समाज व बुराइयाँ

 

लगभग सभी वर्ग के लोग आज की सामाजिक स्थिति पर चिन्ता व्यक्त करते नहीं थकते। बुजुर्ग अपने जमाने के अनुशासन व संवेदनशीलता पर व्याख्यान देने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। युवा अपने आदर्शों व आज के समाज में प्रगति की राह में तकरार के कारण मध्यमार्ग खोजने में व्यस्त हैं। कुछ आदर्शवादी लोग सोशियल मीडिया पर सरकार व नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खोलकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। इस सबसे एक बात तो साफ है कि मनुष्य समाज से आज भी जुड़ाव महसूस करता है। सामाजिक स्थिति से उसकी असजता उसकी स्वयं को असहाय महसूस करने का परिणाम है। यह केवल आज ही की स्थिति नहीं है। वेदान्त साहित्य में भी लगभग आज हो रहे सभी प्रकार के अपराध तथा अपराधी को दण्ड के विधान का विस्तृत विवरण मिलता है। सामाजिक सुधार के लिये मृत्योपरांत स्वर्ग व नर्क की कल्पना आदर्श समाज स्थापित करने की दिशा में एक अद्भुत प्रयास था।  तब से लेकर आजतक नये नये कानून व उनका पालन करवाने के लिये व्यवस्था का विकास सतत रूप से जारी है। किन्तु इन सभी प्रयासों के बावजूद समाज में अपराध व बुराइयाँ कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। इसका प्रमुख कारण मनुष्यों में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियाँ होती हैं।

  1. अहं – अहं का विकसित रूप प्रायः समृद्ध एवं सफल व्यक्तियों में देखने को मिलता है। ऐसे लोग अपने को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। ये मजबूर व जरूरतमन्द लोगों को निम्न श्रेणी का मानकर अपमानित करने में नहीं संकोच करते हैं। इसी श्रेणी में शासकीय वर्ग भी आता है जो स्वयं को शक्ति संपन्न व शासकीय अनुमति के आवेदन कर्ता को असहाय मानकर चलता है।
  2. मद – कई लोग जो शक्ति संपन्न होते हैं अथवा शक्ति संपन्न लोगों के करीबी होते हैं, प्रायः इसका प्रदर्शन करने से स्वयं को रोक नहीं पाते हैं। इसका प्रदर्शन वे अपनी अर्थ व बल संकलन से करते हैं। अर्थ संकलन के लिये वे कई तरह के गैर कानूनी तरीके अपनाते हैं। तथा बल संकलन के लिये असमाजिक तत्वों को अपनी छत्र छाया में संरक्षण देकर अथवा ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों को अपनी सेवा में लेकर करते हैं। ऐसे लोग प्रायः राजनेताओं, उच्च अधिकारियों व गैर कानूनी व्यवसायियों में पाये जाते हैं।
  3. लोभ – कुछ लोगों में धन संग्रह की तीव्र प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग किसी प्रकार से धन कमाकर अपने लिये ऐशो आराम की वस्तुऐं एकत्र करते हैं। किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा होने पर उसे पा लेने के लिये हर संभव प्रयास करते हैं। ऐसे लोग कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। ऐसे व्यक्ति हर जगह हर स्तर पर पाये जाते हैं।
  4. मोह – कुछ लोग व्यक्ति अथवा वस्तु विशेष से विशिष्ट रूप से जुड़ जाते हैं। उसकी रक्षा अथवा प्रगति के लिये वे कुछ भी कर सकते हैं। इस श्रेणी में एक ओर जहाँ देश के लिये प्राण न्योछावर करने वाले देश भक्त आते हैं। तो दूसरी ओर पुत्र मोह में धृतराष्ट्र जैसे लोग जो अपने अजीज के हर अत्याचार से आँख मूंद लेते हैं। कुछ लोग स्वयं के मोह में भी फँस जाते हैं।
  5. ईर्षा – कुछ लोगों की नज़र हमैशा दूसरों पर अधिक केन्द्रित रहती है। ऐसे लोग स्वयं की उपलब्धि को दूसरे से कमतर पाते हैं। ऐसी स्थिति में हीन भाव से ग्रस्त होकर कई बार दूसरे को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के लोग प्रायः आफिस में सहकर्मियों अथवा मोहल्ले में पड़ौसी के रूप में मिल जाते हैं।
  6. हिंसा – इस प्रवृत्ति से ग्रसित लोग पहले जंगल में शिकार करके अथवा आस पड़ौस में जानवरों को देखकर पत्थर मारकर संतोष कर लेते थे। किन्तु आजकल मनुष्यों को मारना अधिक आसान हो गया है। बदले, हीन भावना अथवा अपराध छिपाने की भावना हिंसा प्रज्जवलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  7. वासना – वासना ग्रसित लोग किसी के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि उसे पाने के लिये विवेक खो बैठते हैं। ये आसक्ति किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति हो सकती है। लेकिन आज के परिपेक्ष में यह काम वासना का विकृत रूप ले चुका है जिसने मनुष्य को जानवरों से बदतर हालात में ला खड़ा किया है।
  8. घृणा – इस प्रवृत्ति के लोग किसी व्यक्ति विशेष से इतनी नफरत मन में बिठा लेते है कि उसे किसी भी प्रकार से मिटा अथवा कम नहीं किया जा सकता। वे हर संभव मौके पर उस व्यक्ति की बुराई शुरू करने लगते हैं। जरूरी नहीं कि घृणा का कारण जायज हो।

आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व तक माता पिता, शिक्षक व समाज के दबाव के चलते बचपन से ही इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की सीख दी जाती थी। परिणाम स्वरूप समाज में बुराईयाँ सीमित रूप में ही देखने को मिलती थी। बिखरते संयुक्त परिवार, माता पिता की व्यस्तता, शिक्षकों व माता पिता की सीख एवं आचरण मे विरोधाभास एवं कमजोर सामाजिक बंन्धनों के चलते इन प्रवृत्तियों पर मनु्ष्य का नियंत्रण कम होता गया। भोग विलास के साधन, संपन्नता प्रदर्शित करने की प्रतिस्पर्धा एंव धनबल, बाहुबल से न्याय को प्रभावित कर पाने की क्षमता से प्रेरित मनुष्य आज इन प्रवृत्ति जनित बुराईयों आज अपनी सफलता का आधार मानने लगा है।

इस परिस्थिति से उबरने का सिर्फ एक ही उपाय हो सकता है। वह है मनुष्य स्वयं में संतोष, दया, सहृदयता, संवेदन एवं त्याग की प्रवृत्तियों का पोषण करे।

संकल्प से सिद्धि का आव्हान

 

प्रधान मंत्री श्री मोदी जी का अगस्त क्रान्ति के अवसर पर अगले पाँच वर्षों में देश को भ्रष्टाचार, निर्धनता, आतंकवाद, गंदगी  व जाति अथवा धर्म के आधार पर भेदभाव से मुक्त करने के आव्हान का प्रत्येक देश प्रेमी नागरिक अवश्य ही स्वागत करेगा। काश वे इन बुराइयों में अपराध को भी शामिल कर लेते।

क्या यह लक्ष्य प्राप्त करना संभव है?

