली तेज स्प्लीन एवं ऊपर की तेज कफ नाड़ी ब्लेडर व नीचे वाली तेज किडनी की समस्या दर्शाती है। (हल्के से छूने से ऊपर वाली नाड़ी व दबा कर छूने से नीचे वाली नाड़ी की गति पता चलती है)।
अलग अलग समय नाड़ी गति बदलती रहती है। नाड़ी की जाँच की योग्यता प्रशिक्षण व अभ्यास के बाद ही आती है।
मूत्र परीक्षण – मूत्र का नमूना सवेरे बीच धारा से साफ पात्र में लेना चाहिये।
रंग – कालापन लिये भूरा वात दोष, गहरा पीला पित्त दोष, धुन्धला कफ दोष एवं लाल रंग रक्त दोष बतलाता है। सामान्य रंग हल्का पीला होता है।
बर्तन में एक बूँद तिल के तेल की डालें —
यदि बूँद फैलती है तो उपचार आसान
यदि बूँद बीच तक डूबती है तो उपचार कठिन
यदि बूँद नीचे बैठ जाती है तो उपचार बहुत कठिन
यदि बूँद लहरों में फैलती है तो वात दोष
यदि बूँद कई रंगों में फैलती है तो पित्त दोष
यदि बूँद कई मोती जैसी बूँदो में फैलती है तो कफ दोष
बदबूदार मूत्र टाक्सिन्स की उपस्थिति व मीठी सुगंध मधुमेह दर्शाता है। मूत्र त्याग के समय जलन पथरी व कम मूत्र उच्त रक्तचाप का द्योतक है।
आयुर्वेद के अनुसार सवेरे बीच की धार का मूत्र प्राकृतिक रेचक (मुलायम करने वा) व टाक्सिन्स को नष्ट करने वाला है। सवेरे इसका एक कप सेवन लाभकारीहै।
पसीना – पसीना चर्बी तंतों से पैदा होता है तथा शरीर का तापमान बनाये रखने के लिये जरूरी है। यह त्वचा नर्म व उसकी लचक एवं रंग बनाये रखता है। अधिक पसीने से संक्रमण (फफूँदीय) हो सकता है तथा कम पसीना सूखी व दरार वाली त्वचा कर देता है।
मूत्र व पसीना दोनों का संबंध किडनी से है, स्वस्थ शरीर में दोनों का संतुलन जरूरी है। एक के बढ़ने से दूसरे की मात्रा कम हो जाती है।
जीभ, आखों, चेहरे, होंठ व नाखून का अध्ययन भी रोग समझने में सहायक है
जीभ की जाँच – हल्का पीलापन खून की कमी, पीला रंग गालब्लेडर में बाइल अधिक व किडनी की समस्या। नीलापन ह्मदय रोग। सफेद रंग टाक्सिन्स की संबंधित अंगों में अधिकता। जीभ का अंगों से संबंन्ध इस प्रकार है –
पीछे बाँयें बाँयीं किडनी, बीच आँत व दाँयें दाँयीं किडनी
मध्य भाग बाँयें स्प्लीन, बीच पेन्क्रिया व पेट व दाँयें लीवर
आगे बाँयें बाँयां फेफड़ा , बीच ह्मदय व दाँयें दाँयां फेफड़ा
उभार व गड्डे संबंधित अंगों की खराबी दर्शाते हैं।
इसके अतिरिक्त भावों का संबंध भी दोषों व अंगों से है। जैसे डर का वात व किडनी से, क्रोध का पित्त व लीवर से तथा लालच एवं ईर्षा का कफ व ह्मदय एवं स्प्लीन से।
13. आयुर्वेद के अनुसार व्यक्ति के गुणों का संबंध उसकी गतिविधियों से है। गुण अन्तर्निहित शक्ति है जबकि गतिविधि गत्यामक शक्ति। चरक ने इनके दस विपरीत जोड़ों की पहचान की है (कुल 20 गुण)। वात, पित्त व कफ के अपने अलग गुण होते है –
वात – हल्का, सूक्ष्म, सूखा, चलित, खुरदरा व ठंडा। पतझड़ के मौसम में प्रभाव बढ़ जाता है।
पित्त – गर्म, सूखा, गतिशील व व्याप्त हो जाने वाला (भेदक)। गर्मी में प्रभाव बढ़ जाता है।
कफ – द्रवीय, भारी, ठंडा, चिपकने वाला व धुन्धला। सर्दी में प्रभाव बढ़ जाता है।
इनके गुणों से विपरीत खाद्य पदार्थ लगातार लेने से असंतुलन पैदा होता है।
चरक द्वारा पहचाने गुण व उनके प्रभाव इस प्रकार हैं –
1. गुरु (भारी) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। पौषक तत्व बढ़ाता है किन्तु साथ ही भारीपन, शिथिलता व आलस्य का कारक है।
2. लघु (हल्का) कफ कम करता है व वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है। पाचन में सहायक, मोटापा कम करने वाला, सफाई करने वाला हे। ताजगी, सतर्कता व जागरुकता बढ़ाता है।
3. धीमा (मवा) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। शिथिलता, धीमी कार्य गति, ढिलाई व सुस्ती कारक है।
4. तेज (तीक्ष्ण) कफ घटाता है व वात पित्त बढ़ाता है। छाले व फोडे फुन्सी का कारण है। शरीर पर तुरन्त असर करता है। कुशाग्रता व समझ बढ़ाता है।
5. ठंडा (शीतल) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त घटाता है। सर्दी, अकड़न, बेहोशी, डर, जकड़ाव व संवेदनहीनता कारक है।
6. ऊष्ण वात व कफ घटाता है एवं पित्त व अग्नि बढ़ाता है। गर्मी, पाचन क्रिया, प्रक्षालन, फैलाव, सूजन, क्रोध व घृणा पैदा करता है।
7. तैलीय (स्निग्ध) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। चिकनापन, नमी, चिकनाई (घर्षण कम करना), शक्ति बढ़ाता है एवं लगाव व प्रेम में सहायक।
8. सूखा (रुक्ष) वात व अग्नि बढ़ाता है पित्त व कफ घटाता है। शुष्कता, समावेश कब्जियत व घबराहट बढ़ाता है।
9. चिपचिपा (स्लक्षणा) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। चिकनापन, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
10. खारा वात व अग्नि बढ़ाता है व पित्त व कफ घटाता है। त्वचा व हड्डी में दरार, असावधानी व दृढ़ता बढ़ाता है।
11. कुन्द (सनर) कफ बढ़ाता है व वात पित्त व अग्नि घटाता है। मजबूती, गाढ़ापन व शक्ति वर्धक।
12. द्रव पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। गलाने वाला, द्रवीकरण करने वाला है तथा लार वर्धक, करुणा वर्धक व संगकता वर्धक है।
13. नर्म (म्रुआ) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। कोमलता, नजाकत, तनावहीनता, मृदुता, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
14. कठोर (कठिन) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त एवं अग्नि घटाता है। कठोरता, शक्ति, दृढ़ता, संवेदनहीनता व स्वार्थपरता बढ़ाता है।
15. स्थिर कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। स्थिरता, रुकावट, सहारा, कब्ज व विश्वास को बढ़ावा देता है।
16. चल वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है व कफ घटाता है। गति, कंपन, अधीरता व अनास्था बढ़ाता है।
17. सूक्ष्म (कोमल) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। सूक्ष्म कौषिकाओं मे पहुँचने वाला तथा भावनाओं व संवेदवशीलता बढ़ाने वाला।
18 स्थूल (ठोस) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। रुकावट व मोटापा बढ़ाता है।
19. धुन्धला कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। हड्डी की दरारों को भरने वाला व समझ व कल्पना शक्ति को कम करने वाला।
20. साफ (विसद) कफ घटाता है व वात, पित्त एवं अग्नि बढ़ाता है। शान्त करने वाला व अकेलापन एवं भटकाव पेदा करने वाला।
14. पंच तत्वों का संबंध भी अंगों से होता है। ईथर का दिमाग से, हवा का फेफड़ों से, अग्नि का आँत से, पानी का किडनी से एवं पृथ्वी का ह्मदय से।
15. आयर्वेद में कई रोगों जैसे छाती में बलगम, आँत में बाइल, पेट में गैस आदि की अधिकता को दूर करने के लिये पंचकर्मो का प्रयोग निर्धारित है। इससे शरीर, मस्तिष्क व भावों की सफाई की जाती है। ये पाँच क्रियायें हैं – वमन, रेचक (पेट साफ करने वाली औषधी), दवायुक्त वस्ति (एनिमा), नाँक में दवा डालना व रक्त शुद्धि।
16. आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ रहने के लिये सही खानपान जरूरी है। इसके अलावा स्वस्थ दिनचर्या, योग व श्वास के व्यायाम महत्वपूर्ण हैं। आध्यात्मिक कार्य प्रणाली की समझ समरसता व सुख दायक होती है।
भोजन व्यक्तिगत प्रकृति के अनुकूल होना चाहिये। अपनी प्रकृति व विभिन्न खाद्य पदार्थों का संबंध जानकर ही सही खानपान निर्धारित किया जा सकता है।
इसमें स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा व कसैला) तथा प्रकार (भारी, हल्का, गर्म या ठंडा असर कारक, तैलीय अथवा सूखा आदि)का ध्यान रखना चाहिये। भौजन चुनने में मौसम का भी ध्यान रखना जरूरी है।
मार्ग दर्शन के लिये सामान्य दिशा निर्देश यहाँ संक्षेप में दिये हैं। व्यक्ति विषेश को अपने दोष की अधिकता, एलर्जी, अग्नि की प्रबलता व मौसम को ध्यान में रखते हुए स्वयं निर्धारित करना चाहिये।
1. वात प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये अधिक मात्रा में मेवे, सेव, तरबूज,आलू, टमाटर,बैंगन, आइसक्रीम, माँस, मटर व हरा सलाद हानिकारक हैं। इसके विपरीत मीठे फल, अवाकेडो, नारियल, ब्रााउन चाँवल, लाल पत्ता गोभी, केले, अंगूर, चेरी व संतरे लाभ दायक हैं।
2 पित्त प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये मसालेदार भोजन, मूँगफली का मक्खन, खट्टे फल, केले, पपीता, टमाटर,व लहसुन अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत आम, संतरे, नाशपाती, आलूबुखारा, अंकुरित व हरा सलाद, सूर्यमुखी के बीज, मशरूम व शतावरी (एक प्रकार की साग) लाभ दायक हैं।
3 कफ प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये केले, तरबूज, नारियल, खजूर, पपीता, अनानास व डैरी उत्पाद अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत मेवे, अनार, क्रेनबेरी, बासमती चाँवल, अंकुरित सलाद, व चिकन लाभ दायक हैं।
भौजन तन,मन व चेतन का पौषक है, सही ढ़ग से भौजन करना महत्वपूर्ण है। भौजन सीधे बैठकर, एकाग्र मन से ( टीवी, बातचीत व पुस्तकों के व्यवधान रहित) व प्यार से स्वाद लेकर व चबाकर करना चाहिये।
पेट में तिहाई मात्रा भौजन, तिहाई पानी व तिहाई हवा की होना चाहिये। पानी का शरीर में संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। फलों के रस के रूप में भी पानी ले सकते हैं किन्तु भौजन के साथ नहीं। भौजन के बीच थोड़ा थोड़ा पानी अमृत समान होता है। यह पाचन में सहायक होता है।
शरीर में अपनी जरूरत के अनुसार विटामिन्स पैदा करने की क्षमता है। प्रकृति व अग्नि की स्थिति समझे बिना बाह्य विटामिन्स का सेवन शरीर में विटामिन्स की अधिकता (हाइपरविटामिनोसिस) का कारण बन सकता है।

