मन

 

प्रायः हर किसी से सुनने को मिलता है कि आज मन यह करने का है अथवा यह नहीं करने का है। बच्चा सवेरे उठ कर माँ से कहता है आज स्कूल जाने का मन नहीं है। तो पतिदेव आफिस से आकर बीबी से फरमाइश करते हैं कि आज गरमागरम पकोड़े खाने का मन है। कभी पत्नी छुट्टी के दिन कहती है कि आज खाना बनाने का मन नहीं है, पिक्चर देखकर बाहर खाना खायेंगें। मन से प्रेरित ऐसे उद्गार मनुष्य से क्या क्या नहीं कराते हैं।

मन को दिल व इच्छा के रूप में भी व्यक्त किया जाता है। आखिर यह मन है क्या ? मन शब्द से बना मानस तथा उससे बना मानसिक, अतः मन का संबंध मस्तिष्क से है यह हम मान सकते हैं। मस्तिष्क हमारी सभी इन्द्रियो को नियन्त्रित करता है एवं अनुभूतियों को प्रभावित करता है। अलग अलग मनुष्यों में एक ही घटना पर अनुभूति अलग अलग हो सकती है। उदाहरण स्वरूप किसी व्यक्ति के गिरने पर कोई हँसता है, कोई सम्हल कर चलने की हिदायत देता है तो कोई सहायता करने के लिये दौड़ पड़ता है। यह भी जरूरी नहीं कि एक ही व्यक्ति की एक प्रकार की घटना की हमेशा एक ही तरह की प्रक्रिया हो। इन सब विचारों का नियन्त्रण कैसे होता है?

इस सवाल का उत्तर खोजने के लिये पहले हमें मस्तिष्क को समझना पड़ेगा।

बचपन में एक नाजुक समय होता है जब बच्चे तेजी से सीखते हैं। अन्य कई कारणों में से एक मुख्य कारण इस काल में बीएनडीएफ (ब्रेन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में होना है जो मस्तिष्क विकास के लिये महत्वपूर्ण है। इसलिये बचपन की घटनायें मनुष्य को जीवन भर प्रभावित करती हैं एवं चरित्र निर्माण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है, मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सब मिलकर आसपास घटने वाली घटनाओं की प्रतिक्रिया निर्धारित करते हैं।

हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें। इसे हम विवेक का नाम दे सकते हैं।

शिशु के जन्म के समय मस्तिष्क सिवाय नैसर्गिक क्रियाओं के नियंत्रण जैसे रोना, हाथ पैर हिलाना, भूख महसूस करना आदि के अलावा खाली स्लेट की तरह होता है। इसके बाद का विकास प्रशिक्षण अथवा आसपास होन वाली घटनाओं के आधार पर होता है। ये घटनायें बहुत बढ़ी संख्या में प्रतिदिन होती हैं। यह सब यादों के रूप में मस्तिष्क में अंकित होती जाती हैं। मस्तिष्क एक बड़े भंडार की तरह होता है जहाँ रोज काम आने वाली यादें तो सुव्यवस्थित सामने रखी रहती है। इसे हम चेतन मस्तिष्क के नाम से जानते हैं। ऐसी अनगिनत यादें जो रोजाना उपयोग की नहीं होती हैं वे पीछे दबी हुई पड़ी रहती हैं, जिसे हम अचेतन मस्तिष्क के नाम से जानते हैं। जिस प्रकार अचानक किसी पुरानी वस्तु की जरूरत पढ़ने पर हम भंडार से खोज निकालते हैं। ठीक उसी प्रकार किसी घटना अथवा प्रतिक्रिया से अचेतन मन मे दबी याद अचानक प्रगट हो जाती है, उन यादों से जुड़े अहसास भी साथ ही महसूस होने लगते है, मानो हम दृश्य चित्र देख रहे हों।

यही मन है। विवेक मन पर अंकुश लगाने का काम करता है। आजकल सिनेमा, समाचार पत्रों, दूरदर्शन, सोशियल मीडिया एवं इन्टरनेट ने अधिकतर लोगों के मस्तिष्क का इतने अधिक भाग पर अपना अधिकार जमा लिया है कि विवेक के लिये जगह ही नहीं बची। यही कारण है कि कई लोगों का व्यवहार सब बन्दिशों को लाँघ कर जघन्य अपराध की सीमा तक पहुँच गया है।

 

दान का बदलता स्वरूप

 

दान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। दधिचि ऋषि एवं कर्ण जैसे अन्य कई महापुरुषों के दान की गाथायें हमारे शास्त्रों में मिलती हैं। किन्तु इनको स्वार्थवश याचना अथवा परीक्षा के सफल प्रयास कहना अधिक उचित होगा। वेदों व पुराणों में भी दान का महत्व बताया गया है। विशेषकर ब्राह्मणों को दिये गये दान को विशेष पुण्य का दर्जा दिया गया है। यह शायद उस समय की सामाजिक परिस्थिति के चलते उचित रहा हो। उस समय ब्राह्मण विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रख कर शिक्षा देते थे, अथवा ज्ञान की खोज में अपना पूरा जीवन लगा देते थे। यह एक प्रकार से सामाजिक उत्थान को प्रोत्साहित करने का प्रयास था। निर्धन व जरूरतमन्द लोगों सहायता दया से प्रेरित थी। इस प्रकार ये दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के किये जाते थे, जो वास्तव में मन में एक आनन्द का आभास पैदा कर एक प्रकार से पुण्यफल देते थे।

समय के साथ मनुष्यों में लालच का उद्भव हुआ, परिणाम स्वरूप संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। फलतः दान को स्वर्ग प्राप्ति व पाप को नष्ट करने का उपाय प्रचारित किया जाने लगा। इसके चलते दान दाताओं व दान ग्रहण कर्ताओं का तेजी से विस्तार हुआ। साधारण जन जहाँ मुठ्ठी भर अनाज अथवा कुछ पैसे दान कर स्वर्ग में अपना स्थान सुनिश्चित मानने लगे, वहीं व्यवसायी व लाभप्रद नौकरी पेशा लोग दान देकर अपने पाप का बोझ हल्का करने के प्रयास में जुट गये। इस प्रकार स्वार्थ साधन के लिये दान की परिपाटी का आरम्भ हुआ।

दान करने वालों की बढ़ती संख्या के चलते दान पाने की लालसा बढ़ती गयी। दान पाने के लालच में  निर्धन लोगों में भीख माँगने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। यहाँ तक बच्चों का अपहरण कर उन्हें अपाहिज कर भीख मँगवाने जैसे जघन्य अपराध भी होने लगे। ब्राह्मणों ने दान संग्रहण के लिये कई नये तरीके इज़ाद करना शुरू कर दिये। इनमें पूजा, पाठ, जप आदि के द्वारा परिवार की खुशहाली का भरोसा, स्नान के बाद तिलक लगाकर आशीर्वाद देना, अलग अलग देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित कर उनको चमत्कारिक बतलाकर दर्शनार्थी आकर्षित करना प्रमुख थे। चंदा एकत्रित कर बड़े बड़े धार्मिक आयोजनों को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यह एक प्रकार से मानसिक व सामाजिक दबाव बना कर दान लेने के समान माना जा सकता है।

स्वतन्त्र भारत में सरकारी दान की कई प्रकार की नयी विधायें निकली। इसमें किसानों की ऋण माँफी, दुर्घटनाओं में पीड़ित परिवारों को राहत राशि प्रमुख हैं। वैसे आरक्षण को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है, विशेषकर उस समय जब यह लाभ बार बार एक ही परिवार वाले लेने लगे। अच्छे इरादे से शुरू की गई ये योजनायें राजनीति के चलते सरकार की सहृदयता की जगह प्राप्त करता का अधिकार अथवा चुनावी रणनीति का हिस्सा कब बन गई पता ही नहीं चला। इन योजनाओं से लाभ कम समाज का नुकसान अधिक हुआ है। सामाजिक विघटन, गुणता में गिरावट, अकर्मण्यता तथा हर समस्या के लिये सरकार की ओर देखना इन्हीं योजनाओं की देन है। अच्छा होता यदि इन योजनाओं को योग्यता से जोड़ा जाता।

 

समय के साथ कई धन कुबेरों ने अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा समाज के उत्थान के लिये देने की प्रथा आरम्भ की। हाँलाकि यह दान उनके द्वारा स्थापित संस्थानों की ओर से किया जाता है किन्तु समाचारों में नाम प्रायः धन कुबेरों का ही आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका पिछड़ो के विकास में एवं साथ ही दानदाता की समाज में प्रतिष्ठा स्थापित करने में बहुत बड़ा योगदान है। इसी श्रंखला में ऐसे कई सीमित साधन वाले गुमनाम दानदाता भी आते हैं जो अपनी लगभग पूरी कमाई व समय निर्धन एवं बेसहारा लोगों की सेवा में लगा देते हैं, ऐसे लोग सिर्फ सेवाभाव से प्रेरित होते है।

आजकल कार्पोरेशन द्वारा सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह का काफी प्रचलन है। सरकारी संस्थानों के लिये सरकार द्वारा आवश्यक बनाया गये इस नियम का कई निजी संस्थान भी पालन करते हैं। यह जनता में संस्थान की छबि निखारने के लिये किया गया दान है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके चलते कई गाँवों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है।

क्षेत्रीय विकास के लिये जन प्रतिनिधियों को क्षेत्र के आकार के अनुसार लाखों करोड़ों रुपये अनुदान दिया जाना सरकारी दान का नवीनतम रूप है। यह दुर्भाग्य है कि जन प्रतिनिधियों की उदासीनता तथा गलत प्राथमिकता के चलते इसका सही लाभ संबन्धित क्षेत्र को नहीं मिल पाता है।

चिकित्सा क्षेत्र में विकास के साथ एक नये प्रकार के दान की परंपरा आरम्भ हुई यथा रक्त दान, कोख दान एवं किडनी दान आदि। जन सेवा के रूप में शुरू हुए इस दान ने कब व्यवसाय का रूप ले लिया पता नहीं चला। मरणोंपरान्त अंगदान व देहदान अवश्य ही निस्वार्थ दान है।

दान छोटा या बड़ा यथार्थ में बिना किसी फल के स्वेच्छा से सुपात्र को किया दान ही श्रेष्ठ माना जायेगा।