एक आम भारतीय की व्यथा

मैं यदि अपने आप को एक आम भारतीय कहूँ तो मेरे ख्याल में किसी को भी किसी प्रकार का एतराज नहीं होना चाहिये। मैंने अपना लगभग 70 सालों के जीवन के हर साल को एक आम भारतीय की तरह से ही जिया है। एक आम भारतीय परिवार में 7 भाई बहनों में मेरा जन्म हुआ। छोटे छोटे कस्बों की धूल भरी गलियों मे खेल कूद कर मैंने अपना बचपन बिताया। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की। किशोर अवस्था में अनाज, राशन व बीमार होने पर सरकारी अस्पताल की लाईनों में एक आम आदमी की तरह खड़ा रहा। मास्टर जी से पिटाई, थोड़ी सी गलती पर बड़ों से डाँट सब कुछ तो आम था। किस्मत ने मेहरबान होकर इन्जीनियर बना दिया। लेकिन इसमें भी कोई नयी बात नहीं है बहुत से आम भारतीय पहले भी और बाद में भी इन्जीनीयर किस्मत के बलबूते इन्जीनीयर बनते रहें हैं। आज भी मैं नगरपालिका में सम्पत्ति कर देने के लिये तो कभी बिजली का बिल भरने के लिये व बीएसएनएल में टेलीफोन का बिल देने के लिये व ऐसी ही कई अन्य जगह लाईन में लगा अन्य आम भारतीयों से सामाजिक संम्पर्क बढ़ाते हुए दिख जाता हूँ। मेरे एक आम भारतीय साबित होने के लिये इतना पर्याप्त है।
हाँलाकि मैंने जन्म तो गुलाम भारत में ही लिया, लेकिन समझ स्वतन्त्र भारत में ही आई। बचपन में स्कूलों में देश के आजाद हो जाने के लाभ घुट्टी की तरह पिलाये गये। अतः जरूरी था कि मैं स्वतन्त्र देश का एक आम नागरिक होने पर गर्व महसूस करूँ। जी जान से एक अच्छा नागरिक बनने के लिये जो भी स्कूलों में सिखाया गया था उसका पालन करने की कौशिश की। यह प्रयास आज भी उसी उत्साह के साथ जारी है। वयस्क उम्र में पहुँचते ही हर चुनाव में अपना दायित्व पूरा करने प्रायः सबसे पहले ही पहुँच जाता हूँ। अपने पसन्दीदा उम्मीदवार की जीत से खुश व हार से मायूस हो जाता हूँ। समय पर सब तरह के टेक्स व प्रायः बिना बिल के कोई बड़ा खर्चा नहीं करता हूँ, ताकि मैं देश की प्रगति में किसी प्रकार का बाधक नहीं बनूँ।
पिछले बीस वर्षों तक तो मुझे अपनी शिक्षा की यथार्थता पर काफी गर्व भी था कि वाकई जो भी सिखाया उसके अनुसर देश वास्तव में तेजी से तरक्की कर रहा है। देश के आजाद होने का लाभ भी आम लोगों तक पहुँच रहा है। हम हर क्षेत्र में आत्म निर्भर हो रहें है। आम भारतीय की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है। जब देश के नेतागण भाषण में बोलते थे कि भारत ने इतनी तरक्की कर ली है कि हर भारतीय सर उठा कर कह सकता है कि मैं भारतीय हूँ तो गर्व से सर उठ जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश प्रगति कर रहा है ऐसा प्रचार तो हो रहा है लेकिन वह गोरान्वित होने का अहसास पैदा नहीं कर पा रहा है। आज का आम भारतीय एक अनजान डर से सहमा हुआ है। मैं आतन्कवादी डर अथवा किसी दूसरे देश से आक्रमण के डर की बात नहीं कर रहा हूँ। हमारे देश की सेना के जवानों पर आम भारतीय को नाज व पूरा भरोसा है। मेरा इशारा आम भारतीय के उस डर की ओर है जो हर रोज अखबारों व टेलीवजन चेनलों पर निरन्तर छपती व दिखलाई जाने वाली खबरों की है, जिसमें चोरी, लूट, दंगे, आत्महत्या, हत्या, भ्रष्टाचार व बलात्कार आदि के अलावा कुछ पढ़ने अथवा देखने को नहीं मिलता। आज का आम भारतीय भयग्रस्त है कि उसका बेटा या बेटी शाम को स्कूल अथवा कालेज से वापस सकुशल लौटेगें या नहीं। मेरा इशारा निरन्तर बढ़ती मंहगाँई की और भी है जिससे आम भारतीय त्रस्त है।
ऐसा नहीं है कि पहले ये सब नहीं होता था। लेकिन पहले ये खबरें यदा कदा ही सुनने में आती थीं, लेकिन प्रसाशन की क्षमता पर आम भारतीयों को भरोसा था। इसके प्रमाण स्वरूप उसकी सफलता के समाचार भी प्रायः पढ़ने सुनने को मिल जाते थे। आम भारतीय की व्यथा है कि आजकल प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिये है। आला अधिकारी बयान देतें हैं कि इस प्रकार की घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना असंभव है, तो कोई कहता है कि वे भगवान नहीं है जिन्हें पहले से पता लग जाये कि कहाँ क्या होने वाला है और वहाँ जाकर घटित रोक लें। मन्त्रीगण यह तो नहीं बता सकते हैं कि मंहगाँई कब तक कम होगी लेकिन मंहगाई कब बढ़ने वाली है इसकी भविष्य वाणी अवश्य कर सकतें हैं। अब तो लगता है आम भारतीय की सहायता भगवान भी नहीं करतें हैं।

मानव विकास, मानवता का ह्लास

 

मनुष्य अपने को सभी प्रणियों से श्रेष्ठ मानता आया है। उसके पास इसका समुचित कारण भी है और वह है उसका मस्तिष्क। इस मस्तिष्क का उपयोग मनुष्य ने अपनी सुरक्षा, अपने भौतिक व आध्यात्मिक विकास के लिये सफलता पूर्वक किया है। आज हमारे पास ऐशो आराम के समस्त साधन उपलब्ध हैं, हम पूरे ब्राम्हान्ड में विचरण करने में सक्षम हैं तथा संचार माध्यमों द्वारा पूरे विश्व से जुड़े हुए है। लेकिन क्या हम वास्तव में सुखी, सुरक्षित एवं सन्तुष्ट हैं। आज की सच्चाई यही है कि पूरे विश्व में मनुष्य अपने को तनाव ग्रस्त व असुरक्षित महसूस करता है। इस विसंगति को समझने के लिये मानव विकास के इतिहास को समझना आवश्यक है।

डारविन के अनुसार मनुष्य वानर जाति का ही विकसित रूप है। जंगल में उसने अपने आप को अपने से अधिक शक्तिशाली प्राणियों से घिरा हुआ पाया व सुरक्षा के लिये संगठित होकर रहना सीखा इस प्रकार समाज का उदय हुआ। इकठ्ठे काबिले को जंगल में रहने के लिये पर्याप्त जगह न होने व अधिक सुरक्षित स्थान की खोज में जंगल से बाहर आकर बसने से गाँवों का विकास आरम्भ हुआ। इस तरह शुरूआत में मानव विकास मानवता के हित को ध्यान में रखकर हुआ। इसलिये इस दौर में मानव व मानवता का विकास समानान्तर रूप से हुआ।

विकास के दूसरे दौर में विकास का केन्द्र सुख सुविधा के साधन, समाज संगठन,व शक्ति का विकास रहा। जिसके परिणाम स्वरूप शस्त्रों का विकास, घरों का विकास, काबिले का मुखिया, काबिले की सुरक्षा के उपायों का विकास, खाद्य पदार्थों की विविधता का विकास, कृषि व शिकार औजारों का उत्पादन, मनोरंजन के साधनों का हुआ। इस दौर में भी मुख्यतः विकास मानव जाति के विकास से जुड़ा रहा और मानवता का विकास भी साथ साथ चला। समाज में शान्ति व सुरक्षा के नियमों का विकास हुआ जिसे काबिले के सदस्यों ने मन से स्वीकार किया। परिवहन साधनों के विकास ने काबिलों को आपस में मिलने का अवसर प्रदान किया परिणाम स्वरूप संचार साधन,शिक्षा, खेल व कौशल के विस्तार के उपायों के आवष्कारों ने विकास की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