मानव मस्तिषक परिवर्तनशील होता है

मानव मस्तिषक परिवर्तनशील होता है                                                                           (द ब्रेन चेन्जेस इटसेल्फ, लेखक नारमेन डोल्डगे पर आधारित)
मानव मस्तिषक एक जटिल संरचना है। प्रायः एसा माना जाता है कि मानव मस्तिषक एक अवस्था तक विकसित होने के बाद एक पहले से प्रोग्राम किये हुए कम्प्यूटर के समान कार्य करता है। हाल ही के शोध कार्य इस धारणा को झुठलाते है। कई प्रयोगों द्वारा ये सिद्ध हो चुका है कि मानव मस्तिषक परिवर्तनशील है व उसे बदला जा सकता है। इस प्रकार के प्रयोगों के कुछ सफल उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं –
1. श्रीमती चेरिल शुल्ट्ज हमेशा गिरती पड़ती रहती थीं। उनके मस्तिष्क के उस भाग का विकास नहीं हो पाया था जो शरीर का संतुलन बनाने में आवश्यक है। कान के अन्दरूनी भाग में तीन अर्ध चन्द्राकार छोटी नहरें होती हैं। इनमें भरे द्रव की हलचल वहीं स्थित रोंए महसूस कर मस्तिष्क को शरीर की स्थिती परिवर्तन की सूचना देतें है। इसी सूचना के आधार पर मस्तिष्क शरीर के अन्य अंगों को निरन्तर संतुलन बनाये रखने के निर्देश देता है। इस संरचना को वेस्टिब्यूलर सिस्टम कहते हैं। इसी वेस्टिब्यूलर सिस्टम के कार्य नहीं करने की वजह से श्रीमती शुल्ट्ज की यह समस्या थी।
श्रीमती शुल्ट्ज, वाई बाख रीता जो अपने समय के मानव मस्तिषक के परिवर्तनशील होने पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे थे के संपर्क में आर्इं। बाख के साथी बायोफिजिसिस्ट यूरी डेनीलोव ने श्रीमती शुल्ट्ज का विस्तृत अध्ययन कर एक हेलमेट नुमा उपकरण बनाया जिसमे गति परिवर्तन मापक (एक्सीलरोमीटर) लगा था। इस उपकरण को एक कम्प्यूटर एवं एक छोटी सी धातु की पट्टी से जोड़ा गया। हेलमेट सर पर पहन कर तथा पट्टी को जीभ पर लगा कर श्रीमती शुल्ट्ज से खड़ा होने को कहा गया। कम्प्यूटर मानीटर पर अपनी हलचल देखकर तथा जीभ द्वारा मस्तिष्क को प्रेषित संदेश की सहायता से वे कुछ ही दिनों के अभ्यास से खड़े होने लगी। आगे और अभ्यास करके वे बिना उपकरण की सहायता से सामान्य जीवन जीने लगी। उनके मस्तिष्क का प्रभावित भाग पुनः विकसित हो चुका था।
2. बारबरा एरोस्मिथ यंग का मस्तिष्क विकास असंतुलित था। उनके मस्तिष्क के अग्र भाग (फ्रन्ट लोब) का विकास तो सामान्य था किन्तु पृष्ठ भाग का बाँया हिस्सा छोटा था। इस कारण वे देख सुन तो सकती थी किन्तु उनकी सीखने की क्षमता नगण्य सी थी। उन्हें शब्द उच्चारण व चीजों को स्थान से संबद्ध करने में दिक्कत होती थी। घर के बाहर वे खो जाती थी व चीजों को रख कर भूल जाती थी। वे अंग्रेजी अक्षरों जैसे बी एवं डी तथा पी एवं क्यू में भेद करने में अक्षम थीं।
अपने मित्र बारबरा जोशुआ के मार्फत उन्हें एलेकजेन्द्र लूरिया व ल्योवा जाजेत्स्की द्वारा मस्तिष्क के परिवर्तनशील होने संबन्धी शोध के बारे में जानकारी मिली। इसी जानकारी के आधार पर उन्होंने अपने मित्र की सहायता से बहुत से कार्ड बनवाये जिन पर एक ओर अलग अलग समय बताती घड़ी की तस्वीर थी तथा पीछे की ओर तस्वीर में दर्शाया समय लिखा था।
इन कार्डों की मदद से यंग ने अकेले घड़ी में सही समय जानने का अभ्यास किया। इस प्रकार के अभ्यास से उन्हें स्थान को चीजों से संबद्ध करने की क्षमता में आशातीत सुधार हुआ। इससे प्रेरित होकर यंग ने अपनी अन्य कमियों के लिये भी सफल प्रयोग किये। इन सफलताओं से उत्साहित होकर यंग ने जोशुआ के साथ मिलकर इसी प्रकार की अक्षमता वाले बच्चों के लिये एक स्कूल खोला। यह संभवतया पहला उदाहरण था पीड़ित ने अपने स्वयं के मस्तिष्क को सफलतापूर्वक पुनः सक्रिय किया।

