एक आम भारतीय की व्यथा

मैं यदि अपने आप को एक आम भारतीय कहूँ तो मेरे ख्याल में किसी को भी किसी प्रकार का एतराज नहीं होना चाहिये। मैंने अपना लगभग 70 सालों के जीवन के हर साल को एक आम भारतीय की तरह से ही जिया है। एक आम भारतीय परिवार में 7 भाई बहनों में मेरा जन्म हुआ। छोटे छोटे कस्बों की धूल भरी गलियों मे खेल कूद कर मैंने अपना बचपन बिताया। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की। किशोर अवस्था में अनाज, राशन व बीमार होने पर सरकारी अस्पताल की लाईनों में एक आम आदमी की तरह खड़ा रहा। मास्टर जी से पिटाई, थोड़ी सी गलती पर बड़ों से डाँट सब कुछ तो आम था। किस्मत ने मेहरबान होकर इन्जीनियर बना दिया। लेकिन इसमें भी कोई नयी बात नहीं है बहुत से आम भारतीय पहले भी और बाद में भी इन्जीनीयर किस्मत के बलबूते इन्जीनीयर बनते रहें हैं। आज भी मैं नगरपालिका में सम्पत्ति कर देने के लिये तो कभी बिजली का बिल भरने के लिये व बीएसएनएल में टेलीफोन का बिल देने के लिये व ऐसी ही कई अन्य जगह लाईन में लगा अन्य आम भारतीयों से सामाजिक संम्पर्क बढ़ाते हुए दिख जाता हूँ। मेरे एक आम भारतीय साबित होने के लिये इतना पर्याप्त है।
हाँलाकि मैंने जन्म तो गुलाम भारत में ही लिया, लेकिन समझ स्वतन्त्र भारत में ही आई। बचपन में स्कूलों में देश के आजाद हो जाने के लाभ घुट्टी की तरह पिलाये गये। अतः जरूरी था कि मैं स्वतन्त्र देश का एक आम नागरिक होने पर गर्व महसूस करूँ। जी जान से एक अच्छा नागरिक बनने के लिये जो भी स्कूलों में सिखाया गया था उसका पालन करने की कौशिश की। यह प्रयास आज भी उसी उत्साह के साथ जारी है। वयस्क उम्र में पहुँचते ही हर चुनाव में अपना दायित्व पूरा करने प्रायः सबसे पहले ही पहुँच जाता हूँ। अपने पसन्दीदा उम्मीदवार की जीत से खुश व हार से मायूस हो जाता हूँ। समय पर सब तरह के टेक्स व प्रायः बिना बिल के कोई बड़ा खर्चा नहीं करता हूँ, ताकि मैं देश की प्रगति में किसी प्रकार का बाधक नहीं बनूँ।
पिछले बीस वर्षों तक तो मुझे अपनी शिक्षा की यथार्थता पर काफी गर्व भी था कि वाकई जो भी सिखाया उसके अनुसर देश वास्तव में तेजी से तरक्की कर रहा है। देश के आजाद होने का लाभ भी आम लोगों तक पहुँच रहा है। हम हर क्षेत्र में आत्म निर्भर हो रहें है। आम भारतीय की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है। जब देश के नेतागण भाषण में बोलते थे कि भारत ने इतनी तरक्की कर ली है कि हर भारतीय सर उठा कर कह सकता है कि मैं भारतीय हूँ तो गर्व से सर उठ जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश प्रगति कर रहा है ऐसा प्रचार तो हो रहा है लेकिन वह गोरान्वित होने का अहसास पैदा नहीं कर पा रहा है। आज का आम भारतीय एक अनजान डर से सहमा हुआ है। मैं आतन्कवादी डर अथवा किसी दूसरे देश से आक्रमण के डर की बात नहीं कर रहा हूँ। हमारे देश की सेना के जवानों पर आम भारतीय को नाज व पूरा भरोसा है। मेरा इशारा आम भारतीय के उस डर की ओर है जो हर रोज अखबारों व टेलीवजन चेनलों पर निरन्तर छपती व दिखलाई जाने वाली खबरों की है, जिसमें चोरी, लूट, दंगे, आत्महत्या, हत्या, भ्रष्टाचार व बलात्कार आदि के अलावा कुछ पढ़ने अथवा देखने को नहीं मिलता। आज का आम भारतीय भयग्रस्त है कि उसका बेटा या बेटी शाम को स्कूल अथवा कालेज से वापस सकुशल लौटेगें या नहीं। मेरा इशारा निरन्तर बढ़ती मंहगाँई की और भी है जिससे आम भारतीय त्रस्त है।
ऐसा नहीं है कि पहले ये सब नहीं होता था। लेकिन पहले ये खबरें यदा कदा ही सुनने में आती थीं, लेकिन प्रसाशन की क्षमता पर आम भारतीयों को भरोसा था। इसके प्रमाण स्वरूप उसकी सफलता के समाचार भी प्रायः पढ़ने सुनने को मिल जाते थे। आम भारतीय की व्यथा है कि आजकल प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिये है। आला अधिकारी बयान देतें हैं कि इस प्रकार की घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना असंभव है, तो कोई कहता है कि वे भगवान नहीं है जिन्हें पहले से पता लग जाये कि कहाँ क्या होने वाला है और वहाँ जाकर घटित रोक लें। मन्त्रीगण यह तो नहीं बता सकते हैं कि मंहगाँई कब तक कम होगी लेकिन मंहगाई कब बढ़ने वाली है इसकी भविष्य वाणी अवश्य कर सकतें हैं। अब तो लगता है आम भारतीय की सहायता भगवान भी नहीं करतें हैं।

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