मानव एवं प्रकृति

 

प्रकृति की एक विशेषता यह है कि वह अपना संतुलन बनाये रखती है। प्राकृतिक रूप से पैदा हुई हर वस्तु का निर्धारित जीवन काल होता है, तथा जीवन समाप्त होन पर वह स्वतः उसका अपघटन होकर पंचतत्व में विलीन हो जाती है। इसी प्रकार प्रकृति ने अपनी हर प्रजाति के लिये उचित पालन की व्यवस्था भी निर्धारित की हुई है जिसकी आपसी संबद्धता के चलते एक संतुलन बना रहता है। वातावरण के बदलते स्वरूप के अनुसार प्रजातियों के स्वरूप परिष्कृत होकर नया रूप लेते रहते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयं का विकास करती रहती है। मानव प्रकृति के इसी विकास श्रंखला की एक कड़ी है।

मानव का विकसित मस्तिष्क उसे अन्य प्राणियों से अलग करता है। मनुष्य ने अपने मस्तिष्क का उपयोग हमेशा ही  अपने लिये आराम जुटाने के लिये किया है। जैसे जैसे सुविधा के साधन जुटते गये वह प्रकृति से दूर होता चला गया।पहिया, आग, व खेती का प्रयोग सीखना व प्राकृतिक धूप व बारिश से बचाव के लिये सुरक्षित छत की खोज मनुष्य की इस दिशा में आरम्भिक उपलब्धियाँ थी। जैसे जैसे मनुष्य ने अपने लिये सुख सुविधा जुटाई वैसे वैसे उसका लालच बढ़ता गया तथा संग्रह की भूख भी बढ़ती ही गई। इस बढ़ती भूख के चलते मानव जाति ने प्रकृति के साथ स्वयं को भी को अन्धाधुन्ध नुकसान पहुँचाया जिसकी भरपायी करना अब मुश्किल हो गया है। प्रकृति को नुकसान पहुँचाने में प्रमुख योगदान इन क्षेत्रों में रहा हैः-

  • जल प्रदूषण – बड़े बड़े उद्योगों का दूषित अवशेष बिना किसी उपचार के नालों, तालाबों अथवा नदियों में छोड़ देना। इसके चलते लगभग सभी मैदानीय जल स्रोत इतने प्रदूषित हो गये हैं कि उस पानी को उपयोग योग्य बनाने के लिये करोड़ों रुपये खर्च पड़ रहे हैं। अन्य प्राणियों व जल जीवों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • वायु प्रदूषण – कल कारखानों व वाहनों से निकले धुँए से पूरा वायु मंडल दूषित हो गया है। सर्दी के दिनों में बड़े शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। कई प्रकार की बीमारियाँ वहाँ के निवासियों को इस कारण हो जाती हैं। अन्य कई प्रकार की गैस जो सुख सुविधा के उपयोग के उपकरणों अथवा सौन्दर्य साधनों के उपयोग से उत्सर्जित होती हैं। इन गैसों ने ओज़ोन परत को खंडित कर दिया है, जो हानिकारक अल्ट्रा वायलेट विकरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यह प्राणियों में कई रोगों का आज एक प्रमुख कारण है। बढ़ते तापमान से मानवता के नष्ट होने के खतरे से पर्यावरण वैज्ञानिक अभी से ही आगाह करने लगे हैं।
  • कचरे का ढेर – उपभोग वाद के चलते मनुष्य हर नये उत्पाद के लिये पुराने उत्पादों को कचरा समझ कर फेंक देता है। परिणाम स्वरूप पृथ्वी पर कचरे का अम्बार इकठ्ठा होता जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार २०५० तक विकास की यही गति रही तो लगभग एक तिहाई हिस्से की जरूरत केवल कचरे के लिये ही पड़ेगी। इसके अतिरिक्त समुद्र में भी हजारों टन हानिकारक कचरा हर साल डाला जा रहा है, जो समुद्री जीवों के लिये घातक है। अन्धाधुन्ध उपग्रह प्रक्षेपण के चलते वायुमंडल भी एक कचरा घर बनने की ओर अग्रसर है।
  • प्रदूषित खाद्य पदार्थ – खाद्यान्नों व फल सब्जियों को बीमारी व कीड़ों से बचाने के नाम पर कीट नाशकों के बढ़ते प्रयोग ने इनको मनुष्य के लिये ही जहर तुल्य बना दिया है। स्वस्थ भोजन के नाम पर आर्गिेनिक खाद्य पदार्थों का प्रचलन डेढ़ से दो गुने दामों पर आजकल तेजी से बड़ रहा है। इसके अतिरिक्त फल सब्जियों में कृतिम वृद्धि के लिये रसायनों का उपयोग मानव स्वास्थ के लिये खतरा बनता जारहा है। आजकल अधिक पैदावार व अन्य लाभों के लिये अनुवाशिक तरीके से सुधारे बीजों का बढ़ता प्रचलन मानव पर कैसा प्रभाव डालता है ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।

आखिर क्या कारण है कि मनुष्य इतना बुद्धिमान होते हुए भी प्रकृति के विरुद्ध जाकर विनाश की ओर बढ़ते अपने कदमों को विराम क्यों नहीं दे पा रहा है? इसका एक मात्र कारण है लालच। लगभग विश्व की हरएक सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिये बड़े बड़े उद्योग समूहों पर निर्भर है। उनके लिये ऐसा कोई भी कानून बनाना जो इन उद्योग समूहों के विकास में रोड़ा बने ये स्वयं के पैरों पर कुठाराघात के समान है। पर्यावरण बचाने के नाम पर और नये उद्योगों के लिये नये अवसर प्रदान कर अपनी आय की वृद्धि सभी सरकारें सुनिश्चित करना चाहती हैं।

संक्षेप में यदि कहा जाये कि बड़े बड़े उद्योग समूह ही विश्व की लगभग सभी सरकारों के दिशा निर्देश तय कर रहे है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मनुष्य एवं नशा

 

मनुष्य एवं नशे का साथ लगभग उतना ही पुराना है जितना उसका कृषि पर निर्भर होकर मैदानों में बसना। नशे का सबसे प्रथम उल्लेख वैदिक साहित्य में देवताओं के सोमरस पान के बारे में मिलता है। प्रकृति में ऐसे कई पौधे उपलब्ध हैं जिनसे नशा चढ़ जाता है अथवा जिनका प्रयोग नशीले पदार्थ बनाने के लिये किया जा सकता है। वैसे तो नशा कई अन्य प्रकार का भी हो सकता है जैसे सफलता का नशा, दौलत का नशा अथवा ताकत का नशा। फिलहाल चर्चा नशीले पदार्थों के सेवन तक ही सीमित रखेगे। यह सब जानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन हानिकारक है, विशेषकर जब तब यह आदत में शामिल हो जाये।

