मानव एवं प्रकृति

 

प्रकृति की एक विशेषता यह है कि वह अपना संतुलन बनाये रखती है। प्राकृतिक रूप से पैदा हुई हर वस्तु का निर्धारित जीवन काल होता है, तथा जीवन समाप्त होन पर वह स्वतः उसका अपघटन होकर पंचतत्व में विलीन हो जाती है। इसी प्रकार प्रकृति ने अपनी हर प्रजाति के लिये उचित पालन की व्यवस्था भी निर्धारित की हुई है जिसकी आपसी संबद्धता के चलते एक संतुलन बना रहता है। वातावरण के बदलते स्वरूप के अनुसार प्रजातियों के स्वरूप परिष्कृत होकर नया रूप लेते रहते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयं का विकास करती रहती है। मानव प्रकृति के इसी विकास श्रंखला की एक कड़ी है।

मानव का विकसित मस्तिष्क उसे अन्य प्राणियों से अलग करता है। मनुष्य ने अपने मस्तिष्क का उपयोग हमेशा ही  अपने लिये आराम जुटाने के लिये किया है। जैसे जैसे सुविधा के साधन जुटते गये वह प्रकृति से दूर होता चला गया।पहिया, आग, व खेती का प्रयोग सीखना व प्राकृतिक धूप व बारिश से बचाव के लिये सुरक्षित छत की खोज मनुष्य की इस दिशा में आरम्भिक उपलब्धियाँ थी। जैसे जैसे मनुष्य ने अपने लिये सुख सुविधा जुटाई वैसे वैसे उसका लालच बढ़ता गया तथा संग्रह की भूख भी बढ़ती ही गई। इस बढ़ती भूख के चलते मानव जाति ने प्रकृति के साथ स्वयं को भी को अन्धाधुन्ध नुकसान पहुँचाया जिसकी भरपायी करना अब मुश्किल हो गया है। प्रकृति को नुकसान पहुँचाने में प्रमुख योगदान इन क्षेत्रों में रहा हैः-

  • जल प्रदूषण – बड़े बड़े उद्योगों का दूषित अवशेष बिना किसी उपचार के नालों, तालाबों अथवा नदियों में छोड़ देना। इसके चलते लगभग सभी मैदानीय जल स्रोत इतने प्रदूषित हो गये हैं कि उस पानी को उपयोग योग्य बनाने के लिये करोड़ों रुपये खर्च पड़ रहे हैं। अन्य प्राणियों व जल जीवों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • वायु प्रदूषण – कल कारखानों व वाहनों से निकले धुँए से पूरा वायु मंडल दूषित हो गया है। सर्दी के दिनों में बड़े शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। कई प्रकार की बीमारियाँ वहाँ के निवासियों को इस कारण हो जाती हैं। अन्य कई प्रकार की गैस जो सुख सुविधा के उपयोग के उपकरणों अथवा सौन्दर्य साधनों के उपयोग से उत्सर्जित होती हैं। इन गैसों ने ओज़ोन परत को खंडित कर दिया है, जो हानिकारक अल्ट्रा वायलेट विकरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यह प्राणियों में कई रोगों का आज एक प्रमुख कारण है। बढ़ते तापमान से मानवता के नष्ट होने के खतरे से पर्यावरण वैज्ञानिक अभी से ही आगाह करने लगे हैं।
  • कचरे का ढेर – उपभोग वाद के चलते मनुष्य हर नये उत्पाद के लिये पुराने उत्पादों को कचरा समझ कर फेंक देता है। परिणाम स्वरूप पृथ्वी पर कचरे का अम्बार इकठ्ठा होता जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार २०५० तक विकास की यही गति रही तो लगभग एक तिहाई हिस्से की जरूरत केवल कचरे के लिये ही पड़ेगी। इसके अतिरिक्त समुद्र में भी हजारों टन हानिकारक कचरा हर साल डाला जा रहा है, जो समुद्री जीवों के लिये घातक है। अन्धाधुन्ध उपग्रह प्रक्षेपण के चलते वायुमंडल भी एक कचरा घर बनने की ओर अग्रसर है।
  • प्रदूषित खाद्य पदार्थ – खाद्यान्नों व फल सब्जियों को बीमारी व कीड़ों से बचाने के नाम पर कीट नाशकों के बढ़ते प्रयोग ने इनको मनुष्य के लिये ही जहर तुल्य बना दिया है। स्वस्थ भोजन के नाम पर आर्गिेनिक खाद्य पदार्थों का प्रचलन डेढ़ से दो गुने दामों पर आजकल तेजी से बड़ रहा है। इसके अतिरिक्त फल सब्जियों में कृतिम वृद्धि के लिये रसायनों का उपयोग मानव स्वास्थ के लिये खतरा बनता जारहा है। आजकल अधिक पैदावार व अन्य लाभों के लिये अनुवाशिक तरीके से सुधारे बीजों का बढ़ता प्रचलन मानव पर कैसा प्रभाव डालता है ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।

आखिर क्या कारण है कि मनुष्य इतना बुद्धिमान होते हुए भी प्रकृति के विरुद्ध जाकर विनाश की ओर बढ़ते अपने कदमों को विराम क्यों नहीं दे पा रहा है? इसका एक मात्र कारण है लालच। लगभग विश्व की हरएक सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिये बड़े बड़े उद्योग समूहों पर निर्भर है। उनके लिये ऐसा कोई भी कानून बनाना जो इन उद्योग समूहों के विकास में रोड़ा बने ये स्वयं के पैरों पर कुठाराघात के समान है। पर्यावरण बचाने के नाम पर और नये उद्योगों के लिये नये अवसर प्रदान कर अपनी आय की वृद्धि सभी सरकारें सुनिश्चित करना चाहती हैं।

संक्षेप में यदि कहा जाये कि बड़े बड़े उद्योग समूह ही विश्व की लगभग सभी सरकारों के दिशा निर्देश तय कर रहे है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।