मानव मस्तिष्क
3. मिशाइल मर्जेनिख अथवा मर्ज जैसा कि उनके साथ काम करने वाले उन्हें
बुलाते थे, ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रयोगों से सिद्ध किया कि शिजोफेर्निया (एक ऐसी बीमारी जिसमें रोगी ऐसी चीजों की कल्पना करता है जो होती ही नहीं हैं) मस्तिष्क के अभ्यास द्वारा ठीक की जा सकती है। उन्होंने ब्रोन मेपिंग तकनीक का प्रयोग कर अलग अलग गतिविधियों को मस्तिष्क के विभिन्न भागों से संबद्ध किया।
न्यूरोन के तीन भाग होते हैं। डेनड्राइड्स जिसमें पेड़ की तरह शाखायें होती हैं न्यूरोन्स से संकेत ग्रहण करता हैं सेल बाडी जो उसे जीवित रखता है और जिसमें डीएनए होता है। तथा तीसरा भाग एक्सान जो एक जीवित तार होता है जिसकी लम्बाई अलग अलग हो सकती है (कुछ माइक्रोन से 2 मीटर तक)। ये तार अपने पड़ोसी न्यूरोन तक बिजली संकेत (3 से 300 किमी प्रति घन्टा की गति से) ले जाने का काम करते हैं। ये संकेत दो प्रकार के होते हैं न्यूरोन को सक्रिय अथवा अवरुद्ध करने वाले। न्यूरोन अपने पास आने वाले उचित मात्रा में प्राप्त संकेतों के आधार पर सक्रिय अथवा अवरुद्ध हो जाते हैं। एक्सान व डेनड्राइड्स के बीच थोड़ी सी दूरी होती है जिसे सिनेप्स कहते है। एक्सान के अन्त में बिजली संकेत सिनेप्स में एक रसायन छोड़ते हैं। यही रसायन डेनड्राइड्स पहुँच कर निश्चित करता है कि पड़ोसी न्यूरान सक्रिय होगा अथवा अवरुद्ध। न्यूरान्स का आपस में जुड़ना का अर्थ उनके एक साथ सक्रिय होने अथवा अवरुद्ध होने पर निर्भर करता है।
मनुष्य का मस्तिष्क दो भागों में बाँटा जा सकता है पहला केन्द्रीय भाग (सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम) तथा दूसरा सहायक तन्त्र (पेरिफेरल सिस्टम) जो केन्द्रीय भाग से संदेश ले जाता अथवा केन्द्रीय भाग को संदेश पहुँचाता है।
मर्जेनिख ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि आपसी परिवर्तित (उदारणार्थ तर्जनी व
अंगूठे) सहायक तन्त्र ब्रेन मेपिंग में कोई बदलाव नहीं लाये। उन्होंने यह भी पाया कि यदि शरीर के किसी हिस्से को मस्तिष्क के संबन्धित भाग से अलग कर दिया जाये तो उस भाग में दूसरे पड़ोसी सहायक यंत्र कब्जा कर लेते हैं। इन प्रयोगों से फ्रायड की उस विचार धारा की पुष्ठी होती है कि आपस में जुड़े न्यूरान्स एक साथ क्रियाशील होते है व अलग अलग क्रियाशील होने वाले न्यूरान्स आपस में जुड़े नहीं होते हैं।
यह पाया गया है कि बचपन में एक नाजुक समय होता है जब बच्चे तेजी से सीखते हैं। अन्य कई कारणों में से एक मुख्य कारण इस काल में बीएनडीएफ (ब्रेन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में होना है जो मस्तिष्क विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिष्क के उस भाग(न्यूक्लियस बसालिस) को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करता है, वह भविष्य के लिये मस्तिष्क में न्यूरान्स जोड़ने, बिजली सिगनल्स की गति बढ़ाने (न्यूरान्स पर एक पतली सी
तैलीय सतह बना कर) तथा अन्त में नाजुक काल को बन्द करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ उत्पन्न होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध हो जाता है।
मर्जेनिख ने ऐसी तकनीक का विकास किया, जिसको फास्ट फारवर्ड के नाम से जाना जाता है। इस तकनीक द्वारा प्रोढ़ लोगों में सीखने का नाजुक काल फिर से पैदा किया जा सकता है। यह तकनीक आटिज्म, अल्जीमर (भूलने की बीमारी) व अन्य ऐसी ही कमियों के उपचार में प्रभावी है।
4. मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है, भी परिवर्तनशील हैं। बढ़े लोंगों के रोज के व्यवहार में बचपन के सेन्टीमेन्ट्स की झलक प्रायः देखने को मिल जाती है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। नशीली दवायें व खुशी के भाव डोपेमाइन सिस्टम की सक्रिय होने की सीमा नीचे कर देते है जिस
कारण छोटी सी बात से बहुत अधिक खुशी महसूस होती है। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरानस लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है।
डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।
5. एडवर्ड टाउब ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध करके दिखाया कि रुकावट पैदा कर प्रभावित अंगो को उपयोग में लाने का उपचार संभव है। उन्होंने एक बंन्दर की बाँयें हाथ की संदेश वाहक नली को काटकर अलग कर दिया। इसके उपरान्त उन्होंने उसके दाँये हाथ को बाँध कर निष्क्रिय कर दिया। यह पाया गया कि बन्दर ने अपना बाँया हाथ काम में लेना शुरु कर दिया। फिर बाँये हाथ को कुछ महीनों के लिये बाँध दिया गया। उस हाथ को खोलने पर बन्दर अपने बाँये हाथ को पुनः काम में लेने लगा। इस प्रकार टाउब ने सिद्ध कर दिया कि मस्तिष्क को यह याद रखने से रोका जा सकता है कि प्रभावित अंग उपयोगी नहीं है। कई अंग असक्रिय सिर्फ इसलिये हो जाते है कि मस्तिष्क में यह बैठ जाता है कि वह उपयोग लायक नहीं है। आगे चल कर टाउब ने रुकावट पैदा कर उपचार की तकनीक पर आधारित एक उपचार केन्द्र खोला व कई प्रकार की कमियों का सफलता पूर्वक उपचार किया।
6. मोटापे से ग्रस्त (आबसेसिव कम्पल्सरी डिसआर्डर) लोग प्रायः चिन्ता ग्रस्त रहते है। छोटी सी बात से वे डर के भाव में जकड़ जाते हैं। इसके लिये मस्तिष्क के तीन भाग कार्य करते हैं। कुछ गलत होने का भाव हमारे मस्तिष्क के सामने के हिस्से (आरबिटल फ्रन्टल कोरटेक्स) में पैदा होते हैं। वहाँ से संकेत गहरे अन्दर स्थित गायरस में जाते है। सिन्गुलेट गायरस चिन्ता का भाव पैदा करता है कि यदि गलती को ठीक नहीं किया तो कुछ बुरा हो सकता है। वह हमारे दिल व मन में भी संकेत द्वारा सिरहन (सेन्सेशन) सी पैदा करता है। मस्तिष्क का गहरा केन्द्रीय भाग (कौडेट न्यूक्लियस) जो विचारों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में मदद करता है वह मोटापे से ग्रस्त लोगों में चिपचिपा सा हो जाता है जिसके कारण वे भय का यह भाव उनसे चिपक जाता है।
श्वारत्ज ने मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिये एक उपचार तकनीक का सफलता पूर्वक विकास किया। इसमें आरबिटल कोरटेक्स व सिन्गुलेट गायरस के बीच संबन्ध को अलग कर दिया जाता है, जिससे कौडेट न्यूक्लियस सामान्य तरीके से कार्य करने लगता है। कौडेट न्यूक्लियस को स्वयं के प्रयास से उपयोगी कार्यों में व खुशी प्रदान करने वाली गतिवधियों में ध्यान लगाकर भी सामान्य बनाया जा सकता है।
7. अक्सर वे लोग जो किसी कारण अपने हाथ अथवा पैर गँवा देते है एक काल्पनिक अंग की उपस्तिथि महसूस करते रहते है। इसका अहसास उन्हें जीवन भर दर्द महसूस कराता रहता है। वी एस रामचन्द्रन ने यह सोचा कि इस को भी मस्तिष्क के परिवर्नशील होने से समझा जा सकता है। इस आधार पर उन्होंने एक प्रयोग किया। एक विशेष डिजाइन से तैयार काँच लगे ढाँचे में प्रतिबिम्ब के द्वारा उन्होंने मस्तिष्क को काल्पनिक हाथ को सही हाथ के होने का आभास कराया। काफी लम्बे अभ्यास के बाद यह पाया गया कि उस व्यक्ति के मस्तिष्क से काल्पनिक हाथ होने की बात निकल गई। इस प्रयोग द्वारा उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सही तरीके का उपयोग कर मस्तिष्क से शारीरिक कमी के अहसास को दूर किया जा सकता है।
रामचंद्रन के अनुसार दर्द का अहसास मस्तिष्क में पैदा होता है तथा वह प्रभावित
अंग में महसूस होता है। उनके अनुसार दर्द का संकेत नर्वस सिस्टम द्वारा प्रवाहित होता है। ये संकेत रीढ़ की नलियों के रास्ते के द्वारों से गुजरता है। मस्तिष्क इन द्वारों को संकेत के महत्व के आधार पर खोलता है। जितने अधिक द्वार खुलते हैं दर्द उतना ही बढ़ता जाता है। मस्तिष्क संकेत को एन्ड्रोफिन जो शरीर के द्वारा बनाया गया एक प्रकार का दर्द निवारक है, छोड़ कर संकेत को रोक कर दर्द को रोक भी सकता है। उन्होंने अपनी इस विचारधारा को संक्षेप में इस प्रकार बतलायाः