भारत में नशीले पदार्थों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पहली श्रेणी में ऐसे पदार्थ आते है जिनकी बिक्री की अनुमति है जैसे तम्बाखू, सिगरेट, शराब, भाँग आदि। दूसरी श्रेणी में प्रतिबन्धित पदार्थ जैसे ब्राउन सुगर, हशीश आदि। सरकार का प्रयास रहता है कि समाज को नशे की आदत से बचाये। इसके लिये पहली श्रेणी के पदार्थों पर अधिकाधिक कर लगाकर, स्वास्थ की चेतावनी उत्पाद पर छापना अनिवार्य कर अथवा दूरदर्शन एवं अन्य प्रचार साधनों द्वारा इनके दुश्प्रभावों का प्रचार कर नशे से होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक करने का प्रयास करती है। इसके अतिरिक्त परिवार एवं समाज भी नशीले पदार्थों के सेवन को मान्यता नहीं देता है। इन सब अवरोधों के बावजूद दोनों श्रेणियों के नशीले पदार्थों का व्यापार फलफूल रहा है।  २०१५ के आँकड़ो के अनुसार विश्व में प्रतिबन्धित नशीले पदार्थों का २६००० करोड़, शराब का ३००० करोड़ व तम्बाखू का ४२०० करोड़ रुपये का व्यवसाय अनुमानित है। तथा ये लगभग १५ प्रतिशत हर वर्ष बड़ रहा है। आखिर लोग नशीले पदार्थों का सेवन करते क्यों हैं?

सामान्य मान्यता के अनुसार नशा लोग अपने ग़म को भुलाने के लिये करते है। नशीले पदार्थ के सेवन से मस्तिष्क अर्धसुप्त अवस्था में चला जाता है, जिससे दुःख के अहसास में कमी हो जाती है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है इसमें अहम भूमिका निभाता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। नशीली दवायें व खुशी के भाव डोपेमाइन सिस्टम की सक्रिय होने की सीमा नीचे कर देते है जिस कारण छोटी सी बात से बहुत अधिक खुशी महसूस होती है। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरान्स लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।  इस प्रकार ऐसे व्यक्ति जिनमें भावनात्क कारणों से आक्सीटोसिन की कमी हो जाती है नशा कर  डोपेमाइन सिस्टम की सक्रियता बढ़ाकर नकली खुशी महसूस करते हैं। इसी खुशी को बार बार महसूस करने की इच्छा ही नशे की लत के लिये जिम्मेदार है।

नशे की शुरूआत किसी भी व्यक्ति में निम्न कारणों से हो सकती है।

  • बाल सुलभ उत्सुकता के चलते – बच्चे आसपास के बड़ों को जब शराब, तम्बाखू, सिगरेट आदि का उपयोग करते देखते हैं तो बाल सुलभ उत्सुकता के चलते चोरी चुपके इनका प्रयोग करने का प्रयास करते है। इनमें से अधिकतर पहली कोशिश के बाद ही अपराध बोध से ग्रसित होकर छोड़ देते हैं।
  • लड़कपन में दोस्तों के बहकावे में आकर कई बच्चे चोरी चुपके तम्बाँखू अथवा ड्रग्स के चक्कर में पड़ जाते हैं। किन्तु कुछ भावनात्मक रूप से उपेक्षित बच्चे ही इसके आदी हो सकते हैं।
  • कालेज जाने वाले छात्र विशेष रूप से संपन्न वर्ग से आये हुए अपनी अलग पहचान बनाने के लिये विभिन्न नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। इनमें से अधिकतर इसके आदी हो जाते हैं। किन्तु केवल कुछ ही अनियन्त्रित सेवन से लत के शिकार होते हैं।
  • युवा अवस्था में असफल प्रेम, मनपसन्द कार्य क्षेत्र, पारिवारिक कलह अथवा परेशानियों आदि से कुन्ठित कमजोर मानसिकता वाले लोग नशे नशे के शिकार प्रायः हो जाते हैं।
  • ड्रग्स तस्कर अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिये युवाओं को अपने जाल में फँसा कर हम उम्र युवाओं को नशे की लत का शिकार बनाते हैं।

जहाँ सीमित रूप में नशीले पदार्थों का सेवन क्षणिक आनन्द देता है। किन्तु दीर्घ कालीन कई प्रकार की बीमारियों का कारण भी बन जाता है। दुर्भाग्य से ये असर इतना धीमा होता है कि जब तक असर के लक्षण दिखाई देने लगते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। नशे की लत के शिकार लोगों बीमारी के अतिरिक्त सामाजिक निरादर, पारिवारिक अशान्ति, व जीवन से निराशा ही मिलती हैं। नशे की लत से बाहर निकलने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति व स्वजनों का स्नेह बहुत जरूरी है।

प्रायः यह देखा गया है कि सपंन्न लोग शराब का सेवन स्वयं के आनन्द के लिये नियंत्रितरूप से करते है। इसके विपरीत निर्धन व कम पढ़े लिखे लोग इसकी लत के शिकार होकर अपना व परिवार का जीवन दुर्लभ बना देते हैं।

नशीले पदार्थों के उत्पादन पर तो नियंत्रण असंभव है किन्तु परिवार व समाज चाहे तो भावनात्मक संबन्धों को मजबूत कर नयी पीढ़ी को नशे की लत से अवश्य ही बचा सकते हैं।

 

 

 

 

 

भारतीय किसान

 

भारत यों तो कॄषि प्रधान देश कहलाता है। किन्तु कृषि उत्पाद देश की सकल आय का मात्र १७ प्रतिशत ही है। भारत में कुल किसानों संख्या के बारे में भ्रान्तियाँ हैं। 2011 के आँकड़ों में किसानों की संख्या अलग अलग मानकों के आधार पर 8 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आँकी गई है। देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी गाँवों में बसती है। इसमें से करीब 25 प्रतिशत ही कृषि भूमि के मालिक हैं। कुल कृषि योग्य 19.4 (6.4 करोड़ हेक्टेयर सिचाँई योग्य) करोड़ हेक्टेयर भूमि में से लगभग 50 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन 15 प्रतिशत बड़े किसानों के पास है। इनमें से अधिकतर शहरों में रहते हैं एवं प्रायः इनके आय के अन्य श्रोत भी है। अतः यह कहना अधिक सही होगा कि हमारे देश में कृषि एक सबसे बड़ा असंगठित रोजगार देने वाला क्षेत्र है।

कृषकों द्वारा आत्महत्या आजकल एक चर्चित विषय है। तुलनात्मक रूप से अध्ययन किया जाये तो अन्य भारतीय लोगों की तुलना में किसानों द्वारा आत्महत्या केवल २० प्रतिशत ही है। अतः यह मानना सही होगा कि राजनीतिक कारणों से ही इस पर चर्चा अधिक होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय किसानों की कोई समस्या नहीं है। भारत ही नहीं कई अन्य देशों जैसे श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, केनेडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भी कृषि को तनाव देने वाला क्षेत्र माना है। भारत में भी किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है।

