संकल्प से सिद्धि का आव्हान

 

प्रधान मंत्री श्री मोदी जी का अगस्त क्रान्ति के अवसर पर अगले पाँच वर्षों में देश को भ्रष्टाचार, निर्धनता, आतंकवाद, गंदगी  व जाति अथवा धर्म के आधार पर भेदभाव से मुक्त करने के आव्हान का प्रत्येक देश प्रेमी नागरिक अवश्य ही स्वागत करेगा। काश वे इन बुराइयों में अपराध को भी शामिल कर लेते।

क्या यह लक्ष्य प्राप्त करना संभव है?

अगस्त क्रान्ति के समय में और आज के समय में एक मूलभूत अंतर है। उस समय जहाँ अधिकतर जनता अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त थी, आजकल अधिकतर लोग इन बुराइयों के आदी हो गये हैं। इतना ही नहीं कई लोगों ने तो इन बुराइयों को अपने लाभ का साधन बना रखा है। अतः इन बुराइयों से देश को उबारने के लिये एक सामाजिक क्रान्ति लाने की जरूरत पड़ेगी जो लोगों की सोच बदले। लोगों को इन बुराइयों से घृणा होने लगे। यदि हम ऐसा कर पाने में सफल हो पाते हैं तो ही यह संकल्प पूरा हो पायेगा।

केन्द्र सरकार ने इसकी सफलता के लिये देश के विभिन्न भागों में तिरंगा यात्रा निकालने व शिक्षण संस्थाओं में शपथ ग्रहण समारोह के आयोजन का निर्णय लिया है। किन्तु आज के नेताओं पर अविश्वास के परिपेक्ष में इसका अनुकूल प्रभाव संदिग्ध नजर आाता है। हाँ यह संकल्प से सिद्धी कार्यक्रम के प्रति जागरुकता पैदा करने में अवश्य ही सहायक हो सकता है।

क्योंकि समाज व्यक्तियों से बनता है। अतः बदलाव की शुरूआत भी व्यक्तिगत बदलाव से ही होगी। सामाजिक बदलाव के लिये एक ऐसी नयी पीढ़ी की जरूरत पड़ेगी, जो समाज के उत्थान के लिये अपना सब कुछ त्याग कर युवाओं को इस आन्दोलन से जोड़ सके। यह संभव हो सकता है यदि:-

  1. देश के विभिन्न हिस्सो में कुछ ऐसे युवाओं को चिन्हित किया जाये जो इस संकल्प के लिये अपना सब कुछ त्याग कर समर्पित होने के लिये तैयार हों। ये युवा अपने अपने क्षेत्र में वदलाव के लिये माहौल पैदा करें व बदलाव के लिये समर्पित अन्य युवाओं को जोड़ें। ऐसे युवाओं को संकल्प सेवक का परिचय पत्र तथा आसान पहचान के लिये निर्धारित परिवेष रखा जाये। एक साधारण से संकल्प भवन में इनके सादे जीवनयापन की व्यवस्था सरकारी व्यय से की जाये। इनका प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र में चिन्हित बुराइयों को रोकना व जन मानस में इन बुराइयों के प्रति असहिष्णुता पैदा करना हो।

 

  1. इस संकल्प की पूर्ति के लिये चरित्र विकास की आवश्यकता है। चरित्र गठन में आरम्भ के दस वर्ष अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इस समय परिवार के सदस्य, संबन्धी एवं पड़ोसी तथा शिक्षकों की चरित्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह दुखःद सत्य है कि आजकल अधिकांश बच्चे सिखाये गये आचरण के प्रतिकूल सिखाने वाले का आचरण पाते हैं। यह अविश्वास को जन्म देता है तथा नैतिक शिक्षा व्यर्थ हो जाती है। पारिवारिक व सामाजिक परिवेष में परिवर्तन तो सामाजिक बदलाव से ही आयेगा। लेकिन शिक्षकों के आचरण पर अंकुश लगाने की सख्त जरूरत है। किसी भी प्रकार का गलत आचरण शिक्षक को सेवा के अयोग्य घोषित करने के लिये काफी होना चाहिये। सिफारिशी पदस्थापना, आरक्षित पदस्थापना व उपरी संरक्षण के चलते यह असंभव है। शिक्षण संसथानों को इनसे मुक्त कर योग्यता एवं अनुकूलता के आधार पर शिक्षकों का चयन कर पदास्थापना द्वारा ही यह संभव है।

 

  1. राजनीतिक शुद्धिकरण भी संकल्प पूर्ति के लिये बहुत जरूरी है। आजकल चुने हुए अधिकतर प्रतिनिधि अपने को जनता से ऊपर शक्ति संपन्न व कानून से ऊपर मानते है। चुनाव जीतने के लिये सभी प्रकार के हथकंडे अपनाये जाते हैं। इस तरह से चुनकर आने वालों से इन बुराइयों को दूर करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? इसके शुद्धिकरण की शुरुआत संकल्प सेवकों जो आसपास की जनता में अपनी निस्वार्थ सेवा से निर्मल छबि बना चुके हैं। उनको राजनीति में आकर करनी  चाहिये। बिना बड़ी बड़ी चुनावी सभावों व शोर शराबे के ये सिर्फ व्यक्तिगत संपर्क के बल पर चुनाव जीत कर लोक सभा व विधान सभा में आ सकते हैं। जीतने के बाद ये लोग अन्य सदस्यों जैसा वेतन, भत्ता व अन्य सुविधा न लेकर साधारण गुजारे लायक वेतन लें। शायद इससे अन्य सदस्यों को भी शर्म आये। जनता में इस प्रकार के आचरण से संकल्प सेवकों के प्रति सम्मान बढ़ेगा व यही राजनीतिक शुद्धिकरण की शुरुआत की नींव बनेगी।

 

  1. न्यायपालिका इस संकल्प सिद्धी की सफलता के लिये एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें भी काफी सुधार की गुंजाइश है। यह एक स्थापित सत्य है कि गंभीरतम अपराधों में भी अंतिम फैंसला आने तक वर्षों बीत जाते हैं। यदि मामले में प्रभावशाली व्यक्ति अथवा राजनीतिक स्वार्थ निहित है तो शायद ही फैंसला अन्तिम पढ़ाव तक पहुँचे। इसके विपरीत कई गरीब छोटे से अपराध के लिये सालों जेल में न्याय का इन्तज़ार करते रहते हैं तो वहीं कई गरीब व लाचार लोग उस अपराध में फँसा दिये जाते हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिये मुख्य न्यायाधीश को ही कुछ कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। कुछ सुझाव उनके ध्यानाकर्षण इस प्रकार हैं :-

 

  1. सभी मामलों का गंभीरता के अनुसार ७ या ८ श्रेणियों वर्गीकरण किया जाये व उसके अनुसार फैंसला सुनाने के लिये न्यायालय की बैठके निर्धारित (१ से ५० अधिकतम) की जाये।
  2. गंभीर अपराधों की सुनवाई लगातार हो। तथा गवाहों की अधिकतम सीमा हर मामले में निर्धारित की जाये।
  • झूठी गवाही व गलत जानकारी देने वाले वकील व गवाह पर आर्थिक दन्ड गंभीरता अनुसार तुरन्त लगाया जाये। तीन से अधिक बार गलत जानकारी अथवा गवाह पेश करने वाले वकील को अयोग्य घोषित किया जाये।
  1. ऊपरी अदालत में अपील निचली अदालत के फैंसले में कोई कमी पाये जाने के बाद ही स्वीकृत की जाये। इसका रिकार्ड संबन्धित जज की वार्षिक रिपोर्ट में रखा जाये।
  2. विभिन्न न्यायालयों की वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये।

कई लोगों को शायद ये अव्यहवारिक लगे।