अगस्त क्रान्ति के समय में और आज के समय में एक मूलभूत अंतर है। उस समय जहाँ अधिकतर जनता अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त थी, आजकल अधिकतर लोग इन बुराइयों के आदी हो गये हैं। इतना ही नहीं कई लोगों ने तो इन बुराइयों को अपने लाभ का साधन बना रखा है। अतः इन बुराइयों से देश को उबारने के लिये एक सामाजिक क्रान्ति लाने की जरूरत पड़ेगी जो लोगों की सोच बदले। लोगों को इन बुराइयों से घृणा होने लगे। यदि हम ऐसा कर पाने में सफल हो पाते हैं तो ही यह संकल्प पूरा हो पायेगा।

केन्द्र सरकार ने इसकी सफलता के लिये देश के विभिन्न भागों में तिरंगा यात्रा निकालने व शिक्षण संस्थाओं में शपथ ग्रहण समारोह के आयोजन का निर्णय लिया है। किन्तु आज के नेताओं पर अविश्वास के परिपेक्ष में इसका अनुकूल प्रभाव संदिग्ध नजर आाता है। हाँ यह संकल्प से सिद्धी कार्यक्रम के प्रति जागरुकता पैदा करने में अवश्य ही सहायक हो सकता है।

क्योंकि समाज व्यक्तियों से बनता है। अतः बदलाव की शुरूआत भी व्यक्तिगत बदलाव से ही होगी। सामाजिक बदलाव के लिये एक ऐसी नयी पीढ़ी की जरूरत पड़ेगी, जो समाज के उत्थान के लिये अपना सब कुछ त्याग कर युवाओं को इस आन्दोलन से जोड़ सके। यह संभव हो सकता है यदि:-

  1. देश के विभिन्न हिस्सो में कुछ ऐसे युवाओं को चिन्हित किया जाये जो इस संकल्प के लिये अपना सब कुछ त्याग कर समर्पित होने के लिये तैयार हों। ये युवा अपने अपने क्षेत्र में वदलाव के लिये माहौल पैदा करें व बदलाव के लिये समर्पित अन्य युवाओं को जोड़ें। ऐसे युवाओं को संकल्प सेवक का परिचय पत्र तथा आसान पहचान के लिये निर्धारित परिवेष रखा जाये। एक साधारण से संकल्प भवन में इनके सादे जीवनयापन की व्यवस्था सरकारी व्यय से की जाये। इनका प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र में चिन्हित बुराइयों को रोकना व जन मानस में इन बुराइयों के प्रति असहिष्णुता पैदा करना हो।

 

  1. इस संकल्प की पूर्ति के लिये चरित्र विकास की आवश्यकता है। चरित्र गठन में आरम्भ के दस वर्ष अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इस समय परिवार के सदस्य, संबन्धी एवं पड़ोसी तथा शिक्षकों की चरित्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह दुखःद सत्य है कि आजकल अधिकांश बच्चे सिखाये गये आचरण के प्रतिकूल सिखाने वाले का आचरण पाते हैं। यह अविश्वास को जन्म देता है तथा नैतिक शिक्षा व्यर्थ हो जाती है। पारिवारिक व सामाजिक परिवेष में परिवर्तन तो सामाजिक बदलाव से ही आयेगा। लेकिन शिक्षकों के आचरण पर अंकुश लगाने की सख्त जरूरत है। किसी भी प्रकार का गलत आचरण शिक्षक को सेवा के अयोग्य घोषित करने के लिये काफी होना चाहिये। सिफारिशी पदस्थापना, आरक्षित पदस्थापना व उपरी संरक्षण के चलते यह असंभव है। शिक्षण संसथानों को इनसे मुक्त कर योग्यता एवं अनुकूलता के आधार पर शिक्षकों का चयन कर पदास्थापना द्वारा ही यह संभव है।

 

  1. राजनीतिक शुद्धिकरण भी संकल्प पूर्ति के लिये बहुत जरूरी है। आजकल चुने हुए अधिकतर प्रतिनिधि अपने को जनता से ऊपर शक्ति संपन्न व कानून से ऊपर मानते है। चुनाव जीतने के लिये सभी प्रकार के हथकंडे अपनाये जाते हैं। इस तरह से चुनकर आने वालों से इन बुराइयों को दूर करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? इसके शुद्धिकरण की शुरुआत संकल्प सेवकों जो आसपास की जनता में अपनी निस्वार्थ सेवा से निर्मल छबि बना चुके हैं। उनको राजनीति में आकर करनी  चाहिये। बिना बड़ी बड़ी चुनावी सभावों व शोर शराबे के ये सिर्फ व्यक्तिगत संपर्क के बल पर चुनाव जीत कर लोक सभा व विधान सभा में आ सकते हैं। जीतने के बाद ये लोग अन्य सदस्यों जैसा वेतन, भत्ता व अन्य सुविधा न लेकर साधारण गुजारे लायक वेतन लें। शायद इससे अन्य सदस्यों को भी शर्म आये। जनता में इस प्रकार के आचरण से संकल्प सेवकों के प्रति सम्मान बढ़ेगा व यही राजनीतिक शुद्धिकरण की शुरुआत की नींव बनेगी।

 

  1. न्यायपालिका इस संकल्प सिद्धी की सफलता के लिये एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें भी काफी सुधार की गुंजाइश है। यह एक स्थापित सत्य है कि गंभीरतम अपराधों में भी अंतिम फैंसला आने तक वर्षों बीत जाते हैं। यदि मामले में प्रभावशाली व्यक्ति अथवा राजनीतिक स्वार्थ निहित है तो शायद ही फैंसला अन्तिम पढ़ाव तक पहुँचे। इसके विपरीत कई गरीब छोटे से अपराध के लिये सालों जेल में न्याय का इन्तज़ार करते रहते हैं तो वहीं कई गरीब व लाचार लोग उस अपराध में फँसा दिये जाते हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिये मुख्य न्यायाधीश को ही कुछ कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। कुछ सुझाव उनके ध्यानाकर्षण इस प्रकार हैं :-

 

  1. सभी मामलों का गंभीरता के अनुसार ७ या ८ श्रेणियों वर्गीकरण किया जाये व उसके अनुसार फैंसला सुनाने के लिये न्यायालय की बैठके निर्धारित (१ से ५० अधिकतम) की जाये।
  2. गंभीर अपराधों की सुनवाई लगातार हो। तथा गवाहों की अधिकतम सीमा हर मामले में निर्धारित की जाये।
  • झूठी गवाही व गलत जानकारी देने वाले वकील व गवाह पर आर्थिक दन्ड गंभीरता अनुसार तुरन्त लगाया जाये। तीन से अधिक बार गलत जानकारी अथवा गवाह पेश करने वाले वकील को अयोग्य घोषित किया जाये।
  1. ऊपरी अदालत में अपील निचली अदालत के फैंसले में कोई कमी पाये जाने के बाद ही स्वीकृत की जाये। इसका रिकार्ड संबन्धित जज की वार्षिक रिपोर्ट में रखा जाये।
  2. विभिन्न न्यायालयों की वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये।

कई लोगों को शायद ये अव्यहवारिक लगे।

मानव अधिकार के नाम पर

 