ये समस्यायें नई नही॔ हैं। भारत में किसानों की हालत एतिहासिक तौर पर दयनीय रही है। पुरातन काल में राजाओं के नुमाइन्दे जबरन कर वसूलते थे तो अंग्रेजों के जमाने में उनके कारिन्दे। साहूकार व जमींदार भी उनका जमकर शोषण करते थे। किन्तु उस कठिन समय में भी मेहनत मजदूरी कर अपना परिवार चला ही लेते थे।

स्वतन्त्रता के बाद भी ओद्योगिक विकास के चलते आरम्भ में इस ओर विशेष ध्यान नीं दिया गया। किन्तु  कुछ अकालों व निम्न गुणता वाले खाद्यान्न आयात करने के बाद इस क्षेत्र के विकास की ओर सरकार का ध्यान गया। कृषि तकनीकी संस्थान द्वारा विकसित बीज, रसायनिक खाद, कीट नाशक दवाओं, सिंचाई के साधन में वृद्धि  व कृषि आय को कर मुक्त कर देने से हरित क्रान्ति लाने का दावा भी किया गया। किन्तु इन सबका लाभ चंन्द बड़े किसानों व बाजार व किसानों के बीच के दलालों को ही पहुँच सका। छोटे किसानों स्थिति में बहुत अधिक अन्तर नहीं आया। गिरते राजनीतिक स्तर व स्वार्थ ने छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकार की दया पर निर्भर अधिक बनाया। कई मददकारी पहलों का लाभ किसानों को कम व सरकारी तन्त्रों को अधिक मिला।आर्थिक विषमता तथा नव धनाड्यों के प्रदर्शन करने वाली जीवन शैली ने छोटे किसानों के परिवार के कई युवाओं में महत्वाकांक्षा व लालच के चलते कर्ज के चंगुल में फंसा दिया जिसकी परिणीति आत्महत्या होने लगी।

आंकड़ों के हिसाब से देखा जाये तो 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की जबकि सबसे अधिक आत्महत्या 2004 में 18241 किसानों ने की थी। 2016में यह संख्या 6667 व 2017 में 17 जून तक संख्या 186 है। इससे यह निर्णय करना कठिन नहीं है कि वर्तमान आन्दोलन राजनीति से प्रेरित है। समाचारों में दिखाये किसानों को देखकर भी नहीं लगता है कि यह आन्दोलन गरीब किसानों के लिये है।

यदि हमें वास्तव में किसानों की भलाई के बारे में सोचना है तो राजनीतिक चश्में को उतार कर छोटे किसानों व खेतिहर मजदूरों की मूल समस्या पहचान कर उनका निदान करना होगा।

  • सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरत मंदों को नहीं – अधिकतर सरकारी योजनाओं का लाभ बड़े किसानों को मिलता है। अतः इन्हें बन्द कर कृषि व्यवसाय को एक उद्योग का दर्जा देकर बड़े (10 हेक्टेयर से अधिक ), मध्यम (2 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर तक ), लघु (1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर तक ) व अति लघुश्रेणी ( 0.5 हेक्टेयर से कम ) में कृषि भूमि के आधार पर बाँट देना चाहिये। बीज, खाद, सिंचांई साधन व कीट नाशक पर सब्सिडी केवल लघु व अति लघु श्रेणी के लोगों को ही दी जाये।
  • २. कृषि उत्पाद की लागत – मीडिया में प्रायः दिखाया जाता है कि किसानों को अपने उत्पादों के सही दाम नहीं मिलते। सरकार द्वारा न्यूनतम मूल्य में खरीददारी में भी कठिनाईयों व घोटालों की खबर आती रहती है। इसके अतिरिक्त भंडारण में टनों खाद्य उत्पाद नष्ट होने की खबरें हर साल आती रहती हैं। इन सब समस्याओं के मूल मे उत्पाद से शीघ्रातिशीघ्र कीमत वसूलना है। इसका सीधा समाधान यह है कि बड़े व मध्यम किसानों को अपना उत्पाद स्वयं की सुविधा अनुसार खुले बाजार में बेचने दिया जाये। लघु व अतिलघु श्रेणी के किसानों से सरकार सिर्फ खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक मात्रा में ही उत्पाद खरीदे। शेष उत्पाद के लिये पंचायत के संरक्षण में उचित भंडारण सुविधा में बैंक को उत्पाद बन्धक रखकर ऋण लेने  की सुविधा प्रदान कर सकती है। धीरे धीरे भंडारित उत्पाद को उचित दाम पर पंचायत द्वारा बाजार में बेचकर हिसाब किया जा सकता है। इसके लिये पंचायतों का बैंक के साथ उचित समझौता व पंचायतों को साधन संपन्न बनाना व प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • स्थानीय मूल्यवर्धन – गाँवों में कृषि कार्य साल के कुछ महीनों में ही रहता हैं। अतः श्रमशक्ति का भरपूर उपयोग नहीं हो पाता है। यदि संगठित तरीके से स्थानीय उत्पादों के मूल्य वर्धित उत्पादों को बनाने व विक्रय के लिये संसाधनों को विकसित किया जाये तो स्थानीय आय में काफी इजाफा हो सकता है। यह गाँवों से पलायन, गरीबी उन्मूलन व गाँव वासियों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकता है। यह राज्य स्तर पर सहकारी संगठन गठित कर उसके द्वारा संचालन द्वारा संभव है। खादी एवं ग्रामोद्योग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • उचित शिक्षा – गाँवों में माध्यमिक स्तर तक सामान्य शिक्षा के साथ स्थानीय क्षेत्र में संभावित आय के साधनों एवं संभावनाओं का भी अध्ययन कराया जाये। इच्छुक युवाओं को स्थानीय उद्योगों के विकास के लिये प्रशिक्षित किया जाये। तथा स्थानीय उद्योगों को स्थापित करने के लिये तकनीकी व आर्थिक सहायता दी जाये। इन उत्पादों के लिये बाजार विकसित करने का संगठित प्रयास किया जाये।

 

 

 

इस्लाम व आतंक

 

वैसे तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। ना ही कोई धर्म आतंकवाद का समर्थन करता है। किन्तु पिछले करीब डेढ़ दशक से जिस तरह से कई इस्लामिक संगठन आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होकर एक संगठित रूप से पूरी दुनिया को अपना निशाना बना रहे हैं, यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

कोई भी व्यक्ति अथवा संगठन तभी आक्रामक होता है जब उसे इतना अन्याय व शोषण झेलना पड़े कि  उसकी सहन शक्ति बर्दाश्त न कर पाये।

