कृतिम दिमाग (आर्टीफीशियल इन्टेलीजेन्स)

                  

मनुष्य को अपनी बुद्धि पर हमेशा से गर्व रहा है। इसके चलते वह अपने को सभी प्राणियों से श्रेष्ठ मानता आया है। समय के साथ मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा के साधन जुटाने के लिय अपनी बुद्धि का उपयोग किया। बढ़ती सुविधा के चलते सोचने का समय अधिक मिलने से बुद्धि का और विकास हुआ। इस तरह समय के साथ सुविधायें व बुद्धि के विकास का निरन्तर प्रगतिशील सिलसिला आरम्भ हुआ जो आज तक जारी है। सुख सुविधा से जुड़े संसाधनों का बराबर बँटवारा संभव नहीं हो पाने के कारण साधन संपन्न लोगों को अपने संसाधनों की सुरक्षा के लिये साधन जुटाने पड़े। साधन हीन व साधन संपन्न होना मनुष्य जाति को विभाजित करने की पहली सीढ़ी थी। साधनहीनों ने साधन संपन्नों से साधन छीनने व साधन संपन्नों ने अपने साधनों की सुरक्षा के प्रयासों को विकसित करने में अपनी बुद्धि का उपयोग करना आरम्भ किया। इस प्रतिस्पर्धा ने रक्षा साधनों के विकास का सिल सिला शुरू हुआ। परिणाम स्वरूप मनुष्य जाति कई भौगोलिक, जातीय, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक गुटों में बँटकर अपने को सुरक्षित समझने लगे।

बढ़ते धड़ों की संख्या ने लूटने, अधिक साधन अर्जित करने व उसकी रक्षा के साधन जुटाने के लिये संचार, यातायात, अधिक प्रभावी रक्षा प्रणाली एवं सूचना तकनीक विकसित की गई। साधनहीन व साधन संपन्न दौनों ने इन विकासों का उपयोग अपने हितों को साधने के लिये करना शुरू किया। इस कारण साधन संपन्नों को हर पल सजग रहने की जरूरत महसूस हुई। इसी का परिणाम था कि मनुष्य को कृतिम बुद्धि बनाने की जरूरत महसूस हुई।

कृतिम बुद्धि वाले उपकरणों की शुरुआत पूर्व निर्धारित कार्य को कम्यूटर के प्रोग्राम में डाल देने से हुई। नियत समय पर अलार्म बजा देने से शुरु यह विकास मशीनों के नियंत्रण, उपकरणों के स्वचालन, स्वचालित रोबोट , स्मार्ट फोन  एवं स्वचालित वाहनों तक जा पहुचा। इन सबमें सबसे बड़ी कमी यह रही कि ये सब यंत्र पहले से ही डाली गयी कार्य योजना के अनुरूप ही कार्य कर पाते थे। साधारण आदमी की भाषा में कहे तो इनमें स्वयं सीखने की क्षमता, अथवा स्वयं का अपना दिमाग नहीं था।

मनुष्य को यह स्थिति अमान्य थी तथा उसे महसूस हुआ कि इस तरह के उपकरण बनाना चाहिये जो समय के साथ अपना ज्ञान स्वयं बड़ा सके। अर्थात जिसके पास अपना स्वयं का दिमाग हो। अथक प्रयासों के चलते इस दिशा में काफी सफलता मिल चुकी है एवं और सुधार के प्रयास चल रहे हैं। आजकल रेस्त्राँ में दिमाग वाले रोबोट दिखने लगे है जो आपका स्वागत करने से लेकर आर्डर लेने, भोजन लगाने से लेकर आपका अनुभव तक पूछ लेते हैं। इसी प्रकार अस्पतालों में मरीज की देखरेक मशीनों द्वारा की जा रही है जो समय पर सही दवायें एवं भोजन आदि का उचित ध्यान रख सकती हैं।विकास की यही दर रही तो वह दिन दूर नहीं जब घर के सब काम मशीनें करने लगेगी। यह भी संभावना है कि वाहन चलाने या हवाई जहाज उड़ाने का काम मशीनें करने लगे अथवा युद्ध भी आपस के दो देशों की मशीनें लड़ने लगे।  ऐसी स्थिति में संभावना बनती है कि मशीनों का दिमाग तो विकसित होता जायेगा तथा अधिकतर मनुष्यों का दिमाग धीरे धीरे निष्क्रिय होता जायेगा।

मनुष्य के द्वारा किये गये अधिकतर आविष्कारों को भले ही मनुष्य की भलाई के उद्देश्य से किया गया हो। लेकिन लालच, दर्प, व संकीर्ण सोच के चलते अधिकतर इन आविष्कारों का दुरूपयोग ही हुआ है। इसीका परिणाम है कि विध्वंसकारी जखीरा इतना इकठ्ठा हो गया है जो समूची आबादी को नष्ट कर सकता है। पर्यावरण को हम इतना बिगाड़ चुके हैं कि संभावित विनाश से बचने के लिये अरबों डालर खर्च किये जा रहे हैं। इसी श्रृखंला में ये कृतिम दिमाग वाली मशीने पर्याप्त संख्या में होने पर विद्रोही हो गयी अथवा कर दी गयी तो उसका परिणाम क्या हो सकता है सोचकर मन सिहर उठता है।

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