कृतिम दिमाग (आर्टीफीशियल इन्टेलीजेन्स)

                  

मनुष्य को अपनी बुद्धि पर हमेशा से गर्व रहा है। इसके चलते वह अपने को सभी प्राणियों से श्रेष्ठ मानता आया है। समय के साथ मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा के साधन जुटाने के लिय अपनी बुद्धि का उपयोग किया। बढ़ती सुविधा के चलते सोचने का समय अधिक मिलने से बुद्धि का और विकास हुआ। इस तरह समय के साथ सुविधायें व बुद्धि के विकास का निरन्तर प्रगतिशील सिलसिला आरम्भ हुआ जो आज तक जारी है। सुख सुविधा से जुड़े संसाधनों का बराबर बँटवारा संभव नहीं हो पाने के कारण साधन संपन्न लोगों को अपने संसाधनों की सुरक्षा के लिये साधन जुटाने पड़े। साधन हीन व साधन संपन्न होना मनुष्य जाति को विभाजित करने की पहली सीढ़ी थी। साधनहीनों ने साधन संपन्नों से साधन छीनने व साधन संपन्नों ने अपने साधनों की सुरक्षा के प्रयासों को विकसित करने में अपनी बुद्धि का उपयोग करना आरम्भ किया। इस प्रतिस्पर्धा ने रक्षा साधनों के विकास का सिल सिला शुरू हुआ। परिणाम स्वरूप मनुष्य जाति कई भौगोलिक, जातीय, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक गुटों में बँटकर अपने को सुरक्षित समझने लगे।

बढ़ते धड़ों की संख्या ने लूटने, अधिक साधन अर्जित करने व उसकी रक्षा के साधन जुटाने के लिये संचार, यातायात, अधिक प्रभावी रक्षा प्रणाली एवं सूचना तकनीक विकसित की गई। साधनहीन व साधन संपन्न दौनों ने इन विकासों का उपयोग अपने हितों को साधने के लिये करना शुरू किया। इस कारण साधन संपन्नों को हर पल सजग रहने की जरूरत महसूस हुई। इसी का परिणाम था कि मनुष्य को कृतिम बुद्धि बनाने की जरूरत महसूस हुई।

कृतिम बुद्धि वाले उपकरणों की शुरुआत पूर्व निर्धारित कार्य को कम्यूटर के प्रोग्राम में डाल देने से हुई। नियत समय पर अलार्म बजा देने से शुरु यह विकास मशीनों के नियंत्रण, उपकरणों के स्वचालन, स्वचालित रोबोट , स्मार्ट फोन  एवं स्वचालित वाहनों तक जा पहुचा। इन सबमें सबसे बड़ी कमी यह रही कि ये सब यंत्र पहले से ही डाली गयी कार्य योजना के अनुरूप ही कार्य कर पाते थे। साधारण आदमी की भाषा में कहे तो इनमें स्वयं सीखने की क्षमता, अथवा स्वयं का अपना दिमाग नहीं था।

मनुष्य को यह स्थिति अमान्य थी तथा उसे महसूस हुआ कि इस तरह के उपकरण बनाना चाहिये जो समय के साथ अपना ज्ञान स्वयं बड़ा सके। अर्थात जिसके पास अपना स्वयं का दिमाग हो। अथक प्रयासों के चलते इस दिशा में काफी सफलता मिल चुकी है एवं और सुधार के प्रयास चल रहे हैं। आजकल रेस्त्राँ में दिमाग वाले रोबोट दिखने लगे है जो आपका स्वागत करने से लेकर आर्डर लेने, भोजन लगाने से लेकर आपका अनुभव तक पूछ लेते हैं। इसी प्रकार अस्पतालों में मरीज की देखरेक मशीनों द्वारा की जा रही है जो समय पर सही दवायें एवं भोजन आदि का उचित ध्यान रख सकती हैं।विकास की यही दर रही तो वह दिन दूर नहीं जब घर के सब काम मशीनें करने लगेगी। यह भी संभावना है कि वाहन चलाने या हवाई जहाज उड़ाने का काम मशीनें करने लगे अथवा युद्ध भी आपस के दो देशों की मशीनें लड़ने लगे।  ऐसी स्थिति में संभावना बनती है कि मशीनों का दिमाग तो विकसित होता जायेगा तथा अधिकतर मनुष्यों का दिमाग धीरे धीरे निष्क्रिय होता जायेगा।

मनुष्य के द्वारा किये गये अधिकतर आविष्कारों को भले ही मनुष्य की भलाई के उद्देश्य से किया गया हो। लेकिन लालच, दर्प, व संकीर्ण सोच के चलते अधिकतर इन आविष्कारों का दुरूपयोग ही हुआ है। इसीका परिणाम है कि विध्वंसकारी जखीरा इतना इकठ्ठा हो गया है जो समूची आबादी को नष्ट कर सकता है। पर्यावरण को हम इतना बिगाड़ चुके हैं कि संभावित विनाश से बचने के लिये अरबों डालर खर्च किये जा रहे हैं। इसी श्रृखंला में ये कृतिम दिमाग वाली मशीने पर्याप्त संख्या में होने पर विद्रोही हो गयी अथवा कर दी गयी तो उसका परिणाम क्या हो सकता है सोचकर मन सिहर उठता है।

मन

 

प्रायः हर किसी से सुनने को मिलता है कि आज मन यह करने का है अथवा यह नहीं करने का है। बच्चा सवेरे उठ कर माँ से कहता है आज स्कूल जाने का मन नहीं है। तो पतिदेव आफिस से आकर बीबी से फरमाइश करते हैं कि आज गरमागरम पकोड़े खाने का मन है। कभी पत्नी छुट्टी के दिन कहती है कि आज खाना बनाने का मन नहीं है, पिक्चर देखकर बाहर खाना खायेंगें। मन से प्रेरित ऐसे उद्गार मनुष्य से क्या क्या नहीं कराते हैं।

मन को दिल व इच्छा के रूप में भी व्यक्त किया जाता है। आखिर यह मन है क्या ? मन शब्द से बना मानस तथा उससे बना मानसिक, अतः मन का संबंध मस्तिष्क से है यह हम मान सकते हैं। मस्तिष्क हमारी सभी इन्द्रियो को नियन्त्रित करता है एवं अनुभूतियों को प्रभावित करता है। अलग अलग मनुष्यों में एक ही घटना पर अनुभूति अलग अलग हो सकती है। उदाहरण स्वरूप किसी व्यक्ति के गिरने पर कोई हँसता है, कोई सम्हल कर चलने की हिदायत देता है तो कोई सहायता करने के लिये दौड़ पड़ता है। यह भी जरूरी नहीं कि एक ही व्यक्ति की एक प्रकार की घटना की हमेशा एक ही तरह की प्रक्रिया हो। इन सब विचारों का नियन्त्रण कैसे होता है?

