मनुष्य अपराध क्यों करता है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, ऐसा बचपन से सुनते व पढ़ते आये हैं। किन्तु आज जिस प्रकार अपराधों के किस्से अखबारों व टीवी समाचारों में रोज सुनने को मिलते हैं, उससे तो यही लगता है कि मनुष्य पुनः अपने आदि काल की और लोट रहा है। आज मनुष्य पूरी तरह संवेदन हीन हो कर किसी भी प्रकार अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है। आज सामाजिक बन्धन अथवा कानून उसके इस प्रयास में बाधक नहीं है। बढ़ते अपराध यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि मनुष्य आखिर अपराध करता क्यों है।
मनुष्य की हर गतिविधि मस्तिष्क द्वारा ही संचालित होती है, अतः अपराध का मस्तिष्क से संबंध अवश्य होना चाहिये। मानव मस्तिष्क एक जटिल संरचना है। विशेषज्ञों का मानना है मनुष्य के मस्तिष्क में एक समय में हजारों विचार आते रहते हैं। हमारे दिमाग के बाँये हिस्से का एक बड़ा भाग इन पर नियंत्रण रख कई विचारों को रोकने का कार्य करता है। इस तन्त्र के कमजोर हो जाने अथवा बन्द हो जाने पर मनुष्य विवेक हीन होकर कुछ भी कर सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क के कई भाग सक्रिय व निष्क्रिय होते रहते हैं। यह बहुत कुछ उसके परिवेश व भावों पर निर्भर करता है। कई परिस्तिथियों में मनुष्य अपना विवेक गवाँ बैठता है। संभवतः इसी परिस्थितिवश मनुष्य अपराध कर बैठता है। प्रश्न अब यह उठता है कि आजकल इस तरह की पृवत्ति में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है।

1. ऐसा माना जाता है कि बच्चे तेजी से सीखते हैं। इस काल को बोलचाल की भाषा नाजुक काल भी में कहा जाता है। तेजी से सीखने का प्रमुख कारण बीएनडीएफ (ब्रोन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में पाया जाना है। यह मस्तिष्क के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिषक के उस भाग (न्यूक्लियस बसालिस)को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध भी हो जाता है व सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है। बच्चों पर आजकल बढ़ते बस्तों का बोझ व माता पिता की बच्चों को हर प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने का दबाव भी बीएनडीएफ की मात्रा को प्रभावित कर सकता है जिससे सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जो बच्चे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते वे नकारात्मक मानसिकता के शिकार हो सकते है। अपनी असफलता का कारण दूसरों को मानते हुए
बदले की भावना मन में पाल सकते हैं।
2. मनुष्य के स्वभाव को मस्तिष्क में दो चीजें प्रभावित करती हैं। पहला डोपेमाइन सिस्टम जो मस्तिष्क मे स्थित खुशी के केन्द्र क्रियाशील बनाता है। यह स्थिति उकसाने का कार्य करती है। नशा करने, जुआँ खेलने व अन्य उकसाने वाली गतिविधियाँ डोपेमाइन को बढ़ाने का काम करती हैं। इस मनोदशा में मनुष्य की विवेकशीलता कम हो जाती है। दूसरी आक्सीटोसिन जो चित्त को शान्त करता है, मन में कोमल भावना व विश्वास पैदा करता है। भावनात्मक संबन्ध, रचनात्मक गतिविधियाँ
आक्सीटोसिन को बढ़ाने सहायक होती है। यह स्थिति भूलने में भी मददगार होती है, व दुःख से उबरने में सहायक होती है। आज की आपाधापी की जीवन शैली, बिखरते परिवार व कमजोर सामाजिक संबन्धों के चलते यह स्वाभाविक ही है कि अधिकतर लोगों में डोपेमाइन सिस्टम
अधिक प्रभावी रहता है।
3. आज के सामाजिक परिवेश में जहाँ ऐशोआराम के साधन सुख, संपन्नता व समाज में आदर पाने के मापदन्ड हों। सभी प्रकार के मीडिया ललचाने वाले विज्ञापनों तथा अपराधों व अपराधी के बच निकलने के समाचारों को 24 घन्टे दिखातें हों। तथा सिनेमा, टीवी व इन्टरनेट पर उकसाने वाली जानकारी आसानी से सुलभ हो ऐसे माहोल में निराश मानसिकता व डोपेमाइन अघिकता वाले लोग अपराध में लिप्त हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

अपराध में लिप्त होने के उपरोक्त कारणों को समझने के बाद इस समस्या का निदान आसान हो जाता है। स्कूल, परिवार व समाज अपने परिवेश में भावनात्मक दृढ़ संबन्ध बनाकर इस समस्या के निराकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। सभी प्रकार के मीडिया सकारात्मक प्रकार की
सामग्री को प्राथमिकता देकर लोगों में सही मानसिकता बनाने में सहायक हो सकते हैं। और सबसे अधिक आवश्यकता है प्रारम्भिक शिक्षा में परीक्षा पास करने अथवा बहुत सारे विषय पढ़ाने से अधिक बच्चे के पूरे व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देने की। किताबी ज्ञान से अधिक आवश्कता है दया,
ईमानदारी, मेहनत व लगन से कार्य करने की भावना, टीम भावना, दूसरों की सहायता जैसे मानव मूल्यों के विकास की। साथ ही जरूरत है रुचि अनुसार किसी न किसी प्रकार की कुशलता के विकास की, जिससे वह अपनी प्रारम्भक जीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बन सके। शिक्षा का
विस्तार लोग अपनी रुचि व सुविधा के अनुसार कर सकें इसके लिये उम्र का बन्धन विद्यालय में प्रवेश के लिये नहीं होना चाहिये। कुछ हद तक पत्राचार पाठ्यक्रमों की सुविधा है लेकिन नियमित शिक्षा का अपना अलग महत्व है।

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