दर्द अवयव के स्वास्थ्य की स्थिति बतलाने वाला एक विचार मात्र है न कि चोंट की प्रतिक्रिया।
एक आस्ट्रेलियन वैज्ञानिक जी एल मौसले ने तो रोगी द्वारा प्रभावित अंग को कल्पना में हिलाने डुलाने के माध्यम से दर्द निवारण की तकनीक भी सफलता पूर्वक विकसित कर ली।
8. पास्कुअल लेओने पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने ट्रान्सक्रेनियल मेगनेटिक स्टीमुलेशन (टी एम एस) का प्रयोग किया। टी एम एस का उपयोग से मस्तिष्क के किसी भाग को सक्रिय अथवा निष्क्रिय किया जा सकता है। यह मेगनेटिक स्टीमुलेशन की फ्रीक्वेन्सी व तीव्रता पर निर्भर करता है। उनहोंने इस तकनीक द्वारा ब्रोन मेपिंग कर यह पाया कि एक अंधे व्यक्ति में ब्रेल लिपी पढ़ने वाली उँगली का मोटर कोरटेक्स क्षेत्रफल अन्य उँगलियों की अपेक्षा बड़ा था। उन्होंने यह भी पाया कि क्षेत्रफल उपयोग के अनुसार बदलता है।
इसी खोज के आधार पर व्यक्ति के मस्तिष्क में अवयवों को चलाने वाले नक्शे (मोटर मेपिंग) को विचारों में बदलने वाली मशीन का भी आविष्कार किया गया। इन मशीनों का उपयोग पूरी तरह से लकवा ग्रस्त लोगों को अपने विचारों द्वारा वस्तुओं को चलाने के लिये किया जाता है। यह सिद्ध करता है हमारी कल्पना व कार्य आपस में जुड़े हुए है।
लेओने अपने विभिन्न प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हमारा मस्तिष्क हमेशा एक विशिष्ट कारक श्रंखला (आपरेटर सिरीज) में रहता है। यह कारक ऐसी जानकारी पर काम करता है जो साधारण जानकारी जैसे देखने, छूने अथवा सुनने से अधिक निराकार है। ये कारक श्रंखला आकार, गति अथवा स्थान से संबद्धता जैसी जानकारी के आधार पर कार्य करता है। कारक प्रतिस्पर्धा के आधार पर चुना जाता है। हम अपनी कल्पना से कारक को प्रभावित कर सकते हैं। किन्तु पूरी प्रक्रिया समझना अभी बाकी है।
9. कान्डेल एक मस्तिष्क वैज्ञानिक ने समुद्री घोंघे (एल्पीसिया नामक स्नेल) का अध्ययन किया। इसके न्यूरान का आकार लगभग एक मिलीमीटर होता है जिसे नग्न आखों से देखा जा सकता है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि हल्के विद्युत शाक सेन्सरी व मोटर न्यूरान्स के बीच सिनेप्टिक संबंन्ध दृढ़ करते हैं। इस प्रकार उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भय सिनेप्स में अधिक मात्रा में मेसेन्जर केमिकल उत्पन्न कर संकेतों को अधिक शक्तिशाली बना देता है।
कान्डेल ने यह भी पाया कि घोंघे को यह सिखाया जा सकता है कि इस प्रकार के शाक नुकसानदायक नहीं हैं। इस अध्यन से यह भी पता चला कि अस्थायी याददाश्त स्थायी याददाश्त में कैसे बदलती है।
हमारे जीन्स दो कार्य करते है। एक कार्य अपने आप को बनाना, इस क्रिया पर हमारा कन्ट्रोल नहीं रहता है। दूसरे कार्य में एक सेल जिसमें सभी जीन्स होते है किसी एक जीन को सक्रिय कर देता है जिससे एक नया प्रोटीन बन जाता है तथा उस सेल के स्वभाव में बदलाव आ जाता है। यह कार्य हम क्या सोचते व करते हैं, इस पर निर्भर करता है। इस प्रकार हमारे मस्तिष्क का विकास हम किस प्रकार पाले गये हैं इस से काफी प्रभावित रहता है। द्वितीय युद्ध के अध्यन से यह पता चलता है कि वे बच्चे जिनको नाजुक समय में अपनी माँ के प्यार से वंचित रहे, वे उनका मानसिक व भावनात्मक विकास कम हुआ।
मस्तिष्क विशेषज्ञों के अनुसार दो प्रकार की याददाश्त होती है। एक प्रक्रियात्मक अथवा अनतर्निहित याददाश्त। यह उस समय काम आती है जब हम कौई प्रक्रिया या स्वतः होने वाले काम को सीखते है। ये प्रायः अनजाने में प्रयोग में आ जाती है।
दूसरे प्रकार की स्पष्ट याददाश्त होती है जो हमें हमारे कार्य, संबंध, समय आदि की जानकारी देती है। इसका विकास लगभग 26 माह की आयु से शुरु होता है।
मस्तिष्क मे अँगूठे के बराबर दाँयीं व बाँयीं ओर दो भाग होते हैं, जिन्हें हिप्पोकेम्पस कहते हैं। ये स्पष्ट याददाश्त को दीर्घ कालिक स्पष्ट याददाश्त में बदलतें है।
अवसाद (डिप्रेशन) की दवायें अधिक मात्रा में स्टेम सेल्स बनाती है जो हिप्पोकेम्पस में जाकर न्यूरान्स बन जाते हैं। मनोचिकित्सा से भी मस्तिष्क में स्पष्ट बदलाव लाया जा सकता है।
हमारी निद्रा के दो भाग होते हैं, जिसमें एक तेज आँखों की हलचल (रेपिड आई मूवमेन्ट या रेम) निद्रा होती हैं। हम अधिकतर सपने इसी नींद में देखते हैं। छोटे बच्चों में यह नींद मस्तिष्क के विकास के लिये जरूरी है। छोटे बच्चे बड़ो की अपेक्षा इस नींद में अधिक समय बिताते हैं। रेम दीर्घ कालिक स्पष्ट याददाश्त को बढ़ाने में बहुत मददगार होती है।
10. केज व एरिक्सन पहले न्यूरोनल स्टेम सेल्स को खोजने वाले वैज्ञानिक थे। ये सेल बँटकर न्यूरान अथवा ग्लाइल सेल में बदल जाते हैं, जो मस्तिष्क में न्यूरान्स की सहायता करते हैं। ये स्टेम सेल्स वृद्ध व्यक्ति के मस्तिष्क के उस भाग में सक्रिय पाये जाते हैं जो गंध को महसूस करता है (ओलफेक्ट्री बल्ब)। किन्तु मस्तिष्क के वे भाग जो भावों को नियंत्रित करते हैं (सेप्टम), हिलने डुलने को नियंत्रित करतें हैं (स्ट्रीएटम) या रीढ़ नियंत्रण करते हैं में निष्क्रिय पाये जाते हैं।
यह भी पाया गया है कि उम्र के साथ मस्तिष्क में गतिविधियाँ एक ओर खिसकने लगती हैं। उम्र के साथ मस्तिष्क का आधा (दाँयां अथवा बाँया) भाग दूसरे की अपेक्षा अधिक प्रभावशील होने लगता है। वह गतिवधि जो पहले एक हिस्से में होती थी बाद में दोनों हिस्सों में होने लगती है। इससे ऐसा लगता है कि मस्तिष्क अपनी कमजोरी को स्वयं सुधारने की कौशिश करता है।
डाक्टर करानास्की ने यह सिद्ध किया कि व्यायाम हमारे ह्मदय व मस्तिष्क की रक्त वाहिनी कोशिकाओं को ताकतवर बनाने में सहायक है। परिणाम स्वरूप जो व्यक्ति साइकल चलाना, घूमना या अन्य ह्मदय को ताकत देने वाले व्यायाम करते हैं वे अपने हमउम्र अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक मानसिक तौर पर सक्रिय महसूस करते हैं। यह भी पाया गया है कि व्यायाम बी एन डी एफ (जो मस्तिष्क के विकास के लिये जरूरी है) का उत्पादन बढ़ाता है। चुनौतीपूर्ण मानसिक गतिविधियाँ हमारे हिप्पोकेम्पल न्यूरोन्स को सक्रिय रखने में सहायक हो सकती हैं।
11. मिशेल मेक केवल आधे मस्तिष्क के साथ पैदा हुई थी। जब वह पेट में ही थी तब उसकी मस्तिष्क के बाँये भाग में रक्त पहुँचाने वाली कौशिका (कारोटिड आरटरी) बन्द हो गई थी। इस कारण मस्तिष्क का बाँयें भाग का विकास नहीं हो पाया। सबसे पहले उसकी माँ केरोल ने देखा कि मिशेल निष्क्रिय रहती थी, शायद ही कोई आवाज निकालती ना ही किसी चीज की ओर नजरें घुमाती। उन्होंने यह भी पाया कि मिशेल का दायाँ हिस्सा लकवा ग्रस्त था। कई बार अस्पतालों के चक्कर लगाने से कोई लाभ नहीं मिला। उस समय उपलब्ध केट स्केन सुविधा कुछ निर्णय तक पहुँचने लायक साफ दृश्य देने में असफल थी।
कुछ दिनों बाद केरोल ने मिशेल को खाना खिलाते समय अपने हाथ के साथ नजर घुमाते देखा। बाद में सड़क पर जा रही मोटर साईकल की ओर ध्यान देते देखा। इसी बीच केरोल ने डा. जार्डन ग्राफमेन का एक लेख देखा जिसमें उन्होंने मस्तिष्क की समस्याओं के बारे में प्रचलित कई मान्यताओं को ठुकराते हुए मस्तिष्क के परिवर्तनशील होने की बात लिखी थी। केरोल मिशेल को नेशनल
इन्सटीट्यूट आफ हेल्थ ले गई जहाँ डा. ग्राफमेन डायरेक्टर थे। डा. ग्राफमेन की सहायता से मिशेल ऐसी कई गतिवधियाँ सीख पाई जो बिना मस्तिष्क के बाँये भाग वालों के लिये संभव नहीं होता है। डा. ग्राफमेन का मानना था कि मिशेल के मस्तिष्क के दाँये भाग में गतिविधियों का अच्छा विकास इसलिये संभव हुआ क्योंकि उसे रोकने के लिये मस्तिष्क का बाँया भाग नहीं था।
हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। बिना नियंत्रण के हम पागल हो जायेंगे। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें व सामाजिक व पारिवारिक संबंधो को तहसनहस कर देंगें।

हिन्दु धर्म

(इवाल्यूशन आफ हिन्दुइज्म इन इन्डिया, क्लाउस क्लोस्टरमायर,वन वल्र्ड आक्सफोर्ड पर आधारित)
हिन्दू धर्म किसने स्थापित किया यह ज्ञात नहीं है। जहाँ पश्चिम में हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली माना जाता है, भारत में इसे कई रूपों में देखा जा सकता है।
1. हिन्दु धर्म का उद्गम –
मूल रूप से यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता है। विदेशी लोगों ने इसे हिन्दू धर्म का नाम दिया। मूल रूप में यह सभी वस्तुओं को नियन्त्रित करता है, यह एक व्यापक व समय के साथ अपरिवर्तित नियमों का संग्रह है जो भारतीय समाज का निर्देशन करता है तथा जीवन के सभी पहलुओं का नियन्त्रण करता है। सामान्यतह यह माना जाता है कि 150 वर्ष बीसी में वैदिक आर्य भारत आर्कटिक सर्कल (स्केन्डीनेविया, उक्रेन, पर्सिया, टर्की आदि) से बसने के लिये आये। रिग्वेद की लिपि व जोरोस्ट्रियन एवेस्टा की भाषाओं में काफी समानता है। हाँलाकि रिग्वेद में पुरानी पीढ़ी के लोगों का बाहर से आकर बसने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हिन्दु धर्म के और अधिक पुराने होने के काफी सबूत मिलते है।
2. वेद हिन्दु ग्रन्थ –
हिन्दु धर्म का सर्व प्रथम विवरण श्रुति के रूप में मिलता है। ज्ञान को सिर्फ सुनकर व याद रख कर ही प्राप्त किया जा सकता था। यह ज्ञान भी सिर्फ ऋषि – मुनियों (रिग) तक ही सीमित था। कई हजार वर्षों बाद बाहरी आक्रमण के चलते वेदों को लिपि बद्ध किया गया। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में प्रमुख इस प्रकार है-
– संहिता – रिग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।
– ब्राह्मण – ऐत्रेय आसेवलण्या, तान्डव्य सदविम्सा, तैत्रयी सतपथ, गौपथ आदि।
– उपनिषद – ऐत्रेय, केनाचन्डोग्य, तैत्रयी ईशकथा, प्रश्नमुकुन्द आदि।
रिगवेद के मन्त्र बदले नहीं जा सकते हैं व उनका उपयोग बलि(यज्ञ) में होता है।
यजुर्वेद में यज्ञ विधि का वर्णन है।
सामवेद में वेद रिचाओं प्रभावशाली बनाने के लिये उच्चारण की विधि दी गई है।
अथर्ववेद में तन्त्र व अवतारों का वर्णन है जो यज्ञ से संबन्धित नहीं है।
– स्मृति – मनु, याग्यवल्क, विष्णु आदि
– इतिहास – रामायण व महाभारत
– पुराण 18 महापुराण
– वैष्णव पुराण (सत्व) विष्णु, नारद, भागवत्, गरूड़, पद्म व वराह।
– शैव पुराण (रजस) मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद व अग्नि।
– ब्रह्म पुराण (तमस) ब्राहृा, ब्राहृान्ड, ब्राहृवैवर्त, मार्कन्डेय, भविष्य व वामन।
3. वैदिक जीवन व्यवस्था –
एक हिन्दु अपने जीवन में वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करता है। सामान्य दैनिक
चर्या जैसे सूर्योदय के पहले उठना, नहाना, संन्ध्या व गायत्री जप करना, भोजन करने से पहले ईश्वर को अर्पित करना, गाय को भोजन देना तथा अतिथि को भगवान मानना आदि के अतिरिक्त जीवन की चार अवस्थायें परिभाषित की गई हैं।
– ब्रह्मचर्य – 6-8 वर्ष की आयु से लगभग 18 वर्ष तक गुरु आश्रम में ब्राहृचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना।
– गृहस्थाश्रम – प्रायः यह विवाह पश्चात आरम्भ होता है। यह समय सांसारिक धन (अर्थ व काम) अर्जन का है, किन्तु यह इमानदारी व नियमानुसार होना चाहिये।
– वानप्रस्थाश्रम – जब बच्चे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जाते हैं तब माता पिता परिवारिक जिम्मेदारियों से विरक्त होकर धार्मिक कार्यों में मन लगाने लगाते हैं।
– सन्यासाश्रम – इसमें लोग घर छोड़कर जंगल में तपस्या कर परलोक सुधारने के प्रयास में लग जाते हैं।
समाज को चार वर्णों में बाँटा गया था
ब्राह्मण – समाज के हित में वेदों का अध्ययन व अध्यापन करना तथा यज्ञ पूजा आदि करवाना। जीविका के लिये दान दक्षिणा पर निर्भर रहे हैं।
क्षत्रिय – ये योद्धा व शासक होते हैं, तथा समाज की रक्षा करते हैं। बदले में कर के रूप में दूसरों से धन या सेवा प्राप्त करते है।
वैश्य – ये कृषि, कारीगरी तथा व्यापार आदि से धन अर्जित करे है।
शूद्र – ये लोग अकुशल काम या उच्च वर्ग की सेवा कर बदले में कुछ दन अर्जित कर लेते है।
5. वैदिक रीतिरिवाज
यज्ञ (बलि)को आवश्यक माना जाता था। सबसे उत्तम बलि मनुष्य की मानी जाती थी। श्रोत सूत्र सैकड़ों जानवरों की सामूहिक बली के लिये प्रयोग किये जाते थे तथा व्यक्तिगत बलि के लिये गृहसूत्र का प्रयोग होता था। गर्भ में आने से मृत्यु तक सोलह संस्कार शरीर व जीवन की शुद्धता के लिये जरूरी बताये गये है। वैदिक रीति का मुख्य हिस्सा कर्ममार्ग है, कर्म का अर्थ बलि माना गया है। मीमान्सा में इसे न्याय संगत बताया गया है। ब्रााहृणों में बताया गया कि स्वर्ग प्राप्ति के लिये अग्निस्तोमा नामक यज्ञ जरूरी है। उपनिषदों में बलि की निन्दा की गई है तथा कर्मों को महत्ता दी गई है। मनुस्मृति में विभिन्न पापों के लिये अलग अलग योनियों में पुनर्जन्म का वर्णन है।
6. हिन्दु धर्म का सार
हिन्दु धर्म के मुख्य ग्रन्थ पुराण, गीता, महाभारत व रामायण माने जाते है। रिग्वेद में विष्णु (इन्द्र के छोटे भाई) को प्रमुख देव बताया गया है। इनके दस अवतार (मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिम्ह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि) माने गये हैं। हिन्दु धर्म में चार प्रमुख सम्प्रदाय है। श्रीनिवास या रामानुज, ब्राहृ या माधव, कुमार या निम्बारक और रुद्र या विष्णुस्वामी अथवा वल्लभ। शुरुआती मध्ययुग में भारत में शैव संप्रदाय प्रमुख हो गया था। मार्कन्डेय के शिवजनबोध में शिव सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार प्रमुख तत्व हैं। स्वामी (पति), बन्धनों में जकड़ा मनुष्य (पशु) व बन्धन (पाश)। बन्धन कर्मों, माया व अहं का है। इससे मुक्ति के लिये मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करना (विद्या), संस्कारों का पालन (क्रिया), तप (योग) व धार्मिक कार्य करना (कार्य) चाहिये। देवी पूजा हमेशा ही हिन्दु संस्कृति का हिस्सा रहा है। प्रकृति व देवी से हमेशा शक्ति को जोड़ा गया है साथ ही तन्त्र मन्त्र को भी।
7. हिन्दु दार्शनिक खोज
पुरातन काल से ही भारत अपने ज्ञान के लिये जाना जाता रहा है। पारसी, ग्रीक व रोमन यहाँ के साधु सन्यासियों से सीखने को आतुर थे। 18 वीं सदी में जब पहली बार अंग्रेजी में उपनिषदों का अनुवाद हुआ तो योरोपीय विद्वानों ने इन ग्रंथों की खूबसूरती को सराहा।
हिन्दु दार्शिकता की दो धारायें है –
आस्तिक – सान्ख्य योग, न्याय विशेषिका, व वेदान्त (पूर्व व उत्तर मीमान्सा)
नास्तिक – बौद्ध व जैन विचार धारा
8. योग दर्शन
सान्ख्य दुःखो के निवारण में सहायक है। इसके अनुसार पुरुष व प्रकृति (वस्तु) दोनों अलग हैं। इन दोनों का मिलन व्यक्ति को स्वयं की प्रकृति का आभास कराता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्, रज व तम) का हर व्यक्ति में असंतुलित समावेश होता है। सभी दुःखों का कारण ये असन्तुलन ही है। योग के आठ (यम, नियम, आसन, प्रामायाम, प्रत्याहार, ध्यान व मोक्ष) रूपों के पालन से व्यक्ति प्रकृति के आकर्षण से मुक्त हो सकता है।
9. शंकराचार्य व उनका अद्वैत वेदान्त
उपनिषद विशेषकर भद्रायण के वेदान्तसूत्र में काफी बिखरे हुए वाक्यों में है। इनको समझने के लिये व्याख्या करना जरूरी है। 9वीं और 14वीं शताब्दी के बीच वेदान्त की दस शाखायें विकसित हुई, जिनकी स्वयं की व्याख्या (भाष्य व टीका) है। इनमें प्रमुख चार हैं –
– शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त
– रामानुजाचार्य का विशिष्ट वेदान्त
– माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
– वल्लभाचार्य का पुष्टि मार्ग
आदि शंकराचार्य (788- 820 बीसी) हिन्दु धर्म को बुद्ध धर्म के समानान्तर परिभाषित किया। उन्होने जगत को माया नहीं माना। उनके अनुसार ईश्वर के दो रूप थे। एक जिसकी हम पूजा करते हैं (सगुण)। दूसरा परम शक्तिमान निराकार (निर्गुण)। उनके द्वारा रचित विवेक चूड़ामणि के अनुसार बन्धन या मुक्ति स्वयं के मस्तिष्क पर निर्भर है।
मुक्ति के लिये ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत है जिसे सदाचरण, सुखों के त्याग व मुक्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा से ही पाया जा सकता है। आजकल चार शंकराचार्य पीठ (मठ) हैं।