इस सवाल का उत्तर खोजने के लिये पहले हमें मस्तिष्क को समझना पड़ेगा।

बचपन में एक नाजुक समय होता है जब बच्चे तेजी से सीखते हैं। अन्य कई कारणों में से एक मुख्य कारण इस काल में बीएनडीएफ (ब्रेन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में होना है जो मस्तिष्क विकास के लिये महत्वपूर्ण है। इसलिये बचपन की घटनायें मनुष्य को जीवन भर प्रभावित करती हैं एवं चरित्र निर्माण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है, मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सब मिलकर आसपास घटने वाली घटनाओं की प्रतिक्रिया निर्धारित करते हैं।

हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें। इसे हम विवेक का नाम दे सकते हैं।

शिशु के जन्म के समय मस्तिष्क सिवाय नैसर्गिक क्रियाओं के नियंत्रण जैसे रोना, हाथ पैर हिलाना, भूख महसूस करना आदि के अलावा खाली स्लेट की तरह होता है। इसके बाद का विकास प्रशिक्षण अथवा आसपास होन वाली घटनाओं के आधार पर होता है। ये घटनायें बहुत बढ़ी संख्या में प्रतिदिन होती हैं। यह सब यादों के रूप में मस्तिष्क में अंकित होती जाती हैं। मस्तिष्क एक बड़े भंडार की तरह होता है जहाँ रोज काम आने वाली यादें तो सुव्यवस्थित सामने रखी रहती है। इसे हम चेतन मस्तिष्क के नाम से जानते हैं। ऐसी अनगिनत यादें जो रोजाना उपयोग की नहीं होती हैं वे पीछे दबी हुई पड़ी रहती हैं, जिसे हम अचेतन मस्तिष्क के नाम से जानते हैं। जिस प्रकार अचानक किसी पुरानी वस्तु की जरूरत पढ़ने पर हम भंडार से खोज निकालते हैं। ठीक उसी प्रकार किसी घटना अथवा प्रतिक्रिया से अचेतन मन मे दबी याद अचानक प्रगट हो जाती है, उन यादों से जुड़े अहसास भी साथ ही महसूस होने लगते है, मानो हम दृश्य चित्र देख रहे हों।

यही मन है। विवेक मन पर अंकुश लगाने का काम करता है। आजकल सिनेमा, समाचार पत्रों, दूरदर्शन, सोशियल मीडिया एवं इन्टरनेट ने अधिकतर लोगों के मस्तिष्क का इतने अधिक भाग पर अपना अधिकार जमा लिया है कि विवेक के लिये जगह ही नहीं बची। यही कारण है कि कई लोगों का व्यवहार सब बन्दिशों को लाँघ कर जघन्य अपराध की सीमा तक पहुँच गया है।

 

दान का बदलता स्वरूप

 

दान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। दधिचि ऋषि एवं कर्ण जैसे अन्य कई महापुरुषों के दान की गाथायें हमारे शास्त्रों में मिलती हैं। किन्तु इनको स्वार्थवश याचना अथवा परीक्षा के सफल प्रयास कहना अधिक उचित होगा। वेदों व पुराणों में भी दान का महत्व बताया गया है। विशेषकर ब्राह्मणों को दिये गये दान को विशेष पुण्य का दर्जा दिया गया है। यह शायद उस समय की सामाजिक परिस्थिति के चलते उचित रहा हो। उस समय ब्राह्मण विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रख कर शिक्षा देते थे, अथवा ज्ञान की खोज में अपना पूरा जीवन लगा देते थे। यह एक प्रकार से सामाजिक उत्थान को प्रोत्साहित करने का प्रयास था। निर्धन व जरूरतमन्द लोगों सहायता दया से प्रेरित थी। इस प्रकार ये दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के किये जाते थे, जो वास्तव में मन में एक आनन्द का आभास पैदा कर एक प्रकार से पुण्यफल देते थे।

समय के साथ मनुष्यों में लालच का उद्भव हुआ, परिणाम स्वरूप संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। फलतः दान को स्वर्ग प्राप्ति व पाप को नष्ट करने का उपाय प्रचारित किया जाने लगा। इसके चलते दान दाताओं व दान ग्रहण कर्ताओं का तेजी से विस्तार हुआ। साधारण जन जहाँ मुठ्ठी भर अनाज अथवा कुछ पैसे दान कर स्वर्ग में अपना स्थान सुनिश्चित मानने लगे, वहीं व्यवसायी व लाभप्रद नौकरी पेशा लोग दान देकर अपने पाप का बोझ हल्का करने के प्रयास में जुट गये। इस प्रकार स्वार्थ साधन के लिये दान की परिपाटी का आरम्भ हुआ।

दान करने वालों की बढ़ती संख्या के चलते दान पाने की लालसा बढ़ती गयी। दान पाने के लालच में  निर्धन लोगों में भीख माँगने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। यहाँ तक बच्चों का अपहरण कर उन्हें अपाहिज कर भीख मँगवाने जैसे जघन्य अपराध भी होने लगे। ब्राह्मणों ने दान संग्रहण के लिये कई नये तरीके इज़ाद करना शुरू कर दिये। इनमें पूजा, पाठ, जप आदि के द्वारा परिवार की खुशहाली का भरोसा, स्नान के बाद तिलक लगाकर आशीर्वाद देना, अलग अलग देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित कर उनको चमत्कारिक बतलाकर दर्शनार्थी आकर्षित करना प्रमुख थे। चंदा एकत्रित कर बड़े बड़े धार्मिक आयोजनों को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यह एक प्रकार से मानसिक व सामाजिक दबाव बना कर दान लेने के समान माना जा सकता है।

स्वतन्त्र भारत में सरकारी दान की कई प्रकार की नयी विधायें निकली। इसमें किसानों की ऋण माँफी, दुर्घटनाओं में पीड़ित परिवारों को राहत राशि प्रमुख हैं। वैसे आरक्षण को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है, विशेषकर उस समय जब यह लाभ बार बार एक ही परिवार वाले लेने लगे। अच्छे इरादे से शुरू की गई ये योजनायें राजनीति के चलते सरकार की सहृदयता की जगह प्राप्त करता का अधिकार अथवा चुनावी रणनीति का हिस्सा कब बन गई पता ही नहीं चला। इन योजनाओं से लाभ कम समाज का नुकसान अधिक हुआ है। सामाजिक विघटन, गुणता में गिरावट, अकर्मण्यता तथा हर समस्या के लिये सरकार की ओर देखना इन्हीं योजनाओं की देन है। अच्छा होता यदि इन योजनाओं को योग्यता से जोड़ा जाता।

 

समय के साथ कई धन कुबेरों ने अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा समाज के उत्थान के लिये देने की प्रथा आरम्भ की। हाँलाकि यह दान उनके द्वारा स्थापित संस्थानों की ओर से किया जाता है किन्तु समाचारों में नाम प्रायः धन कुबेरों का ही आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका पिछड़ो के विकास में एवं साथ ही दानदाता की समाज में प्रतिष्ठा स्थापित करने में बहुत बड़ा योगदान है। इसी श्रंखला में ऐसे कई सीमित साधन वाले गुमनाम दानदाता भी आते हैं जो अपनी लगभग पूरी कमाई व समय निर्धन एवं बेसहारा लोगों की सेवा में लगा देते हैं, ऐसे लोग सिर्फ सेवाभाव से प्रेरित होते है।

आजकल कार्पोरेशन द्वारा सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह का काफी प्रचलन है। सरकारी संस्थानों के लिये सरकार द्वारा आवश्यक बनाया गये इस नियम का कई निजी संस्थान भी पालन करते हैं। यह जनता में संस्थान की छबि निखारने के लिये किया गया दान है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके चलते कई गाँवों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है।

क्षेत्रीय विकास के लिये जन प्रतिनिधियों को क्षेत्र के आकार के अनुसार लाखों करोड़ों रुपये अनुदान दिया जाना सरकारी दान का नवीनतम रूप है। यह दुर्भाग्य है कि जन प्रतिनिधियों की उदासीनता तथा गलत प्राथमिकता के चलते इसका सही लाभ संबन्धित क्षेत्र को नहीं मिल पाता है।

चिकित्सा क्षेत्र में विकास के साथ एक नये प्रकार के दान की परंपरा आरम्भ हुई यथा रक्त दान, कोख दान एवं किडनी दान आदि। जन सेवा के रूप में शुरू हुए इस दान ने कब व्यवसाय का रूप ले लिया पता नहीं चला। मरणोंपरान्त अंगदान व देहदान अवश्य ही निस्वार्थ दान है।

दान छोटा या बड़ा यथार्थ में बिना किसी फल के स्वेच्छा से सुपात्र को किया दान ही श्रेष्ठ माना जायेगा।

 

राहुल गाँधी कांग्रेस के नये नायक

 

राहुल गाँधी लगभग २० वर्षों से भारतीय राजनीति में पैर जमाने की कौशिश में हैं। कई पार्टी नेताओं व अन्य संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण के वावजूद एक अपरिपक्व युवक की छबि से वे उबरने में नाकाम रहे। उनकी छबि प्रायः मनमौजी युवा व जबरन राजनीति में उलझाये राजनेता जैसी रही। कई बचकानी हरकतों के चलते वे मीडिया में वर्षों तक हास्य का माध्यम भी बने रहे। किन्तु इस बार गुजरात चुनाव के दौरान नये जोश व थोड़ी परिपक्वता से उनके प्रचार ने पार्टी में नयी उम्मीद का संचार किया है। सुनने में आया है कि इस बदलाव के पीछे एक विदेशी विश्लेषक कम्पनी का हाथ है। इसी के चलते उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद पर स्थापित कर दिया गया है। यह भी खबर में है कि २०१९ के संसद चुनाव के लिये भी पार्टी ने इसी कम्पनी (इस कम्पनी का योगदान १६ में ट्रम्प जी को जिताने में अहम माना जाता है) से समझौता किया है। इसके चलते २०१९ के चुनाव के हिसाब से आने वाला समय राजनीतक रूप से उथल पुथल व सरगर्मी भरा रहने की संभावना है। इस परिपेक्ष में राहुल के बारे में मेरे अध्ययन का निष्कर्ष इस प्रकार है:-

  • मेरा यह अनुमान है कि राहुल का माध्यमिक शिक्षण (जो मुख्यतः सुरक्षा कारणों से विदेश में हुई थी) से राजनीति में आने तक का समय एक गैर जिम्मेदार अमीरजादे सा गुजरा होगा। इसमें मौज मस्ती के अतिरिक्त और किसी कार्य के लिये प्रमुखता नहीं रही होगी।
  • राहुल को राजनीति में अपरिपक्व उम्र में लाना एक मजबूरी उस समय बन गयी, जब राजीव गाँधीजी की आकस्मिक मौत के बाद सोनियाजी को विदेशी होने के कारण प्रधानमंत्री के पद से दूर रहना पड़ा। इस प्रकार से उनका राजनीति में प्रवेश एक प्रकार से अत्प्रत्याशित था, जिसके लिये वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे।
  • अमेठी से पारिवारिक सुरक्षित सीट के चलते वे सांसद तो आसानी से बन गये किन्तु पहले पाँच सालों में न तो संसद के अन्दर एवं न ही संसद से बाहर अपनी राजनीतिक पहचान बनाने में वे सफल रहे। उनका अधिकतर समय विदेशों में छुट्टियाँ मनाने में ही बीता।
  • राहुल को राजनीति में प्रतिष्ठित करने के लिये पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को उनकी छबि सुधारने की जिम्मेदारी दी गई लेकिन ये प्रयास प्रभावी नहीं रहे। कभी गरीबों के मसीहा तो कभी गुस्साये युवा नेता अथवा सदन में युवा विरोधी नेता के रूप में पेश राहुल जनमन में विश्वास पैदा करने में सफल न हो सके।
  • उनको प्रोत्साहित करने के लिये कई युवा नेताओं को भी संसद में लाया गया, किन्तु वान्छित परिणाम नहीं मिल पाया। राहुल न तो एक प्रभावी वक्ता, न ही जन नेता एवं ना ही कुशल प्रबन्धक बन पाये। इस का मुख्य कारण उनकी अति संरक्षित परवरिश को माना जा सकता है। मौलिकता का उनमें अभाव परिलक्षित होता है।
  • २०१४ में संसद चुनाव में आगे से नेत्रत्व कर रहे राहुल का धुँआधार प्रचार मोदी जी की लहर के चलते लगभग निष्प्रभावी रहा। इससे उनकी साख को गहरा आघात पहुँचा। उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की हार ने उनके नेतृत्व में वि्श्वास हिला कर रख दिया।
  • हाल ही के गुजरात चुनाव में उनमें जो थोड़ा बहुत उत्साह व आत्मविश्वास देखने को मिला उसके पीछे एक किराये की एजेन्सी द्वारा जातीय ध्रुवीकरण द्वारा पार्टी के लिये जीत का वातावरण बनाने में सफल होना मुख्य कारण रहा। राहुल के अत्यधिक मंदिर प्रेम व पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के अनावश्यक बयानबाजी के चलते पार्टी मौके का पूरा लाभ नहीं उठा सकी।
  • समाचारों के अनुसार पार्टी ने उसी एजेन्सी से २०१९ के चुनाव के लिये अनुबन्ध किया है। अतः आने वाला समय आन्दोलन, दंगे एवं वाक युद्ध का अपेक्षित है। देखना होगा कि यह सब मोदी जी की लोकप्रियता में कितनी सेंध लगा पायेगा? राहुल अपने बल बूते पर शायद ही कुछ कर पायें।

नरेन्द्र मोदी एक रहस्यमय व्यक्तित्व

 

मोदी जी लगभग १२ वर्षों तक गुजरात के मुख्य मंत्री रहे तब तक उनके बारे में यदा कदा ही कोई समाचार सुनने को मिलता था। इन समाचारों में भी अधिकांश उनके २००२ के दंगों में लिप्त होने अथवा दंगें को रोकने में नाकामी के किस्से ही बहुतायत से होते थे। यदाकदा उनके द्वारा गुजरात में किये विकास कार्यों की तारीफ भी सुनने देखने को मिल जाती थी। कुल मिलाकर एक अछूत नेता की छबि मिडिया द्वारा बनाई गयी थी जिस वजह से पार्टी व अन्य दलों के नेता दूरी बनाये रखने में ही अपनी भलाई समझते थे। यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधान मंत्री वाजपेयी जी ने उन्हें लगभग मुख्यमंत्री पद से हटा ही दिया था। इसी छबि के चलते अमेरिका ने उन्हें वीसा देने से भी इनकार कर दिया था। इस पटाक्षेप में २०१४ के संसदीय चुनाव के लिये उनको प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार बनाने की खबर अप्रत्याशित व अफवाह जैसी ही लगी।

उनको प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार बनाने की खबर के तुरन्त बाद ही लगभग चुनाव से ६ माह पहले ही अमित शाह को उत्तर प्रदेश में जीत के लिये जमीन तैयार करने के लिये भेजने की खबर आयी। फिर तो सोशियल नेटवर्क पर जैसे मोदी जी छाने लगे। लालकिलेनुमा विशाल मंच से एक विशाल जन समूह को संबोधित करने से चुनाव प्रचार का मानो मापदंड बदल गया हो। हर रैली के साथ उनकी भाषण कला का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोलने लगा। अत्प्रत्याशित जन समूह उनको सुनने के लिये उमड़ने लगा। जैसे जैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई पार्टी के अन्दर व विरोधी पार्टियों के नेताओं का महत्व क्षीण होता गया। पार्टी कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ता गया एवं जीत के संभावित आंकड़ो की संख्या लगातार बढ़ती गई। अन्त में पूर्ण बहुमत से बीजेपी व सहयोगियों की जीत पर किसीको आश्चर्य नहीं हुआ।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी स्वयं व विरोधी पार्टी के नेताओं ने उनकी काबिलियत पर कई बार प्रश्नचिन्ह लगाने के प्रयास किये। किन्तु वे निरन्तर सफलता के आयाम स्थापित कर अल्प समय में ही विश्व के अग्रिम राजनायकों की पंक्ति में अपना स्थान बनाने में सफल हुए।

