इस्लाम व आतंक

 

वैसे तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। ना ही कोई धर्म आतंकवाद का समर्थन करता है। किन्तु पिछले करीब डेढ़ दशक से जिस तरह से कई इस्लामिक संगठन आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होकर एक संगठित रूप से पूरी दुनिया को अपना निशाना बना रहे हैं, यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर ऐसा क्यों है?

कोई भी व्यक्ति अथवा संगठन तभी आक्रामक होता है जब उसे इतना अन्याय व शोषण झेलना पड़े कि  उसकी सहन शक्ति बर्दाश्त न कर पाये।

यदि इस्लाम की उत्पत्ती से अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो पायेगें की इस्लाम धर्म अनुयायी हमेशा ही कट्टर धार्मिक रहे हैं व इसके प्रचार को धर्म का ही हिस्सा मानते है। इसी कारण जहाँ कहीं भी ये अनुयायी आक्रमक बन कर विजयी हुए बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन कराया।  इस हिसाब से प्रायः दूसरे धर्मावलम्बी ही इनके द्वारा सताये गये। स्वभाविक विरोध स्वरूप कुछ सीमा तक इन अनुयायियों को भी मुश्किलों का सामना अवश्य ही करना पड़ा होगा किन्तु एक सीमित दायरे में ही। अतः सताया जाना इस तरह के उन्माद का कारण नहीं हो सकता।

हम यदि मानव इतिहास में झांके तो पायेगें कि लगभग हर काल में कुछ दुष्ट प्रकृति के खल नायक हुए हैं। उदाहरण स्वरूप रावण, कंस, हिटलर, स्टटालिन आदि के नाम दिमाग में आते हैं। किन्तु ये एक व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में फला फूला आतंक था जिसका अन्त उसके साथ ही हो गया। इसे उस व्यक्ति विशेष के विकृत मस्तिष्क का परिणाम माना जा सकता है।

इसके विपरीत आज का इस्लामिक आतंकवाद कई अलग अलग संगठनों द्वारा संचालित है जो नियोजित तरीके से आर्थिक, राजनीतिक, व सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति से प्रेरित हैं। इससे निपटने के लिये इसके मूल में निहित कारणों को समझना आवश्यक है।

इन कारणों को समझने के लिये हमें पिछले कुछ दशकों में हुए विश्व की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव को समझना जरूरी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व का राजनीतिक ध्रुविकरण हुआ। अमेरिका व रूस दो महाशक्ति के रूप में उभरे। दो विश्व युद्धों के लिये विकसित हथियार एक लाभकारी व्यवसाय बन गया। इसमें आगे मारक क्षमता व शक्ति के  विकास के लिये बड़ा निवेश किया गया।  संचार व यातायात के साधनों के विकास ने विश्व को एक दूसरे से जोड़ दिया। छोटी बड़ी कहीं भी घटी घटना की प्रतिक्रिया हर कोने में होने लगी। एक महाशक्ति के वर्चस्व बढ़ाने के प्रयास को दूसरी महाशक्ति ने रोकने के लिये कदम उठाना लाजिमी समझा। परिणाम स्वरूप मुस्लिम बाहुल्य मध्य एशिया में पश्चिम की दखलअंदाजी बढ़ने लगी। इसका असर वहाँ की युवा संस्कृति पर पड़ने लगा। धार्मिक व सामाजिक नेताओं को यह परिवर्तन स्थानीय संप्रभुता एवं संस्कृति में अवान्छित हस्तक्षेप लगा। संस्कृति को बचाने के लिये विशेष स्कूल(मदरसे) खोले जहाँ धार्मिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाने लगा। अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी इस्लामिक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये मदरसों के लिये आर्थिक मदद उपलब्ध कराई गई।

महा शक्तियों के प्रभाव से कई पड़ोसी देशों में उभरे मतभेदों ने आपसी युद्ध की स्थिति की स्थिति पैदा कर दी। युद्ध में दोनों महाशक्तियों ने भी परोक्ष रूप से हिस्सा लिया। इस कारण लम्बे समय तक इस क्षेत्र में अशांत वातावरण रहा। हस्तक्षेप के कुछ आर्थिक कारण भी रहे होगें। कुछ उग्र स्वभाव के विचारकों को महाशक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं हुआ तथा बदला लेने के लिये संगठन बनाने की शुरुआत हुई। क्योंकि सीधी लड़ाई संभव नहीं थी, इस कारण आतंक फैलाकर इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करने का निश्चय किया गया। राजनीतिक संरक्षण व अनैतिक तरीकों से धन कमाने वाले संगठनों की आर्थिक सहायता के चलते ये संगठन फलने फूलने लगे। मदरसों से निकले कट्टर अनुयायियों के लिय प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये। आतंक को प्रभावी बनाने के शोध केन्द्र स्थापित किये गये। समय के साथ अन्य देशों ने भी पड़ोसी देशों से छद्म युद्ध के लिये इनकी सेवायें लेना आरंम्भ कर दी। शीघ्र ही यह व्यवसाय बन गया और कई समानान्तर संगठन स्थापित हो गये।

पीड़ित देशों की मदद को आगे बडे़ देश भी इन आतंकी संगठनों के निशाने पर आने लगे। बड़ती शक्ति के चलते इन संगठनों व इनके संरक्षकों को पूरे विश्व के इस्लामीकरण की संभावना नजर आने लगी। कुछ राजप्रमुखों व आतंकी संगठनों ने इस संभावना को व्यवहारिक रूप देनें के लिये संयुक्त प्रयास भी आरंभ किये। इन प्रयासों में अन्य देशों में प्रक्षिशित प्रतिनिधियों को भेज कर प्रचार प्रसार का आधार तैयार करना व नये स्थानों पर उपनिवेश बसाना। यह अनैतिक व्यवसाय फैलाने का एक साधन भी सिद्ध हुआ। इस्लामीकरण के विस्तार के विरोध में उठे स्वरों को भी आतंक से दबाने का प्रयास किया गया। आज यह एक उन्माद का स्वरूप ले चुका है, जिसके किसी भी कृत्य को किसी भी मानव विचार धारा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता है। यह मानव का सबसे घिनौना स्वरूप बन चुका है।

इससे निपटने के लिये:-

  1. सबसे पहले मदरसों को बन्द करना जरूरी है अथवा इन्हें पारदर्शी बनाने के लिये सबके लिये खोल दिया जाये। अलग अलग धर्मों की शिक्षा सामान्य शिक्षण संस्थाओं में सबके लिये पारदर्शी तरीके से स्वेच्छा से उपलब्ध कराई जा सकती है।
  2. प्रशिक्षण केन्द्रों को सख्ती से नष्ट करने की जरूरत है।
  3. सभी आतंक के सभी स्वरूपों पर यू एन में नकारा जाये। आतंक को किसी भी रूप में सहायता करने वाले देशों का बाकी सभी सदस्य देश बहिष्कार करें। सुरक्षा परिषद का इस विषय में कोई दखल न हो।
  4. आतंक को समाप्त करने के लिये यदि कोई देश सहायता चाहे तो यू एन प्रभावी सहायता उपलब्ध कराये। खर्च राशि न दे पाने की स्थिति में मदद देश की आर्थिक स्थिति के अनुरूप ऋण अथवा सहायता के रूप।
  5. किसी भी प्रकार के आतंक में कोई भेदभाव न किया जाये।
  6. यथासंभव शस्त्रों के उत्पादन व बिक्री को नियंत्रित किया जाये।

 

 

 

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