फर्ज़ या आत्मतुष्टि

 

चालीसवें दशक अथवा उससे पहले पैदा हुअे बच्चों को सादा जीवन जीने व संतोष करने का पाठ मानों घुट्टी में पिला कर बड़ा किया जाता था। समय के साथ संम्पन्नता व बढ़ती सुविधाओं के कारण जीवन शैली में बदलाव अवश्य ही आये। पर  उनमें से अधिकतर आज भी सादा जीवन शैली को अपना आधार मानते है। वे फिजूल खर्ची से बच कर प्रायः भोग विलासिता से दूर रहने का प्रयास करते हैं।

७० के दशक के बच्चों को तुलनात्मक रूप से बेहतर परवरिश अवश्य ही मिली। किन्तु सादगी व मितव्ययता तब भी अवश्य ही सिखाई गई। प्रायः बच्चे माता पिता के साथ अपनी बात निडर होकर रख सकते थे। इस कारण आपसी निकटता पुराने समय से अधिक थी। सीमित होता परिवार भी इसका एक कारण हो सकता है। अधिकतर ये बच्चे अतः अपने से अलग रह रहे माता पिताओं से भावनात्म रूप से निकटता से जुड़े है। तथा सतत संपर्क बना कर कुशल क्षेम पूछते रहते हैं। यह निश्चय ही अलग रह रहे माता पिताओं के लिये बच्चों की निकटता का अहसास कराता है तथा आवश्यकता पढ़ने पर सहारे का भरोसा दिलाता है। यह सहारा उन्हे अकेले होने का अहसास नहीं होने देता है व वे आराम से अपने जीवन को स्वेच्छा जी पा रहे हैं।

इसी बीच अधिकतर बच्चों ने आर्थिक प्रगति कर उच्च वर्ग की जीवन शैली अपना ली है। बच्चों का सुख संपन्न जीवन माता पिताओं के लिये अवश्य ही प्रसन्नता का विषय है। किन्तु बच्चे जब माता पिता के घर जब कुछ समय बिताने आते है तो उन्हें उनका रहन सहन काफी निम्न स्तर का लगता है। सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। यह एक प्रकार का अपराध बोध सा महसूस करते हैं। तथा परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अपने जैसी सुख सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। एक और जहाँ यह संतोष का विषय है कि बच्चे अपने माता पिता के बारे में सोचते हैं। वहीँ दूसरी ओर उनकी मान्यता से अलग होने से प्रायः ये अतिरिक्त सुविधायें उचित उपयोग में नहीँ आ पाती है। कुछ सीमा तक माता पिता के लिये यह असुविधा जनक भी हो जाता है।

यह समझ पाना मुश्किल है कि इसे बच्चों का अपने माता पिता के प्रति फर्ज़ माना जाये उनके लिये अपनी आत्मतुष्टि।

 

उलझन

गहरी सोच में डूबी अनामिका शायद अपनी जिन्दगी का हिसाब मन ही मन लगा रही थी। चेहरे पर छाया अवसाद व आँखों में छायी उदासी से लग रहा था मानों खुशियों ने साथ वर्षों पहले छोड़ दिया हो। अचानक दरवाजे की घन्टी बजी देखा तो पति सोमेश काम से लौट आये। खुले दरवाजे से बिना कुछ बोले, सर झुकाये अन्दर चले गये। अनामिका इसकी अभ्यस्त थी, उसने दो कप चाय बना कर एक कप बैठक में पति के लिये रख दिया व दूसरा स्वयं लिये डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। थोड़ी देर में बिटिया विनीता काम से लौटी व सीधी अपने कमरे में चली गई। उसे कमरे में चाय देकर अनामिका रात के भोजन की तैयारी में जुट गई। रात को खाने पर भी आपस में तीनों के बीच कोई बात नहीं हुई। बेटा सौरभ विदेश में है व माह में एक आध बार फोन पर हाल चाल पूछ लेता है।

किन्तु पहले ऐसा नहीं था। पाँच बहनों और दो भाईयों में घर में सबसे छोटी होने के कारण सबके लाड़ प्यार में वह पली बड़ी। बिना दहेज के ब्याह कर ससुराल इस आशा से आई कि परिवार में सबकी सेवा कर दिल जीत लेगी । गृह विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई घर चलाने में काफी सहायक सिद्ध हुई। पहले सौरभ फिर विनिता ने आकर उसके जीवन में अपार खुशियाँ भर दी।वह अपने को सौभाग्यशाली समझने लगी। शादी के २० वर्ष मानों पंख लगाकर उड़ गये।

अचानक मानों परिवर्तन की धीमी बयार ने जैसे जीवन की नौका को झकझोरना शुरू कर दिया। बच्चे बड़े होकर अपने हम उम्र मित्रों में व्यस्त रहने लगे। पति कार्य की अधिकता के चलते अथवा पुराने मित्रों के साथ समय बिताने के बहाने अधिक समय बाहर ही बिताने लगे। घर आने पर चुपचाप खाकर सो जाना। देरी से आने का कारण पूछने पर काम के बोझ का बहाना। सभी की उपेक्षा ने मन में संशय के बीज बो दिये। अधिक बार पूछताछ करने पर वहम की बीमारी के बहाने डाक्टर से इलाज के नाम पर सेडेटिव्स दिये जाने लगे। परिणाम स्वरूप आपसी वाद विवाद कब झगड़ों में बदल गया पता नहीं चला। सुस्ती, शंका व परिवार से कटने के तनाव ने उसके विवेक को प्रभावित किया नतीजतन उसके व्यवहार में एक चिड़चिड़ापन आने लगा। समय के साथ इलाज का स्वरूप मानसिक रोग के इलाज में बदल गया।

पति के अपने पर्यटन संबन्धी व्यवसाय के चलते विकसित वाक्चातुर्य से आसपड़ोस व परिवार में सभी को मानसिक रोगी होने व मनोचिकित्सक से इलाज चलने के बारे में आश्वत कर दिया। परिणाम स्वरूप सभी ने संशय भाव से दूरी बना ली। संबन्धियों से बातचीत समझाइश अथवा सहानुभूति तक सीमित रह गई। आरम्भ में अपनों से क्रोध मिश्रित व्यथा को बाँटने के प्रयास भी किये। किन्तु पति के पास समझाने के लिये तिल को ताड़ बनाने जैसे कई उदाहरण थे। परिणाम स्वरूप करीब करीब सभी ने उसके मानसिक रोग को स्वीकार लिया। परिस्थितियों के इस मकड़जाल में फँसी वह बच्चों के ३० वर्ष पार करने के बाद भी विवाह के लिये राजी न होने के लिये स्वयं को जिम्मेदार मान वह स्वयं को भी मानसिक रोगी मानने को विवश है।

इस इन्तजार में कि कोई चमत्कार शायद उसे इस उलझन से बाहर निकाल पाये।