इस परिपेक्ष में मेरा ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हुआ और मैंने ध्यान पूर्वक मीडिया के माध्यम से समझने का प्रयास किया। लगभग चार वर्षों के अध्ययन का सार इस प्रकार है:-

  • मोदी जी अपनी सार्वजनिक छबि के प्रति अत्यन्त संवेदन शील हैं। उनका विशिष्ट परिवेष, सभाओं में अपार भीड़, शपथ समारोह में सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करना, मन की बात की शुरुआत व विश्व के सभी सशक्त राष्ट्राध्यक्षों से दोस्तीपूर्ण व्यवहार इसी श्रृंखला में आते हैं। इन सब प्रयासों से वे अपनी सरल, सहृदय, विनयशील, संवेदनशील एवं स्वाभिमानी छबि बनाने में सफल हुऐ हैं।
  • मोदी जी एक सशक्त नेता हैं, व हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहना पसंद करते हैं। अपने साथियों पर उनकी पकड़ मजबूत है। मन्त्री परिषद का कोई भी मंन्त्री अपने विभाग की उपलब्धियों का बयान मोदी जी को श्रेय दिये बिना नहीं करता है।
  • मोदी जी मंजे हुए राजनीतिज्ञ हैं। विरोधियों की किसी भी टिप्पणी पर वे शीघ्र प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करते हैं। सार्वजनिक सभाओं में उचित अवसर पर उनका उत्तर देकर वे उन टिप्पणियों का उपयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिये करते हैं।
  • मोदी जी में लोगों को अपने साथ जोड़ने की अद्भुत क्षमता है। लगभग सभी सभाओं में आरम्भ में वे स्थानीय लोगों से संबन्ध जोड़ने में अपने भाषण में जोर देतें हैं। भाषण के दौरान भी लोगों को अपने साथ जोड़ने पर विशेष ध्यान देते हैं।
  • मोदी जी अपने विरोधियों को कभी माफ नहीं करते। कभी नजर अंदाज, तो कभी छद्म रूप से या प्रत्यक्ष प्रचार से उन्होनें लगभग सभी विरोधियों को कमजोर कर दिया है।
  • मोदी जी की तकनीक में अत्यधिक रुचि है। विडियो कानफ्रेन्सिंग, सोशियल मीडिया, इन्टरनेट आदि का उन्होनें अपने प्रचार व प्रशासनिक सुधार के लिये प्रभावशाली उपयोग किया है।
  • मोदी जी देश के हालात सुधारने के प्रति सच्चे मन से समर्पित हैं। स्वच्छता अभियान, जनधन योजना, उज्जवला योजना, डिजिटल इन्डिया आदि देश के विकास में महत्वपूर्ण कदम साबित होगें। इसके अतिरिक्त कई ढाँचा गत विकास योजनायें विकास की गति में तेजी लायेंगी। विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्रों में विकास को महत्व देना भविष्य में देश को जोड़ने में कारीगर कदम साबित होगा।
  • मोदी जी एक कुशल प्रबन्धक भी हैं। उनके कार्यकाल में कार्य कुशलता में सुधार, योजनाओं के कार्यान्वयन में गतिशीलता तथा लागत में काफी कमी आई है। सरकार के निर्णय त्वरित व प्रभावी रहे हैं। सरकारी कार्य शैली में नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता परिलक्षित होती है।
  • मोदी जी धार्मिक पॄवत्ति के व्यक्ति है। मंदिरों में श्रद्धा पूर्वक जाते हैं। दोनों नवरात्रियो पर वे निराहार व्रत रखते हैं।
  • मोदी जी सच्चे मन से राष्ट्रभक्त हैं। दृढ़ निष्चयी हैं, तथा अपने लक्ष्य की रुकावटों का पूर्वानुमान लगा कर उन्हें दूर करने की क्षमता रखते हैं। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जी तोड़ प्रयास करने की क्षमता रखते हैं।
  • मोदी जी एक प्रखर वक्ता हैं। दूसरों द्वारा लिखित भाषण को भी उनमें तात्कालिक स्वरचित भाषण के समान दर्शाने की क्षमता है। उनके भाषण हमेशा सटीक, प्रभावशाली एवं श्रोताओं द्वारा ग्राह्य होते हैं।
  • इन सब से इतर मोदी जी में कुछ हद तक अहंकार परिलक्षित होता है।उनका व्यवहार कुछ हद तक तानाशाह जैसा है। पार्टी में दूसरे नेताओं के विकास में ध्यान उनकी प्रमुख ध्येय नहीं है।

 

भारतीय समाज में बदलाव के सात दशक

 

सात दशकों के ऊपर के जीवन काल में मैंने भारत के सामाजिक जीवन में बदलाव को लगातार महसूस किया है। इन सात दशकों में मनुष्य के जीवन को आसान व आरामदायक बनाने के हर संभव प्रयासों के बावज़ूद भी लगभग हर स्तर पर आज असहजता, असंतोष एवं अनजान भय से ग्रसित जीवन लोग जी रहे हैं ऐसा प्रतीत होता है। यह बदलाव धीमी गति से आने के कारण लोग बदलाव के परिणामों का सही आकलन नही कर पाये व बदलावों को आत्म सात करते गये। दशक दर दशक बदलाव जैसे मेरे स्मृति पटल पर अंकित है यह उनको लिपिबद्ध करने का प्रयास भर है।

  • पचास के दशक में बच्चे माँ बाप से डरते थे किन्तु उनके प्रति दिल से श्रद्धा रखते थे। समाज का लोगों के व्यवहार पर प्रभावी अंकुश था। तंगी में भी लोग संतुष्ट थे। घर आये जानवर को भी लोग खाली वापस नहीं लौटाते थे। भगवान में निस्वार्थ श्रद्धा थी। इमानदारी व सरलता समाज की पहचान थी।
  • साठ के दशक में परिस्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। युवाओं में फेशन, सिनेमा, व खेलों के प्रति रुझान में बढ़ोतरी। माता पिता के अंकुश पर विरोध के स्वर उभरने लगे। किन्तु उनके प्रति आदर भाव में कमी नहीं आयी। समाज का व्यक्तिगत व्यवहार पर प्रभाव में कमी। भगवान को सफलता के बदले में चढ़ावे का प्रचलन शुरु। नेताओं के घोटालों की यदा कदा समाचार। गरीबों के प्रति आदर में कमी व संदेह की शुरुआत।
  • सत्तर के दशक में संयुक्त परिवारों का विघटन शुरु। विवाह में दहेज माँगने के समाचार यदाकदा प्रकाशित। पश्चिमी फेशन की ओर बढ़ता झुकाव। बाहर खाने की ओर बढ़ता रुझान। परीक्षाओं में नकल करने की पृवत्ति बढ़ी। माता पिता में बच्चों की जिद के आगे झुकने की शुरुआत। युवाओं का रुझान सिनेमा व खेल (विशेषकर क्रिकेट) के प्रति बढ़ा, किन्तु माता पिता के प्रति आदर में कमी की शुरुआत।
  • अस्सी के दशक मे पाश्तचात सभ्यता की ओर युवा युवतियों के रुझान में बढ़ोतरी। युवतियों मे युवकों के समान अधिकारों की चाहत जागी। पिछड़ी जाति को आरक्षण देने पर युवाओं का राष्ट्र व्यापी रोष। युवाओं में नेताओं के प्रति अविश्वास पैदा। जाति व धर्म पर आधारित समाज के विघटन की शुरुआत। युवओं की सहनशीलता घटी, संयुक्त परिवारों में बिखराव आरम्भ। व्यापार व राजनीतिक भ्रष्टाचार में तेजी से बढ़ोतरी।

 