10. कई लोग शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त को बौद्ध धर्म का छिपा रूप मानते थे। 9वीं शताब्दी में श्रीरंगम में नाथमुनि ने तमिल प्रबंधन के भक्त कवियों (अल्वर) को मान्यता देकर उनके गीतों को को पूजा में उपयोग करने की स्वीकृति देदी। पिता द्वारा विरासत में मिली पंकार्ता (पूजा विधि) व इन भक्तिगीतों ने भविष्य के अधिक रूढ़ि वादी श्रीनिवास पन्थ की नींव रखी। उनके विद्वान पौत्र ने कई ग्रन्थों की रचना कर वैष्णव वेदान्त को संगठित किया। अपनी मृत्यु शैया पर रामानुजाचार्या को बुलाकर अपनी तीन इच्छायें पूरी करने का वचन लिया। ये थीं व्यास व परसुराम (विष्णु पुराण के रचियता) मुनियों की प्रतिष्ठा पुनस्र्थापित करना, नम्मालवर (प्रमुख अलवर) के गीतों को जीवित रखना व ब्राहृसूत्र की व्याख्या करना। श्रीरंगम में रामानुजाचार्य ने कई सुधार व पूजा विधि का पुनर्गठन किया। वैष्णव संप्रदाय के विस्तार में उन्हें शैव राजा के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें भागकर मैसूर जाना पड़ा जहां का शासक उनका शिष्य बन गया। बाद में श्रीरंगम लौट कर श्रीरंगम के आचार्योंकी वैषणव वेदान्त मठाधीषों के रूप में स्थापना की। वे 120 वर्षों तक जीवित रहे व ब्राहृसूत्र की आधिकारिक व्याख्या लिखी। उन्होंने वैष्णव मंदिरों पूजा विधि निर्धारित की। आज श्रीनिवास समुदाय कापी बड़ा है तथा दो केन्द्रों में विभाजत है। कान्चीपुरम दक्षिण क्षेत्र के लिये व श्रीरंगम उत्तर क्षेत्र के लिये।
11. माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
माधवाचार्य जी (1238-1317) का जन्म उडीपी गाँव में हुआ। वे पहले अद्वैत वेदान्त के शिक्षक अच्युतप्रेक्षा के शिष्य बने। बावजूद प्रायः मत भिन्नता के वे गुरू का आदर पाने में सफल रहे व उन्हें आनंदतीर्थ नाम मिला। रामानुजाचार्य से अलग उन्होनें स्वयं का द्वैत वेदान्त स्थापित किया। मनुष्य व परमेश्वर में उन्होनें पाँच मुख्य अन्तर बतलाये। दोनों के बीच बिम्ब प्रतिबिम्ब का संबन्ध माना। परमेश्वर मूल रूप है, तथा मनुष्य उसका परावर्तित रूप है। अज्ञान ही बन्धन का कारण है तथा ईश्वर ही उससे मुक्ति दिला सकता है। वे एक प्रभावी लेखक थे तथा रिग्वेद व महाभारत के एक भाग की व्याख्या की। वे विष्णु के प्रबल समर्थक थे तथा विरोधी उनसे भय खाते थे।
12. वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग
वल्लभाचार्य (1481-1533) एक तेलगु ब्रााहृण थे, उन्होंने एक नये वैष्णव वेदान्त पुष्टिमार्ग की स्थापना की। वे भागवत् पुराण को नयी उचाँईयों तक ले गये। उनका मानना था कि संन्यास का अत्यधिक पतन हो चुका है, तथा पूजा पारिवारिक माहौल में की जानी चाहिये। उनके उपदेश का सार था कि ईश्वर की प्रसन्नता के कारण को जाना जा सकता है। पुष्टिमार्ग उदार व सबके लिये खुला है। इसमें ईस्वर के साथ को आनंददायी माना
गया है, तथा नाथ जी (मूर्ती जो वल्लभाचार्य को गिरिराज में मिली थी) की सेवा में विश्वास किया जाता है। बाद में वेदान्त का ज्ञान क्षीण होकर केवल गुरु विशेष की संस्था, पूजा विधि व प्रेरक भक्ति साहित्य का महत्व रह गया।
13. हिन्दु धर्म का अन्य धर्मों से सामना
स्वयं से अलग हुए धर्मों जैसे बौद्ध व जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दु धर्म को 14वीं शताब्दी से मुस्लिम आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अलग हुए धड़ों से मुकाबला जहाँ केवल बहस तक सीमित था, मुसलमानों ने जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने कई मन्दिरों को नष्ट किया तथा उँचे पद सिर्फ मुसलमानों को दिये। हालाकि बाद में अकबर ने हिन्दुओं को बराबर का
स्थान देने का प्रयास किया, लेकिन हिन्दुओं ने अपने को घेरा हुआ पाया फलतः वे कठोर व अन्तर्मुखी हो गये। 15वीं सदी के अन्त तक यूरोप के लोंगों के आक्रमण शुरू होने पर उसे क्रिश्चन मिशनरियों से सामना हुआ। 1857 में ब्रिाटिश साम्राज्य में आने से मिशनरी गतिविधियाँ (प्रोटेस्टेन्ट) काफी बढ़ गई। मिशनरी स्कूल खोले गये क्रिश्चन साहित्य का भारतीय भाषाओं में हुआ तथा चर्चों में धर्म परिवर्तन सभायें होने लगी। उस समय धर्म परिवर्तन साफ तौर पर लाभकारी था तथा ईसाइयों की संख्या लगातार बड़ने लगी। कुछ हिन्दुओं को ईसाइ धर्म की कुछ बातें अच्छी लगी और वे अपनी परंपरा बदलने लगे। राजा राम मोहन राय(1772-1833) ने सती प्रथा उन्मूलन व विधवाओं के जीवन सुधार आरम्भ किया। दयानंद सरस्वती ने ईसाइ धर्म का खुलकर विरोध किया व आर्यसमाज की स्थापना की।
14. पश्चिम सभ्यता का हिन्दु धर्म की प्रतिक्रिया
जहाँ राजा राममोहन राय व महात्मा गाँधी ने पश्चिम विचारधारा के कई बिन्दुओं को स्वीकार किया, सामान्य प्रतिक्रिया उसके विरुद्ध ही थी। राजा राममोहन राय ने पटना के मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी व कम्पनी की नौकरी की वे अपने वैष्णव पिता से अलग हो गये। उन्होंने स्वयं को हिन्दु धर्म के सुधार के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों को बढ़ावा देकर विज्ञान की शिक्षा पर बल दिया। रामकृष्ण परमहंस (1834-1886) गरीब ब्रााहृण परिवार में जन्मे थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगा तथा पिता व भाई की मृत्यु उपरान्त वे काली मठ में पुजारी बन गये। वे देवी के अनन्य भक्त बन गये जनेऊ त्याग कर वे अछूतों में देवी का रूप देख कर उन्हें गले लगाने लगे। उनका सभी धर्मों में विश्वास था तथा उनके उपदेश का केन्द्र था कि ईश्वर ही सब कुछ करता है। धीरे धीरे उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने विवेकानंद में नारायण का रूप देखा जो लोंगो का दुःख दूर करे के लिये आये हैं। उन्होंने विवेकानंद के शरीर पर अपना पैर रखकर उनको ईश्वर के दर्शन की शक्ति दी। बेरोजगारी से परेशान विवेकानंद ने अनुभव किया कि ईश्वर द्वारा दी गई वस्तु, प्रेम, न्याय व दुःख सभी के लिये संसार में अपना स्थान है। उन्होंने अपना जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया।
तीर्थ यात्रा के दौरान कन्याकुमारी में उन्हें समझ में आया कि आजकल के संन्यासी को व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिये जिससे समाज का भला हो सके। इस प्रकार सामाजिक उत्थान के साथ व्यवहारिक शिक्षा के विचार की शुरुआत हुई। 1893 में शिकागो की विश्व धर्म सबा में में अमेरिकन बन्धुओं से अनुरोध किया कि वे भारत में मिशनरी के स्थान पर अध्यापक व तकनीकी विशेषज्ञ भेजे। अपने भाषण के बाद वे सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने गये। फोर्ड की सहाया से स्थापित रामाकृष्ण सान्स्कृतिक केन्द्र में लगातार सम्मेलन व सभायें होती रहती हैं। महातमा गाँधी ने भी ने पश्चिम विचारधारा से प्रभावित होकर छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष किया। वे स्त्रियों के मनोबल व आध्यात्मिक शक्ति में बरोसा रखते थे। इन सभी ने भीतर रह कर ही हिन्दु धर्म में सुधार लाने का प्रयास किया।
उसके उपरान्त हिन्दु धर्म का राजनीति करण शुरू हो गया और वह एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरा। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1909 में पहली हिन्दु राजनीतिक पार्टी हिन्दु
महासभा का गठन किया जो मुस्लिमों की कट्टर विरोधी थी। जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टी दूसरी बड़ी हिन्दु पार्टी है। इसके अतिरिक्त 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 1964 में विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल आदि आक्रमक संगठन बन गये।
16. हिन्दु धर्म के आधुनिक चेहरे
रमन महर्षि(1879-1950), अरविन्दो घोष (1872-1950), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888- 1975), भक्त वेदान्त स्वामी (1896-1977, इस्कान के संस्थापक), श्रीकृष्णप्रेम वैरागी (1895-1965), सत्य सांई बाबा (1926-2011), आनन्दमयी माँ (1896-1983) आदि आधुनिक नाम है जिनके काफी अनुयायी रहे है।
17. हिन्दु धर्म के लिये आज की चुनौती
आज हिन्दु धर्म केवल रस्मों तक सीमित रह गया है। अधिकतर संत व पुजारी ब्राहृ ज्ञान त्याग कर सान्सारिक सुखों में लिप्त रहते हैं। लोग देवी देवताओं की पूजा भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिये करते हैं। ब्राहृ की अथवा स्वयं की खोज की ओर प्रेरित करना ही आज की हिन्दू धर्म के लये सबसे बड़ी चुनौती है।

