समाज व बुराइयाँ

 

लगभग सभी वर्ग के लोग आज की सामाजिक स्थिति पर चिन्ता व्यक्त करते नहीं थकते। बुजुर्ग अपने जमाने के अनुशासन व संवेदनशीलता पर व्याख्यान देने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। युवा अपने आदर्शों व आज के समाज में प्रगति की राह में तकरार के कारण मध्यमार्ग खोजने में व्यस्त हैं। कुछ आदर्शवादी लोग सोशियल मीडिया पर सरकार व नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खोलकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। इस सबसे एक बात तो साफ है कि मनुष्य समाज से आज भी जुड़ाव महसूस करता है। सामाजिक स्थिति से उसकी असजता उसकी स्वयं को असहाय महसूस करने का परिणाम है। यह केवल आज ही की स्थिति नहीं है। वेदान्त साहित्य में भी लगभग आज हो रहे सभी प्रकार के अपराध तथा अपराधी को दण्ड के विधान का विस्तृत विवरण मिलता है। सामाजिक सुधार के लिये मृत्योपरांत स्वर्ग व नर्क की कल्पना आदर्श समाज स्थापित करने की दिशा में एक अद्भुत प्रयास था।  तब से लेकर आजतक नये नये कानून व उनका पालन करवाने के लिये व्यवस्था का विकास सतत रूप से जारी है। किन्तु इन सभी प्रयासों के बावजूद समाज में अपराध व बुराइयाँ कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। इसका प्रमुख कारण मनुष्यों में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियाँ होती हैं।

  1. अहं – अहं का विकसित रूप प्रायः समृद्ध एवं सफल व्यक्तियों में देखने को मिलता है। ऐसे लोग अपने को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। ये मजबूर व जरूरतमन्द लोगों को निम्न श्रेणी का मानकर अपमानित करने में नहीं संकोच करते हैं। इसी श्रेणी में शासकीय वर्ग भी आता है जो स्वयं को शक्ति संपन्न व शासकीय अनुमति के आवेदन कर्ता को असहाय मानकर चलता है।
  2. मद – कई लोग जो शक्ति संपन्न होते हैं अथवा शक्ति संपन्न लोगों के करीबी होते हैं, प्रायः इसका प्रदर्शन करने से स्वयं को रोक नहीं पाते हैं। इसका प्रदर्शन वे अपनी अर्थ व बल संकलन से करते हैं। अर्थ संकलन के लिये वे कई तरह के गैर कानूनी तरीके अपनाते हैं। तथा बल संकलन के लिये असमाजिक तत्वों को अपनी छत्र छाया में संरक्षण देकर अथवा ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों को अपनी सेवा में लेकर करते हैं। ऐसे लोग प्रायः राजनेताओं, उच्च अधिकारियों व गैर कानूनी व्यवसायियों में पाये जाते हैं।
  3. लोभ – कुछ लोगों में धन संग्रह की तीव्र प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग किसी प्रकार से धन कमाकर अपने लिये ऐशो आराम की वस्तुऐं एकत्र करते हैं। किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा होने पर उसे पा लेने के लिये हर संभव प्रयास करते हैं। ऐसे लोग कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। ऐसे व्यक्ति हर जगह हर स्तर पर पाये जाते हैं।
  4. मोह – कुछ लोग व्यक्ति अथवा वस्तु विशेष से विशिष्ट रूप से जुड़ जाते हैं। उसकी रक्षा अथवा प्रगति के लिये वे कुछ भी कर सकते हैं। इस श्रेणी में एक ओर जहाँ देश के लिये प्राण न्योछावर करने वाले देश भक्त आते हैं। तो दूसरी ओर पुत्र मोह में धृतराष्ट्र जैसे लोग जो अपने अजीज के हर अत्याचार से आँख मूंद लेते हैं। कुछ लोग स्वयं के मोह में भी फँस जाते हैं।
  5. ईर्षा – कुछ लोगों की नज़र हमैशा दूसरों पर अधिक केन्द्रित रहती है। ऐसे लोग स्वयं की उपलब्धि को दूसरे से कमतर पाते हैं। ऐसी स्थिति में हीन भाव से ग्रस्त होकर कई बार दूसरे को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के लोग प्रायः आफिस में सहकर्मियों अथवा मोहल्ले में पड़ौसी के रूप में मिल जाते हैं।
  6. हिंसा – इस प्रवृत्ति से ग्रसित लोग पहले जंगल में शिकार करके अथवा आस पड़ौस में जानवरों को देखकर पत्थर मारकर संतोष कर लेते थे। किन्तु आजकल मनुष्यों को मारना अधिक आसान हो गया है। बदले, हीन भावना अथवा अपराध छिपाने की भावना हिंसा प्रज्जवलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  7. वासना – वासना ग्रसित लोग किसी के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि उसे पाने के लिये विवेक खो बैठते हैं। ये आसक्ति किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति हो सकती है। लेकिन आज के परिपेक्ष में यह काम वासना का विकृत रूप ले चुका है जिसने मनुष्य को जानवरों से बदतर हालात में ला खड़ा किया है।
  8. घृणा – इस प्रवृत्ति के लोग किसी व्यक्ति विशेष से इतनी नफरत मन में बिठा लेते है कि उसे किसी भी प्रकार से मिटा अथवा कम नहीं किया जा सकता। वे हर संभव मौके पर उस व्यक्ति की बुराई शुरू करने लगते हैं। जरूरी नहीं कि घृणा का कारण जायज हो।

आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व तक माता पिता, शिक्षक व समाज के दबाव के चलते बचपन से ही इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की सीख दी जाती थी। परिणाम स्वरूप समाज में बुराईयाँ सीमित रूप में ही देखने को मिलती थी। बिखरते संयुक्त परिवार, माता पिता की व्यस्तता, शिक्षकों व माता पिता की सीख एवं आचरण मे विरोधाभास एवं कमजोर सामाजिक बंन्धनों के चलते इन प्रवृत्तियों पर मनु्ष्य का नियंत्रण कम होता गया। भोग विलास के साधन, संपन्नता प्रदर्शित करने की प्रतिस्पर्धा एंव धनबल, बाहुबल से न्याय को प्रभावित कर पाने की क्षमता से प्रेरित मनुष्य आज इन प्रवृत्ति जनित बुराईयों आज अपनी सफलता का आधार मानने लगा है।

इस परिस्थिति से उबरने का सिर्फ एक ही उपाय हो सकता है। वह है मनुष्य स्वयं में संतोष, दया, सहृदयता, संवेदन एवं त्याग की प्रवृत्तियों का पोषण करे।