आस्था

 

आस्था का शाब्दिक अर्थ वैसे तो विश्वास होता है किन्तु प्रायः इसको धार्मिक विश्वास से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक विश्वास वैसे तो व्यक्तिगत मान्यता का विषय होना चाहिये। इसमें दूसरों की दखलअंदाजी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिये। हाँ प्रवचन आदि के द्वारा किसी आस्था विशेष की ओर अन्यों को आकर्षित करने में भी कोई बुराई नहीं है। किन्तु धर्म के बदलते रूप के चलते आस्था के साथ कई अन्य पहलु जुड़ गये हैं। इनमें से प्रमुख हैं :-

  • आर्थिक :- आजकल धर्म आय का एक बड़ा साधन हो गया है। लगभग सभी धर्मों में स्वेच्छा अथवा सामाजिक व्यवस्था के चलते धार्मिक स्थलों अथवा संगठनों को आर्थिक भेंट अथवा दान देने की परंपरा है। परिणाम स्वरूप धर्म आधारित नये नये स्थल व संगठन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के आयोजन चंदा एकत्र कर करने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। ये एक प्रकार का प्रचार माध्यम हो गया है जिसका व्यय सामान्य जनता ही उठाती है। इसके अतिरिक्त इन आयोजनों से संबन्धित कई व्यवसाय भी फलस्वरूप फल फूल रहे हैं। पूरे विश्व में इस प्रकार धर्म सबसे अधिक रोजगार के अवसर प्रदान कर रहा है। इस प्रकार कई लोगों की आस्था का आधार जीवनयापन हो गया है।
  • लक्ष्य प्राप्ति :- प्रायः लक्ष्य की पूर्ती के अथवा दुःख से उबरने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हुए लोगों को सुना जा सकता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति पर क्षमता अनुसार प्रसाद अथवा अनुष्ठान का प्रण भी लोग ले लेते हैं। इस प्रकार की स्वार्थ निहित आस्था युवाओ में परीक्षा के दिनों में विशेष रूप से देखने को मिलती है।
  • अपराध बोध से मुक्ति :- भ्रष्टाचार, बेईमानी व अनैतिक तरीके से कमाई आजकल आम बात है। इन गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति प्रायः अपनी अन्तरात्मा के चलते अपराध भावना से ग्रस्त रहते हैं। यह भावना विषाद का रूप लेले इसके पूर्व ही अपराध की गम्भीरता के अनुसार अपने इष्ट को भेंट चढ़ा कर पाप का बोझ हल्का कर लेते हैं। यह एक प्रकार से अपने इष्ट को भागीदार बनाने वाली आस्था है।
  • राजनीतिक आस्था :- प्रजातन्त्र में चुनाव के द्वारा ही सरकार चुनी जाती है। बढ़ती स्पर्धा के चलते नेताओं ने समाज को जाति, आर्थिक, भोगोलिक एवं धर्म के आधार पर बाँट दिया है। राजनीतिक उपयोगिता के अनुसार नेता अपनी आस्था बदलते रहते हैं।
  • सामुदायिक आस्था :- धर्म समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने का एक कारगर साधन बन गया है। फलस्वरूप नित नये समुदाय अथवा उपसमुदायों का गठन हो रहा है। अपने समुदाय के विस्तार के लिये कई प्रकार के प्रचार माध्यम द्वारा लुभाने के प्रयास किये जाते हैं। सामुदायिक आस्था इन प्रयासों का परिणाम है।
  • पारम्परिक आस्था :- कई लोग आस्था न होते हुए भी कई धार्मिक आयोजनों में सिर्फ इसलिये शामिल हो जाते हैं कि यह वर्षों से चली आ रही सामाजिक अथवा पारिवारिक परम्परा है।
  • आतंकी आस्था :- कई समुदायों का अपनी स्वयं की आस्था इतनी दृढ़ है कि अन्य सभी आस्थायें उन्हें अपनी आस्था के विरुद्ध लगती है। अपनी आस्था का वर्चस्व स्थापित करने के लिये ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं।
  • भोग की आस्था:- बढ़ती आय के चलते कई धार्मिक प्रतिष्ठान वहाँ के सेवादारों के लिये राजसी ठाठ बाट के साधन हो गये हैं। ऐेसे प्रतिष्ठानों में पैठ बनाने वाले आस्थावान भोग की आस्था से प्रेरित होते हैं।

 

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