  • नब्भे के दशक में सहिष्णुता में कमी। समाज के विभिन्न घटकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। चुनावों में जाति व धर्म का प्रभाव बढ़ा। धार्मिक कट्टरता की शुरुआत। क्षेत्रीय संबद्धता बढ़ने के परिणाम स्वरूप क्षेत्रीय दल शक्तिशाली बन कर उभरे। राष्ट्रीय भावना में भारी गिरावट। २४ घन्टे टीवी प्रसार से सामाजिक मेल जोल में कमी। शिक्षा के निजीकरण से शासकीय स्कूलों के स्तर में गिरावट, शिक्षा महँगी होना आरम्भ।
  • धार्मिक कट्टरता ने आतंक का रूप लेना शुरू किया। धर्म ने एक व्यापार का रूप लेना शुरू किया। धर्म गुरुओं व मुखियाओं ने विलासिता को अपनाया। स्वार्थवश ऐसे धार्मिक नेताओं के अनुयायियों की संख्या में वॄद्धि, ऐसे लोगों की बाढ़ । युवाओं में ऐशो आराम व भ्रमण की ओर रुझान बढ़ा, धन अर्जन का महत्व बढ़ा, इसके लिये सभी तरीके मान्य। इकाई परिवार की शुरुआत। माता पिता पर खर्च बोझ लगना आरम्भ।
  • इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में मानव मूल्यों में तेजी से गिरावट की शुरुआत। पढ़ाई, राजनीति, धार्मिक संस्थानों, व्यापार आदि सभी जगह भ्रष्टाचार में वृद्धि। समाचारों की सच्चाई सन्दिग्ध। इन्टरनेट व मीडिया में अश्लीलता की भरमार। महिलाओं पर छेड़छाड़ व अन्य अपराध में बढ़ोतरी। अपराध उजागर लेकिन प्रभावशाली सजा से बच निकलने में सफल। माता पिता को वृद्धावस्था में असहाय छोड़ने की पृवत्ति की शुरुआत।
  • इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरम्भ से ही बड़े कार्पोरेट व्यापारियों व राजनेताओं द्वारा बड़े वित्तीय घोटाले। कई नकली धर्म गुरूओं का उदय। ऐसे गुरूओं ने भक्तों की फौज तैयार कर राजनीतिक शक्ति बढ़ाई एवं अपने अड्डों को ऐशगाह व विलासिता का केन्द्र बनाया। आतंकवाद मे अत्प्रत्याशित विस्तार। महिलाओं, लड़कियों एवं बच्चियों तक से अमानुष कृत्यों में अकल्पनीय वृद्धि।

मानव मूल्यों में सात दशकों की सतत गिरावट कब थमेगी कहना मुश्किल है। मुश्किल यह है कि इस अवनति पर चिन्ता तो कई लोग दर्शाते है, लेकिन बदलने की जिम्मेदारी सरकार को दोष देने तक ही सीमित है। कोई चमत्कारी व्यक्तित्व के उदय होने पर ही बदलाव संभावित है।

 

भारत एवं ज्ञान

 

भारत को विश्व की पुरातनतम संस्कृतियों में से एक के लिये जाना जाता है। भारत के हजारों मनीषियों ने अपना संम्पूर्ण जीवन ज्ञान की खोज में अर्पित कर वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रंथों में हजारों वर्ष पूर्व ही समाज, विज्ञान एवं कला की अनेक विधाओं का संकलन किया। इन ग्रंथो का अध्ययन पूरे विश्व ने किया तथा इन्हें ज्ञान का भंडार बताया। इन प्रयासों के फलस्वरूप भारत को विश्व गुरू होने का सम्मान मिला। दूर दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने भारत आते थे। यह एक दुर्भाग्य है कि समय के साथ भारत ज्ञान के क्षेत्र मे पिछड़ता गया। आज ज्ञान को मात्र जीवकोपार्जन का साधन मात्र मानकर किसी भी प्रकार एक प्रमाणपत्र प्राप्ति मान बैठे है। ऐसा भी नहीं है कि भारतीयों की बुद्धिमता में कोई कमी आई है। इस अवनति के निम्न लिखित कारण हो सकते है:-

१. प्राचीन ग्रंथो का धार्मिक बताया जाना

हमारे पुरातन सामाजिक चिन्तकों ने शायद प्राचीन ग्रंथो के प्रसार के लिये इनका पाठन पुण्य का कार्य घोषित कर दिया एवं सुख संपत्ति देने वाला व स्वर्ग में स्थान दिलाने का साधन बतलाया। परिणाम स्वरूप अनेक प्राचीन ग्रंथों के पठन व कथा श्रवण का प्रचलन अवश्य ही बढ़ा किन्तु उसमें निहित ज्ञान को सीमित वर्ग ही समझ पाया। परिणाम स्वरूप उपदेशकों की संख्या का विस्तार अवश्य हुआ किन्तु ज्ञान का विकास नहीं।

२. अंग्रेजों ने शिक्षा व्यवस्था को अपनी आवश्यकता अनुसार रोजगार पाने का साधन बना दिया। फलतः पढ़े लिखे लोग नौकरी के अतिरिक्त अन्य जीवनयापन के साधन के लिये अनुपयुक्त होते गये। नौकरी में ज्ञान का उपयोग दैनिक कार्य को कुशलता पूर्वक करने तक सीमित रहा। ज्ञान का विस्तार नौकरी में उन्नति तक सीमित।

३. स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा में सुधार के नाम पर सतही सुधार ही किये गये जैसे वेषभूषा, शालाओं में भोजन देना, पुस्तकों में बिना विशेष प्रयोजन बदलाव कर कठिन बनाना। आरंभिक वर्षों में पढ़ाई का बोझ बढ़ाना। बिना परीक्षा उत्तीर्ण किये १०वीं कक्षा तक आगे बढ़ाते रहना आदि। परिणाम स्वरूप स्कूल जाने पर अधिक जोर ज्ञान अर्जन पर नहीं।

४. सरकारी स्कूलों में आरक्षण, सिफारिश व भाई भतीजावाद के चलते अयोग्य व शिक्षण में रुचि नहीं रखने वाले शिक्षकों को लगाना। परिणाम स्वरूप शिक्षा स्तर में गिरावट व निजी संस्थाओं के प्रवेश से शिक्षा का व्यापारी करण।

५. शिक्षकों को पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य कई कामों में उलझाना। परिणाम स्वरूप योग्य युवा शिक्षण क्षेत्र में आने से कतराने लगे। समाज में  शिक्षकों के मान सम्मान में लगातार गिरावट।

६. पढ़ाई में सुधार से ज्यादा परीक्षा परिणाम पर जोर। परिणाम स्वरूप पर्यवेक्षण, विवेचन, सूचना एकत्र करने में उपयोगी समय की बर्बादी। परीक्षा परिणाम सुधारने के दबाव के चलते अनुचित साधनों के उपयोग को बढ़ावा।

७. उच्च शिक्षा व अन्य सेवाओं में प्रवेश के लिये अलग से प्रतियोगता परीक्षाओं के कारण योग्य छात्रों का ध्यान ज्ञान अर्जन में कम,  प्रतियोगता परीक्षाओं की तैयारी में अधिक।

इस स्थिति से उबरने के लिये आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था में कुछ क्रान्ति कारी बदलाव लायें जायें। नीचे दिये कुछ सुझाव ध्यान देने योग्य हैं:-

