भारतीय किसान

 

भारत यों तो कॄषि प्रधान देश कहलाता है। किन्तु कृषि उत्पाद देश की सकल आय का मात्र १७ प्रतिशत ही है। भारत में कुल किसानों संख्या के बारे में भ्रान्तियाँ हैं। 2011 के आँकड़ों में किसानों की संख्या अलग अलग मानकों के आधार पर 8 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आँकी गई है। देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी गाँवों में बसती है। इसमें से करीब 25 प्रतिशत ही कृषि भूमि के मालिक हैं। कुल कृषि योग्य 19.4 (6.4 करोड़ हेक्टेयर सिचाँई योग्य) करोड़ हेक्टेयर भूमि में से लगभग 50 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन 15 प्रतिशत बड़े किसानों के पास है। इनमें से अधिकतर शहरों में रहते हैं एवं प्रायः इनके आय के अन्य श्रोत भी है। अतः यह कहना अधिक सही होगा कि हमारे देश में कृषि एक सबसे बड़ा असंगठित रोजगार देने वाला क्षेत्र है।

कृषकों द्वारा आत्महत्या आजकल एक चर्चित विषय है। तुलनात्मक रूप से अध्ययन किया जाये तो अन्य भारतीय लोगों की तुलना में किसानों द्वारा आत्महत्या केवल २० प्रतिशत ही है। अतः यह मानना सही होगा कि राजनीतिक कारणों से ही इस पर चर्चा अधिक होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय किसानों की कोई समस्या नहीं है। भारत ही नहीं कई अन्य देशों जैसे श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, केनेडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भी कृषि को तनाव देने वाला क्षेत्र माना है। भारत में भी किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है।

ये समस्यायें नई नही॔ हैं। भारत में किसानों की हालत एतिहासिक तौर पर दयनीय रही है। पुरातन काल में राजाओं के नुमाइन्दे जबरन कर वसूलते थे तो अंग्रेजों के जमाने में उनके कारिन्दे। साहूकार व जमींदार भी उनका जमकर शोषण करते थे। किन्तु उस कठिन समय में भी मेहनत मजदूरी कर अपना परिवार चला ही लेते थे।

स्वतन्त्रता के बाद भी ओद्योगिक विकास के चलते आरम्भ में इस ओर विशेष ध्यान नीं दिया गया। किन्तु  कुछ अकालों व निम्न गुणता वाले खाद्यान्न आयात करने के बाद इस क्षेत्र के विकास की ओर सरकार का ध्यान गया। कृषि तकनीकी संस्थान द्वारा विकसित बीज, रसायनिक खाद, कीट नाशक दवाओं, सिंचाई के साधन में वृद्धि  व कृषि आय को कर मुक्त कर देने से हरित क्रान्ति लाने का दावा भी किया गया। किन्तु इन सबका लाभ चंन्द बड़े किसानों व बाजार व किसानों के बीच के दलालों को ही पहुँच सका। छोटे किसानों स्थिति में बहुत अधिक अन्तर नहीं आया। गिरते राजनीतिक स्तर व स्वार्थ ने छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकार की दया पर निर्भर अधिक बनाया। कई मददकारी पहलों का लाभ किसानों को कम व सरकारी तन्त्रों को अधिक मिला।आर्थिक विषमता तथा नव धनाड्यों के प्रदर्शन करने वाली जीवन शैली ने छोटे किसानों के परिवार के कई युवाओं में महत्वाकांक्षा व लालच के चलते कर्ज के चंगुल में फंसा दिया जिसकी परिणीति आत्महत्या होने लगी।

आंकड़ों के हिसाब से देखा जाये तो 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की जबकि सबसे अधिक आत्महत्या 2004 में 18241 किसानों ने की थी। 2016में यह संख्या 6667 व 2017 में 17 जून तक संख्या 186 है। इससे यह निर्णय करना कठिन नहीं है कि वर्तमान आन्दोलन राजनीति से प्रेरित है। समाचारों में दिखाये किसानों को देखकर भी नहीं लगता है कि यह आन्दोलन गरीब किसानों के लिये है।