विकास के अगले चरण में मनुष्य में एक छोटा सा बदलाव आया। यह था ईर्षा

की भावना का उत्पन्न होना। कुछ लोगों को लगा कि कबीले के नेता के पास विशेष शक्ति व सम्मान है और उस पद को पाने के लिये प्रतिस्पर्धा आरम्भ होने लगी।

पहले जहाँ नेता सर्व सम्मति से अनुभव व ज्ञान के आधार पर चुना जाता था, अब उस पद को अपने बाहुबल के आधार पर हासिल किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप नये नेता ने अपने विरोधियों व समर्थकों में भेद करना शुरु कर दिया। यहाँ से मानवता के पतन का आरम्भ हुआ। सहयोग के कई अन्य लाभों को देखते हुए यह भाव बहुत ही सीमित रूप में ही रहा। विकास के इस चरण में भी मानव तेजी से अपने भोजन, मौसम व जानवरों से सुरक्षा व आराम के साधन जुटाने में लगा रहा। परिणाम स्वरूप साधनों की विपुलता के कारण संग्रह करने की प्रवत्ति पैदा हुई। संग्रह ने धीरे धीरे लालच व संपन्नता का रूप ले लिया, परिणाम स्वरूप अन्य लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। यह भेद भाव आगे चल कर मालिक व चाकर के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ इसने विकृत होकर गुलामी का रूप ले लिया। कुछ सहृदय समाज विचारकों के वर्षों के प्रयासों से गुलामी से तो मानवता को मुक्ति मिल गई किन्तु मनुष्य की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया। मानवता के पतन का यह दूसरा चरण था।

विकास के अगले दौर में एक ओर जहाँ मनुष्य ने अपने बुद्धि बल से विज्ञान में नये आयाम स्थापित किये, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चिन्तकों ने मानवता की रक्षा के लिये, धर्म, सामाजिक सह अस्तितव के लिये नियम व नियमों का उल्लघन करने पर दंड का प्रावधान किया। मानवता के पतन को रोकने व आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिये खेल प्रतियोगितायें व मिलन समारोहों के आयोजन शुरू हुआ। विकास और मानवता के उत्थान के इस दौर को हम मानव विकास का स्वर्ण युग मान सकते हैं। मानव विकास के इस चरण में ज्ञान का तेजी से विकास हुआ। भाषा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान की सभी विधायें, गणित, साहित्य,व्यापार, व शिक्षा के क्षेत्र में मानव तेजी से अग्रसर हुआ। साथ ही समाज का विस्तार भी हुआ। कबीले से गाँव, शहर, राज्य व देश के रूप में उसका विस्तार हुआ। विस्तार के साथ ही सामाजिक संगठन में बदलाव आया। राज्य के शासक के लिये व्यवस्था बनाये रखने के लिये कई प्रतिनिधियों को रखना व सुरक्षा के लिये सेना को रखना आवश्यक हो गया। इस प्रकार शक्ति के विकेन्द्रीकरण का आरम्भ हुआ। सामाजिक विकास के इस दौर में शक्ति को सम्मान का मापदन्ड माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप एक और जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर लोग छोटी छोटी बात पर एक दूसरे के प्राण लेने को तैयार रहते थे वहीं शासक गण अन्य शासकों को नीचा दिखाने के लिये युध्द के लिये हजारों लोगों को मौत के मुँह में झोंकने को तत्पर थे। मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु बन गया। यह मानवता के पतन का एक नया दौर था। मनुष्य शक्ति प्रदर्शन में इतना अन्धा हो गया था कि खुद के संहार के लिये विज्ञान का उपयोग से घातक अस्त्र जैसे तोप, बारूद, बम व अन्ततः परमाणु बम विकसित कर लिये। हिरोशिमा व नागासाकी इस विध्वंस की मिसाल है। शक्ति संचय के लिये धन भी जरूरी था अतः शक्ति के बल पर धन संचय की परंपरा आरंभ हुई। एक ओर शासक गण जबरन कर वसूलने लगे तथा दूसरी ओर चोर लुटेरे छल बल से धन चुराने लगे। धन व शक्ति इस प्रकार सम्मान व भय का कारण बन गये। शासक व व्यापार के जुड़ाव के कारण ही ब्रिाटेन अपना विस्तार पूरे विश्व में कर पाया। भारत वासियों ने उस समय के अत्याचार को भोगा है। बेईमानी व भ्रष्टाचार भी इसी दौर की देन है।

