मनुष्य एवं नशा

 

मनुष्य एवं नशे का साथ लगभग उतना ही पुराना है जितना उसका कृषि पर निर्भर होकर मैदानों में बसना। नशे का सबसे प्रथम उल्लेख वैदिक साहित्य में देवताओं के सोमरस पान के बारे में मिलता है। प्रकृति में ऐसे कई पौधे उपलब्ध हैं जिनसे नशा चढ़ जाता है अथवा जिनका प्रयोग नशीले पदार्थ बनाने के लिये किया जा सकता है। वैसे तो नशा कई अन्य प्रकार का भी हो सकता है जैसे सफलता का नशा, दौलत का नशा अथवा ताकत का नशा। फिलहाल चर्चा नशीले पदार्थों के सेवन तक ही सीमित रखेगे। यह सब जानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन हानिकारक है, विशेषकर जब तब यह आदत में शामिल हो जाये।

भारत में नशीले पदार्थों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पहली श्रेणी में ऐसे पदार्थ आते है जिनकी बिक्री की अनुमति है जैसे तम्बाखू, सिगरेट, शराब, भाँग आदि। दूसरी श्रेणी में प्रतिबन्धित पदार्थ जैसे ब्राउन सुगर, हशीश आदि। सरकार का प्रयास रहता है कि समाज को नशे की आदत से बचाये। इसके लिये पहली श्रेणी के पदार्थों पर अधिकाधिक कर लगाकर, स्वास्थ की चेतावनी उत्पाद पर छापना अनिवार्य कर अथवा दूरदर्शन एवं अन्य प्रचार साधनों द्वारा इनके दुश्प्रभावों का प्रचार कर नशे से होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक करने का प्रयास करती है। इसके अतिरिक्त परिवार एवं समाज भी नशीले पदार्थों के सेवन को मान्यता नहीं देता है। इन सब अवरोधों के बावजूद दोनों श्रेणियों के नशीले पदार्थों का व्यापार फलफूल रहा है।  २०१५ के आँकड़ो के अनुसार विश्व में प्रतिबन्धित नशीले पदार्थों का २६००० करोड़, शराब का ३००० करोड़ व तम्बाखू का ४२०० करोड़ रुपये का व्यवसाय अनुमानित है। तथा ये लगभग १५ प्रतिशत हर वर्ष बड़ रहा है। आखिर लोग नशीले पदार्थों का सेवन करते क्यों हैं?

सामान्य मान्यता के अनुसार नशा लोग अपने ग़म को भुलाने के लिये करते है। नशीले पदार्थ के सेवन से मस्तिष्क अर्धसुप्त अवस्था में चला जाता है, जिससे दुःख के अहसास में कमी हो जाती है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है इसमें अहम भूमिका निभाता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। नशीली दवायें व खुशी के भाव डोपेमाइन सिस्टम की सक्रिय होने की सीमा नीचे कर देते है जिस कारण छोटी सी बात से बहुत अधिक खुशी महसूस होती है। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरान्स लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।  इस प्रकार ऐसे व्यक्ति जिनमें भावनात्क कारणों से आक्सीटोसिन की कमी हो जाती है नशा कर  डोपेमाइन सिस्टम की सक्रियता बढ़ाकर नकली खुशी महसूस करते हैं। इसी खुशी को बार बार महसूस करने की इच्छा ही नशे की लत के लिये जिम्मेदार है।

नशे की शुरूआत किसी भी व्यक्ति में निम्न कारणों से हो सकती है।

  • बाल सुलभ उत्सुकता के चलते – बच्चे आसपास के बड़ों को जब शराब, तम्बाखू, सिगरेट आदि का उपयोग करते देखते हैं तो बाल सुलभ उत्सुकता के चलते चोरी चुपके इनका प्रयोग करने का प्रयास करते है। इनमें से अधिकतर पहली कोशिश के बाद ही अपराध बोध से ग्रसित होकर छोड़ देते हैं।
  • लड़कपन में दोस्तों के बहकावे में आकर कई बच्चे चोरी चुपके तम्बाँखू अथवा ड्रग्स के चक्कर में पड़ जाते हैं। किन्तु कुछ भावनात्मक रूप से उपेक्षित बच्चे ही इसके आदी हो सकते हैं।
  • कालेज जाने वाले छात्र विशेष रूप से संपन्न वर्ग से आये हुए अपनी अलग पहचान बनाने के लिये विभिन्न नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। इनमें से अधिकतर इसके आदी हो जाते हैं। किन्तु केवल कुछ ही अनियन्त्रित सेवन से लत के शिकार होते हैं।
  • युवा अवस्था में असफल प्रेम, मनपसन्द कार्य क्षेत्र, पारिवारिक कलह अथवा परेशानियों आदि से कुन्ठित कमजोर मानसिकता वाले लोग नशे नशे के शिकार प्रायः हो जाते हैं।
  • ड्रग्स तस्कर अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिये युवाओं को अपने जाल में फँसा कर हम उम्र युवाओं को नशे की लत का शिकार बनाते हैं।

जहाँ सीमित रूप में नशीले पदार्थों का सेवन क्षणिक आनन्द देता है। किन्तु दीर्घ कालीन कई प्रकार की बीमारियों का कारण भी बन जाता है। दुर्भाग्य से ये असर इतना धीमा होता है कि जब तक असर के लक्षण दिखाई देने लगते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। नशे की लत के शिकार लोगों बीमारी के अतिरिक्त सामाजिक निरादर, पारिवारिक अशान्ति, व जीवन से निराशा ही मिलती हैं। नशे की लत से बाहर निकलने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति व स्वजनों का स्नेह बहुत जरूरी है।

प्रायः यह देखा गया है कि सपंन्न लोग शराब का सेवन स्वयं के आनन्द के लिये नियंत्रितरूप से करते है। इसके विपरीत निर्धन व कम पढ़े लिखे लोग इसकी लत के शिकार होकर अपना व परिवार का जीवन दुर्लभ बना देते हैं।

नशीले पदार्थों के उत्पादन पर तो नियंत्रण असंभव है किन्तु परिवार व समाज चाहे तो भावनात्मक संबन्धों को मजबूत कर नयी पीढ़ी को नशे की लत से अवश्य ही बचा सकते हैं।

 

 

 

 

 

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