सभी प्राणियों में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने की सहज पृवत्ति होती है। कई प्रकार की प्रतिस्पर्धायें श्रेष्ठता स्थापित करने का माध्यम आदिकाल से रही है। मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से कई नयी नयी प्रतिस्पर्धाओं का आविष्कार अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिये किया। इनमें गुलामों को रखना व उन पर अत्याचार करना निसंदेह मनुष्य की क्रूरता की पराकाष्ठा थी। इसके विरोध में समाज सुधारकों का आवाज उठाना आवश्यक था। धनवानों, बाहुबलियों व प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा निर्धन व निःसहाय मनुष्यों पर अत्याचार व उनका शोषण आज भी लगभग पूरे विश्व में जारी है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। इसी नियंत्रण के लिये कई शासकीय, व अशासकीय मानव अधिकार संगठन विश्व भर में गठित हैं। ये संगठन अपराधी की सजा, आदिवासियों के विस्थापन, बाल मजदूरी, महिलाओं व दलितों व निर्बलों के विरुद्ध अन्याय पर नजर रखते हैं तथा आवश्यकता पढ़ने पर उनकी सहायता करते हैं। ये इन वर्गों के साथ अन्याय न हो ऐसा कानून बनाने के लिये सरकारों पर दबाव भी बनाते हैं। ये सब प्रयास अवश्य ही सराहनीय हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में ऐसा देखने को मिल रहा है कि कुछ संस्थान मानव अधिकारों की आड़ में देश में सुनियोजित रूप से अराजकता व अस्थिरता फैलाने में सहायता कर रहें हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-

  1. जे एन यू में लगभग साल भर पहले एक कार्यक्रम के दौरान देशद्रोही नारे लगे। उसका संज्ञान लेकर नारा लगाने वाले छात्र के विरुद्ध कार्यवाही की माँग क्या शुरु हुई कि कई मानव अधिकार के रक्षक अचानक जाग उठे। चारों और हल्ला मच गया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का गला घोटा जा रहा है। जैसे किसी ने उस छात्र को फाँसी की सजा सुनादी हो। हफ्ते भर तक टेलिविजन पर लगातार देश में मौलिक अधिकारों के हनन पर चर्चा होती रही।
  2. एक आतंकवादी को वर्षों चली न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई। इसके उपरान्त राष्ट्रपतिजी ने आतन्की की दया याचिका को निरस्त कर फाँसी की सजा बकरार रखी। इन सब प्रावधानों को पूरा करने के बाद जब आतंकी को फाँसी की सजा दी गई तो मानव अधिकरों की रक्षा में जुटे कई संगठनों को मानव अधिकारों का हनन होता हुआ दिखा। व लगभग दो हफ्तों तक अलग अलग माध्यमों द्वारा फाँसी के विरोध में सरकार व प्रशासन को कोसते रहे।
  3. आतंकवादियों को बचाने के लिये कच्ची उम्र के युवा सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते बच्चों को तितर बितर करने के सुरक्षा बल पेलेट गन का प्रयोग करती है। इसमें कई मानवता के प्रहरियों को मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन नजर आता है। यदि एक पत्थरबाज को ढाल बनाकर सुरक्षाकर्मी सुरक्षित निकलने में कामयाब हो जाते हैं तो ये मानव अधिकारों के पहरेदार गला फाड़कर चिल्लाने लगते हैं।
  4. आजकल मानव अधिकार के प्रति संवेदनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि घर में गलत काम करने पर बच्चों को डाँटना या कान पकड़ना अथवा कक्षा में शरारत करने पर बच्चों को झिड़कना अपराध की श्रेणी में आ गयें हैं।

मानव अधिकारों के नाम पर ऐसे कई संगठन सामाजिक व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं यह प्रायः देखने को मिलता रहता है।

समाज में कोई भी अपराध बिना किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्ति समूह के अधिकार का हनन किये बिना संभव नहीं है। इसका अपवाद सिर्फ एक ही स्थिति में हो सकता है, जब कोई किसी को राष्ट्र अथवा धर्म के विरुद्ध भड़काने का प्रयास करे जैसा जेएनयू में हुआ था। यह एक प्रकार से सामाजिक शान्ति भंग करने की परिभाषा में आता है। अतः हम मान सकते है कि एक व्यक्ति या समूह द्वारा किया अपराध अन्य व्यक्ति या समूह के अधिकारों का हनन है अथवा सामाजिक शान्ति के लिये खतरा है। इसका निराकरण शीघ्रातिशीघ्र होना आवश्यक है।

किन्तु मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं व बचाव पक्ष का धन बर्बाद होता है। इसका परिणाम कितना भयावह हो सकता है यह हवाई अपहरण के बाद कुख्यात आतंकवादी अजहर महमूद की रिहाई से अच्छी तरह समझा जा सकता है। कसाब की सुरक्षा पर करोड़ों का खर्च व  छोटे अपराधियों का केस का निपटारा होने के इन्तज़ार में वर्षों तक जेल में बन्द रहना इसके अन्य उदाहरण हैं। इसके विपरीत प्रभावशाली प्रत्यक्ष अपराधियों का अपने धन व शक्ति बल के चलते सजा को जीवन पर्यंत टालना अथवा निर्दोष छूट जाना क्या पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों का हनन नहीं है?

मानव अधिकार के नाम पर अपराधियों का संरक्षण किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिये। आवश्कता है कि वर्तमान न्याय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाये तथा अपराधी के मानव अधिकार के बजाय पीड़ित के अधिकारों की रक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाय।

इसी प्रकार मानव अधिकारविदों को सामान्य सामाजिक व्यवस्था जैसे घर में बच्चों का पालन  अथवा शिक्षण संस्थाओं में अनुशासन बनाये रखने आदि में दख़ल नहीं देना चाहिये। पारिवारिक व सामाजिक बन्धन व वर्जनायें समाज के चरित्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसको कमज़ोर करने के प्रयास का ही परिणाम है कि कम उम्र बच्चे स्कूल में बन्दूकें चलाते हैं व अन्य अपराध में लिप्त हो जाते हैं। समाज का आपसी जुड़ाव ही एक स्वस्थ समाज दे सकता है। मानव अधिकारों के नाम पर समाज का बिखराव मानवता के लिये घातक सिद्ध हो सकता है।

 

 

आस्था

 

आस्था का शाब्दिक अर्थ वैसे तो विश्वास होता है किन्तु प्रायः इसको धार्मिक विश्वास से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक विश्वास वैसे तो व्यक्तिगत मान्यता का विषय होना चाहिये। इसमें दूसरों की दखलअंदाजी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिये। हाँ प्रवचन आदि के द्वारा किसी आस्था विशेष की ओर अन्यों को आकर्षित करने में भी कोई बुराई नहीं है। किन्तु धर्म के बदलते रूप के चलते आस्था के साथ कई अन्य पहलु जुड़ गये हैं। इनमें से प्रमुख हैं :-

  • आर्थिक :- आजकल धर्म आय का एक बड़ा साधन हो गया है। लगभग सभी धर्मों में स्वेच्छा अथवा सामाजिक व्यवस्था के चलते धार्मिक स्थलों अथवा संगठनों को आर्थिक भेंट अथवा दान देने की परंपरा है। परिणाम स्वरूप धर्म आधारित नये नये स्थल व संगठन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के आयोजन चंदा एकत्र कर करने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। ये एक प्रकार का प्रचार माध्यम हो गया है जिसका व्यय सामान्य जनता ही उठाती है। इसके अतिरिक्त इन आयोजनों से संबन्धित कई व्यवसाय भी फलस्वरूप फल फूल रहे हैं। पूरे विश्व में इस प्रकार धर्म सबसे अधिक रोजगार के अवसर प्रदान कर रहा है। इस प्रकार कई लोगों की आस्था का आधार जीवनयापन हो गया है।
  • लक्ष्य प्राप्ति :- प्रायः लक्ष्य की पूर्ती के अथवा दुःख से उबरने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हुए लोगों को सुना जा सकता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति पर क्षमता अनुसार प्रसाद अथवा अनुष्ठान का प्रण भी लोग ले लेते हैं। इस प्रकार की स्वार्थ निहित आस्था युवाओ में परीक्षा के दिनों में विशेष रूप से देखने को मिलती है।
  • अपराध बोध से मुक्ति :- भ्रष्टाचार, बेईमानी व अनैतिक तरीके से कमाई आजकल आम बात है। इन गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति प्रायः अपनी अन्तरात्मा के चलते अपराध भावना से ग्रस्त रहते हैं। यह भावना विषाद का रूप लेले इसके पूर्व ही अपराध की गम्भीरता के अनुसार अपने इष्ट को भेंट चढ़ा कर पाप का बोझ हल्का कर लेते हैं। यह एक प्रकार से अपने इष्ट को भागीदार बनाने वाली आस्था है।
  • राजनीतिक आस्था :- प्रजातन्त्र में चुनाव के द्वारा ही सरकार चुनी जाती है। बढ़ती स्पर्धा के चलते नेताओं ने समाज को जाति, आर्थिक, भोगोलिक एवं धर्म के आधार पर बाँट दिया है। राजनीतिक उपयोगिता के अनुसार नेता अपनी आस्था बदलते रहते हैं।
  • सामुदायिक आस्था :- धर्म समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने का एक कारगर साधन बन गया है। फलस्वरूप नित नये समुदाय अथवा उपसमुदायों का गठन हो रहा है। अपने समुदाय के विस्तार के लिये कई प्रकार के प्रचार माध्यम द्वारा लुभाने के प्रयास किये जाते हैं। सामुदायिक आस्था इन प्रयासों का परिणाम है।
  • पारम्परिक आस्था :- कई लोग आस्था न होते हुए भी कई धार्मिक आयोजनों में सिर्फ इसलिये शामिल हो जाते हैं कि यह वर्षों से चली आ रही सामाजिक अथवा पारिवारिक परम्परा है।
  • आतंकी आस्था :- कई समुदायों का अपनी स्वयं की आस्था इतनी दृढ़ है कि अन्य सभी आस्थायें उन्हें अपनी आस्था के विरुद्ध लगती है। अपनी आस्था का वर्चस्व स्थापित करने के लिये ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं।
  • भोग की आस्था:- बढ़ती आय के चलते कई धार्मिक प्रतिष्ठान वहाँ के सेवादारों के लिये राजसी ठाठ बाट के साधन हो गये हैं। ऐेसे प्रतिष्ठानों में पैठ बनाने वाले आस्थावान भोग की आस्था से प्रेरित होते हैं।

 

मानव एवं प्रकृति

 

प्रकृति की एक विशेषता यह है कि वह अपना संतुलन बनाये रखती है। प्राकृतिक रूप से पैदा हुई हर वस्तु का निर्धारित जीवन काल होता है, तथा जीवन समाप्त होन पर वह स्वतः उसका अपघटन होकर पंचतत्व में विलीन हो जाती है। इसी प्रकार प्रकृति ने अपनी हर प्रजाति के लिये उचित पालन की व्यवस्था भी निर्धारित की हुई है जिसकी आपसी संबद्धता के चलते एक संतुलन बना रहता है। वातावरण के बदलते स्वरूप के अनुसार प्रजातियों के स्वरूप परिष्कृत होकर नया रूप लेते रहते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयं का विकास करती रहती है। मानव प्रकृति के इसी विकास श्रंखला की एक कड़ी है।

मानव का विकसित मस्तिष्क उसे अन्य प्राणियों से अलग करता है। मनुष्य ने अपने मस्तिष्क का उपयोग हमेशा ही  अपने लिये आराम जुटाने के लिये किया है। जैसे जैसे सुविधा के साधन जुटते गये वह प्रकृति से दूर होता चला गया।पहिया, आग, व खेती का प्रयोग सीखना व प्राकृतिक धूप व बारिश से बचाव के लिये सुरक्षित छत की खोज मनुष्य की इस दिशा में आरम्भिक उपलब्धियाँ थी। जैसे जैसे मनुष्य ने अपने लिये सुख सुविधा जुटाई वैसे वैसे उसका लालच बढ़ता गया तथा संग्रह की भूख भी बढ़ती ही गई। इस बढ़ती भूख के चलते मानव जाति ने प्रकृति के साथ स्वयं को भी को अन्धाधुन्ध नुकसान पहुँचाया जिसकी भरपायी करना अब मुश्किल हो गया है। प्रकृति को नुकसान पहुँचाने में प्रमुख योगदान इन क्षेत्रों में रहा हैः-

  • जल प्रदूषण – बड़े बड़े उद्योगों का दूषित अवशेष बिना किसी उपचार के नालों, तालाबों अथवा नदियों में छोड़ देना। इसके चलते लगभग सभी मैदानीय जल स्रोत इतने प्रदूषित हो गये हैं कि उस पानी को उपयोग योग्य बनाने के लिये करोड़ों रुपये खर्च पड़ रहे हैं। अन्य प्राणियों व जल जीवों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • वायु प्रदूषण – कल कारखानों व वाहनों से निकले धुँए से पूरा वायु मंडल दूषित हो गया है। सर्दी के दिनों में बड़े शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। कई प्रकार की बीमारियाँ वहाँ के निवासियों को इस कारण हो जाती हैं। अन्य कई प्रकार की गैस जो सुख सुविधा के उपयोग के उपकरणों अथवा सौन्दर्य साधनों के उपयोग से उत्सर्जित होती हैं। इन गैसों ने ओज़ोन परत को खंडित कर दिया है, जो हानिकारक अल्ट्रा वायलेट विकरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यह प्राणियों में कई रोगों का आज एक प्रमुख कारण है। बढ़ते तापमान से मानवता के नष्ट होने के खतरे से पर्यावरण वैज्ञानिक अभी से ही आगाह करने लगे हैं।
  • कचरे का ढेर – उपभोग वाद के चलते मनुष्य हर नये उत्पाद के लिये पुराने उत्पादों को कचरा समझ कर फेंक देता है। परिणाम स्वरूप पृथ्वी पर कचरे का अम्बार इकठ्ठा होता जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार २०५० तक विकास की यही गति रही तो लगभग एक तिहाई हिस्से की जरूरत केवल कचरे के लिये ही पड़ेगी। इसके अतिरिक्त समुद्र में भी हजारों टन हानिकारक कचरा हर साल डाला जा रहा है, जो समुद्री जीवों के लिये घातक है। अन्धाधुन्ध उपग्रह प्रक्षेपण के चलते वायुमंडल भी एक कचरा घर बनने की ओर अग्रसर है।
  • प्रदूषित खाद्य पदार्थ – खाद्यान्नों व फल सब्जियों को बीमारी व कीड़ों से बचाने के नाम पर कीट नाशकों के बढ़ते प्रयोग ने इनको मनुष्य के लिये ही जहर तुल्य बना दिया है। स्वस्थ भोजन के नाम पर आर्गिेनिक खाद्य पदार्थों का प्रचलन डेढ़ से दो गुने दामों पर आजकल तेजी से बड़ रहा है। इसके अतिरिक्त फल सब्जियों में कृतिम वृद्धि के लिये रसायनों का उपयोग मानव स्वास्थ के लिये खतरा बनता जारहा है। आजकल अधिक पैदावार व अन्य लाभों के लिये अनुवाशिक तरीके से सुधारे बीजों का बढ़ता प्रचलन मानव पर कैसा प्रभाव डालता है ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।