काफी समय तक धर्म ने समाज में बुराईयों का विस्तार रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तथा सामाजिक बुराईयाँ कुछ ही शक्ति संपन्न लोगों तक ही सीमित रही। धर्म के अतिरिक्त समाज का प्रभाव भी काफी हद तक इन बुराईयों के विस्तार को रोकने में सक्षम रहा। किन्तु समय के साथ धर्म प्रचारक व प्रतिनिधि भी लालच व शक्ति संचय के मोह में ऐसे फँसे कि आजकल अधिकतर लोगों का धर्म से विश्वास ही उठ गया। तो अन्य लोगों ने भगवान को ही हैसियत अनुसार भेंट चढ़ाकर पाप से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोज लिया। वहीं वैश्वीकरण से समाज का इतना विस्तार हो गया कि सामाजिक बन्धन बिल्कुल शिथिल हो गये। परिणाम स्वरूप मनुष्य आज निर्बाध लालच, बेईमानी, व्यभिचार, लूट आदि में आकन्ठ डूब गया है। मानवता सिसक रही है और दूर दूर तक कोई उसको धीरज देने वाला दिखाई नहीं दे रहा है।

गीता मे कहा गया है कि पृथ्वी पर जब भी धर्म की हानी होती है और अत्याचार बढ़ जाते है तो भगवान धर्म की स्थापना के लिये धरती पर अवतार लेते हैं। शायद समय के साथ भगवान की सहनशक्ति का विस्तार हो गया है। और कितना समय मानवता का यह पतन जारी रहेगा।

भारत की अर्थ व्यवस्था

 

इसमें कोई संदेह नहीं की भारत विविधता से भरा विशाल देश है। यहाँ अलग अलग राज्यों की भोगोलिक, नेसर्गिक, सान्सकृतिक,सामाजिक व आर्थिक स्थितियों में भारी अन्तर है। इन कारणों से यहाँ का वित्तीय प्रबन्धन आसान नहीं है। प्रायः हर बजट के पूर्व,  पूरे देश में मंहगाँई व टेक्स की दोहरी मार से ग्रसित लोगों में आशा की किरण सी फूटती है व बजट में मिली छोटी मोटी राहतों की खुशी रेत में गिरी कुछ ओंस की बूंदों की तरह थोड़े समय में गायब हो जाती है। हमारे नेता भारत को विश्व में एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में बताते नहीं थकते। वहीं समाचार पत्र, दूरदर्शन व व्यवसायिक पत्रिकायें वित्त मंत्री द्वारा आर्थिक सुधारों के गुणगान करते नहीं थकते। लेकिन आज भारत की वित्तीय स्थिति की सच्चाई यही है कि करीब 30 प्रतिशत जनता को दो समय का भरपेट भोजन नहीं मिलता है व अधिकतर मध्य वर्ग मँहगाई, भ्रष्टाचार व कालाबजारी से त्रस्त है। पिछले कुछ  दस वर्षों तक सरकार के मुखिया स्वयं एक वित्त विशेषज्ञ थे। अपने पिछले वित्त मंत्री के कार्यकाल में उनके द्वारा शुरु उदारी करण की नीतियों को ही भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक ताकत बन कर उभरने का श्रेय दिया जाता है। यह एक विडम्बना ही है कि इन दस वर्षों में स्थिति बद से बदतर ही हुई है। शायद उनकी भी कुछ मजबूरियाँ होगीं। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार से लोगों की मँहगाई कम करने के लिये कदम उठाने की उम्मीद थी।  यह सरकार फिलहाल कई मौलिक सुधारों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है। इसका परिणाम दीर्घ अवधि में ही दिखाई देगा। निकट भविष्य में अधिक की आशा भी नहीं करनी चाहिये।

