महिलाओं की सुरक्षा

 

कुछ वर्ष दिल्ली में हुए दिल दहला देने वाले हादसे पर पूरा देश हतप्रभ था । सभी संवेदनशील लोग अलग अलग तरीके से अपनी नाराजगी व गुस्सा जाहिर कर रहें थे। राजनीतिक, सामाजिक स्तर व दूरदर्शन पर लगातार इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिये कठोर कानून व दोषियों को कठोर दण्ड के प्रावधान करने के लिये दबाव बनाया जा रहा था। लोग कई दिनों तकसे सड़कों पर उतर आये थे।

इन सब के बीच लगातार महिला वर्ग की अस्मिता पर हमले जारी हैं। इसलिये जरूरी है कि समस्या के मूल में जाकर इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया जाये।

महिलाओं व पुरुष का आपसी आकर्षण प्राकृतिक है। समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये अलग अलग समय पुरुषों व महिलाओं पर कई प्रकार की बन्दिशें लगाइ जाती रही हैं। इन बन्दिशों के कारण आज से कुछ दशाब्दियों पहले तक काफी हद तक समाज अनुशासित रहा। यदाकदा अपवाद स्वरूप यदि कोई घटना सार्वजनिक होती तो समाज के मान्य प्रतिनिधि जैसे पंचायत तुरन्त ही दोनों पक्षों को सुन कर दोषी को दण्डित कर देते थे। इससे भी अधिक दण्ड होता था दोषी को समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखना। सामाजिक बन्धन इतना प्रगाढ़ होता था कि समाज की नजरों में गिरना न सिर्फ दोषी बल्कि उसके परिवार वालों को भी मृत्यु से भी अधिक भयभीत करने वाला लगता था। यही भय लोंगों को अपने बच्चों को अनुशासन में रखने के लिये प्रेरित करता था। यह व्ववस्था लगभग पूरे विश्व में लागू थी। इस संदर्भ में समाज का अर्थ स्थानीय समाज यथा मोहल्ला, बस्ती अथवा गाँव अधिक सटीक बैठता है।

इस व्यवस्था की सफलता के मूल कारण के बारे में यदि हम ध्यान दें तो वे थे –

1 समाज में प्रतिष्ठा बनाये रखने की आवश्कता महसूस करना।

2 समाज में एक दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्कता।

3 परिवार में एक मुखिये का होने व अन्य सदस्यों का उस पर निर्भर होना।

4 धर्म में आस्था व अधर्म करने पर भगवान द्वारा दण्डित होने का डर।

5 शिक्षा में अनुशासन पर जोर।

6 धर्म व समाज में सदाचरण पर जोर।

7 समाज में अनुशासित लोगों का सम्मान।

इस व्यवस्था पर राजाओं, नवाबों व अंग्रेजों के शासन काल तक बहुत विशेष अंतर नहीं आया अतिरिक्त इसके कि कुछ शक्ति संपन्न लोग स्वेच्छारी हो गये तथा स्त्रियों पर जोर जबरजस्ती करने लगे। परिणाम स्वरूप निःसहाय समाज ने महिलाओं पर घर से बाहर अकेले निकलने पर बन्दिश लगा कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया। इसके बाद सामाजिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया वह था प्रजातन्त्र की स्थापना। लोगों को सरकार में अपने प्रतिनधि चुनने का अधिकार मिला। हर व्यक्ति अपने को शक्ति संपन्न समझने लगा। प्रजातन्त्र ने लोगों को स्वाधीनता अथवा स्वतन्त्रता के सुख को महसूस कराया। लोगों में आत्म विश्वास जागा और प्रगति की रफ्तार तेजी से बढ़ने लगी। धीरे धीरे लोग सामाजिक बन्धन को परतंत्रता समझ कर उससे भी मुक्त होने का प्रयास करने लगे। इन सब प्रयासों में स्वतन्त्रता कब स्वच्छन्दता में बदलने लगी यह कुछ लोगों को ही शायद समझ में आया। ऐसे लोगों की चेतावनी नक्कार खाने में तूती की आवाज सी दब गई। परिणाम स्वरूप सामाजिक व्यवस्था विकृत होने लगी। कुछ लोग अलग से शक्ति के केन्द्र बन कर उभरने लगे। ये शक्ति केन्द्र प्रायः कुछ राजनेता, बाहुबली, साधन संपन्न लोग अथवा धर्म गुरुओं के आस पास उभरे। ये शक्ति केन्द्र गैर कानूनी तरीके अपना कर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने लगे। अपने प्रभाव के बल पर ये कानून को खरीदने अथवा सबूतों को खत्म करने में सक्षम थे। अतः ये अपने को कानून से ऊपर मानने लगे। अपने विरोध में उठने वाली आवाजों को दबाने के लिये इन लोगों ने अपना

   भारत में शिक्षा समस्यायें व समाधान

                 