आखिर क्या कारण है कि मनुष्य इतना बुद्धिमान होते हुए भी प्रकृति के विरुद्ध जाकर विनाश की ओर बढ़ते अपने कदमों को विराम क्यों नहीं दे पा रहा है? इसका एक मात्र कारण है लालच। लगभग विश्व की हरएक सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिये बड़े बड़े उद्योग समूहों पर निर्भर है। उनके लिये ऐसा कोई भी कानून बनाना जो इन उद्योग समूहों के विकास में रोड़ा बने ये स्वयं के पैरों पर कुठाराघात के समान है। पर्यावरण बचाने के नाम पर और नये उद्योगों के लिये नये अवसर प्रदान कर अपनी आय की वृद्धि सभी सरकारें सुनिश्चित करना चाहती हैं।

संक्षेप में यदि कहा जाये कि बड़े बड़े उद्योग समूह ही विश्व की लगभग सभी सरकारों के दिशा निर्देश तय कर रहे है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मनुष्य एवं नशा

 

मनुष्य एवं नशे का साथ लगभग उतना ही पुराना है जितना उसका कृषि पर निर्भर होकर मैदानों में बसना। नशे का सबसे प्रथम उल्लेख वैदिक साहित्य में देवताओं के सोमरस पान के बारे में मिलता है। प्रकृति में ऐसे कई पौधे उपलब्ध हैं जिनसे नशा चढ़ जाता है अथवा जिनका प्रयोग नशीले पदार्थ बनाने के लिये किया जा सकता है। वैसे तो नशा कई अन्य प्रकार का भी हो सकता है जैसे सफलता का नशा, दौलत का नशा अथवा ताकत का नशा। फिलहाल चर्चा नशीले पदार्थों के सेवन तक ही सीमित रखेगे। यह सब जानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन हानिकारक है, विशेषकर जब तब यह आदत में शामिल हो जाये।

भारत में नशीले पदार्थों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पहली श्रेणी में ऐसे पदार्थ आते है जिनकी बिक्री की अनुमति है जैसे तम्बाखू, सिगरेट, शराब, भाँग आदि। दूसरी श्रेणी में प्रतिबन्धित पदार्थ जैसे ब्राउन सुगर, हशीश आदि। सरकार का प्रयास रहता है कि समाज को नशे की आदत से बचाये। इसके लिये पहली श्रेणी के पदार्थों पर अधिकाधिक कर लगाकर, स्वास्थ की चेतावनी उत्पाद पर छापना अनिवार्य कर अथवा दूरदर्शन एवं अन्य प्रचार साधनों द्वारा इनके दुश्प्रभावों का प्रचार कर नशे से होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक करने का प्रयास करती है। इसके अतिरिक्त परिवार एवं समाज भी नशीले पदार्थों के सेवन को मान्यता नहीं देता है। इन सब अवरोधों के बावजूद दोनों श्रेणियों के नशीले पदार्थों का व्यापार फलफूल रहा है।  २०१५ के आँकड़ो के अनुसार विश्व में प्रतिबन्धित नशीले पदार्थों का २६००० करोड़, शराब का ३००० करोड़ व तम्बाखू का ४२०० करोड़ रुपये का व्यवसाय अनुमानित है। तथा ये लगभग १५ प्रतिशत हर वर्ष बड़ रहा है। आखिर लोग नशीले पदार्थों का सेवन करते क्यों हैं?

सामान्य मान्यता के अनुसार नशा लोग अपने ग़म को भुलाने के लिये करते है। नशीले पदार्थ के सेवन से मस्तिष्क अर्धसुप्त अवस्था में चला जाता है, जिससे दुःख के अहसास में कमी हो जाती है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है इसमें अहम भूमिका निभाता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। नशीली दवायें व खुशी के भाव डोपेमाइन सिस्टम की सक्रिय होने की सीमा नीचे कर देते है जिस कारण छोटी सी बात से बहुत अधिक खुशी महसूस होती है। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरान्स लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।  इस प्रकार ऐसे व्यक्ति जिनमें भावनात्क कारणों से आक्सीटोसिन की कमी हो जाती है नशा कर  डोपेमाइन सिस्टम की सक्रियता बढ़ाकर नकली खुशी महसूस करते हैं। इसी खुशी को बार बार महसूस करने की इच्छा ही नशे की लत के लिये जिम्मेदार है।

नशे की शुरूआत किसी भी व्यक्ति में निम्न कारणों से हो सकती है।

  • बाल सुलभ उत्सुकता के चलते – बच्चे आसपास के बड़ों को जब शराब, तम्बाखू, सिगरेट आदि का उपयोग करते देखते हैं तो बाल सुलभ उत्सुकता के चलते चोरी चुपके इनका प्रयोग करने का प्रयास करते है। इनमें से अधिकतर पहली कोशिश के बाद ही अपराध बोध से ग्रसित होकर छोड़ देते हैं।
  • लड़कपन में दोस्तों के बहकावे में आकर कई बच्चे चोरी चुपके तम्बाँखू अथवा ड्रग्स के चक्कर में पड़ जाते हैं। किन्तु कुछ भावनात्मक रूप से उपेक्षित बच्चे ही इसके आदी हो सकते हैं।
  • कालेज जाने वाले छात्र विशेष रूप से संपन्न वर्ग से आये हुए अपनी अलग पहचान बनाने के लिये विभिन्न नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। इनमें से अधिकतर इसके आदी हो जाते हैं। किन्तु केवल कुछ ही अनियन्त्रित सेवन से लत के शिकार होते हैं।
  • युवा अवस्था में असफल प्रेम, मनपसन्द कार्य क्षेत्र, पारिवारिक कलह अथवा परेशानियों आदि से कुन्ठित कमजोर मानसिकता वाले लोग नशे नशे के शिकार प्रायः हो जाते हैं।
  • ड्रग्स तस्कर अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिये युवाओं को अपने जाल में फँसा कर हम उम्र युवाओं को नशे की लत का शिकार बनाते हैं।

जहाँ सीमित रूप में नशीले पदार्थों का सेवन क्षणिक आनन्द देता है। किन्तु दीर्घ कालीन कई प्रकार की बीमारियों का कारण भी बन जाता है। दुर्भाग्य से ये असर इतना धीमा होता है कि जब तक असर के लक्षण दिखाई देने लगते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। नशे की लत के शिकार लोगों बीमारी के अतिरिक्त सामाजिक निरादर, पारिवारिक अशान्ति, व जीवन से निराशा ही मिलती हैं। नशे की लत से बाहर निकलने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति व स्वजनों का स्नेह बहुत जरूरी है।

