वेद साहित्य (विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित)

वेद शब्द विद (ज्ञान) संज्ञा से बना है। इसमें संपूर्ण ज्ञान निहित माना जाता है। वेद संस्कृत भाषा का प्राचीन ग्रंथ है। मूलतः यह लिखित भाषा के उद्भव से पूर्व में श्रुति के रूप में उपलब्ध था जिसमें समय के साथ श्लोक जुड़ते गये। इस कारण इसे स्मृति भी कहा जाता है। महाभारत के अनुसार ब्रह्माजी ने इसे रचा था।
वेदों के चार अंग माने गये हैं। ये हैं –
1. संहिता – मंत्र
2. आरण्यक – बलि व बलि विधियाँ
3. ब्राह्मण – बलि विधियों की व्याख्यायें
4. उपनिषद – ध्यान, आध्यात्म व वैचारिक लेख
कुछ विद्वान पाँचवाँ अंग उपासना को भी मानते हैं।
वेद के श्रुति रूप का उद्भव अधिकतर पाश्चात विद्वान 1500 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानते है। यद्यपि कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार इसका उद्भव 7000 से 5000 वर्ष पूर्व का मानते है। वेदों का श्रुति अथवा स्मृति रूप वर्ष 1000 ई तक प्रचलित रहा ऐसा अनुमान है।
ताड़पत्रों व वृक्षों के तनों से निर्मित छाल पर लिखित होने के कारण लिखित पान्डुलिपि मुश्किल से 150-200 वर्ष तक ही संरक्षित रह पाती थी इसलिये इसकी पहली प्रति कब लिखी गई कहना मुश्किल है। संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वव्द्यालय में 1400 सदी की मूल प्रति उपलब्ध है। किन्तु नेपाल में 11वीं सदी तक की प्रतियाँ उपलब्ध है।
पुरातन विश्वविद्यालयों जैसे नालन्दा, तक्षिला व विक्रमशिला में वेदों व वेदान्गों (वेदों से जुड़े अन्य विषय) की शिक्षा दी जाती थी।
वैदिक साहित्य में चार वेदों के मूल रूप (संहिता) के अतिरिक्त आरण्यक (विभिन्न संस्कारों का वर्णन), ब्राह्मण (संहिता व अनुष्ठानों की विवेचना व विस्तृत वर्णन), तथा उपनिषद् (वेदों पर हुए सम्मेलनों की चर्चाओं का वर्णन) को भी माना जाता है।
वैदिक समय के श्रोता सूत्र व ग्राह्र सूत्र वैदिक साहित्य से अलग हैं किन्तु वैदिक संस्कृति का ही हिस्सा माने गये हैं।
कई उपनिषदों की रचना वैदिक काल (150 वर्ष ई. पूर्व) के बाद हुई है।
आजकल ऋगवेद का सिर्फ एक ही रूप उपलब्ध है जबकि साम, अथर्व व यजुर्वेद के कई रूप उपलब्ध है।
ब्राह्मण, आरण्यक व उपनिषद में संहिताओं की विवेचना व वाद विवाद के रूप में परम ब्राहृ व आत्मा की खोज का दार्शनिक वर्णन सम्मिलित है। यह हिन्दु धर्म की बाद की विचार धारा है। इससे प्रभावित होकर आदि शंकराचार्यजी ने वेदो को कर्म खन्ड व ज्ञान खन्ड की ओर मोड़ दिया।
बाद के वैदिक साहित्य में काफी अंश वैदिक काल के बाद के भी जोड़े गये हैं। मेक्समुलर के अनुसार वैदिक साहित्य को श्रुति व अन्य को स्मृति माना गया है। यह विभाजन स्पष्ट नहीं है, क्योंकि एक ही उपनिषद् के कई संस्करण मिलते है। ब्रााहृण आरण्यक व उपनिषद् का भेद भी समय के साथ क्षीण होता गया।