  1. बच्चों को ५ वर्ष की आयु के बाद ही किसी स्कूल में प्रवेश। प्राथमिक स्कूल पैदल पहुँचने लायक दूरी से अधिक न हो। प्रवेश के समय जाति नहीं पूछी जाये ना ही यूनीफार्म का बन्धन। प्रथम दो वर्ष स्लेट व कलम का ही प्रयोग। अक्षर, अंक,व्यवहार ज्ञान, व सामूहिक गतिविधियों तक पढ़ाई सीमित। पाँचवीं कक्षा तक पाँच घंटों से अधिक नहीं।
  2. बच्चों को मुफ्त में कुछ नहीं दिया जाये। छोटे मोटे काम स्वेच्छा से करवाकर आर्थिक मदद की जा सकती है। इससे बच्चों का आत्म सम्मान व आत्मविश्वास बढ़ेगा। स्कूलों पर्यवेक्षण स्कूल के बच्चों के माता पिता द्वारा ही हो। समाज द्वारा स्कूल को आर्थिक सहायता का प्रावधान हो।
  3. माध्यमिक शिक्षा में नियमित पढ़ाई के साथ बच्चों की रुचि जानकर आगे किस क्षेत्र में उसकी सफलता की संभावना अधिक है, इसका मार्ग दर्शन भी किया जाय। माध्यमिक शिक्षा के बाद कौशल विकास पाठ्यक्रम (आई टी आई ) चयन करने का प्रावधान हो। यह पाठ्यक्रम ४ वर्ष का (हायरसेकेन्डरी के समकक्ष) हो तथा इसमें उद्यमिता विकास भी समाहित हो। ऐसे छात्र यदि आगे शिक्षा लेना चाहें तो वे महाविद्यालयों में प्रवेश के पात्र माने जायें।
  4. उच्च शिक्षा के लिये पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम व पुस्तकें हों। परीक्षा रीजनल बोर्ड (रेलवे के समान भाषा व राज्य सीमा के आधार रहित) के द्वारा संचालित की जाये। परीक्षा का उददेश्य ज्ञान अर्जन को आँकना हो। परीक्षा का मानक पूरे देश में एक हो। उच्च शिक्षा के लिये उम्र का बन्धन नहीं हो। परीक्षा में अनुचित साधन का उपयोग करने वाले छात्रों को अनुत्तीर्ण माना जाये।
  5. नौकरी व अन्य चयन यथा संभव शैक्षणिक उपलब्धि के आधार पर हो। यदि चयन परीक्षा आवश्यक हो तो उसका स्वरूप समकक्ष स्कूली परीक्षा के समान ही हो ताकि विशेष कोचिंग की जरूरत न हो।
  6. शिक्षकों को समाज में सम्मान दिलाने के लिये, बैंको. रेल व अन्य जगह पंक्ति में प्राथमिकता दी जाये। साथ ही शिक्षकों द्वारा छोटे से छोटा अनैतिक कार्य को गंभीरता से लिया जाये। शिक्षकों को शिक्षण के अतिरिक्त अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाये।

समाज व बुराइयाँ

 

लगभग सभी वर्ग के लोग आज की सामाजिक स्थिति पर चिन्ता व्यक्त करते नहीं थकते। बुजुर्ग अपने जमाने के अनुशासन व संवेदनशीलता पर व्याख्यान देने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। युवा अपने आदर्शों व आज के समाज में प्रगति की राह में तकरार के कारण मध्यमार्ग खोजने में व्यस्त हैं। कुछ आदर्शवादी लोग सोशियल मीडिया पर सरकार व नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खोलकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। इस सबसे एक बात तो साफ है कि मनुष्य समाज से आज भी जुड़ाव महसूस करता है। सामाजिक स्थिति से उसकी असजता उसकी स्वयं को असहाय महसूस करने का परिणाम है। यह केवल आज ही की स्थिति नहीं है। वेदान्त साहित्य में भी लगभग आज हो रहे सभी प्रकार के अपराध तथा अपराधी को दण्ड के विधान का विस्तृत विवरण मिलता है। सामाजिक सुधार के लिये मृत्योपरांत स्वर्ग व नर्क की कल्पना आदर्श समाज स्थापित करने की दिशा में एक अद्भुत प्रयास था।  तब से लेकर आजतक नये नये कानून व उनका पालन करवाने के लिये व्यवस्था का विकास सतत रूप से जारी है। किन्तु इन सभी प्रयासों के बावजूद समाज में अपराध व बुराइयाँ कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। इसका प्रमुख कारण मनुष्यों में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियाँ होती हैं।

  1. अहं – अहं का विकसित रूप प्रायः समृद्ध एवं सफल व्यक्तियों में देखने को मिलता है। ऐसे लोग अपने को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। ये मजबूर व जरूरतमन्द लोगों को निम्न श्रेणी का मानकर अपमानित करने में नहीं संकोच करते हैं। इसी श्रेणी में शासकीय वर्ग भी आता है जो स्वयं को शक्ति संपन्न व शासकीय अनुमति के आवेदन कर्ता को असहाय मानकर चलता है।
  2. मद – कई लोग जो शक्ति संपन्न होते हैं अथवा शक्ति संपन्न लोगों के करीबी होते हैं, प्रायः इसका प्रदर्शन करने से स्वयं को रोक नहीं पाते हैं। इसका प्रदर्शन वे अपनी अर्थ व बल संकलन से करते हैं। अर्थ संकलन के लिये वे कई तरह के गैर कानूनी तरीके अपनाते हैं। तथा बल संकलन के लिये असमाजिक तत्वों को अपनी छत्र छाया में संरक्षण देकर अथवा ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों को अपनी सेवा में लेकर करते हैं। ऐसे लोग प्रायः राजनेताओं, उच्च अधिकारियों व गैर कानूनी व्यवसायियों में पाये जाते हैं।
  3. लोभ – कुछ लोगों में धन संग्रह की तीव्र प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग किसी प्रकार से धन कमाकर अपने लिये ऐशो आराम की वस्तुऐं एकत्र करते हैं। किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा होने पर उसे पा लेने के लिये हर संभव प्रयास करते हैं। ऐसे लोग कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। ऐसे व्यक्ति हर जगह हर स्तर पर पाये जाते हैं।
  4. मोह – कुछ लोग व्यक्ति अथवा वस्तु विशेष से विशिष्ट रूप से जुड़ जाते हैं। उसकी रक्षा अथवा प्रगति के लिये वे कुछ भी कर सकते हैं। इस श्रेणी में एक ओर जहाँ देश के लिये प्राण न्योछावर करने वाले देश भक्त आते हैं। तो दूसरी ओर पुत्र मोह में धृतराष्ट्र जैसे लोग जो अपने अजीज के हर अत्याचार से आँख मूंद लेते हैं। कुछ लोग स्वयं के मोह में भी फँस जाते हैं।
  5. ईर्षा – कुछ लोगों की नज़र हमैशा दूसरों पर अधिक केन्द्रित रहती है। ऐसे लोग स्वयं की उपलब्धि को दूसरे से कमतर पाते हैं। ऐसी स्थिति में हीन भाव से ग्रस्त होकर कई बार दूसरे को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के लोग प्रायः आफिस में सहकर्मियों अथवा मोहल्ले में पड़ौसी के रूप में मिल जाते हैं।
  6. हिंसा – इस प्रवृत्ति से ग्रसित लोग पहले जंगल में शिकार करके अथवा आस पड़ौस में जानवरों को देखकर पत्थर मारकर संतोष कर लेते थे। किन्तु आजकल मनुष्यों को मारना अधिक आसान हो गया है। बदले, हीन भावना अथवा अपराध छिपाने की भावना हिंसा प्रज्जवलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  7. वासना – वासना ग्रसित लोग किसी के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि उसे पाने के लिये विवेक खो बैठते हैं। ये आसक्ति किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति हो सकती है। लेकिन आज के परिपेक्ष में यह काम वासना का विकृत रूप ले चुका है जिसने मनुष्य को जानवरों से बदतर हालात में ला खड़ा किया है।
  8. घृणा – इस प्रवृत्ति के लोग किसी व्यक्ति विशेष से इतनी नफरत मन में बिठा लेते है कि उसे किसी भी प्रकार से मिटा अथवा कम नहीं किया जा सकता। वे हर संभव मौके पर उस व्यक्ति की बुराई शुरू करने लगते हैं। जरूरी नहीं कि घृणा का कारण जायज हो।

आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व तक माता पिता, शिक्षक व समाज के दबाव के चलते बचपन से ही इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की सीख दी जाती थी। परिणाम स्वरूप समाज में बुराईयाँ सीमित रूप में ही देखने को मिलती थी। बिखरते संयुक्त परिवार, माता पिता की व्यस्तता, शिक्षकों व माता पिता की सीख एवं आचरण मे विरोधाभास एवं कमजोर सामाजिक बंन्धनों के चलते इन प्रवृत्तियों पर मनु्ष्य का नियंत्रण कम होता गया। भोग विलास के साधन, संपन्नता प्रदर्शित करने की प्रतिस्पर्धा एंव धनबल, बाहुबल से न्याय को प्रभावित कर पाने की क्षमता से प्रेरित मनुष्य आज इन प्रवृत्ति जनित बुराईयों आज अपनी सफलता का आधार मानने लगा है।

इस परिस्थिति से उबरने का सिर्फ एक ही उपाय हो सकता है। वह है मनुष्य स्वयं में संतोष, दया, सहृदयता, संवेदन एवं त्याग की प्रवृत्तियों का पोषण करे।

संकल्प से सिद्धि का आव्हान

 

प्रधान मंत्री श्री मोदी जी का अगस्त क्रान्ति के अवसर पर अगले पाँच वर्षों में देश को भ्रष्टाचार, निर्धनता, आतंकवाद, गंदगी  व जाति अथवा धर्म के आधार पर भेदभाव से मुक्त करने के आव्हान का प्रत्येक देश प्रेमी नागरिक अवश्य ही स्वागत करेगा। काश वे इन बुराइयों में अपराध को भी शामिल कर लेते।

क्या यह लक्ष्य प्राप्त करना संभव है?

अगस्त क्रान्ति के समय में और आज के समय में एक मूलभूत अंतर है। उस समय जहाँ अधिकतर जनता अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त थी, आजकल अधिकतर लोग इन बुराइयों के आदी हो गये हैं। इतना ही नहीं कई लोगों ने तो इन बुराइयों को अपने लाभ का साधन बना रखा है। अतः इन बुराइयों से देश को उबारने के लिये एक सामाजिक क्रान्ति लाने की जरूरत पड़ेगी जो लोगों की सोच बदले। लोगों को इन बुराइयों से घृणा होने लगे। यदि हम ऐसा कर पाने में सफल हो पाते हैं तो ही यह संकल्प पूरा हो पायेगा।

केन्द्र सरकार ने इसकी सफलता के लिये देश के विभिन्न भागों में तिरंगा यात्रा निकालने व शिक्षण संस्थाओं में शपथ ग्रहण समारोह के आयोजन का निर्णय लिया है। किन्तु आज के नेताओं पर अविश्वास के परिपेक्ष में इसका अनुकूल प्रभाव संदिग्ध नजर आाता है। हाँ यह संकल्प से सिद्धी कार्यक्रम के प्रति जागरुकता पैदा करने में अवश्य ही सहायक हो सकता है।

क्योंकि समाज व्यक्तियों से बनता है। अतः बदलाव की शुरूआत भी व्यक्तिगत बदलाव से ही होगी। सामाजिक बदलाव के लिये एक ऐसी नयी पीढ़ी की जरूरत पड़ेगी, जो समाज के उत्थान के लिये अपना सब कुछ त्याग कर युवाओं को इस आन्दोलन से जोड़ सके। यह संभव हो सकता है यदि:-

  1. देश के विभिन्न हिस्सो में कुछ ऐसे युवाओं को चिन्हित किया जाये जो इस संकल्प के लिये अपना सब कुछ त्याग कर समर्पित होने के लिये तैयार हों। ये युवा अपने अपने क्षेत्र में वदलाव के लिये माहौल पैदा करें व बदलाव के लिये समर्पित अन्य युवाओं को जोड़ें। ऐसे युवाओं को संकल्प सेवक का परिचय पत्र तथा आसान पहचान के लिये निर्धारित परिवेष रखा जाये। एक साधारण से संकल्प भवन में इनके सादे जीवनयापन की व्यवस्था सरकारी व्यय से की जाये। इनका प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र में चिन्हित बुराइयों को रोकना व जन मानस में इन बुराइयों के प्रति असहिष्णुता पैदा करना हो।

 

  1. इस संकल्प की पूर्ति के लिये चरित्र विकास की आवश्यकता है। चरित्र गठन में आरम्भ के दस वर्ष अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इस समय परिवार के सदस्य, संबन्धी एवं पड़ोसी तथा शिक्षकों की चरित्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह दुखःद सत्य है कि आजकल अधिकांश बच्चे सिखाये गये आचरण के प्रतिकूल सिखाने वाले का आचरण पाते हैं। यह अविश्वास को जन्म देता है तथा नैतिक शिक्षा व्यर्थ हो जाती है। पारिवारिक व सामाजिक परिवेष में परिवर्तन तो सामाजिक बदलाव से ही आयेगा। लेकिन शिक्षकों के आचरण पर अंकुश लगाने की सख्त जरूरत है। किसी भी प्रकार का गलत आचरण शिक्षक को सेवा के अयोग्य घोषित करने के लिये काफी होना चाहिये। सिफारिशी पदस्थापना, आरक्षित पदस्थापना व उपरी संरक्षण के चलते यह असंभव है। शिक्षण संसथानों को इनसे मुक्त कर योग्यता एवं अनुकूलता के आधार पर शिक्षकों का चयन कर पदास्थापना द्वारा ही यह संभव है।

 

  1. राजनीतिक शुद्धिकरण भी संकल्प पूर्ति के लिये बहुत जरूरी है। आजकल चुने हुए अधिकतर प्रतिनिधि अपने को जनता से ऊपर शक्ति संपन्न व कानून से ऊपर मानते है। चुनाव जीतने के लिये सभी प्रकार के हथकंडे अपनाये जाते हैं। इस तरह से चुनकर आने वालों से इन बुराइयों को दूर करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? इसके शुद्धिकरण की शुरुआत संकल्प सेवकों जो आसपास की जनता में अपनी निस्वार्थ सेवा से निर्मल छबि बना चुके हैं। उनको राजनीति में आकर करनी  चाहिये। बिना बड़ी बड़ी चुनावी सभावों व शोर शराबे के ये सिर्फ व्यक्तिगत संपर्क के बल पर चुनाव जीत कर लोक सभा व विधान सभा में आ सकते हैं। जीतने के बाद ये लोग अन्य सदस्यों जैसा वेतन, भत्ता व अन्य सुविधा न लेकर साधारण गुजारे लायक वेतन लें। शायद इससे अन्य सदस्यों को भी शर्म आये। जनता में इस प्रकार के आचरण से संकल्प सेवकों के प्रति सम्मान बढ़ेगा व यही राजनीतिक शुद्धिकरण की शुरुआत की नींव बनेगी।

 

  1. न्यायपालिका इस संकल्प सिद्धी की सफलता के लिये एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें भी काफी सुधार की गुंजाइश है। यह एक स्थापित सत्य है कि गंभीरतम अपराधों में भी अंतिम फैंसला आने तक वर्षों बीत जाते हैं। यदि मामले में प्रभावशाली व्यक्ति अथवा राजनीतिक स्वार्थ निहित है तो शायद ही फैंसला अन्तिम पढ़ाव तक पहुँचे। इसके विपरीत कई गरीब छोटे से अपराध के लिये सालों जेल में न्याय का इन्तज़ार करते रहते हैं तो वहीं कई गरीब व लाचार लोग उस अपराध में फँसा दिये जाते हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिये मुख्य न्यायाधीश को ही कुछ कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। कुछ सुझाव उनके ध्यानाकर्षण इस प्रकार हैं :-