प्रायः यह देखा गया है कि सपंन्न लोग शराब का सेवन स्वयं के आनन्द के लिये नियंत्रितरूप से करते है। इसके विपरीत निर्धन व कम पढ़े लिखे लोग इसकी लत के शिकार होकर अपना व परिवार का जीवन दुर्लभ बना देते हैं।

नशीले पदार्थों के उत्पादन पर तो नियंत्रण असंभव है किन्तु परिवार व समाज चाहे तो भावनात्मक संबन्धों को मजबूत कर नयी पीढ़ी को नशे की लत से अवश्य ही बचा सकते हैं।

 

 

 

 

 

भारतीय किसान

 

भारत यों तो कॄषि प्रधान देश कहलाता है। किन्तु कृषि उत्पाद देश की सकल आय का मात्र १७ प्रतिशत ही है। भारत में कुल किसानों संख्या के बारे में भ्रान्तियाँ हैं। 2011 के आँकड़ों में किसानों की संख्या अलग अलग मानकों के आधार पर 8 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आँकी गई है। देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी गाँवों में बसती है। इसमें से करीब 25 प्रतिशत ही कृषि भूमि के मालिक हैं। कुल कृषि योग्य 19.4 (6.4 करोड़ हेक्टेयर सिचाँई योग्य) करोड़ हेक्टेयर भूमि में से लगभग 50 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन 15 प्रतिशत बड़े किसानों के पास है। इनमें से अधिकतर शहरों में रहते हैं एवं प्रायः इनके आय के अन्य श्रोत भी है। अतः यह कहना अधिक सही होगा कि हमारे देश में कृषि एक सबसे बड़ा असंगठित रोजगार देने वाला क्षेत्र है।

कृषकों द्वारा आत्महत्या आजकल एक चर्चित विषय है। तुलनात्मक रूप से अध्ययन किया जाये तो अन्य भारतीय लोगों की तुलना में किसानों द्वारा आत्महत्या केवल २० प्रतिशत ही है। अतः यह मानना सही होगा कि राजनीतिक कारणों से ही इस पर चर्चा अधिक होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय किसानों की कोई समस्या नहीं है। भारत ही नहीं कई अन्य देशों जैसे श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, केनेडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भी कृषि को तनाव देने वाला क्षेत्र माना है। भारत में भी किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है।

ये समस्यायें नई नही॔ हैं। भारत में किसानों की हालत एतिहासिक तौर पर दयनीय रही है। पुरातन काल में राजाओं के नुमाइन्दे जबरन कर वसूलते थे तो अंग्रेजों के जमाने में उनके कारिन्दे। साहूकार व जमींदार भी उनका जमकर शोषण करते थे। किन्तु उस कठिन समय में भी मेहनत मजदूरी कर अपना परिवार चला ही लेते थे।

स्वतन्त्रता के बाद भी ओद्योगिक विकास के चलते आरम्भ में इस ओर विशेष ध्यान नीं दिया गया। किन्तु  कुछ अकालों व निम्न गुणता वाले खाद्यान्न आयात करने के बाद इस क्षेत्र के विकास की ओर सरकार का ध्यान गया। कृषि तकनीकी संस्थान द्वारा विकसित बीज, रसायनिक खाद, कीट नाशक दवाओं, सिंचाई के साधन में वृद्धि  व कृषि आय को कर मुक्त कर देने से हरित क्रान्ति लाने का दावा भी किया गया। किन्तु इन सबका लाभ चंन्द बड़े किसानों व बाजार व किसानों के बीच के दलालों को ही पहुँच सका। छोटे किसानों स्थिति में बहुत अधिक अन्तर नहीं आया। गिरते राजनीतिक स्तर व स्वार्थ ने छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकार की दया पर निर्भर अधिक बनाया। कई मददकारी पहलों का लाभ किसानों को कम व सरकारी तन्त्रों को अधिक मिला।आर्थिक विषमता तथा नव धनाड्यों के प्रदर्शन करने वाली जीवन शैली ने छोटे किसानों के परिवार के कई युवाओं में महत्वाकांक्षा व लालच के चलते कर्ज के चंगुल में फंसा दिया जिसकी परिणीति आत्महत्या होने लगी।

आंकड़ों के हिसाब से देखा जाये तो 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की जबकि सबसे अधिक आत्महत्या 2004 में 18241 किसानों ने की थी। 2016में यह संख्या 6667 व 2017 में 17 जून तक संख्या 186 है। इससे यह निर्णय करना कठिन नहीं है कि वर्तमान आन्दोलन राजनीति से प्रेरित है। समाचारों में दिखाये किसानों को देखकर भी नहीं लगता है कि यह आन्दोलन गरीब किसानों के लिये है।

यदि हमें वास्तव में किसानों की भलाई के बारे में सोचना है तो राजनीतिक चश्में को उतार कर छोटे किसानों व खेतिहर मजदूरों की मूल समस्या पहचान कर उनका निदान करना होगा।

  • सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरत मंदों को नहीं – अधिकतर सरकारी योजनाओं का लाभ बड़े किसानों को मिलता है। अतः इन्हें बन्द कर कृषि व्यवसाय को एक उद्योग का दर्जा देकर बड़े (10 हेक्टेयर से अधिक ), मध्यम (2 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर तक ), लघु (1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर तक ) व अति लघुश्रेणी ( 0.5 हेक्टेयर से कम ) में कृषि भूमि के आधार पर बाँट देना चाहिये। बीज, खाद, सिंचांई साधन व कीट नाशक पर सब्सिडी केवल लघु व अति लघु श्रेणी के लोगों को ही दी जाये।
  • २. कृषि उत्पाद की लागत – मीडिया में प्रायः दिखाया जाता है कि किसानों को अपने उत्पादों के सही दाम नहीं मिलते। सरकार द्वारा न्यूनतम मूल्य में खरीददारी में भी कठिनाईयों व घोटालों की खबर आती रहती है। इसके अतिरिक्त भंडारण में टनों खाद्य उत्पाद नष्ट होने की खबरें हर साल आती रहती हैं। इन सब समस्याओं के मूल मे उत्पाद से शीघ्रातिशीघ्र कीमत वसूलना है। इसका सीधा समाधान यह है कि बड़े व मध्यम किसानों को अपना उत्पाद स्वयं की सुविधा अनुसार खुले बाजार में बेचने दिया जाये। लघु व अतिलघु श्रेणी के किसानों से सरकार सिर्फ खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक मात्रा में ही उत्पाद खरीदे। शेष उत्पाद के लिये पंचायत के संरक्षण में उचित भंडारण सुविधा में बैंक को उत्पाद बन्धक रखकर ऋण लेने  की सुविधा प्रदान कर सकती है। धीरे धीरे भंडारित उत्पाद को उचित दाम पर पंचायत द्वारा बाजार में बेचकर हिसाब किया जा सकता है। इसके लिये पंचायतों का बैंक के साथ उचित समझौता व पंचायतों को साधन संपन्न बनाना व प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • स्थानीय मूल्यवर्धन – गाँवों में कृषि कार्य साल के कुछ महीनों में ही रहता हैं। अतः श्रमशक्ति का भरपूर उपयोग नहीं हो पाता है। यदि संगठित तरीके से स्थानीय उत्पादों के मूल्य वर्धित उत्पादों को बनाने व विक्रय के लिये संसाधनों को विकसित किया जाये तो स्थानीय आय में काफी इजाफा हो सकता है। यह गाँवों से पलायन, गरीबी उन्मूलन व गाँव वासियों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकता है। यह राज्य स्तर पर सहकारी संगठन गठित कर उसके द्वारा संचालन द्वारा संभव है। खादी एवं ग्रामोद्योग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • उचित शिक्षा – गाँवों में माध्यमिक स्तर तक सामान्य शिक्षा के साथ स्थानीय क्षेत्र में संभावित आय के साधनों एवं संभावनाओं का भी अध्ययन कराया जाये। इच्छुक युवाओं को स्थानीय उद्योगों के विकास के लिये प्रशिक्षित किया जाये। तथा स्थानीय उद्योगों को स्थापित करने के लिये तकनीकी व आर्थिक सहायता दी जाये। इन उत्पादों के लिये बाजार विकसित करने का संगठित प्रयास किया जाये।