ऋगवेद –
ऋगवेद संहिता सबसे पुराना है, इसमें 1028 स्तोत्र है तथा 10600 श्लोक है। इन्हें दस मन्डलों में रखा गया है। स्तोत्र वैदिक देवताओं की स्तुतियाँ है। ये रचनायें सप्तसिन्धु (पंजाब) से लेकर उत्तर पश्चिम के भारतीय ऋषियों द्वारा कई शताब्दियों में पूरी की गयीं। अग्नि इन्द्र आदि देवताओं के स्तोत्र श्लोकों की घटती संख्या के आधार पर क्रम में रखे गये हैं। आरम्भ में देवताओं की प्रसंशा से बाद में विषय ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति के प्रश्नों की ओर मुड़ जाता है। ऋगवेद के पौराणिक विवरण, भाष्य व अनुष्ठान मध्य एशिया, इरान व हिन्दकुश (अफगानिस्तान) के साहित्य से काफी मिलते हैं। शायद इसलिये कि इन क्षेत्रों से विद्वान ज्ञान की खोज में भारत आते थे।
सामवेद –
सामवेद संहिता में 1549 पद हैं। केवल 75 मंत्रों को छोड़ कर सभी ऋगवेद से लिये हैं। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं, पहला राग संग्रह व दूसरा कविता संग्रह की तीन पुस्तकें (अर्सिका)। राग संग्रह अर्सिका का ही गायन रूप है। ऋगवेद के समान सामवेद अग्नि व इन्द्र स्तुति से आरम्भ होकर अमूर्त रूप में ऋगवेद के काफी निकट आ जाता है। श्रुति होने के कारण जल्दी स्मरण होने के लिये शायद इसे गायन रूप दिया गया है। इसमें कई कवितायें एक से अधिक बार लिखी हैं। कोथुमा या रनयानिया एवं जैमिनिया दो रूप ही बचे हैं जो पुजारियों द्वारा गायन के संग्रह हैं।
यजुर्वेद –
यजुर्वेद गद्य मंत्रों का संग्रह है। इस में अनुष्ठान करवाने वाले पंडितो के लिये निर्देशों व मंत्रों का संकलन है जो यज्ञ जैसे अनुष्टान के समय प्रयोग किये जाते थे। सबसे पुराने संकलन में 1875 अनुच्छेद हैं। यजुर्वेद संहिता की भाषा व विषय ऋगवेद से अलग है। यह वैदिक काल के अनुष्ठानों की जानकारी का प्रमुख श्रोत है। इसके कृष्ण व शुक्ल दो रूप हैं। कृष्ण रूप अव्यवस्थित जबकि शुक्ल रूप व्यवस्थित है। शुक्ल रूप में संहिता व ब्राह्मण (संहिता की व्याख्या) अलग अलग है। कृष्ण यजुर्वेद के चार (मैत्रयाणी, कथा, कपिश्थला कथा व तैत्रीय) तथा शुक्ल यजुर्वेद के दो (कण्व व मध्यांदिना) संकलन बचे हैं। यजुर्वेद के बाद के संकलनों में अनुष्ठानों का स्थान अधिकतर उपनिषदों ने ले लिया है जो अलग अलग हिन्दु धाराओं का आधार है।
अथर्व वेद –
