राहुल गाँधी कांग्रेस के नये नायक

 

राहुल गाँधी लगभग २० वर्षों से भारतीय राजनीति में पैर जमाने की कौशिश में हैं। कई पार्टी नेताओं व अन्य संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण के वावजूद एक अपरिपक्व युवक की छबि से वे उबरने में नाकाम रहे। उनकी छबि प्रायः मनमौजी युवा व जबरन राजनीति में उलझाये राजनेता जैसी रही। कई बचकानी हरकतों के चलते वे मीडिया में वर्षों तक हास्य का माध्यम भी बने रहे। किन्तु इस बार गुजरात चुनाव के दौरान नये जोश व थोड़ी परिपक्वता से उनके प्रचार ने पार्टी में नयी उम्मीद का संचार किया है। सुनने में आया है कि इस बदलाव के पीछे एक विदेशी विश्लेषक कम्पनी का हाथ है। इसी के चलते उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद पर स्थापित कर दिया गया है। यह भी खबर में है कि २०१९ के संसद चुनाव के लिये भी पार्टी ने इसी कम्पनी (इस कम्पनी का योगदान १६ में ट्रम्प जी को जिताने में अहम माना जाता है) से समझौता किया है। इसके चलते २०१९ के चुनाव के हिसाब से आने वाला समय राजनीतक रूप से उथल पुथल व सरगर्मी भरा रहने की संभावना है। इस परिपेक्ष में राहुल के बारे में मेरे अध्ययन का निष्कर्ष इस प्रकार है:-

  • मेरा यह अनुमान है कि राहुल का माध्यमिक शिक्षण (जो मुख्यतः सुरक्षा कारणों से विदेश में हुई थी) से राजनीति में आने तक का समय एक गैर जिम्मेदार अमीरजादे सा गुजरा होगा। इसमें मौज मस्ती के अतिरिक्त और किसी कार्य के लिये प्रमुखता नहीं रही होगी।
  • राहुल को राजनीति में अपरिपक्व उम्र में लाना एक मजबूरी उस समय बन गयी, जब राजीव गाँधीजी की आकस्मिक मौत के बाद सोनियाजी को विदेशी होने के कारण प्रधानमंत्री के पद से दूर रहना पड़ा। इस प्रकार से उनका राजनीति में प्रवेश एक प्रकार से अत्प्रत्याशित था, जिसके लिये वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे।
  • अमेठी से पारिवारिक सुरक्षित सीट के चलते वे सांसद तो आसानी से बन गये किन्तु पहले पाँच सालों में न तो संसद के अन्दर एवं न ही संसद से बाहर अपनी राजनीतिक पहचान बनाने में वे सफल रहे। उनका अधिकतर समय विदेशों में छुट्टियाँ मनाने में ही बीता।
  • राहुल को राजनीति में प्रतिष्ठित करने के लिये पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को उनकी छबि सुधारने की जिम्मेदारी दी गई लेकिन ये प्रयास प्रभावी नहीं रहे। कभी गरीबों के मसीहा तो कभी गुस्साये युवा नेता अथवा सदन में युवा विरोधी नेता के रूप में पेश राहुल जनमन में विश्वास पैदा करने में सफल न हो सके।
  • उनको प्रोत्साहित करने के लिये कई युवा नेताओं को भी संसद में लाया गया, किन्तु वान्छित परिणाम नहीं मिल पाया। राहुल न तो एक प्रभावी वक्ता, न ही जन नेता एवं ना ही कुशल प्रबन्धक बन पाये। इस का मुख्य कारण उनकी अति संरक्षित परवरिश को माना जा सकता है। मौलिकता का उनमें अभाव परिलक्षित होता है।
  • २०१४ में संसद चुनाव में आगे से नेत्रत्व कर रहे राहुल का धुँआधार प्रचार मोदी जी की लहर के चलते लगभग निष्प्रभावी रहा। इससे उनकी साख को गहरा आघात पहुँचा। उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की हार ने उनके नेतृत्व में वि्श्वास हिला कर रख दिया।
  • हाल ही के गुजरात चुनाव में उनमें जो थोड़ा बहुत उत्साह व आत्मविश्वास देखने को मिला उसके पीछे एक किराये की एजेन्सी द्वारा जातीय ध्रुवीकरण द्वारा पार्टी के लिये जीत का वातावरण बनाने में सफल होना मुख्य कारण रहा। राहुल के अत्यधिक मंदिर प्रेम व पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के अनावश्यक बयानबाजी के चलते पार्टी मौके का पूरा लाभ नहीं उठा सकी।
  • समाचारों के अनुसार पार्टी ने उसी एजेन्सी से २०१९ के चुनाव के लिये अनुबन्ध किया है। अतः आने वाला समय आन्दोलन, दंगे एवं वाक युद्ध का अपेक्षित है। देखना होगा कि यह सब मोदी जी की लोकप्रियता में कितनी सेंध लगा पायेगा? राहुल अपने बल बूते पर शायद ही कुछ कर पायें।

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