मानव विकास, मानवता का ह्लास

 

मनुष्य अपने को सभी प्रणियों से श्रेष्ठ मानता आया है। उसके पास इसका समुचित कारण भी है और वह है उसका मस्तिष्क। इस मस्तिष्क का उपयोग मनुष्य ने अपनी सुरक्षा, अपने भौतिक व आध्यात्मिक विकास के लिये सफलता पूर्वक किया है। आज हमारे पास ऐशो आराम के समस्त साधन उपलब्ध हैं, हम पूरे ब्राम्हान्ड में विचरण करने में सक्षम हैं तथा संचार माध्यमों द्वारा पूरे विश्व से जुड़े हुए है। लेकिन क्या हम वास्तव में सुखी, सुरक्षित एवं सन्तुष्ट हैं। आज की सच्चाई यही है कि पूरे विश्व में मनुष्य अपने को तनाव ग्रस्त व असुरक्षित महसूस करता है। इस विसंगति को समझने के लिये मानव विकास के इतिहास को समझना आवश्यक है।

डारविन के अनुसार मनुष्य वानर जाति का ही विकसित रूप है। जंगल में उसने अपने आप को अपने से अधिक शक्तिशाली प्राणियों से घिरा हुआ पाया व सुरक्षा के लिये संगठित होकर रहना सीखा इस प्रकार समाज का उदय हुआ। इकठ्ठे काबिले को जंगल में रहने के लिये पर्याप्त जगह न होने व अधिक सुरक्षित स्थान की खोज में जंगल से बाहर आकर बसने से गाँवों का विकास आरम्भ हुआ। इस तरह शुरूआत में मानव विकास मानवता के हित को ध्यान में रखकर हुआ। इसलिये इस दौर में मानव व मानवता का विकास समानान्तर रूप से हुआ।

विकास के दूसरे दौर में विकास का केन्द्र सुख सुविधा के साधन, समाज संगठन,व शक्ति का विकास रहा। जिसके परिणाम स्वरूप शस्त्रों का विकास, घरों का विकास, काबिले का मुखिया, काबिले की सुरक्षा के उपायों का विकास, खाद्य पदार्थों की विविधता का विकास, कृषि व शिकार औजारों का उत्पादन, मनोरंजन के साधनों का हुआ। इस दौर में भी मुख्यतः विकास मानव जाति के विकास से जुड़ा रहा और मानवता का विकास भी साथ साथ चला। समाज में शान्ति व सुरक्षा के नियमों का विकास हुआ जिसे काबिले के सदस्यों ने मन से स्वीकार किया। परिवहन साधनों के विकास ने काबिलों को आपस में मिलने का अवसर प्रदान किया परिणाम स्वरूप संचार साधन,शिक्षा, खेल व कौशल के विस्तार के उपायों के आवष्कारों ने विकास की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

विकास के अगले चरण में मनुष्य में एक छोटा सा बदलाव आया। यह था ईर्षा

की भावना का उत्पन्न होना। कुछ लोगों को लगा कि कबीले के नेता के पास विशेष शक्ति व सम्मान है और उस पद को पाने के लिये प्रतिस्पर्धा आरम्भ होने लगी।

पहले जहाँ नेता सर्व सम्मति से अनुभव व ज्ञान के आधार पर चुना जाता था, अब उस पद को अपने बाहुबल के आधार पर हासिल किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप नये नेता ने अपने विरोधियों व समर्थकों में भेद करना शुरु कर दिया। यहाँ से मानवता के पतन का आरम्भ हुआ। सहयोग के कई अन्य लाभों को देखते हुए यह भाव बहुत ही सीमित रूप में ही रहा। विकास के इस चरण में भी मानव तेजी से अपने भोजन, मौसम व जानवरों से सुरक्षा व आराम के साधन जुटाने में लगा रहा। परिणाम स्वरूप साधनों की विपुलता के कारण संग्रह करने की प्रवत्ति पैदा हुई। संग्रह ने धीरे धीरे लालच व संपन्नता का रूप ले लिया, परिणाम स्वरूप अन्य लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। यह भेद भाव आगे चल कर मालिक व चाकर के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ इसने विकृत होकर गुलामी का रूप ले लिया। कुछ सहृदय समाज विचारकों के वर्षों के प्रयासों से गुलामी से तो मानवता को मुक्ति मिल गई किन्तु मनुष्य की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया। मानवता के पतन का यह दूसरा चरण था।