यदि इस्लाम की उत्पत्ती से अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो पायेगें की इस्लाम धर्म अनुयायी हमेशा ही कट्टर धार्मिक रहे हैं व इसके प्रचार को धर्म का ही हिस्सा मानते है। इसी कारण जहाँ कहीं भी ये अनुयायी आक्रमक बन कर विजयी हुए बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन कराया।  इस हिसाब से प्रायः दूसरे धर्मावलम्बी ही इनके द्वारा सताये गये। स्वभाविक विरोध स्वरूप कुछ सीमा तक इन अनुयायियों को भी मुश्किलों का सामना अवश्य ही करना पड़ा होगा किन्तु एक सीमित दायरे में ही। अतः सताया जाना इस तरह के उन्माद का कारण नहीं हो सकता।

हम यदि मानव इतिहास में झांके तो पायेगें कि लगभग हर काल में कुछ दुष्ट प्रकृति के खल नायक हुए हैं। उदाहरण स्वरूप रावण, कंस, हिटलर, स्टटालिन आदि के नाम दिमाग में आते हैं। किन्तु ये एक व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में फला फूला आतंक था जिसका अन्त उसके साथ ही हो गया। इसे उस व्यक्ति विशेष के विकृत मस्तिष्क का परिणाम माना जा सकता है।

इसके विपरीत आज का इस्लामिक आतंकवाद कई अलग अलग संगठनों द्वारा संचालित है जो नियोजित तरीके से आर्थिक, राजनीतिक, व सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति से प्रेरित हैं। इससे निपटने के लिये इसके मूल में निहित कारणों को समझना आवश्यक है।

इन कारणों को समझने के लिये हमें पिछले कुछ दशकों में हुए विश्व की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव को समझना जरूरी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व का राजनीतिक ध्रुविकरण हुआ। अमेरिका व रूस दो महाशक्ति के रूप में उभरे। दो विश्व युद्धों के लिये विकसित हथियार एक लाभकारी व्यवसाय बन गया। इसमें आगे मारक क्षमता व शक्ति के  विकास के लिये बड़ा निवेश किया गया।  संचार व यातायात के साधनों के विकास ने विश्व को एक दूसरे से जोड़ दिया। छोटी बड़ी कहीं भी घटी घटना की प्रतिक्रिया हर कोने में होने लगी। एक महाशक्ति के वर्चस्व बढ़ाने के प्रयास को दूसरी महाशक्ति ने रोकने के लिये कदम उठाना लाजिमी समझा। परिणाम स्वरूप मुस्लिम बाहुल्य मध्य एशिया में पश्चिम की दखलअंदाजी बढ़ने लगी। इसका असर वहाँ की युवा संस्कृति पर पड़ने लगा। धार्मिक व सामाजिक नेताओं को यह परिवर्तन स्थानीय संप्रभुता एवं संस्कृति में अवान्छित हस्तक्षेप लगा। संस्कृति को बचाने के लिये विशेष स्कूल(मदरसे) खोले जहाँ धार्मिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाने लगा। अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी इस्लामिक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये मदरसों के लिये आर्थिक मदद उपलब्ध कराई गई।

महा शक्तियों के प्रभाव से कई पड़ोसी देशों में उभरे मतभेदों ने आपसी युद्ध की स्थिति की स्थिति पैदा कर दी। युद्ध में दोनों महाशक्तियों ने भी परोक्ष रूप से हिस्सा लिया। इस कारण लम्बे समय तक इस क्षेत्र में अशांत वातावरण रहा। हस्तक्षेप के कुछ आर्थिक कारण भी रहे होगें। कुछ उग्र स्वभाव के विचारकों को महाशक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं हुआ तथा बदला लेने के लिये संगठन बनाने की शुरुआत हुई। क्योंकि सीधी लड़ाई संभव नहीं थी, इस कारण आतंक फैलाकर इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करने का निश्चय किया गया। राजनीतिक संरक्षण व अनैतिक तरीकों से धन कमाने वाले संगठनों की आर्थिक सहायता के चलते ये संगठन फलने फूलने लगे। मदरसों से निकले कट्टर अनुयायियों के लिय प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये। आतंक को प्रभावी बनाने के शोध केन्द्र स्थापित किये गये। समय के साथ अन्य देशों ने भी पड़ोसी देशों से छद्म युद्ध के लिये इनकी सेवायें लेना आरंम्भ कर दी। शीघ्र ही यह व्यवसाय बन गया और कई समानान्तर संगठन स्थापित हो गये।

पीड़ित देशों की मदद को आगे बडे़ देश भी इन आतंकी संगठनों के निशाने पर आने लगे। बड़ती शक्ति के चलते इन संगठनों व इनके संरक्षकों को पूरे विश्व के इस्लामीकरण की संभावना नजर आने लगी। कुछ राजप्रमुखों व आतंकी संगठनों ने इस संभावना को व्यवहारिक रूप देनें के लिये संयुक्त प्रयास भी आरंभ किये। इन प्रयासों में अन्य देशों में प्रक्षिशित प्रतिनिधियों को भेज कर प्रचार प्रसार का आधार तैयार करना व नये स्थानों पर उपनिवेश बसाना। यह अनैतिक व्यवसाय फैलाने का एक साधन भी सिद्ध हुआ। इस्लामीकरण के विस्तार के विरोध में उठे स्वरों को भी आतंक से दबाने का प्रयास किया गया। आज यह एक उन्माद का स्वरूप ले चुका है, जिसके किसी भी कृत्य को किसी भी मानव विचार धारा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता है। यह मानव का सबसे घिनौना स्वरूप बन चुका है।

इससे निपटने के लिये:-

  1. सबसे पहले मदरसों को बन्द करना जरूरी है अथवा इन्हें पारदर्शी बनाने के लिये सबके लिये खोल दिया जाये। अलग अलग धर्मों की शिक्षा सामान्य शिक्षण संस्थाओं में सबके लिये पारदर्शी तरीके से स्वेच्छा से उपलब्ध कराई जा सकती है।
  2. प्रशिक्षण केन्द्रों को सख्ती से नष्ट करने की जरूरत है।
  3. सभी आतंक के सभी स्वरूपों पर यू एन में नकारा जाये। आतंक को किसी भी रूप में सहायता करने वाले देशों का बाकी सभी सदस्य देश बहिष्कार करें। सुरक्षा परिषद का इस विषय में कोई दखल न हो।
  4. आतंक को समाप्त करने के लिये यदि कोई देश सहायता चाहे तो यू एन प्रभावी सहायता उपलब्ध कराये। खर्च राशि न दे पाने की स्थिति में मदद देश की आर्थिक स्थिति के अनुरूप ऋण अथवा सहायता के रूप।
  5. किसी भी प्रकार के आतंक में कोई भेदभाव न किया जाये।
  6. यथासंभव शस्त्रों के उत्पादन व बिक्री को नियंत्रित किया जाये।

 

 

 

क्या ये विकास है?