अथर्व वेद संहिता अथर्वान व अग्निरस कवियों द्वारा रचित है। इसमें 760 स्तोत्र है, जिसमें से 160 ऋगवेद में भी है। अधिकतर स्तोत्र स्वरबद्ध हैं लेकिन कुछ गद्य में भी है। दो संस्करण पैप्पलदा व आनुक्या अभी बचे हैं। आरम्भिक वैदिककाल मैं इसे वेद नहीं माना गया था, बाद में ईसा से करीब 500 वर्ष पूर्व इसे वेद मान लिया गया (रचना के करीब 400-500 वर्ष बाद)। कुछ विद्वान इसे जादुई फार्मुले वाला वेद मानते हैं जिसे अन्य कई विद्वानों ने गलत बतलाया है। इसकी संहिताओं में तत्कालीन प्रचलित अन्धविश्वासों, राक्षसों द्वारा रोपित रोगों तथा जड़ी बूटियों से बनी दवाईयों की विधियाँ समाहित हैं। केनेथ जिस्क के मतानुसार धार्मिक दवाओं व लोक इलाज के उद्भव का यह सबसे पुराना अभिलेख है। अथर्ववेद संहिता की कई पुस्तकों में जादुई अनुष्ठान रहित दार्शनिक चिन्तन व ब्राह्मविद्या का वर्णन है। यह वैदिक काल की संस्कृति, रीति रिवाज, आस्थाओं, आकांक्षाओं व निराशाओं को दर्शाता है। राजा व शासन के दायित्व व परेशानियाँ भी इसमें सम्मिलित है। काफी ऋचायों में विवाह व दाह संस्कार का वर्णन हैं। इसमें संस्सकारों के अर्थ पर व्याख्या भी मिलती है।
वेदों की भाषा कठिन है, सभी के लिये इन्हैं समझना कठिन है। इन की भाषा टीका, सहित संहिताओं के वर्णन के साथ कल्पित कथायें, दर्शन व किवदंती ब्रााहृणों में मिलते है। हर स्थानीय वैदिक शाखा का अपना ब्राह्मण हुआ करता था। अब केवल 19 (2 रिगवेद, 6 सामवेद, 10 यजुर्वेद व 1 अथर्ववेद संबन्धी) ही बचे हैं। इनकी रचना 700 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानी जाती है। इनके विषयों में एक ही वेद के बारे में भिन्नता पायी जाती है।
आरणयक में अनुष्ठानों के वर्णन के साथ सांकेतिक अनुष्ठानों पर वाद विवाद व दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। कुछ विद्वान इसे वन में जाकर अध्ययन करने वाले ग्रन्थ मानते हैं तो अन्य वानप्रस्थाश्रम किये जाने वाले अनुष्ठानों की नियमावली मानते हैं।
उपनिषदों का केन्द्र ब्राहृ व आत्मा की खोज के दर्शन पर केन्द्रित है। इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इन्हें हिन्दू धर्म व संस्कारों का आधार माना जाता है। आरण्यकों को कर्म खंड व उपनिषदों को ज्ञान खंड भी माना जाता है।
ईसा से करीब 100 वर्ष पूर्व वेदांगो का उदय हुआ। इनका उद्देश्य उस समय के लोगों के समझने लायक बनाना था। वेदांगो के 6 विषय उच्चारण, छन्द गायन, व्याकरण, शब्द साधन (व्युत्पत्ति), भाषा विज्ञान, धर्म संस्कार व समय ज्ञान एवं खगोल विद्या थे। वेदांग का उद्भव वैसे तो वैदो के सहायक ज्ञान पाने के लिये हुआ था, किन्तु आगे चलकर यह कला, संस्कृति व हिन्दू दर्शन का आधार बन गया। उदाहरण स्वरूप कल्प वेदांग अध्ययन से धर्म सूत्र होता हुआ धर्म शास्त्र में परिवर्तित हो गया।
परिशिश्ट –
यह वेदों पर सहायक टिप्पणियाँ है जो वैदिक साहित्य का तार्किक व कालक्रम सहित विस्तार है। वैसे तो सभी वेदों के परिशिष्ट हैं किन्तु सर्वाधिक अथर्व वेद पर आधारित हैं।
उपवेद-
इन्हें वेदों के तकनीकी विषय का प्रायोगिक साहित्य माना जाता है। चरणव्यूह के अनुसार चार उपवेद हैं-
