भारतीय समाज में बदलाव के सात दशक

 

सात दशकों के ऊपर के जीवन काल में मैंने भारत के सामाजिक जीवन में बदलाव को लगातार महसूस किया है। इन सात दशकों में मनुष्य के जीवन को आसान व आरामदायक बनाने के हर संभव प्रयासों के बावज़ूद भी लगभग हर स्तर पर आज असहजता, असंतोष एवं अनजान भय से ग्रसित जीवन लोग जी रहे हैं ऐसा प्रतीत होता है। यह बदलाव धीमी गति से आने के कारण लोग बदलाव के परिणामों का सही आकलन नही कर पाये व बदलावों को आत्म सात करते गये। दशक दर दशक बदलाव जैसे मेरे स्मृति पटल पर अंकित है यह उनको लिपिबद्ध करने का प्रयास भर है।

  • पचास के दशक में बच्चे माँ बाप से डरते थे किन्तु उनके प्रति दिल से श्रद्धा रखते थे। समाज का लोगों के व्यवहार पर प्रभावी अंकुश था। तंगी में भी लोग संतुष्ट थे। घर आये जानवर को भी लोग खाली वापस नहीं लौटाते थे। भगवान में निस्वार्थ श्रद्धा थी। इमानदारी व सरलता समाज की पहचान थी।
  • साठ के दशक में परिस्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। युवाओं में फेशन, सिनेमा, व खेलों के प्रति रुझान में बढ़ोतरी। माता पिता के अंकुश पर विरोध के स्वर उभरने लगे। किन्तु उनके प्रति आदर भाव में कमी नहीं आयी। समाज का व्यक्तिगत व्यवहार पर प्रभाव में कमी। भगवान को सफलता के बदले में चढ़ावे का प्रचलन शुरु। नेताओं के घोटालों की यदा कदा समाचार। गरीबों के प्रति आदर में कमी व संदेह की शुरुआत।
  • सत्तर के दशक में संयुक्त परिवारों का विघटन शुरु। विवाह में दहेज माँगने के समाचार यदाकदा प्रकाशित। पश्चिमी फेशन की ओर बढ़ता झुकाव। बाहर खाने की ओर बढ़ता रुझान। परीक्षाओं में नकल करने की पृवत्ति बढ़ी। माता पिता में बच्चों की जिद के आगे झुकने की शुरुआत। युवाओं का रुझान सिनेमा व खेल (विशेषकर क्रिकेट) के प्रति बढ़ा, किन्तु माता पिता के प्रति आदर में कमी की शुरुआत।
  • अस्सी के दशक मे पाश्तचात सभ्यता की ओर युवा युवतियों के रुझान में बढ़ोतरी। युवतियों मे युवकों के समान अधिकारों की चाहत जागी। पिछड़ी जाति को आरक्षण देने पर युवाओं का राष्ट्र व्यापी रोष। युवाओं में नेताओं के प्रति अविश्वास पैदा। जाति व धर्म पर आधारित समाज के विघटन की शुरुआत। युवओं की सहनशीलता घटी, संयुक्त परिवारों में बिखराव आरम्भ। व्यापार व राजनीतिक भ्रष्टाचार में तेजी से बढ़ोतरी।

 

  • नब्भे के दशक में सहिष्णुता में कमी। समाज के विभिन्न घटकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। चुनावों में जाति व धर्म का प्रभाव बढ़ा। धार्मिक कट्टरता की शुरुआत। क्षेत्रीय संबद्धता बढ़ने के परिणाम स्वरूप क्षेत्रीय दल शक्तिशाली बन कर उभरे। राष्ट्रीय भावना में भारी गिरावट। २४ घन्टे टीवी प्रसार से सामाजिक मेल जोल में कमी। शिक्षा के निजीकरण से शासकीय स्कूलों के स्तर में गिरावट, शिक्षा महँगी होना आरम्भ।
  • धार्मिक कट्टरता ने आतंक का रूप लेना शुरू किया। धर्म ने एक व्यापार का रूप लेना शुरू किया। धर्म गुरुओं व मुखियाओं ने विलासिता को अपनाया। स्वार्थवश ऐसे धार्मिक नेताओं के अनुयायियों की संख्या में वॄद्धि, ऐसे लोगों की बाढ़ । युवाओं में ऐशो आराम व भ्रमण की ओर रुझान बढ़ा, धन अर्जन का महत्व बढ़ा, इसके लिये सभी तरीके मान्य। इकाई परिवार की शुरुआत। माता पिता पर खर्च बोझ लगना आरम्भ।
  • इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में मानव मूल्यों में तेजी से गिरावट की शुरुआत। पढ़ाई, राजनीति, धार्मिक संस्थानों, व्यापार आदि सभी जगह भ्रष्टाचार में वृद्धि। समाचारों की सच्चाई सन्दिग्ध। इन्टरनेट व मीडिया में अश्लीलता की भरमार। महिलाओं पर छेड़छाड़ व अन्य अपराध में बढ़ोतरी। अपराध उजागर लेकिन प्रभावशाली सजा से बच निकलने में सफल। माता पिता को वृद्धावस्था में असहाय छोड़ने की पृवत्ति की शुरुआत।
  • इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरम्भ से ही बड़े कार्पोरेट व्यापारियों व राजनेताओं द्वारा बड़े वित्तीय घोटाले। कई नकली धर्म गुरूओं का उदय। ऐसे गुरूओं ने भक्तों की फौज तैयार कर राजनीतिक शक्ति बढ़ाई एवं अपने अड्डों को ऐशगाह व विलासिता का केन्द्र बनाया। आतंकवाद मे अत्प्रत्याशित विस्तार। महिलाओं, लड़कियों एवं बच्चियों तक से अमानुष कृत्यों में अकल्पनीय वृद्धि।

मानव मूल्यों में सात दशकों की सतत गिरावट कब थमेगी कहना मुश्किल है। मुश्किल यह है कि इस अवनति पर चिन्ता तो कई लोग दर्शाते है, लेकिन बदलने की जिम्मेदारी सरकार को दोष देने तक ही सीमित है। कोई चमत्कारी व्यक्तित्व के उदय होने पर ही बदलाव संभावित है।