 

अर्थ शास्त्रियों ने पूरी मानव आबादी को तीन भागों में बाँट रखा है। ये भाग हैं विकसित, विकासशील व अविकसित। इस विभाजन का आधार रखा गया है प्रतिव्यक्तति आय, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, क्रय शक्ति व सेहत। विकसित देशों के अर्थ शास्त्रियों द्वारा निर्धारित इस विभाजन को लगभग पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया है।

किन्तु क्या यह विभाजन सही है? क्या अन्य कोई और किसी क्षेत्र की संपत्ति नापने का आधार नहीं हो सकता है? क्या इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है? इन सब प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सकते है, यदि हम वास्तविक संपदा को समझने का प्रयास करें।

मनुष्य अपनी जरूरत की वस्तुओं को प्रकृति से प्राप्त करता है। हवा, पानी, धूप, खनिज व भोजन आदि हमें प्रकृति से ही मिलता है। लगभग सभी ओद्योगिक उत्पाद भी प्रकृति से प्राप्त खनिज अथवा प्रकृतिक उत्पादों से ही बनते हैं। अतः यह आवश्यक है कि संपदा का मापदंड भी यही होना चाहिये।

बहुत पहले एक वैज्ञानिक लेख में विकास का मापदंड उस देश में प्रति व्यक्ति कितने एकड़ पृथ्वी के उत्पाद का उपयोग होता है बताया गया था।

पृथ्वी पर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार कुल 11.8 बिलियन हेक्टेयर उत्पादक क्षेत्र के हिसाब से प्रति व्यक्ति 1.8 हेक्टेयर उपलब्ध क्षेत्र है। अतः प्रति व्यक्ति इतने क्षेत्रफल का उत्पाद हर व्यक्ति को मिलना चाहिये। इसकि तुलना में नीचे तालिका में कुछ देशों के प्रतिव्यक्ति उपलब्ध क्षेत्रफल व प्रतिव्यक्ति क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग की जानकारी दी गई है। तालिका से स्पष्ट है कि अधिकतर विकसित व विकासशील देश अविकसित देशों के प्राकृतिक साधनों का दोहन कर रहे हैं।

यह दुर्भाग्य है कि आधुनिक औद्योगिकरण के कारण प्राकृतिक उत्पादों की तुलना में औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। यह भी आश्चर्य की बात है कि गुणता व उत्पादकता में सुधार के नाम पर विकसित मशीनों ने औद्योगिक उत्पादों की कीमतों की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्र में में अनेक उत्पाद ऐसे बनाये जाते हैं जो मानव हितों के विरुद्ध जाते हैं।

 

 

क्रमांक देश प्रतिव्यक्ति हेक्टेयर  क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग प्रति व्यक्ति प्राकृतिक साधन उपलब्धता
1 अमेरिका 8.22 3.76
2 रूस 5.59 6.79
3 फ्रान्स 5.14 3.11
4 चीन 3.38 0.94
5 भारत 1.15 0.45
6 मध्य अफ्रिकन रिपब्लिक 1.24 7.87
7 कांगो 1.29 10.91
8 अर्जेनटिना 3.14 6.94
9 पेरागुवे 4.16 10. 52

 

औद्योगिकरण से सर्वाधिक नुकसान मानव हितों का निम्न क्षेत्रो में हुआ है –

  • विनाश कारी हथियार- न्यूक्लियर बम, रसायनिक शस्त्र व उनके दूर तक मारक क्षमता के साधन, स्वचालित व शक्तिशाली हथियार। इस कारण कई देशों को अपने नागरिकों के उत्थान के बदले सीमा सुरक्षा पर अधिक  साधन खर्च करना पढ़ता है। आतंकवाद फैलने में भी हथियारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • नशीले पदार्थ- लगभग सभी देशों में प्रतिबन्ध के बावजूद नशीले पदार्थों का धंधा पूरे विश्व में फैला हुआ है। एक ओर इसके कारण जहाँ कई युवा जिन्दगियाँ बर्बाद हो रही है वहीं इससे अर्जित धन आतंकियों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • पर्ययावरण की बर्बादी- यातायात साधनों जनित वायु प्रदूषण, औद्योगिक अपशिष्ट द्वारा जल व वायु प्रदूषण, ओजोन सतह की क्षति तथा हानिकारक रसायनों का उपयोग के कारण पूरा विश्व आज मानव जाति के भविष्य के लिये चिन्तित है।

तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य आज जिस डाल पर बैठा है उसी को काटने में लगा है।

मन क्या है?

 

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते है कि आज पकोड़े खाने का मन है अथवा पिकनिक पर जाने का मन है। कई बार लोग कहते हैं कि कुछ करने का दिल नहीं है या किसी भी चीज में मन नहीं लग रहा है। कभी सुनने को मिलता है कि मन उदास है या दिल खुश हो गया। लोग यह भी कहते हैं कि मन को बस में रखना चाहिये।

दिल और मन का संबंन्ध क्या है? दिल का कार्य तो शरीर में रक्त का संचालन करना भर है तथा मन नाम का तो शरीर का कोई भाग नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार तो सुख, दुःख अथवा इच्छा का नियंत्रण मस्तिष्क ही करता है। फिर मन की उत्पत्ति कैसे हुई?

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरानस लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।

हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। बिना नियंत्रण के हम पागल हो जायेंगे। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें व सामाजिक व पारिवारिक संबंधो को तहसनहस कर देंगें।

शायद इसी नियत्रण तन्त्र को हम लोग मन या दिल के नाम से जानते हैं।

विचारणीय ये है कि नियन्त्रण तन्त्र विकसित कैसे होता है?

बचपन से लेकर पूरी उम्र हमें अपने परिवेश से अपने व अन्य  व्ययक्तियों से संबन्धी प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं। इनमें प्रशंसा, बुराई, वर्जना, प्रोत्साहन, अपमान, गुस्सा, प्रेम, घृणा आदि सम्मलित हैं। इन प्रतिक्रियाओं को हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप ग्रहण करता है। इसको हम साधारण शब्दों में अनुभव भी कह सकते हैं। ये अनुभव ही व्यक्ति के नियंत्रण तन्त्र को दिशा देते है। जिसे हम मन कह सकते हैं।

फर्ज़ या आत्मतुष्टि

 

चालीसवें दशक अथवा उससे पहले पैदा हुअे बच्चों को सादा जीवन जीने व संतोष करने का पाठ मानों घुट्टी में पिला कर बड़ा किया जाता था। समय के साथ संम्पन्नता व बढ़ती सुविधाओं के कारण जीवन शैली में बदलाव अवश्य ही आये। पर  उनमें से अधिकतर आज भी सादा जीवन शैली को अपना आधार मानते है। वे फिजूल खर्ची से बच कर प्रायः भोग विलासिता से दूर रहने का प्रयास करते हैं।

