भारत एवं ज्ञान

 

भारत को विश्व की पुरातनतम संस्कृतियों में से एक के लिये जाना जाता है। भारत के हजारों मनीषियों ने अपना संम्पूर्ण जीवन ज्ञान की खोज में अर्पित कर वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रंथों में हजारों वर्ष पूर्व ही समाज, विज्ञान एवं कला की अनेक विधाओं का संकलन किया। इन ग्रंथो का अध्ययन पूरे विश्व ने किया तथा इन्हें ज्ञान का भंडार बताया। इन प्रयासों के फलस्वरूप भारत को विश्व गुरू होने का सम्मान मिला। दूर दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने भारत आते थे। यह एक दुर्भाग्य है कि समय के साथ भारत ज्ञान के क्षेत्र मे पिछड़ता गया। आज ज्ञान को मात्र जीवकोपार्जन का साधन मात्र मानकर किसी भी प्रकार एक प्रमाणपत्र प्राप्ति मान बैठे है। ऐसा भी नहीं है कि भारतीयों की बुद्धिमता में कोई कमी आई है। इस अवनति के निम्न लिखित कारण हो सकते है:-

१. प्राचीन ग्रंथो का धार्मिक बताया जाना

हमारे पुरातन सामाजिक चिन्तकों ने शायद प्राचीन ग्रंथो के प्रसार के लिये इनका पाठन पुण्य का कार्य घोषित कर दिया एवं सुख संपत्ति देने वाला व स्वर्ग में स्थान दिलाने का साधन बतलाया। परिणाम स्वरूप अनेक प्राचीन ग्रंथों के पठन व कथा श्रवण का प्रचलन अवश्य ही बढ़ा किन्तु उसमें निहित ज्ञान को सीमित वर्ग ही समझ पाया। परिणाम स्वरूप उपदेशकों की संख्या का विस्तार अवश्य हुआ किन्तु ज्ञान का विकास नहीं।

२. अंग्रेजों ने शिक्षा व्यवस्था को अपनी आवश्यकता अनुसार रोजगार पाने का साधन बना दिया। फलतः पढ़े लिखे लोग नौकरी के अतिरिक्त अन्य जीवनयापन के साधन के लिये अनुपयुक्त होते गये। नौकरी में ज्ञान का उपयोग दैनिक कार्य को कुशलता पूर्वक करने तक सीमित रहा। ज्ञान का विस्तार नौकरी में उन्नति तक सीमित।

३. स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा में सुधार के नाम पर सतही सुधार ही किये गये जैसे वेषभूषा, शालाओं में भोजन देना, पुस्तकों में बिना विशेष प्रयोजन बदलाव कर कठिन बनाना। आरंभिक वर्षों में पढ़ाई का बोझ बढ़ाना। बिना परीक्षा उत्तीर्ण किये १०वीं कक्षा तक आगे बढ़ाते रहना आदि। परिणाम स्वरूप स्कूल जाने पर अधिक जोर ज्ञान अर्जन पर नहीं।

४. सरकारी स्कूलों में आरक्षण, सिफारिश व भाई भतीजावाद के चलते अयोग्य व शिक्षण में रुचि नहीं रखने वाले शिक्षकों को लगाना। परिणाम स्वरूप शिक्षा स्तर में गिरावट व निजी संस्थाओं के प्रवेश से शिक्षा का व्यापारी करण।

५. शिक्षकों को पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य कई कामों में उलझाना। परिणाम स्वरूप योग्य युवा शिक्षण क्षेत्र में आने से कतराने लगे। समाज में  शिक्षकों के मान सम्मान में लगातार गिरावट।

६. पढ़ाई में सुधार से ज्यादा परीक्षा परिणाम पर जोर। परिणाम स्वरूप पर्यवेक्षण, विवेचन, सूचना एकत्र करने में उपयोगी समय की बर्बादी। परीक्षा परिणाम सुधारने के दबाव के चलते अनुचित साधनों के उपयोग को बढ़ावा।

७. उच्च शिक्षा व अन्य सेवाओं में प्रवेश के लिये अलग से प्रतियोगता परीक्षाओं के कारण योग्य छात्रों का ध्यान ज्ञान अर्जन में कम,  प्रतियोगता परीक्षाओं की तैयारी में अधिक।

इस स्थिति से उबरने के लिये आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था में कुछ क्रान्ति कारी बदलाव लायें जायें। नीचे दिये कुछ सुझाव ध्यान देने योग्य हैं:-

  1. बच्चों को ५ वर्ष की आयु के बाद ही किसी स्कूल में प्रवेश। प्राथमिक स्कूल पैदल पहुँचने लायक दूरी से अधिक न हो। प्रवेश के समय जाति नहीं पूछी जाये ना ही यूनीफार्म का बन्धन। प्रथम दो वर्ष स्लेट व कलम का ही प्रयोग। अक्षर, अंक,व्यवहार ज्ञान, व सामूहिक गतिविधियों तक पढ़ाई सीमित। पाँचवीं कक्षा तक पाँच घंटों से अधिक नहीं।
  2. बच्चों को मुफ्त में कुछ नहीं दिया जाये। छोटे मोटे काम स्वेच्छा से करवाकर आर्थिक मदद की जा सकती है। इससे बच्चों का आत्म सम्मान व आत्मविश्वास बढ़ेगा। स्कूलों पर्यवेक्षण स्कूल के बच्चों के माता पिता द्वारा ही हो। समाज द्वारा स्कूल को आर्थिक सहायता का प्रावधान हो।
  3. माध्यमिक शिक्षा में नियमित पढ़ाई के साथ बच्चों की रुचि जानकर आगे किस क्षेत्र में उसकी सफलता की संभावना अधिक है, इसका मार्ग दर्शन भी किया जाय। माध्यमिक शिक्षा के बाद कौशल विकास पाठ्यक्रम (आई टी आई ) चयन करने का प्रावधान हो। यह पाठ्यक्रम ४ वर्ष का (हायरसेकेन्डरी के समकक्ष) हो तथा इसमें उद्यमिता विकास भी समाहित हो। ऐसे छात्र यदि आगे शिक्षा लेना चाहें तो वे महाविद्यालयों में प्रवेश के पात्र माने जायें।
  4. उच्च शिक्षा के लिये पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम व पुस्तकें हों। परीक्षा रीजनल बोर्ड (रेलवे के समान भाषा व राज्य सीमा के आधार रहित) के द्वारा संचालित की जाये। परीक्षा का उददेश्य ज्ञान अर्जन को आँकना हो। परीक्षा का मानक पूरे देश में एक हो। उच्च शिक्षा के लिये उम्र का बन्धन नहीं हो। परीक्षा में अनुचित साधन का उपयोग करने वाले छात्रों को अनुत्तीर्ण माना जाये।
  5. नौकरी व अन्य चयन यथा संभव शैक्षणिक उपलब्धि के आधार पर हो। यदि चयन परीक्षा आवश्यक हो तो उसका स्वरूप समकक्ष स्कूली परीक्षा के समान ही हो ताकि विशेष कोचिंग की जरूरत न हो।
  6. शिक्षकों को समाज में सम्मान दिलाने के लिये, बैंको. रेल व अन्य जगह पंक्ति में प्राथमिकता दी जाये। साथ ही शिक्षकों द्वारा छोटे से छोटा अनैतिक कार्य को गंभीरता से लिया जाये। शिक्षकों को शिक्षण के अतिरिक्त अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाये।