मानव अधिकार के नाम पर

 

सभी प्राणियों में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने की सहज पृवत्ति होती है। कई प्रकार की प्रतिस्पर्धायें श्रेष्ठता स्थापित करने का माध्यम आदिकाल से रही है। मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से कई नयी नयी प्रतिस्पर्धाओं का आविष्कार अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिये किया। इनमें गुलामों को रखना व उन पर अत्याचार करना निसंदेह मनुष्य की क्रूरता की पराकाष्ठा थी। इसके विरोध में समाज सुधारकों का आवाज उठाना आवश्यक था। धनवानों, बाहुबलियों व प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा निर्धन व निःसहाय मनुष्यों पर अत्याचार व उनका शोषण आज भी लगभग पूरे विश्व में जारी है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। इसी नियंत्रण के लिये कई शासकीय, व अशासकीय मानव अधिकार संगठन विश्व भर में गठित हैं। ये संगठन अपराधी की सजा, आदिवासियों के विस्थापन, बाल मजदूरी, महिलाओं व दलितों व निर्बलों के विरुद्ध अन्याय पर नजर रखते हैं तथा आवश्यकता पढ़ने पर उनकी सहायता करते हैं। ये इन वर्गों के साथ अन्याय न हो ऐसा कानून बनाने के लिये सरकारों पर दबाव भी बनाते हैं। ये सब प्रयास अवश्य ही सराहनीय हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में ऐसा देखने को मिल रहा है कि कुछ संस्थान मानव अधिकारों की आड़ में देश में सुनियोजित रूप से अराजकता व अस्थिरता फैलाने में सहायता कर रहें हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-

  1. जे एन यू में लगभग साल भर पहले एक कार्यक्रम के दौरान देशद्रोही नारे लगे। उसका संज्ञान लेकर नारा लगाने वाले छात्र के विरुद्ध कार्यवाही की माँग क्या शुरु हुई कि कई मानव अधिकार के रक्षक अचानक जाग उठे। चारों और हल्ला मच गया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का गला घोटा जा रहा है। जैसे किसी ने उस छात्र को फाँसी की सजा सुनादी हो। हफ्ते भर तक टेलिविजन पर लगातार देश में मौलिक अधिकारों के हनन पर चर्चा होती रही।
  2. एक आतंकवादी को वर्षों चली न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई। इसके उपरान्त राष्ट्रपतिजी ने आतन्की की दया याचिका को निरस्त कर फाँसी की सजा बकरार रखी। इन सब प्रावधानों को पूरा करने के बाद जब आतंकी को फाँसी की सजा दी गई तो मानव अधिकरों की रक्षा में जुटे कई संगठनों को मानव अधिकारों का हनन होता हुआ दिखा। व लगभग दो हफ्तों तक अलग अलग माध्यमों द्वारा फाँसी के विरोध में सरकार व प्रशासन को कोसते रहे।
  3. आतंकवादियों को बचाने के लिये कच्ची उम्र के युवा सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते बच्चों को तितर बितर करने के सुरक्षा बल पेलेट गन का प्रयोग करती है। इसमें कई मानवता के प्रहरियों को मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन नजर आता है। यदि एक पत्थरबाज को ढाल बनाकर सुरक्षाकर्मी सुरक्षित निकलने में कामयाब हो जाते हैं तो ये मानव अधिकारों के पहरेदार गला फाड़कर चिल्लाने लगते हैं।
  4. आजकल मानव अधिकार के प्रति संवेदनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि घर में गलत काम करने पर बच्चों को डाँटना या कान पकड़ना अथवा कक्षा में शरारत करने पर बच्चों को झिड़कना अपराध की श्रेणी में आ गयें हैं।

मानव अधिकारों के नाम पर ऐसे कई संगठन सामाजिक व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं यह प्रायः देखने को मिलता रहता है।

समाज में कोई भी अपराध बिना किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्ति समूह के अधिकार का हनन किये बिना संभव नहीं है। इसका अपवाद सिर्फ एक ही स्थिति में हो सकता है, जब कोई किसी को राष्ट्र अथवा धर्म के विरुद्ध भड़काने का प्रयास करे जैसा जेएनयू में हुआ था। यह एक प्रकार से सामाजिक शान्ति भंग करने की परिभाषा में आता है। अतः हम मान सकते है कि एक व्यक्ति या समूह द्वारा किया अपराध अन्य व्यक्ति या समूह के अधिकारों का हनन है अथवा सामाजिक शान्ति के लिये खतरा है। इसका निराकरण शीघ्रातिशीघ्र होना आवश्यक है।

किन्तु मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं व बचाव पक्ष का धन बर्बाद होता है। इसका परिणाम कितना भयावह हो सकता है यह हवाई अपहरण के बाद कुख्यात आतंकवादी अजहर महमूद की रिहाई से अच्छी तरह समझा जा सकता है। कसाब की सुरक्षा पर करोड़ों का खर्च व  छोटे अपराधियों का केस का निपटारा होने के इन्तज़ार में वर्षों तक जेल में बन्द रहना इसके अन्य उदाहरण हैं। इसके विपरीत प्रभावशाली प्रत्यक्ष अपराधियों का अपने धन व शक्ति बल के चलते सजा को जीवन पर्यंत टालना अथवा निर्दोष छूट जाना क्या पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों का हनन नहीं है?

मानव अधिकार के नाम पर अपराधियों का संरक्षण किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिये। आवश्कता है कि वर्तमान न्याय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाये तथा अपराधी के मानव अधिकार के बजाय पीड़ित के अधिकारों की रक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाय।

इसी प्रकार मानव अधिकारविदों को सामान्य सामाजिक व्यवस्था जैसे घर में बच्चों का पालन  अथवा शिक्षण संस्थाओं में अनुशासन बनाये रखने आदि में दख़ल नहीं देना चाहिये। पारिवारिक व सामाजिक बन्धन व वर्जनायें समाज के चरित्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसको कमज़ोर करने के प्रयास का ही परिणाम है कि कम उम्र बच्चे स्कूल में बन्दूकें चलाते हैं व अन्य अपराध में लिप्त हो जाते हैं। समाज का आपसी जुड़ाव ही एक स्वस्थ समाज दे सकता है। मानव अधिकारों के नाम पर समाज का बिखराव मानवता के लिये घातक सिद्ध हो सकता है।

 

 

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