 

 

 

इस्लाम व आतंक

 

वैसे तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। ना ही कोई धर्म आतंकवाद का समर्थन करता है। किन्तु पिछले करीब डेढ़ दशक से जिस तरह से कई इस्लामिक संगठन आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होकर एक संगठित रूप से पूरी दुनिया को अपना निशाना बना रहे हैं, यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

कोई भी व्यक्ति अथवा संगठन तभी आक्रामक होता है जब उसे इतना अन्याय व शोषण झेलना पड़े कि  उसकी सहन शक्ति बर्दाश्त न कर पाये।

यदि इस्लाम की उत्पत्ती से अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो पायेगें की इस्लाम धर्म अनुयायी हमेशा ही कट्टर धार्मिक रहे हैं व इसके प्रचार को धर्म का ही हिस्सा मानते है। इसी कारण जहाँ कहीं भी ये अनुयायी आक्रमक बन कर विजयी हुए बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन कराया।  इस हिसाब से प्रायः दूसरे धर्मावलम्बी ही इनके द्वारा सताये गये। स्वभाविक विरोध स्वरूप कुछ सीमा तक इन अनुयायियों को भी मुश्किलों का सामना अवश्य ही करना पड़ा होगा किन्तु एक सीमित दायरे में ही। अतः सताया जाना इस तरह के उन्माद का कारण नहीं हो सकता।

हम यदि मानव इतिहास में झांके तो पायेगें कि लगभग हर काल में कुछ दुष्ट प्रकृति के खल नायक हुए हैं। उदाहरण स्वरूप रावण, कंस, हिटलर, स्टटालिन आदि के नाम दिमाग में आते हैं। किन्तु ये एक व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में फला फूला आतंक था जिसका अन्त उसके साथ ही हो गया। इसे उस व्यक्ति विशेष के विकृत मस्तिष्क का परिणाम माना जा सकता है।

इसके विपरीत आज का इस्लामिक आतंकवाद कई अलग अलग संगठनों द्वारा संचालित है जो नियोजित तरीके से आर्थिक, राजनीतिक, व सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति से प्रेरित हैं। इससे निपटने के लिये इसके मूल में निहित कारणों को समझना आवश्यक है।

इन कारणों को समझने के लिये हमें पिछले कुछ दशकों में हुए विश्व की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव को समझना जरूरी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व का राजनीतिक ध्रुविकरण हुआ। अमेरिका व रूस दो महाशक्ति के रूप में उभरे। दो विश्व युद्धों के लिये विकसित हथियार एक लाभकारी व्यवसाय बन गया। इसमें आगे मारक क्षमता व शक्ति के  विकास के लिये बड़ा निवेश किया गया।  संचार व यातायात के साधनों के विकास ने विश्व को एक दूसरे से जोड़ दिया। छोटी बड़ी कहीं भी घटी घटना की प्रतिक्रिया हर कोने में होने लगी। एक महाशक्ति के वर्चस्व बढ़ाने के प्रयास को दूसरी महाशक्ति ने रोकने के लिये कदम उठाना लाजिमी समझा। परिणाम स्वरूप मुस्लिम बाहुल्य मध्य एशिया में पश्चिम की दखलअंदाजी बढ़ने लगी। इसका असर वहाँ की युवा संस्कृति पर पड़ने लगा। धार्मिक व सामाजिक नेताओं को यह परिवर्तन स्थानीय संप्रभुता एवं संस्कृति में अवान्छित हस्तक्षेप लगा। संस्कृति को बचाने के लिये विशेष स्कूल(मदरसे) खोले जहाँ धार्मिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाने लगा। अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी इस्लामिक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये मदरसों के लिये आर्थिक मदद उपलब्ध कराई गई।

महा शक्तियों के प्रभाव से कई पड़ोसी देशों में उभरे मतभेदों ने आपसी युद्ध की स्थिति की स्थिति पैदा कर दी। युद्ध में दोनों महाशक्तियों ने भी परोक्ष रूप से हिस्सा लिया। इस कारण लम्बे समय तक इस क्षेत्र में अशांत वातावरण रहा। हस्तक्षेप के कुछ आर्थिक कारण भी रहे होगें। कुछ उग्र स्वभाव के विचारकों को महाशक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं हुआ तथा बदला लेने के लिये संगठन बनाने की शुरुआत हुई। क्योंकि सीधी लड़ाई संभव नहीं थी, इस कारण आतंक फैलाकर इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करने का निश्चय किया गया। राजनीतिक संरक्षण व अनैतिक तरीकों से धन कमाने वाले संगठनों की आर्थिक सहायता के चलते ये संगठन फलने फूलने लगे। मदरसों से निकले कट्टर अनुयायियों के लिय प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये। आतंक को प्रभावी बनाने के शोध केन्द्र स्थापित किये गये। समय के साथ अन्य देशों ने भी पड़ोसी देशों से छद्म युद्ध के लिये इनकी सेवायें लेना आरंम्भ कर दी। शीघ्र ही यह व्यवसाय बन गया और कई समानान्तर संगठन स्थापित हो गये।

पीड़ित देशों की मदद को आगे बडे़ देश भी इन आतंकी संगठनों के निशाने पर आने लगे। बड़ती शक्ति के चलते इन संगठनों व इनके संरक्षकों को पूरे विश्व के इस्लामीकरण की संभावना नजर आने लगी। कुछ राजप्रमुखों व आतंकी संगठनों ने इस संभावना को व्यवहारिक रूप देनें के लिये संयुक्त प्रयास भी आरंभ किये। इन प्रयासों में अन्य देशों में प्रक्षिशित प्रतिनिधियों को भेज कर प्रचार प्रसार का आधार तैयार करना व नये स्थानों पर उपनिवेश बसाना। यह अनैतिक व्यवसाय फैलाने का एक साधन भी सिद्ध हुआ। इस्लामीकरण के विस्तार के विरोध में उठे स्वरों को भी आतंक से दबाने का प्रयास किया गया। आज यह एक उन्माद का स्वरूप ले चुका है, जिसके किसी भी कृत्य को किसी भी मानव विचार धारा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता है। यह मानव का सबसे घिनौना स्वरूप बन चुका है।