७० के दशक के बच्चों को तुलनात्मक रूप से बेहतर परवरिश अवश्य ही मिली। किन्तु सादगी व मितव्ययता तब भी अवश्य ही सिखाई गई। प्रायः बच्चे माता पिता के साथ अपनी बात निडर होकर रख सकते थे। इस कारण आपसी निकटता पुराने समय से अधिक थी। सीमित होता परिवार भी इसका एक कारण हो सकता है। अधिकतर ये बच्चे अतः अपने से अलग रह रहे माता पिताओं से भावनात्म रूप से निकटता से जुड़े है। तथा सतत संपर्क बना कर कुशल क्षेम पूछते रहते हैं। यह निश्चय ही अलग रह रहे माता पिताओं के लिये बच्चों की निकटता का अहसास कराता है तथा आवश्यकता पढ़ने पर सहारे का भरोसा दिलाता है। यह सहारा उन्हे अकेले होने का अहसास नहीं होने देता है व वे आराम से अपने जीवन को स्वेच्छा जी पा रहे हैं।

इसी बीच अधिकतर बच्चों ने आर्थिक प्रगति कर उच्च वर्ग की जीवन शैली अपना ली है। बच्चों का सुख संपन्न जीवन माता पिताओं के लिये अवश्य ही प्रसन्नता का विषय है। किन्तु बच्चे जब माता पिता के घर जब कुछ समय बिताने आते है तो उन्हें उनका रहन सहन काफी निम्न स्तर का लगता है। सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। यह एक प्रकार का अपराध बोध सा महसूस करते हैं। तथा परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अपने जैसी सुख सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। एक और जहाँ यह संतोष का विषय है कि बच्चे अपने माता पिता के बारे में सोचते हैं। वहीँ दूसरी ओर उनकी मान्यता से अलग होने से प्रायः ये अतिरिक्त सुविधायें उचित उपयोग में नहीँ आ पाती है। कुछ सीमा तक माता पिता के लिये यह असुविधा जनक भी हो जाता है।

यह समझ पाना मुश्किल है कि इसे बच्चों का अपने माता पिता के प्रति फर्ज़ माना जाये उनके लिये अपनी आत्मतुष्टि।

 

उलझन

गहरी सोच में डूबी अनामिका शायद अपनी जिन्दगी का हिसाब मन ही मन लगा रही थी। चेहरे पर छाया अवसाद व आँखों में छायी उदासी से लग रहा था मानों खुशियों ने साथ वर्षों पहले छोड़ दिया हो। अचानक दरवाजे की घन्टी बजी देखा तो पति सोमेश काम से लौट आये। खुले दरवाजे से बिना कुछ बोले, सर झुकाये अन्दर चले गये। अनामिका इसकी अभ्यस्त थी, उसने दो कप चाय बना कर एक कप बैठक में पति के लिये रख दिया व दूसरा स्वयं लिये डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। थोड़ी देर में बिटिया विनीता काम से लौटी व सीधी अपने कमरे में चली गई। उसे कमरे में चाय देकर अनामिका रात के भोजन की तैयारी में जुट गई। रात को खाने पर भी आपस में तीनों के बीच कोई बात नहीं हुई। बेटा सौरभ विदेश में है व माह में एक आध बार फोन पर हाल चाल पूछ लेता है।

किन्तु पहले ऐसा नहीं था। पाँच बहनों और दो भाईयों में घर में सबसे छोटी होने के कारण सबके लाड़ प्यार में वह पली बड़ी। बिना दहेज के ब्याह कर ससुराल इस आशा से आई कि परिवार में सबकी सेवा कर दिल जीत लेगी । गृह विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई घर चलाने में काफी सहायक सिद्ध हुई। पहले सौरभ फिर विनिता ने आकर उसके जीवन में अपार खुशियाँ भर दी।वह अपने को सौभाग्यशाली समझने लगी। शादी के २० वर्ष मानों पंख लगाकर उड़ गये।

अचानक मानों परिवर्तन की धीमी बयार ने जैसे जीवन की नौका को झकझोरना शुरू कर दिया। बच्चे बड़े होकर अपने हम उम्र मित्रों में व्यस्त रहने लगे। पति कार्य की अधिकता के चलते अथवा पुराने मित्रों के साथ समय बिताने के बहाने अधिक समय बाहर ही बिताने लगे। घर आने पर चुपचाप खाकर सो जाना। देरी से आने का कारण पूछने पर काम के बोझ का बहाना। सभी की उपेक्षा ने मन में संशय के बीज बो दिये। अधिक बार पूछताछ करने पर वहम की बीमारी के बहाने डाक्टर से इलाज के नाम पर सेडेटिव्स दिये जाने लगे। परिणाम स्वरूप आपसी वाद विवाद कब झगड़ों में बदल गया पता नहीं चला। सुस्ती, शंका व परिवार से कटने के तनाव ने उसके विवेक को प्रभावित किया नतीजतन उसके व्यवहार में एक चिड़चिड़ापन आने लगा। समय के साथ इलाज का स्वरूप मानसिक रोग के इलाज में बदल गया।

पति के अपने पर्यटन संबन्धी व्यवसाय के चलते विकसित वाक्चातुर्य से आसपड़ोस व परिवार में सभी को मानसिक रोगी होने व मनोचिकित्सक से इलाज चलने के बारे में आश्वत कर दिया। परिणाम स्वरूप सभी ने संशय भाव से दूरी बना ली। संबन्धियों से बातचीत समझाइश अथवा सहानुभूति तक सीमित रह गई। आरम्भ में अपनों से क्रोध मिश्रित व्यथा को बाँटने के प्रयास भी किये। किन्तु पति के पास समझाने के लिये तिल को ताड़ बनाने जैसे कई उदाहरण थे। परिणाम स्वरूप करीब करीब सभी ने उसके मानसिक रोग को स्वीकार लिया। परिस्थितियों के इस मकड़जाल में फँसी वह बच्चों के ३० वर्ष पार करने के बाद भी विवाह के लिये राजी न होने के लिये स्वयं को जिम्मेदार मान वह स्वयं को भी मानसिक रोगी मानने को विवश है।

इस इन्तजार में कि कोई चमत्कार शायद उसे इस उलझन से बाहर निकाल पाये।

महिलाओं की सुरक्षा

 

कुछ वर्ष दिल्ली में हुए दिल दहला देने वाले हादसे पर पूरा देश हतप्रभ था । सभी संवेदनशील लोग अलग अलग तरीके से अपनी नाराजगी व गुस्सा जाहिर कर रहें थे। राजनीतिक, सामाजिक स्तर व दूरदर्शन पर लगातार इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिये कठोर कानून व दोषियों को कठोर दण्ड के प्रावधान करने के लिये दबाव बनाया जा रहा था। लोग कई दिनों तकसे सड़कों पर उतर आये थे।

इन सब के बीच लगातार महिला वर्ग की अस्मिता पर हमले जारी हैं। इसलिये जरूरी है कि समस्या के मूल में जाकर इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया जाये।