 

  1. सभी मामलों का गंभीरता के अनुसार ७ या ८ श्रेणियों वर्गीकरण किया जाये व उसके अनुसार फैंसला सुनाने के लिये न्यायालय की बैठके निर्धारित (१ से ५० अधिकतम) की जाये।
  2. गंभीर अपराधों की सुनवाई लगातार हो। तथा गवाहों की अधिकतम सीमा हर मामले में निर्धारित की जाये।
  • झूठी गवाही व गलत जानकारी देने वाले वकील व गवाह पर आर्थिक दन्ड गंभीरता अनुसार तुरन्त लगाया जाये। तीन से अधिक बार गलत जानकारी अथवा गवाह पेश करने वाले वकील को अयोग्य घोषित किया जाये।
  1. ऊपरी अदालत में अपील निचली अदालत के फैंसले में कोई कमी पाये जाने के बाद ही स्वीकृत की जाये। इसका रिकार्ड संबन्धित जज की वार्षिक रिपोर्ट में रखा जाये।
  2. विभिन्न न्यायालयों की वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये।

कई लोगों को शायद ये अव्यहवारिक लगे।

मानव अधिकार के नाम पर

 

सभी प्राणियों में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने की सहज पृवत्ति होती है। कई प्रकार की प्रतिस्पर्धायें श्रेष्ठता स्थापित करने का माध्यम आदिकाल से रही है। मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से कई नयी नयी प्रतिस्पर्धाओं का आविष्कार अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिये किया। इनमें गुलामों को रखना व उन पर अत्याचार करना निसंदेह मनुष्य की क्रूरता की पराकाष्ठा थी। इसके विरोध में समाज सुधारकों का आवाज उठाना आवश्यक था। धनवानों, बाहुबलियों व प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा निर्धन व निःसहाय मनुष्यों पर अत्याचार व उनका शोषण आज भी लगभग पूरे विश्व में जारी है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। इसी नियंत्रण के लिये कई शासकीय, व अशासकीय मानव अधिकार संगठन विश्व भर में गठित हैं। ये संगठन अपराधी की सजा, आदिवासियों के विस्थापन, बाल मजदूरी, महिलाओं व दलितों व निर्बलों के विरुद्ध अन्याय पर नजर रखते हैं तथा आवश्यकता पढ़ने पर उनकी सहायता करते हैं। ये इन वर्गों के साथ अन्याय न हो ऐसा कानून बनाने के लिये सरकारों पर दबाव भी बनाते हैं। ये सब प्रयास अवश्य ही सराहनीय हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में ऐसा देखने को मिल रहा है कि कुछ संस्थान मानव अधिकारों की आड़ में देश में सुनियोजित रूप से अराजकता व अस्थिरता फैलाने में सहायता कर रहें हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-

  1. जे एन यू में लगभग साल भर पहले एक कार्यक्रम के दौरान देशद्रोही नारे लगे। उसका संज्ञान लेकर नारा लगाने वाले छात्र के विरुद्ध कार्यवाही की माँग क्या शुरु हुई कि कई मानव अधिकार के रक्षक अचानक जाग उठे। चारों और हल्ला मच गया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का गला घोटा जा रहा है। जैसे किसी ने उस छात्र को फाँसी की सजा सुनादी हो। हफ्ते भर तक टेलिविजन पर लगातार देश में मौलिक अधिकारों के हनन पर चर्चा होती रही।
  2. एक आतंकवादी को वर्षों चली न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई। इसके उपरान्त राष्ट्रपतिजी ने आतन्की की दया याचिका को निरस्त कर फाँसी की सजा बकरार रखी। इन सब प्रावधानों को पूरा करने के बाद जब आतंकी को फाँसी की सजा दी गई तो मानव अधिकरों की रक्षा में जुटे कई संगठनों को मानव अधिकारों का हनन होता हुआ दिखा। व लगभग दो हफ्तों तक अलग अलग माध्यमों द्वारा फाँसी के विरोध में सरकार व प्रशासन को कोसते रहे।
  3. आतंकवादियों को बचाने के लिये कच्ची उम्र के युवा सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते बच्चों को तितर बितर करने के सुरक्षा बल पेलेट गन का प्रयोग करती है। इसमें कई मानवता के प्रहरियों को मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन नजर आता है। यदि एक पत्थरबाज को ढाल बनाकर सुरक्षाकर्मी सुरक्षित निकलने में कामयाब हो जाते हैं तो ये मानव अधिकारों के पहरेदार गला फाड़कर चिल्लाने लगते हैं।
  4. आजकल मानव अधिकार के प्रति संवेदनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि घर में गलत काम करने पर बच्चों को डाँटना या कान पकड़ना अथवा कक्षा में शरारत करने पर बच्चों को झिड़कना अपराध की श्रेणी में आ गयें हैं।

मानव अधिकारों के नाम पर ऐसे कई संगठन सामाजिक व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं यह प्रायः देखने को मिलता रहता है।

समाज में कोई भी अपराध बिना किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्ति समूह के अधिकार का हनन किये बिना संभव नहीं है। इसका अपवाद सिर्फ एक ही स्थिति में हो सकता है, जब कोई किसी को राष्ट्र अथवा धर्म के विरुद्ध भड़काने का प्रयास करे जैसा जेएनयू में हुआ था। यह एक प्रकार से सामाजिक शान्ति भंग करने की परिभाषा में आता है। अतः हम मान सकते है कि एक व्यक्ति या समूह द्वारा किया अपराध अन्य व्यक्ति या समूह के अधिकारों का हनन है अथवा सामाजिक शान्ति के लिये खतरा है। इसका निराकरण शीघ्रातिशीघ्र होना आवश्यक है।

किन्तु मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं व बचाव पक्ष का धन बर्बाद होता है। इसका परिणाम कितना भयावह हो सकता है यह हवाई अपहरण के बाद कुख्यात आतंकवादी अजहर महमूद की रिहाई से अच्छी तरह समझा जा सकता है। कसाब की सुरक्षा पर करोड़ों का खर्च व  छोटे अपराधियों का केस का निपटारा होने के इन्तज़ार में वर्षों तक जेल में बन्द रहना इसके अन्य उदाहरण हैं। इसके विपरीत प्रभावशाली प्रत्यक्ष अपराधियों का अपने धन व शक्ति बल के चलते सजा को जीवन पर्यंत टालना अथवा निर्दोष छूट जाना क्या पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों का हनन नहीं है?

मानव अधिकार के नाम पर अपराधियों का संरक्षण किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिये। आवश्कता है कि वर्तमान न्याय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाये तथा अपराधी के मानव अधिकार के बजाय पीड़ित के अधिकारों की रक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाय।

इसी प्रकार मानव अधिकारविदों को सामान्य सामाजिक व्यवस्था जैसे घर में बच्चों का पालन  अथवा शिक्षण संस्थाओं में अनुशासन बनाये रखने आदि में दख़ल नहीं देना चाहिये। पारिवारिक व सामाजिक बन्धन व वर्जनायें समाज के चरित्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसको कमज़ोर करने के प्रयास का ही परिणाम है कि कम उम्र बच्चे स्कूल में बन्दूकें चलाते हैं व अन्य अपराध में लिप्त हो जाते हैं। समाज का आपसी जुड़ाव ही एक स्वस्थ समाज दे सकता है। मानव अधिकारों के नाम पर समाज का बिखराव मानवता के लिये घातक सिद्ध हो सकता है।