विकास के अगले दौर में एक ओर जहाँ मनुष्य ने अपने बुद्धि बल से विज्ञान में नये आयाम स्थापित किये, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चिन्तकों ने मानवता की रक्षा के लिये, धर्म, सामाजिक सह अस्तितव के लिये नियम व नियमों का उल्लघन करने पर दंड का प्रावधान किया। मानवता के पतन को रोकने व आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिये खेल प्रतियोगितायें व मिलन समारोहों के आयोजन शुरू हुआ। विकास और मानवता के उत्थान के इस दौर को हम मानव विकास का स्वर्ण युग मान सकते हैं। मानव विकास के इस चरण में ज्ञान का तेजी से विकास हुआ। भाषा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान की सभी विधायें, गणित, साहित्य,व्यापार, व शिक्षा के क्षेत्र में मानव तेजी से अग्रसर हुआ। साथ ही समाज का विस्तार भी हुआ। कबीले से गाँव, शहर, राज्य व देश के रूप में उसका विस्तार हुआ। विस्तार के साथ ही सामाजिक संगठन में बदलाव आया। राज्य के शासक के लिये व्यवस्था बनाये रखने के लिये कई प्रतिनिधियों को रखना व सुरक्षा के लिये सेना को रखना आवश्यक हो गया। इस प्रकार शक्ति के विकेन्द्रीकरण का आरम्भ हुआ। सामाजिक विकास के इस दौर में शक्ति को सम्मान का मापदन्ड माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप एक और जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर लोग छोटी छोटी बात पर एक दूसरे के प्राण लेने को तैयार रहते थे वहीं शासक गण अन्य शासकों को नीचा दिखाने के लिये युध्द के लिये हजारों लोगों को मौत के मुँह में झोंकने को तत्पर थे। मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु बन गया। यह मानवता के पतन का एक नया दौर था। मनुष्य शक्ति प्रदर्शन में इतना अन्धा हो गया था कि खुद के संहार के लिये विज्ञान का उपयोग से घातक अस्त्र जैसे तोप, बारूद, बम व अन्ततः परमाणु बम विकसित कर लिये। हिरोशिमा व नागासाकी इस विध्वंस की मिसाल है। शक्ति संचय के लिये धन भी जरूरी था अतः शक्ति के बल पर धन संचय की परंपरा आरंभ हुई। एक ओर शासक गण जबरन कर वसूलने लगे तथा दूसरी ओर चोर लुटेरे छल बल से धन चुराने लगे। धन व शक्ति इस प्रकार सम्मान व भय का कारण बन गये। शासक व व्यापार के जुड़ाव के कारण ही ब्रिाटेन अपना विस्तार पूरे विश्व में कर पाया। भारत वासियों ने उस समय के अत्याचार को भोगा है। बेईमानी व भ्रष्टाचार भी इसी दौर की देन है।

काफी समय तक धर्म ने समाज में बुराईयों का विस्तार रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तथा सामाजिक बुराईयाँ कुछ ही शक्ति संपन्न लोगों तक ही सीमित रही। धर्म के अतिरिक्त समाज का प्रभाव भी काफी हद तक इन बुराईयों के विस्तार को रोकने में सक्षम रहा। किन्तु समय के साथ धर्म प्रचारक व प्रतिनिधि भी लालच व शक्ति संचय के मोह में ऐसे फँसे कि आजकल अधिकतर लोगों का धर्म से विश्वास ही उठ गया। तो अन्य लोगों ने भगवान को ही हैसियत अनुसार भेंट चढ़ाकर पाप से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोज लिया। वहीं वैश्वीकरण से समाज का इतना विस्तार हो गया कि सामाजिक बन्धन बिल्कुल शिथिल हो गये। परिणाम स्वरूप मनुष्य आज निर्बाध लालच, बेईमानी, व्यभिचार, लूट आदि में आकन्ठ डूब गया है। मानवता सिसक रही है और दूर दूर तक कोई उसको धीरज देने वाला दिखाई नहीं दे रहा है।

गीता मे कहा गया है कि पृथ्वी पर जब भी धर्म की हानी होती है और अत्याचार बढ़ जाते है तो भगवान धर्म की स्थापना के लिये धरती पर अवतार लेते हैं। शायद समय के साथ भगवान की सहनशक्ति का विस्तार हो गया है। और कितना समय मानवता का यह पतन जारी रहेगा।

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