महिलाओं व पुरुष का आपसी आकर्षण प्राकृतिक है। समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये अलग अलग समय पुरुषों व महिलाओं पर कई प्रकार की बन्दिशें लगाइ जाती रही हैं। इन बन्दिशों के कारण आज से कुछ दशाब्दियों पहले तक काफी हद तक समाज अनुशासित रहा। यदाकदा अपवाद स्वरूप यदि कोई घटना सार्वजनिक होती तो समाज के मान्य प्रतिनिधि जैसे पंचायत तुरन्त ही दोनों पक्षों को सुन कर दोषी को दण्डित कर देते थे। इससे भी अधिक दण्ड होता था दोषी को समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखना। सामाजिक बन्धन इतना प्रगाढ़ होता था कि समाज की नजरों में गिरना न सिर्फ दोषी बल्कि उसके परिवार वालों को भी मृत्यु से भी अधिक भयभीत करने वाला लगता था। यही भय लोंगों को अपने बच्चों को अनुशासन में रखने के लिये प्रेरित करता था। यह व्ववस्था लगभग पूरे विश्व में लागू थी। इस संदर्भ में समाज का अर्थ स्थानीय समाज यथा मोहल्ला, बस्ती अथवा गाँव अधिक सटीक बैठता है।

इस व्यवस्था की सफलता के मूल कारण के बारे में यदि हम ध्यान दें तो वे थे –

1 समाज में प्रतिष्ठा बनाये रखने की आवश्कता महसूस करना।

2 समाज में एक दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्कता।

3 परिवार में एक मुखिये का होने व अन्य सदस्यों का उस पर निर्भर होना।

4 धर्म में आस्था व अधर्म करने पर भगवान द्वारा दण्डित होने का डर।

5 शिक्षा में अनुशासन पर जोर।

6 धर्म व समाज में सदाचरण पर जोर।

7 समाज में अनुशासित लोगों का सम्मान।

इस व्यवस्था पर राजाओं, नवाबों व अंग्रेजों के शासन काल तक बहुत विशेष अंतर नहीं आया अतिरिक्त इसके कि कुछ शक्ति संपन्न लोग स्वेच्छारी हो गये तथा स्त्रियों पर जोर जबरजस्ती करने लगे। परिणाम स्वरूप निःसहाय समाज ने महिलाओं पर घर से बाहर अकेले निकलने पर बन्दिश लगा कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया। इसके बाद सामाजिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया वह था प्रजातन्त्र की स्थापना। लोगों को सरकार में अपने प्रतिनधि चुनने का अधिकार मिला। हर व्यक्ति अपने को शक्ति संपन्न समझने लगा। प्रजातन्त्र ने लोगों को स्वाधीनता अथवा स्वतन्त्रता के सुख को महसूस कराया। लोगों में आत्म विश्वास जागा और प्रगति की रफ्तार तेजी से बढ़ने लगी। धीरे धीरे लोग सामाजिक बन्धन को परतंत्रता समझ कर उससे भी मुक्त होने का प्रयास करने लगे। इन सब प्रयासों में स्वतन्त्रता कब स्वच्छन्दता में बदलने लगी यह कुछ लोगों को ही शायद समझ में आया। ऐसे लोगों की चेतावनी नक्कार खाने में तूती की आवाज सी दब गई। परिणाम स्वरूप सामाजिक व्यवस्था विकृत होने लगी। कुछ लोग अलग से शक्ति के केन्द्र बन कर उभरने लगे। ये शक्ति केन्द्र प्रायः कुछ राजनेता, बाहुबली, साधन संपन्न लोग अथवा धर्म गुरुओं के आस पास उभरे। ये शक्ति केन्द्र गैर कानूनी तरीके अपना कर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने लगे। अपने प्रभाव के बल पर ये कानून को खरीदने अथवा सबूतों को खत्म करने में सक्षम थे। अतः ये अपने को कानून से ऊपर मानने लगे। अपने विरोध में उठने वाली आवाजों को दबाने के लिये इन लोगों ने अपना

   भारत में शिक्षा समस्यायें व समाधान

                 

यह एक दुःखद स्थिति है कि विश्व में एक समय शिक्षा का समृद्ध केन्द्र माने जाने वाले भारत में शिक्षा की हालत दयनीय है।

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजो की देन है। उनका प्रमुख उद्देश्य युवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना था जिससे वे निष्ठा पूर्वक सरकार की सेवा कर सकें। अतः उनका मुख्य उद्देश्य उनको एक कार्य विशेष के योग्य बनाना था, जो वे जीवन पर्यंत करते रहें। उदाहरण स्वरूप कोई जीवन भर इन्जीनियरिंग, डाक्टर,  वकील अथवा लेखा जोखा करने का काम करेगा। स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयास अवश्य ही किये गये। लेकिन ये प्रयास जैसे यूनिफार्म लागू करना, मध्यान्ह भोजन देना अथवा १०वीं तक बच्चों को फेल नहीं करना सिर्फ अलंकिृत करने जैसे ही माने जाने चाहिये। इससे गुणता में कोई सुधार नहीं आया। एनसीइआरटी द्वारा प्रकाशित अधिकतर पुस्तकें समझने में बच्चों के लिये पहले की अपेक्षा कठिन लगती है। आज सरकारी स्कूल संसाधन की कमी, खराब परीक्षाफल व शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य शासकीय सेवाओं में व्यस्त रखने के लिये अधिक जाने जाते हैं।

इसका परिणाम यह है कि आज निम्न मध्यम वर्ग भी अपने बच्चों को सामर्थ से अधिक फीस देकर निजी स्कूलों में भर्ती करना चाहता है।

अधिकतर निजी संस्थान व्यापार केन्द्र बन चुके हैं। फल स्वरूप राजनेता व उद्योगपतियों का निजी क्षेत्र में लगभग एकाधिकार है। इनका विकृत रूप कोचिंग संस्थानों के रूप में उभर आया है।

इस परिस्थिति के कारणों को खोजने का प्रयास करे तो हमें ये मौलिक कारण मिलेंगें।

१. शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटकना –

वास्तव में देखा जाय तो शिक्षा शब्द का चयन ही गलत है। हमारे मनीषियों ने इसे विद्या ग्रहण करना माना था। उन्होंने इसका उद्देश्य इस श्लोक में सटीक वर्णित किया है।

विद्या ददाति विनयं, विनयाति याति पात्रताम्,

पात्रतात धनमापनोति , धनात  धर्मं ततः सुखम्।

संक्षेप में विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धर्म व सुख मिलते हैं।

मूलतः विद्या हम ग्रहण करते हैं व शिक्षा दी जाती है। स्वेच्छा से ग्रहण की गई ही विद्या है। आज शिक्षा ज्ञान अर्जन के उद्देश्य से भटक कर प्रमाण पत्र व उपाधि अर्जन के मोहजाल में उलझ गई है। इसका सीधा असर देश का भविष्य कहलाने वाले लगभग ३० प्रतिशत बच्चों व युवाओं पर पढ़ता है।