यह एक दुःखद स्थिति है कि विश्व में एक समय शिक्षा का समृद्ध केन्द्र माने जाने वाले भारत में शिक्षा की हालत दयनीय है।

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजो की देन है। उनका प्रमुख उद्देश्य युवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना था जिससे वे निष्ठा पूर्वक सरकार की सेवा कर सकें। अतः उनका मुख्य उद्देश्य उनको एक कार्य विशेष के योग्य बनाना था, जो वे जीवन पर्यंत करते रहें। उदाहरण स्वरूप कोई जीवन भर इन्जीनियरिंग, डाक्टर,  वकील अथवा लेखा जोखा करने का काम करेगा। स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयास अवश्य ही किये गये। लेकिन ये प्रयास जैसे यूनिफार्म लागू करना, मध्यान्ह भोजन देना अथवा १०वीं तक बच्चों को फेल नहीं करना सिर्फ अलंकिृत करने जैसे ही माने जाने चाहिये। इससे गुणता में कोई सुधार नहीं आया। एनसीइआरटी द्वारा प्रकाशित अधिकतर पुस्तकें समझने में बच्चों के लिये पहले की अपेक्षा कठिन लगती है। आज सरकारी स्कूल संसाधन की कमी, खराब परीक्षाफल व शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य शासकीय सेवाओं में व्यस्त रखने के लिये अधिक जाने जाते हैं।

इसका परिणाम यह है कि आज निम्न मध्यम वर्ग भी अपने बच्चों को सामर्थ से अधिक फीस देकर निजी स्कूलों में भर्ती करना चाहता है।

अधिकतर निजी संस्थान व्यापार केन्द्र बन चुके हैं। फल स्वरूप राजनेता व उद्योगपतियों का निजी क्षेत्र में लगभग एकाधिकार है। इनका विकृत रूप कोचिंग संस्थानों के रूप में उभर आया है।

इस परिस्थिति के कारणों को खोजने का प्रयास करे तो हमें ये मौलिक कारण मिलेंगें।

१. शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटकना –

वास्तव में देखा जाय तो शिक्षा शब्द का चयन ही गलत है। हमारे मनीषियों ने इसे विद्या ग्रहण करना माना था। उन्होंने इसका उद्देश्य इस श्लोक में सटीक वर्णित किया है।

विद्या ददाति विनयं, विनयाति याति पात्रताम्,

पात्रतात धनमापनोति , धनात  धर्मं ततः सुखम्।

संक्षेप में विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धर्म व सुख मिलते हैं।

मूलतः विद्या हम ग्रहण करते हैं व शिक्षा दी जाती है। स्वेच्छा से ग्रहण की गई ही विद्या है। आज शिक्षा ज्ञान अर्जन के उद्देश्य से भटक कर प्रमाण पत्र व उपाधि अर्जन के मोहजाल में उलझ गई है। इसका सीधा असर देश का भविष्य कहलाने वाले लगभग ३० प्रतिशत बच्चों व युवाओं पर पढ़ता है।

२. स्कूल व उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश –

यह हास्यास्पद स्थिति है कि एक ओर तो स्कूली शिक्षा को आवश्यक किया हुआ है वहीं दूसरी ओर प्रवेश के लिये सबसे निचली कक्षा के लिये भी बच्चों का चयन किया जाता है। यह भी हास्यास्पद है कि कई उच्च शिक्षण संस्थान नियमित शिक्षण आकलन को मानक नहीं मानकर अलग से परीक्षा के आधार पर प्रवेश देती हैं। परिणाम स्वरूप कोचिंग का व्यापार फल फूल रहा है।

३. शिक्षण खर्च का एक छोटा हिस्सा ही शिक्षा खर्च-

सभी शिक्षण संस्थाओं में अन्य प्रभारों के कारण शिक्षा पर कुल शुल्क का सिर्फ १५-२० प्रतिशत ही वास्तव में शिक्षा पर खर्च हो पाता है। बस, पुस्तकों, यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन आदि खर्चे तुलनात्मक रूप से अधिक हैं।

४. स्कूल की दूरी

बच्चों को प्रायः विशेष कर निजी स्कूलों के दूर होने के कारण आने जाने में २-२.३० घन्टे का समय व्यर्थ व थका देने वाला होता है।

५. परीक्षा का मानसिक दबाव

अच्छे नम्बर की होड़ ने परीक्षा को विद्यार्थी के ज्ञान अर्जन का अनुमान लगाने के साधन न होकर एक प्रतियोगिता बना दिया है। जिससे किसी भी प्रकार से दूसरों से आगे निकलने की भावना प्रबल हो गई। परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से गलत उपाय अपनाये जाने लगे। फलतः परीक्षाफल की विश्वसनीयता ही समाप्त हो गई। पुनर्मूल्याकंन परीक्षाओं के चलन ने प्रतियोगिता संस्कृति को और बढ़ावा दिया, जिससे कोचिंग व्यवसाय चल निकला।

६. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा

कुछ शहर व कस्बों के स्कूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो अधिकतर सरकारी स्कूल दुर्व्यवस्था व भ्रष्टाचार के चलते बीमार हालत में ही हैं।

७. शिक्षण लाभ का व्यवसाय

उपरोक्त कारणों ने शिक्षण को एक लाभप्रद व्यवसाय बना दिया। शिक्षा के विस्तार के नामपर निजी संस्थानों को लुभाने के लिये इस क्षेत्र की आय को कर मुक्त घोषित किया गया। फलतः राजनेता व उद्योगपतियों ने इसे अपना गढ़ बना लिया।

पता नहीं स्थिति का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों को ये समस्यायें क्यों नहीं दिखती?