1. धनुर्वेद (ऋगवेद आधारित)
2. स्थापत्य (आर्किटेक्ट) वेद (यजुर्वेद आधारित)
3. गंधर्ववेद (नृत्य व गान) (सामवेद आधारित)
4. आयुर्वेद (अथर्ववेद आधारित)
कुछ वैदिक काल के बाद के साहित्य में नाट्य शास्त्र, महाभारत व पुराणों को पाँचवाँ वेद माना गया है। नाट्य शास्त्र के बारे में ऐसा माना जाता है कि शब्द ऋगवेद, गायन सामवेद, भंगिमा यजुर्वेद व भाव अथर्ववेद से लिये गयें हैं।
पुराण-
पुराण लोक कथाओं,किंवदंतियों आदि पर आधारित विविध विषयों का साहित्य है। सभी प्रमुख देवताओं जैसे विष्णु, शिव, देवी आदि के नाम पर 18 महापुराण व 18 पुराण हैं जिनमें 40000 से अधिक स्तोत्र हैं। इसमें भागवत् पुराण का हिन्दू धर्म में अत्यधिक प्रभाव है। पौराणिक साहित्य भक्ति आन्दोलन के साथ घुलमिल गया। द्वैत व अद्वैत दोनों विचार धाराओं में महा पुराणों की व्याख्यायें मिलती है।
पाशचात्य देशों में संस्कृत का अध्ययन सत्रहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में आर्थर शोपेनहाउर ने वेदों की (विशेषकर उपनिषदों) ओर ध्यान आकर्षित किया। संहिताओं का अंग्रेजी रूपान्तरण उन्नीसवीं सदी के अंत तक हो चुका था।
राल्फ टी एच ग्रिफिथ के अनुसार वेद सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जिसके लिये पश्चिम हमेशा पूर्व का ऋणी रहेगा।
पाशचात्य देशों व भारत के वैदिक अध्ययन में एक महत्व पूर्ण अन्तर यह है कि जहाँ भारतीय विद्वानों ने इसे आद्यात्मिक रूप से अध्ययन किया पास्चात्य विद्वानों ने विज्ञान के दृष्टिकोण से इनका अध्ययन किया।
संदर्भ
वेद- रेंडम हाउस वेबस्टर्स अनब्रिाज्ड डिक्शनरी
सनुजित घोष(2011)- रिलीजियस डेवेलपमेंट्स इन एनशियेन्ट इंन्डिया इन एनशियेन्ट हिस्ट्री एनसाइक्लोपीडिया
वर्मा शिवराम आप्टे- दि प्रेक्टिकल डिक्शनरी, देखिये अपौरुषेय
डी शर्मा – क्लासीकल इन्डियन हिस्ट्री रीडर कोलम्बिया युनिवर्सिटी प्रेस आइबीएसएन पेज 196-197
विट्जेल, मिशाइल – वेदास एन्ड उपनिषदास इनः फ्लड 2003 पेज 69, 100-101
दि वेदिक संस्कृत कारपस इज इनकारपोरेटेड इन ए वैदिक वर्ड कोनकार्डेन्स (वैदिका पद्मकुमार कोष) प्रिपेयर्ड फ्राम 1930 अन्डर वि·ा बन्धु एन्ड पबलिश्ड इन 5 वाल्यूम्स इन 1935-1965. वाल्यूम 1. संहितास, 2. ब्रााहृणास, 3. उपनिषदास, 4. वेदांगास। विट्सल एम – दि डेवेलपमेन्टेस आफ
दि वेदिक केनन एन्ड इट्स स्कूल्सः दि सोशियल एन्ड पोलिटिकल मिलियो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी इन विट्सेल 1997 पेज 261-264।
एनेटी विल्के एन्ड ओलिवर मोबस – साउन्ड एन्ड कम्यूनिकेशनः एन एस्थेटिक कल्चरल हिस्ट्री आफ संस्कृत हिन्दुइज्म, वाल्टर डि ग्रुयटर, आइएसबीएन 9783110181593, पेज 381

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