अपने लक्ष्य से भटकते विश्व के धर्म

विश्व के सभी धर्मों का मूल उद्देश्य समाज में आपसी सामंजस्य, प्रेम व सहयोग की स्थापना का ही रहा है। यह बिल्कुल सच है कि समाज के सभी लोगों से समझाबुझा कर अथवा नियमों की अवहेलना करने पर दन्ड का भय दिखाकर समाज के नियमों का पालन नहीं करवाया जा सकता है। स्वभाविक विविधता के चलते समाज में कुछ लोग बुद्धिमान, कुछ दयालु, कुछ दबंग, कुछ आलसी, कुछ मेहनती, कुछ शान्त, कुछ क्रोधी आदि स्वभाव के होते हैं। इन्हीं विविधताओं के चलते समाज में अपराध, टकराव व बिखराव की स्तिथियाँ उत्पन्न होना स्वभाविक है। विभिन्न समाजों ने इस समस्या से निपटने के लिये आरम्भ से ही प्रयास किया है। इसका सबसे आसान उपाय जो लगभग सभी समाजों ने अपनाया वह था नियम बनाने का व नियमों के न मानने पर दन्डित करने का। इसी उपाय ने समाज में एक प्रसाशनिक ढाँचे की नींव रखी जो समय के साथ विकसित होता रहा। इस उपाय में सबसे बड़ी कमी थी पूरे समाज पर नजर रखने की आवश्यकता। समाज के विस्तार के साथ यह उपाय अधिक प्रभावी नहीं रह पाया। परिणाम स्वरूप एक ओर अधिकारी स्वेच्छारी हो गये व दूसरी ओर कानून की नजर से बचकर लोग गलत काम करने लगे। परिणाम स्वरूप समाज में अराजकता बढ़ने लगी। इसी परिस्थिति को सुधारने के लिये सामाजिक चिन्तकों ने धर्म का सहारा लिया। लगभग सभी धर्मों के मूल में इसीलिये ये बातें मूलतः मिलेंगी
1. एक महाशक्ति (ईश्वर) है जो सब देखती है व संसार का संचालन करती है।
2. मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है। यह फल इस जन्म में अथवा अगले जन्म में अवश्य ही मिलता है।
3. सत्य का पालन, जीवों पर दया, दूसरों की सहायता, बड़े बूड़ों व बीमार लोगों की सेवा, बड़ों का आदर करना व समाज के नियमों का पालन करना आदि पुण्य कार्य हैं जिनका फल अच्छा मिलता है।
4. लोभ, क्रोध, घृणा, झूठ बोलना, निर्बल को सताना, दूसरों का हक छीनना आदि पाप है, जिनका फल बुरा मिलता है।
5. ईश्वर हमेशा कमजोर की सहायता करता है। सच्चे मन से स्मरण करने से वह किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य ही करता है।
6. गलती से गलत काम हो जाये उचित प्रायश्चित से उसके परिणाम से मुक्ति मिल सकती है।
7. इस जन्म के कुल कार्यों के अनुसार ही मनुष्य मृत्यु उपरान्त स्वर्ग अथवा नर्क का पात्र होता है।
यह स्वभाविक था कि इस विचारधारा का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाये। इसके लिये प्रचारकों की बड़ी टीम तैयार करने तथा उन्हें प्रशिक्षण देने के लिये संगठन बनाये गये। समाज पर उचित प्रभाव हो इसलिये इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि प्रचारक स्वयं धर्म में विश्वास रखने वाले हों व उसके अनुसार आचरण करें। संगठन सुचारु रूप से चले इसके लिये समाज से स्वेच्छा से दान देने को धर्म पालन का ही एक हिस्सा भी बनाया गया। विचारधारा को सामान्य लोगों की समझ में आसान बनाने के लिये प्रार्थना स्थलों की जगह जगह स्थापना की गई। यही स्थल प्रचार प्रसार का केन्द्र भी बन गये। इस विचारधारा के आशातीत परिणाम सामने आये। सामान्य जनता व प्रशासक वर्ग पर इसका लगभग एकसा प्रभाव देखने को मिला, परिणाम स्वरूप बिना विशेष प्रयास के सामाजिक व्यवस्था में काफी सुधार देखने को मिला। शासक वर्गों को समाज को व्यवस्थित रखने का यह तरीका बहुत आसान लगा। अतः शासक वर्गों ने इन संगठनों को समर्थन व सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। समाज ने भी इस विचार धारा को दिल से स्वीकार किया व इस विचारधारा को न मानने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। कई सदियों तक यह विचारधारा समाज पर स्वनियंत्रण बनाये रखने में सफल रही। अपवाद स्वरूप ही समस्यायें समाज में देखने को मिलती थी जिनकों प्रशासन के लिये नियन्त्रण करना कठिन नहीं था।
शासक वर्गों का वरद हस्त मिलने के साथ ही धार्मिक संगठनों में सत्ता के निकट पहुँच कर अपनी शक्ति बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा होने लगी। यह धर्म को अपने लक्ष्य से भटकाने वाला पहला कदम सिद्ध हुआ। प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने के प्रयास में धर्म प्रतिनिधियों ने शासकों व शक्तिशाली वर्गों के गलत कार्यों को जनता में उचित व जायज बताने का प्रयास किया। बदले में उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप धार्मिक केन्द्र स्वयं एक सत्ता केन्द्र बनने लगे। ऐसे केन्द्र प्रमुख सादगी से हटकर भोग विलास का जीवन जीने लगे। इसका प्रभाव यह रहा कि सत्ता लोलुप व लालची लोग इस ओर आकर्षित होने लगे। इस प्रकार समय के साथ प्रर्थना स्थलों की जगह पूजा स्थलों ने लेली। इन पूजा स्थलों में भेंट चढ़ाना आवश्यक हो गया। पूजा स्थलों का विकास तेजी से हुआ। तथा पाप निवारण तथा स्वर्ग प्राप्ति के लिये नये नये तरीके स्थापित किये गये। इन पर खर्च व्यक्ति की हैसियत देख कर निर्धारित होता था। समाज ने इन उपायों को मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की उम्मीद में सहर्ष स्वीकार किया। कई सदियों तक ये प्रथायें पनपती रहीं। स्वेच्छिक दान से अलग लोभ अथवा भय के कारण दान की प्रथा ने धर्म के प्रति लोगों की आस्था कम करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
उपरोक्त दो महत्वपूर्ण बदलावों ने धर्म के स्वरूप को बदल दिया। प्रतिस्पर्धा ने धर्म के विघटन को बढ़ावा दिया जिससे कई शाखायें व उपशाखायें लगभग सभी धर्मों में स्थापित हो गई धर्म ने लगभग एक व्यापार का स्वरूप ले लिया। अपना व्यापार बढ़ाने के लिये ये प्रतिष्ठान विज्ञापन, प्रवेश शुल्क, विशेष पूजा व प्रसाद व अन्य उत्पादों की बिक्री से अपना व्यवसाय बढ़ाने में व्यस्त हैं।
इन बदलावों का ही परिणाम कि आज धर्म में मन से आस्था रखने वाले व धर्म के मूल सिद्धान्तों का पालन करने वाले लोग समाज में कम ही मिलेंगें। अधिकतर धर्मस्थलों में लोग या तो पर्यटक की तरह अथवा भेंट चढ़ाकर अपने पापों के बोझ से मुक्ति पाने के लिये ही जाते हैं।
धर्म अपने मूल उद्देश्य समाज में सामंजस्य, सद्भावना व सहयोग से बहुत दूर चला गया है यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक स्थलों में बढ़ती भीड़ के बावजूद आज भ्रष्टाचार, बेईमानी, अपराध. आतन्कवाद व अत्याचार की घटनायें रोज बड़ी संख्या में देखने सुनने को मिलते है।

आधुनिक समाज और धर्म

विश्व में सभी धर्मों का उद्भव समाज के उत्थान के लिये व मानव मूल्यों की स्थापना के लिये ही हुआ है। यह सामाजिक चिन्तकों द्वारा समाज में आपसी सामंजस्य एवं व्यवस्था को स्थापित करने हेतु बनाई गई एक आचार संहिता है।
समाज की आवश्यकतायें समय के साथ बदलती हैं। लेकिन धर्म का स्वरूप आज भी थोड़े बहुत फेर बदल के साथ पुरातन ही है। अतः आज धर्म को लोग एक परंपरा के रूप में ही लेते हैं। धर्म गुरु भी विश्व भर में इसे इसी रूप में अपने अपने तरीके से आगे बड़ाने का प्रयास कर रहें हैं।
इन प्रयासों में समय के साथ कई विकृतियाँ जैसे अन्धविश्वास, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, धन व बल संग्रह की प्रवृत्ति आदि साफ दिखती हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो धर्म आज एक व्यवसाय हो गया है।
धर्म के पथ प्रदर्शक के रूप में आज भी हजारों वर्ष पूर्व रचित ग्रन्थों को ही माना जाता है। ये धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, कुरान, बाइबल आदि निसंदेह अपने समय के महत्वपूर्ण एवं महान रचनायें हैं। लेकिन आज के सामाजिक संदर्भ में इनका कितना महत्व है इस पर विचार करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
ये आश्चर्य की बात है कि आज के विद्वान इन ग्रन्थों की मीमान्सा तो अपने तरीके से समय समय पर करते रहते है। लेकिन किसी भी विद्वान ने एक नये सिरे इन विषयों पर विचार करने की आवश्कता महसूस नहीं की। यही एक कारण है जिसकी वजह से आज धर्म का मूलभूत आधार जो सामाजिक उत्थान से जुड़ा था वह उससे अलग हो गया है।
ऐसा नहीं है कि समाज सुधार के प्रयास नहीं हो रहें हैं। ऐसे कई महापुरुष हुए हैं और आज भी हैं जिन्होनें अपना संपूर्ण जीवन समाज की उन्नति व सुधार के लिये समर्पित कर दिया है। किन्तु ये प्रयास मानव सेवा को धर्म मान कर किये गये प्रयास हैं और उनका प्रतिफल भी एक सीमित सीमित स्वरूप में ही रहा है।
आज धर्म के नाम पर कई आयोजन करोड़ों रूपये लगा कर विश्व भर में आयोजित किये जातें हैं। लोग उसमे अपना योगदान धन व समय लगा कर देतें भी हैं। लेकिन समाज पर इन आयोजनों का प्रभाव एक सामाजिक मिलन से अधिक कुछ देखने को नहीं मिलता है।
यह भी देखने में आता है कि लोग करोड़ों रूपये खर्च कर कई प्रकार के अनुष्ठान आयोजित करते हैं। इनका उद्देश्य मात्र अपना समाज में महत्व दिखाने अथवा अपना अपराध बोध कम करने के लिये अधिक समाज की भलाई के लिये कम होता है।
आज धार्मिक प्रतिष्ठानों के पास अपार संपदा है एवं धार्मिक गुरु एवं विद्वानों के पास
सभी प्रकार के साधन एवं सुविधायें। लेकिन सामाजिक मूल्य आज इतिहास के निम्नतर स्तर पर हैं। पुराने विद्वानों ने भगवान अथवा ईश्वर को सर्व व्यापी, पाप व पुण्यों का हिसाब रखने वाला व अन्त में मनुष्य को उसके कर्मो के अनुसार दन्ड अथवा पुरस्कार देने वाला स्थापित किया था। लोगों में यह भावना घर कर गई थी कि ईश्वर का न्याय सटीक व बिना किसी भेदभाव के होता है। अतः अधिकतर लोग भगवान अथवा ईश्वर से डरते थे एवं नियन्त्रित आचरण करते थे। इस कारण समाज में एक व्यापक स्तर पर समन्वय व शान्ति बनी रही। यदा कदा कुछ लोग दुराचरण करते थे तो सामाजिक व्यवस्था उसे दण्ड देती थी।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्तिथियों में तेजी से बदलाव आया है। आज शक्ति संपन्न वर्ग यह मानता है कि वह कुछ भी गलत कर सकता है। एक उचित अनुष्ठान अथवा यथोचित भेंट किसी धर्मस्थल पर चढ़ा कर वह ईश्वर से अपने किये की क्षमा माँग सकता है। ईश्वर से क्षमा मिले या नहीं उसका अपराध बोध तो कम अवश्य ही हो जाता है। और वह उससे भी बड़े अनेतिक कार्य की योजना बनाने में लग जाता है। शक्ति व साधन के बल पर प्रायः ये लोग सामाजिक व्यवस्था के दण्ड से भी बच जाते हैं। इस वजह से ईश्वर की निस्पक्षता पर लोगों का विश्वास कम हुआ है। परिणाम स्वरूप शक्ति साधन हीन लोग भी दुराचरण निडर होकर करने लगे है। यही वजह है कि मानव मूल्य आज निम्नतर स्तर पर हैं।
भगवान से क्षमा माँगने अथवा अपने अपराध बोध को दबाने वाले श्रदधालुओं की बढ़ती संख्या के फल स्वरूप ही आजकल धार्मिक स्थलों की संख्या व उनका स्तर तेजी से बढ़ रहा है। और उतनी ही तेजी से बढ़ रही है सामाजिक अपराधों की संख्या एवं उनके आकार।
धर्म व अपराध की एक साथ प्रगति आज के समाज में धर्म की सार्थकता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।
इसलिये आज आवश्कता है धर्म को नये सिरे से परिभाषित करने की। यह सौभाग्य की बात है कि आज धार्मिक संगठन साधन संपन्न है और धार्मिक विद्वानों की भी विश्व में कमी नहीं है। आज जरूरत है तो सिर्फ इतनी कि विश्व भर के विद्वान व धर्म संस्थान मिल कर इस विषय पर ध्यान केन्द्रित करें। और शोध करें एक ऐसे नये धर्म की जो मानव मूल्यों की व एक सभ्य समाज की पुनस्र्थापना में सहायक हो सके।