२. स्कूल व उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश –

यह हास्यास्पद स्थिति है कि एक ओर तो स्कूली शिक्षा को आवश्यक किया हुआ है वहीं दूसरी ओर प्रवेश के लिये सबसे निचली कक्षा के लिये भी बच्चों का चयन किया जाता है। यह भी हास्यास्पद है कि कई उच्च शिक्षण संस्थान नियमित शिक्षण आकलन को मानक नहीं मानकर अलग से परीक्षा के आधार पर प्रवेश देती हैं। परिणाम स्वरूप कोचिंग का व्यापार फल फूल रहा है।

३. शिक्षण खर्च का एक छोटा हिस्सा ही शिक्षा खर्च-

सभी शिक्षण संस्थाओं में अन्य प्रभारों के कारण शिक्षा पर कुल शुल्क का सिर्फ १५-२० प्रतिशत ही वास्तव में शिक्षा पर खर्च हो पाता है। बस, पुस्तकों, यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन आदि खर्चे तुलनात्मक रूप से अधिक हैं।

४. स्कूल की दूरी

बच्चों को प्रायः विशेष कर निजी स्कूलों के दूर होने के कारण आने जाने में २-२.३० घन्टे का समय व्यर्थ व थका देने वाला होता है।

५. परीक्षा का मानसिक दबाव

अच्छे नम्बर की होड़ ने परीक्षा को विद्यार्थी के ज्ञान अर्जन का अनुमान लगाने के साधन न होकर एक प्रतियोगिता बना दिया है। जिससे किसी भी प्रकार से दूसरों से आगे निकलने की भावना प्रबल हो गई। परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से गलत उपाय अपनाये जाने लगे। फलतः परीक्षाफल की विश्वसनीयता ही समाप्त हो गई। पुनर्मूल्याकंन परीक्षाओं के चलन ने प्रतियोगिता संस्कृति को और बढ़ावा दिया, जिससे कोचिंग व्यवसाय चल निकला।

६. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा

कुछ शहर व कस्बों के स्कूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो अधिकतर सरकारी स्कूल दुर्व्यवस्था व भ्रष्टाचार के चलते बीमार हालत में ही हैं।

७. शिक्षण लाभ का व्यवसाय

उपरोक्त कारणों ने शिक्षण को एक लाभप्रद व्यवसाय बना दिया। शिक्षा के विस्तार के नामपर निजी संस्थानों को लुभाने के लिये इस क्षेत्र की आय को कर मुक्त घोषित किया गया। फलतः राजनेता व उद्योगपतियों ने इसे अपना गढ़ बना लिया।

पता नहीं स्थिति का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों को ये समस्यायें क्यों नहीं दिखती?

इन मूल समस्याओं से उबरने के लिये शिक्षण व्यवस्था में बड़े व मूल भूत सुधार की जरूररत है। नीचे दिये सुझाव शिक्षा को पुनः ज्ञान अर्जन का साधन बनाने में सहायक हो सकते हैं।

  • पाँच साल तक बच्चों को किसी भी प्रकार के स्कूल में नहीं भेजा जाय। केवल सीमित समय ही टीवी या अन्य उपकरणों के लिये निर्धारित किया जाये। बच्चों में बाहर खेलने व आपस में मिलने जुलने की आदत डालें। प्रेरक कहानियाँ सुनायें। चीजों को साझा करना सिखायें। नौकरी पेशा माता पिताओं के लिये यही सुविधा झूलाघरों में हो।
  • पाँच वर्ष की उम्र में बच्चों को पहली कक्षा में स्कूल में बिना किसी चयन प्रक्रिया के लिया जाये। कक्षा ५ तक मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्माण व भाषा एवं अंक ज्ञान हो। होमवर्क न देकर पुस्तक पठन को प्रोत्साहन दिया जाये। तथा बच्चों की रुचि जानने का प्रयास किया जाये। कम से कम १५ मिनट सामूहिक व्यायाम अवश्य ही करवाया जाये। छोटे व सरल सृजन कार्य करवाये जायें। परीक्षा न लेकर आकलन रिपोर्ट तैयार की जाये। कुल स्कूल समय ४ घन्टे से अधिक न हो।
  • कक्षा ५ से ८ तक भाषा व गणित के साथ अन्य विषय ज्ञान व एक अन्य भाषा जोड़ सकते हैं। विभिन्न प्रकार की कला में कार्य करने का बच्चों को अवसर देकर रुचि का आकलन किया जाये। बच्चों के लिये आगे के लिये संभावित क्षेत्र का आकलन किया जाये। जिला स्तर पर कक्षा ८ की परीक्षा ली जाये। अन्य परीक्षा स्कूल स्तर पर हों। अधिक से अधिक बच्चों को विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर प्रदान किये जायें। स्कूल का कुल समय ६ घन्टे से अधिक न हो। होमवर्क केवल कला संबन्धित कार्य हो।
  • कक्षा ८ के बाद से कुशलता कार्यक्रमों की शुरुआत भी की जाये। जिससे छात्र आगे पढ़ाई अथवा कुशलता में से एक अपनी पसंद अनुसार चुन सकें। कुशलता कार्यक्रमों में उद्यमिता व स्वव्यवसाय स्थापना पर बल दिया जाय। कुशलता कार्यक्रमों से भी उच्च व्यवसायिक शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश का प्रावधान हो।
  • निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के शिक्षण पर प्रतिबन्ध हो। किन्तु निर्धारित कार्यक्रमों में प्रवेश पर उम्र का बन्धन न हो ताकि सभी अपनी योग्यता में सुधार कर सकें।
  • परीक्षाफल में अंकों के अतिरिक्त संक्षिप्त चरित्र वर्णन भी शामिल हो। गलत साधन का प्रयोग दण्डनीय अपराध हो। एक कक्षा में ४० से अधिक बच्चे न हों।
  • सभी निर्धारित कार्यक्रमों के लिये अधिकतम फीस निश्चित की जाये। अन्य किसी प्रकार का शुल्क न लिया जाय।
  • नौकरी के लिये सिर्फ शैक्षणिक योग्यता चयन का आधार हो। अधिकारी वर्ग के लिये इन्टरव्यू लिये जा सकते हैं।
  • सभी स्तर के अध्यापकों को समाज में आदर दिलाने के लिये उन्हे विशेष सामाजिक सुविधा दी जाये। शिक्षण आवश्यक सेवा घोषित की जाये ताकि शिक्षकों से अन्य सेवायें न ली जा सकें व वे हड़ताल पर भी न जा सकें। शिक्षकों के चयन का आधार पढ़ाने में रूचि व चरित्र मुख्य रूप से हो।

उपरोक्त प्रयत्नों से शिक्षा व्यवस्था को ज्ञान अर्जन के साथ एक अच्छा नागरिक बनाने का माध्यम बनाया जा सकता है।