यदि हमें वास्तव में किसानों की भलाई के बारे में सोचना है तो राजनीतिक चश्में को उतार कर छोटे किसानों व खेतिहर मजदूरों की मूल समस्या पहचान कर उनका निदान करना होगा।

  • सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरत मंदों को नहीं – अधिकतर सरकारी योजनाओं का लाभ बड़े किसानों को मिलता है। अतः इन्हें बन्द कर कृषि व्यवसाय को एक उद्योग का दर्जा देकर बड़े (10 हेक्टेयर से अधिक ), मध्यम (2 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर तक ), लघु (1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर तक ) व अति लघुश्रेणी ( 0.5 हेक्टेयर से कम ) में कृषि भूमि के आधार पर बाँट देना चाहिये। बीज, खाद, सिंचांई साधन व कीट नाशक पर सब्सिडी केवल लघु व अति लघु श्रेणी के लोगों को ही दी जाये।
  • २. कृषि उत्पाद की लागत – मीडिया में प्रायः दिखाया जाता है कि किसानों को अपने उत्पादों के सही दाम नहीं मिलते। सरकार द्वारा न्यूनतम मूल्य में खरीददारी में भी कठिनाईयों व घोटालों की खबर आती रहती है। इसके अतिरिक्त भंडारण में टनों खाद्य उत्पाद नष्ट होने की खबरें हर साल आती रहती हैं। इन सब समस्याओं के मूल मे उत्पाद से शीघ्रातिशीघ्र कीमत वसूलना है। इसका सीधा समाधान यह है कि बड़े व मध्यम किसानों को अपना उत्पाद स्वयं की सुविधा अनुसार खुले बाजार में बेचने दिया जाये। लघु व अतिलघु श्रेणी के किसानों से सरकार सिर्फ खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक मात्रा में ही उत्पाद खरीदे। शेष उत्पाद के लिये पंचायत के संरक्षण में उचित भंडारण सुविधा में बैंक को उत्पाद बन्धक रखकर ऋण लेने  की सुविधा प्रदान कर सकती है। धीरे धीरे भंडारित उत्पाद को उचित दाम पर पंचायत द्वारा बाजार में बेचकर हिसाब किया जा सकता है। इसके लिये पंचायतों का बैंक के साथ उचित समझौता व पंचायतों को साधन संपन्न बनाना व प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • स्थानीय मूल्यवर्धन – गाँवों में कृषि कार्य साल के कुछ महीनों में ही रहता हैं। अतः श्रमशक्ति का भरपूर उपयोग नहीं हो पाता है। यदि संगठित तरीके से स्थानीय उत्पादों के मूल्य वर्धित उत्पादों को बनाने व विक्रय के लिये संसाधनों को विकसित किया जाये तो स्थानीय आय में काफी इजाफा हो सकता है। यह गाँवों से पलायन, गरीबी उन्मूलन व गाँव वासियों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकता है। यह राज्य स्तर पर सहकारी संगठन गठित कर उसके द्वारा संचालन द्वारा संभव है। खादी एवं ग्रामोद्योग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • उचित शिक्षा – गाँवों में माध्यमिक स्तर तक सामान्य शिक्षा के साथ स्थानीय क्षेत्र में संभावित आय के साधनों एवं संभावनाओं का भी अध्ययन कराया जाये। इच्छुक युवाओं को स्थानीय उद्योगों के विकास के लिये प्रशिक्षित किया जाये। तथा स्थानीय उद्योगों को स्थापित करने के लिये तकनीकी व आर्थिक सहायता दी जाये। इन उत्पादों के लिये बाजार विकसित करने का संगठित प्रयास किया जाये।

 

 

 

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