आज का इंसान आखिर क्या चाहता है

आज का इन्सान आखिर चाहता क्या है

आज हम लोग अपनी उन्नति का बखान करते नहीं थकते। मेडिकल साइन्स वाले कहते
है हमने मनुष्य बनाने का रहस्य जान लिया है। अब हम दिये हुए गुणों के अनुसार मानव
भ्रूण अथवा अन्य किसी भी जानवर का बीज का प्रारूप तैयार कर सकते है। भौतिक
शास्त्री प्रकृति की उत्पत्ति की गुत्थी को सुलझाने का दावा कर रहे हैं। आज हम ब्राम्हांड
के किसी भी कोने में पहुँच सकने का दावा भी करते हैं। सुख सुविधा के सब साधन
जुटाने का काम तो हम निरन्तर कर ही रहें हैं। लेकिन क्या ये प्रयत्न वास्तव में जिस
उद्देश्य से किये गये थे उसे पूरा करने में सहायक हुए है इस पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह
आज लगा हुआ है।

क्या आज लोग दुनिया के किसी भी कोने में पिछले सौ साल की तुलना में अधिक सुखी
व सन्तुष्ट है। ये एक विडम्बना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा व सहुलियत के
साधन बढ़ाने के प्रयास किये उतनी ही उसकी असुरक्षा की भावना व चिन्तायें बढ़ती गई।
विकास की ये विसंगतियाँ लगभग हर क्षेत्र में आज देखने को मिलती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में
आज साधनों के साथ बीमारियाँ बढ़ रही है। सुख सुविधाओं के साथ बैचेनी बढ़ रही है।
संचार साधनों में प्रगति के साथ दिलों की दूरियाँ बढ़ रही हैं। परिवाहन साधनों की प्रगति
के साथ दुर्घटनायें बढ़ रही है। चाँद तक तो हम आज हफ्ते भर में पहुँच सकते हैं लेकिन
पड़ोसी तक पहुँचने में महीनों निकल जाते हैं। ये प्रगति मानव को कहाँ ले जायेगी कह
पाना मुश्किल है।

ये बदलाव क्यों आया इस पर गौर करने की आवश्कता है। यह जरूरत इसलिये है भी
कि यदि हम परिवर्तन की दिशा बदलना चाहें तो हमें क्या करना चाहिये यह हम जान
सकें। आज का समाज जिस ओर अग्रसर है उसके मूल में सोच में आया एक महत्वपूर्ण
बदलाव है। और यह बदलाव है हमारे सोच का स्वयं पर केन्द्रित होना। पहले हमारी सोच
का आधार हुआ करता था त्याग, दूसरों की भलाई, मुसीबत में दूसरों की सहायता, बड़ों
का सम्मान, दया,प्यार आदि आदि। इसके अतिरिक्त लोग समाज में अपनी छबि के प्रति
कफी सचेत रहते थे। अतः पहले प्रायः लोग किसी भी कार्य को करने के पहले सोच को
उपरोक्त आधारों पर तोल लेते थे। समाज के अलावा धर्म की भी मनुष्य के व्यवहार में एक
अहम भूमिका होती थी। लोग भगवान से डरते थे व हर कार्य को पाप व पुण्य के तराजू में
तौल कर निर्णय लेते थे।

विज्ञान की प्रगति के साथ मनुष्य की तर्क शक्ति का विकास हुआ, और उसके साथ ही
पाप पुण्य से विश्वास डगमगाने लगा। साथ ही धर्म के पंडितों ने पाप कर्म की काट के
लिये दान, अनुष्ठान आदि उपाय खोज निकाले जिससे लोगों के मन से गलत कार्य करने
के बाद होने वाला अपराध भाव का बोझ दूर नहीं तो कम अवश्य ही होने लगा। शायद
भगवान से डर दूर होने के साथ ही समाज का डर भी नहीं रहा। परिणाम स्वरूप शुरु हुई
धन एवं शक्ति संग्रह की एक ऐसी दौड़, जिसमें कुछ भी करना जायज था। उदेश्य रह
गया तो सिर्फ एक, वह यह कि किसी भी सूरत में मुझे सबसे आगे निकलना हैं। शक्ति व
धन संग्रह की इस दौड़ ने मनुष्य का ध्यान स्वयं पर केन्द्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धन व शक्ति किसके पास कितनी है, यह दिखलाने का एक ही तरीका हो सकता है। वह
है उसका प्रदर्शन। और इस प्रकार शुरु हुआ धन व शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला। कोई
बड़े बड़े मन्दिर बना रहा है तो कोई बड़ी बड़ी धर्मशाला। कोई विशाल धार्मिक आयोजन
कर रहा है तो कोई प्रतिद्वन्दी को नीचा दिखाने का षडयन्त्र रच रहा है। गलत कार्य करने
पर जो दन्ड का विधान प्रशासन ने बनाया है वह भी आज शक्ति व धन के प्रदर्शन के
प्रभाव से नहीं बच पाया और समय के साथ इसने भ्रष्टाचार का विकराल रूप ले लिया।
कहतें हैं कि पाप की कमाई बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। यही कारण है कि आज दुराचार
सड़क पर आ गया है। आज हत्या, लूट व बलात्कार आम है। नैतिकता का इतना
अवमूल्यन हो गया है कि 2-3 साल की बच्ची का भी दुराचार का शिकार होना आम बात
हो गई है। आज शक्ति व धन संग्रह की होड़ व उसके प्रदर्शन में दया, धर्म, परोपकार
आदि मानव मूल्य जो एक सभ्य समाज का आधार हुआ करते थे वह प्रायः लुप्त हो गये
हैं।

ऐसा नहीं कि पहले अनैतिक कार्य करने वाले लोग नहीं होते थे, लेकिन वे कुछ गिने चुने
व मार्ग से भटके लोग ही हुआ करते थे। लोग उन्हे पापी और दुष्ट मान लेते थे और
भरोसा रखते थे कि ईश्वर उनको दन्ड अवश्य ही देगा। उनका उदाहरण देकर वे बच्चों
को गलत राह पर न चलने का पाठ पढ़ाते थे। लेकिन आज चारों ओर अनैतिकता का
साम्राज्य है। और अधिकतर लोग आज यह मानते हैं कि सफलता के लिये धन व शक्ति
का होना जरूरी है, वे किसी भी सूरत में इन्हें पाना चाहते हैं।

अवश्य ही इस प्रकार पायी सफलता अन्दर ही अन्दर व्यक्ति को कचोटती रहती है जिस
कारण बहुत कुछ पा लेने के बावजूद वह सुख एवं सन्तोष महसूस नहीं कर पा रहा है।
आखिर इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या है। समस्या का हल मूल कारण दूर
करने में ही है। आज आवश्यकता है मनुष्य को अपना ध्यान स्व से हटा कर दूसरों पर
केन्द्रित करने की।

एक सीधा सा तरीका हो सकता है सिर्फ इन्तजार करने का। जो हो रहा है उसे होने दें।
मनुष्य का स्वभाव है कि वह कुछ समय बाद हर चीज से ऊब जाता है, और कुछ नया
करना चाहता है। इसकी पूरी संभावना है समय के साथ मूल्य फिर बदलें और फिर समाज
के सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें। हाँ यह सब होने में कितनी सदियाँ लगेगी कह
पाना कठिन है।

दूसरा तरीका वैज्ञानिक हो सकता है। यह सम्भव है कि कुछ वर्षों में विज्ञान में हम इतनी
प्रगति कर लें कि मनुष्य के मस्तिष्क को नियन्त्रित करने का उपाय खोज निकालें। तब
मनुष्य के मस्तिष्क को जैसा चाहे ढाल सकें। यदि मस्तिष्क को भावना शून्य ही कर दिया
जाय तो सुख दुःख से परे एक मशीनी समाज का निर्माण समस्या को जड़ से ही समाप्त
कर देगा।

तीसरा तरीका हो सकता है नये सिरे से भगवान के समकक्ष अथवा उनसे भी बड़कर
एक नयी सर्वव्यापी, निष्पक्ष शक्ति रूप की प्रतिष्ठा जिसका डर मनुष्य के ह्मदय में पुनः बैठ
सके।

यह डर मनुष्य को अपने विवेक का उपयोग दूसरों की भलाई के लिये प्रेरित करेगा और
पुनः एक ऐसे समाज जिसमें हर व्यक्ति दूसरों की भलाई एवं उन्नति के बारे में सोचे व
अपने कर्मों का आधार बनाये। निश्चित ही ऐसे समाज में अमन चैन के अतिरिक्त कुछ
और हो ही नहीं सकता है।