इन मूल समस्याओं से उबरने के लिये शिक्षण व्यवस्था में बड़े व मूल भूत सुधार की जरूररत है। नीचे दिये सुझाव शिक्षा को पुनः ज्ञान अर्जन का साधन बनाने में सहायक हो सकते हैं।

  • पाँच साल तक बच्चों को किसी भी प्रकार के स्कूल में नहीं भेजा जाय। केवल सीमित समय ही टीवी या अन्य उपकरणों के लिये निर्धारित किया जाये। बच्चों में बाहर खेलने व आपस में मिलने जुलने की आदत डालें। प्रेरक कहानियाँ सुनायें। चीजों को साझा करना सिखायें। नौकरी पेशा माता पिताओं के लिये यही सुविधा झूलाघरों में हो।
  • पाँच वर्ष की उम्र में बच्चों को पहली कक्षा में स्कूल में बिना किसी चयन प्रक्रिया के लिया जाये। कक्षा ५ तक मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्माण व भाषा एवं अंक ज्ञान हो। होमवर्क न देकर पुस्तक पठन को प्रोत्साहन दिया जाये। तथा बच्चों की रुचि जानने का प्रयास किया जाये। कम से कम १५ मिनट सामूहिक व्यायाम अवश्य ही करवाया जाये। छोटे व सरल सृजन कार्य करवाये जायें। परीक्षा न लेकर आकलन रिपोर्ट तैयार की जाये। कुल स्कूल समय ४ घन्टे से अधिक न हो।
  • कक्षा ५ से ८ तक भाषा व गणित के साथ अन्य विषय ज्ञान व एक अन्य भाषा जोड़ सकते हैं। विभिन्न प्रकार की कला में कार्य करने का बच्चों को अवसर देकर रुचि का आकलन किया जाये। बच्चों के लिये आगे के लिये संभावित क्षेत्र का आकलन किया जाये। जिला स्तर पर कक्षा ८ की परीक्षा ली जाये। अन्य परीक्षा स्कूल स्तर पर हों। अधिक से अधिक बच्चों को विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर प्रदान किये जायें। स्कूल का कुल समय ६ घन्टे से अधिक न हो। होमवर्क केवल कला संबन्धित कार्य हो।
  • कक्षा ८ के बाद से कुशलता कार्यक्रमों की शुरुआत भी की जाये। जिससे छात्र आगे पढ़ाई अथवा कुशलता में से एक अपनी पसंद अनुसार चुन सकें। कुशलता कार्यक्रमों में उद्यमिता व स्वव्यवसाय स्थापना पर बल दिया जाय। कुशलता कार्यक्रमों से भी उच्च व्यवसायिक शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश का प्रावधान हो।
  • निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के शिक्षण पर प्रतिबन्ध हो। किन्तु निर्धारित कार्यक्रमों में प्रवेश पर उम्र का बन्धन न हो ताकि सभी अपनी योग्यता में सुधार कर सकें।
  • परीक्षाफल में अंकों के अतिरिक्त संक्षिप्त चरित्र वर्णन भी शामिल हो। गलत साधन का प्रयोग दण्डनीय अपराध हो। एक कक्षा में ४० से अधिक बच्चे न हों।
  • सभी निर्धारित कार्यक्रमों के लिये अधिकतम फीस निश्चित की जाये। अन्य किसी प्रकार का शुल्क न लिया जाय।
  • नौकरी के लिये सिर्फ शैक्षणिक योग्यता चयन का आधार हो। अधिकारी वर्ग के लिये इन्टरव्यू लिये जा सकते हैं।
  • सभी स्तर के अध्यापकों को समाज में आदर दिलाने के लिये उन्हे विशेष सामाजिक सुविधा दी जाये। शिक्षण आवश्यक सेवा घोषित की जाये ताकि शिक्षकों से अन्य सेवायें न ली जा सकें व वे हड़ताल पर भी न जा सकें। शिक्षकों के चयन का आधार पढ़ाने में रूचि व चरित्र मुख्य रूप से हो।

उपरोक्त प्रयत्नों से शिक्षा व्यवस्था को ज्ञान अर्जन के साथ एक अच्छा नागरिक बनाने का माध्यम बनाया जा सकता है।