इससे निपटने के लिये:-

  1. सबसे पहले मदरसों को बन्द करना जरूरी है अथवा इन्हें पारदर्शी बनाने के लिये सबके लिये खोल दिया जाये। अलग अलग धर्मों की शिक्षा सामान्य शिक्षण संस्थाओं में सबके लिये पारदर्शी तरीके से स्वेच्छा से उपलब्ध कराई जा सकती है।
  2. प्रशिक्षण केन्द्रों को सख्ती से नष्ट करने की जरूरत है।
  3. सभी आतंक के सभी स्वरूपों पर यू एन में नकारा जाये। आतंक को किसी भी रूप में सहायता करने वाले देशों का बाकी सभी सदस्य देश बहिष्कार करें। सुरक्षा परिषद का इस विषय में कोई दखल न हो।
  4. आतंक को समाप्त करने के लिये यदि कोई देश सहायता चाहे तो यू एन प्रभावी सहायता उपलब्ध कराये। खर्च राशि न दे पाने की स्थिति में मदद देश की आर्थिक स्थिति के अनुरूप ऋण अथवा सहायता के रूप।
  5. किसी भी प्रकार के आतंक में कोई भेदभाव न किया जाये।
  6. यथासंभव शस्त्रों के उत्पादन व बिक्री को नियंत्रित किया जाये।

 

 

 

क्या ये विकास है?

 

अर्थ शास्त्रियों ने पूरी मानव आबादी को तीन भागों में बाँट रखा है। ये भाग हैं विकसित, विकासशील व अविकसित। इस विभाजन का आधार रखा गया है प्रतिव्यक्तति आय, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, क्रय शक्ति व सेहत। विकसित देशों के अर्थ शास्त्रियों द्वारा निर्धारित इस विभाजन को लगभग पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया है।

किन्तु क्या यह विभाजन सही है? क्या अन्य कोई और किसी क्षेत्र की संपत्ति नापने का आधार नहीं हो सकता है? क्या इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है? इन सब प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सकते है, यदि हम वास्तविक संपदा को समझने का प्रयास करें।

मनुष्य अपनी जरूरत की वस्तुओं को प्रकृति से प्राप्त करता है। हवा, पानी, धूप, खनिज व भोजन आदि हमें प्रकृति से ही मिलता है। लगभग सभी ओद्योगिक उत्पाद भी प्रकृति से प्राप्त खनिज अथवा प्रकृतिक उत्पादों से ही बनते हैं। अतः यह आवश्यक है कि संपदा का मापदंड भी यही होना चाहिये।

बहुत पहले एक वैज्ञानिक लेख में विकास का मापदंड उस देश में प्रति व्यक्ति कितने एकड़ पृथ्वी के उत्पाद का उपयोग होता है बताया गया था।

पृथ्वी पर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार कुल 11.8 बिलियन हेक्टेयर उत्पादक क्षेत्र के हिसाब से प्रति व्यक्ति 1.8 हेक्टेयर उपलब्ध क्षेत्र है। अतः प्रति व्यक्ति इतने क्षेत्रफल का उत्पाद हर व्यक्ति को मिलना चाहिये। इसकि तुलना में नीचे तालिका में कुछ देशों के प्रतिव्यक्ति उपलब्ध क्षेत्रफल व प्रतिव्यक्ति क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग की जानकारी दी गई है। तालिका से स्पष्ट है कि अधिकतर विकसित व विकासशील देश अविकसित देशों के प्राकृतिक साधनों का दोहन कर रहे हैं।

यह दुर्भाग्य है कि आधुनिक औद्योगिकरण के कारण प्राकृतिक उत्पादों की तुलना में औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। यह भी आश्चर्य की बात है कि गुणता व उत्पादकता में सुधार के नाम पर विकसित मशीनों ने औद्योगिक उत्पादों की कीमतों की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्र में में अनेक उत्पाद ऐसे बनाये जाते हैं जो मानव हितों के विरुद्ध जाते हैं।

 

 

क्रमांक देश प्रतिव्यक्ति हेक्टेयर  क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग प्रति व्यक्ति प्राकृतिक साधन उपलब्धता
1 अमेरिका 8.22 3.76
2 रूस 5.59 6.79
3 फ्रान्स 5.14 3.11
4 चीन 3.38 0.94
5 भारत 1.15 0.45
6 मध्य अफ्रिकन रिपब्लिक 1.24 7.87
7 कांगो 1.29 10.91
8 अर्जेनटिना 3.14 6.94
9 पेरागुवे 4.16 10. 52

 

औद्योगिकरण से सर्वाधिक नुकसान मानव हितों का निम्न क्षेत्रो में हुआ है –

  • विनाश कारी हथियार- न्यूक्लियर बम, रसायनिक शस्त्र व उनके दूर तक मारक क्षमता के साधन, स्वचालित व शक्तिशाली हथियार। इस कारण कई देशों को अपने नागरिकों के उत्थान के बदले सीमा सुरक्षा पर अधिक  साधन खर्च करना पढ़ता है। आतंकवाद फैलने में भी हथियारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • नशीले पदार्थ- लगभग सभी देशों में प्रतिबन्ध के बावजूद नशीले पदार्थों का धंधा पूरे विश्व में फैला हुआ है। एक ओर इसके कारण जहाँ कई युवा जिन्दगियाँ बर्बाद हो रही है वहीं इससे अर्जित धन आतंकियों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • पर्ययावरण की बर्बादी- यातायात साधनों जनित वायु प्रदूषण, औद्योगिक अपशिष्ट द्वारा जल व वायु प्रदूषण, ओजोन सतह की क्षति तथा हानिकारक रसायनों का उपयोग के कारण पूरा विश्व आज मानव जाति के भविष्य के लिये चिन्तित है।

तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य आज जिस डाल पर बैठा है उसी को काटने में लगा है।

मन क्या है?

 

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते है कि आज पकोड़े खाने का मन है अथवा पिकनिक पर जाने का मन है। कई बार लोग कहते हैं कि कुछ करने का दिल नहीं है या किसी भी चीज में मन नहीं लग रहा है। कभी सुनने को मिलता है कि मन उदास है या दिल खुश हो गया। लोग यह भी कहते हैं कि मन को बस में रखना चाहिये।

दिल और मन का संबंन्ध क्या है? दिल का कार्य तो शरीर में रक्त का संचालन करना भर है तथा मन नाम का तो शरीर का कोई भाग नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार तो सुख, दुःख अथवा इच्छा का नियंत्रण मस्तिष्क ही करता है। फिर मन की उत्पत्ति कैसे हुई?

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरानस लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।

हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। बिना नियंत्रण के हम पागल हो जायेंगे। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें व सामाजिक व पारिवारिक संबंधो को तहसनहस कर देंगें।

शायद इसी नियत्रण तन्त्र को हम लोग मन या दिल के नाम से जानते हैं।

विचारणीय ये है कि नियन्त्रण तन्त्र विकसित कैसे होता है?

बचपन से लेकर पूरी उम्र हमें अपने परिवेश से अपने व अन्य  व्ययक्तियों से संबन्धी प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं। इनमें प्रशंसा, बुराई, वर्जना, प्रोत्साहन, अपमान, गुस्सा, प्रेम, घृणा आदि सम्मलित हैं। इन प्रतिक्रियाओं को हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप ग्रहण करता है। इसको हम साधारण शब्दों में अनुभव भी कह सकते हैं। ये अनुभव ही व्यक्ति के नियंत्रण तन्त्र को दिशा देते है। जिसे हम मन कह सकते हैं।