आज अधिकतर भारतीय जनता की हालत का कारण समझने के लिये किसी विशेषज्ञ की शायद आवश्यकता भी नहीं है। 50 के दशक में स्कूल में वित्त प्रबन्धन के कुछ मूलभूत सिद्धान्त सिखाये गये थे जो आज भी मुझे अच्छी तरह से याद हैं। उनमें प्रमुख ये हैं –

  1. रोटी, कपड़ा व मकान परिवार की मूल आवश्यकता है।
  2. जरूरी वस्तुओं की कमी होने पर मँहगाई बढ़ती है।
  3. अनावश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से उनकी खपत में कमी आती है।
  4. जितनी चादर हो उतने पैर फैलाओ।
  5. उधार लेकर ऐश मत करो।
  6. भविष्य के लिये थोड़ी थोड़ी बचत अवश्य करो।

लेकिन आज ये मूल सिद्धान्त सरकार व भारतीय शायद भूल गये हैं।

सरकार की बात करें तो मूल आवश्यकता की चीजों पर मँहगाई सबसे अधिक है लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कोई तरीका उनको नहीं सूझता है। कुछ वर्ष पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि भन्डार ग्रहों में अनाज सड़ाने से अच्छा है कि सरकार उस अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट दें। इस पर सरकार की प्रतिक्रिया थी कि यह संभव नहीं है। लेकिन अनाज को भन्डार ग्रहों में सढ़ने से बचाने के लिये भी सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। यदि सरकार अनाज का भन्डारन सही तरीके से नहीं कर पाती है तो फिर अनाज खरीदती ही क्यों है। हर साल सरकार किसानों की मदद के नाम पर न्यूनतम मूल्य जो बाजार भाव से काफी कम होता है निर्धारित करती है। और लाखों करोड़ रूपये में किसानों से अनाज खरीदती है। और उसे सड़ने के लिये छोड़ देती है। सिर्फ अनाज ही क्यों हर साल लाखों टन फल, सब्जियाँ भी सढ़ जाती है। क्या हमारा देश इतनी खाद्य पदार्थों की बरबादी का भार वहन कर सकता है।

आर्थिक प्रबन्धन के लिये मूलभूत आवश्यकता है संसाधनों का कुशलता पूर्वक उपयोग। मुझे याद है एक बार उस समय प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी ने कहा था कि देश में 1 रुपया खर्च करने पर 15 पैसे का ही लाभ जनता को मिलता है। आज तो यह गिर कर 4 पैसे भी शायद ही रहा हो। इस को सुधारना क्या सरकार का दायित्व नहीं है।

उदारीकरण से आर्थिक प्रगति के गुणगान सरकार व मीडिया करते नहीं थकता है। लेकिन इसके परिणाम का यदि आम जनता पर असर हम देखें तो हमारे बच्चे कोका कोला, पेप्सी, चिप्स व अन्य ऐसी ही वस्तुओं को खाकर अपनी सेहत खराब कर रहें है। अमीर बच्चे तो मोटापे के शिकार हो रहे हैं। वहीं गाँव व गरीब बच्चों के इस प्रकार के शौक ने तो घर की अर्थ व्यवस्था को ही बिगाड़ कर रख दिया है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उदारी करण से पहले जो पेन्ट शर्ट 200-300 रूपये मे मिल जाता था उसकी कीमत अचानक 800-900 रुपये होगई थी। आज कीमत 2500-3000 रुपये है। यही हाल खाद्य पदार्थों पर छपी कीमतों का है। मुझे आश्चर्य हुआ जब एक दुकान दार ने मुझे मैदे का एक पेकेट जिसकी छपी कीमत करीब 40 रु. थी, उसके उसने सिर्फ 22 रु. लिये। क्या ये सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह उत्पादों पर सही मूल्य अंकित करना सुनिश्चित करे। यह आश्चर्य की बात है कि छपे हुए मूल्य से काफी कम मूल्य पर सरकार को उत्पाद शुल्क स्वीकार्य है। यही कारण है कि कई बड़े बड़े शो रूम साल भर 30 से 70 प्रतिशत कीमत की सेल लगाते रहते हैं।

किसी भी अर्थ व्यवस्था में क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कार, पेट्रोल, व अन्य उपकरणों के दाम बढ़ते जाते है और इनकी माँग भी बढ़ती जाती है। सिर्फ कार ही क्यों अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों के साथ माँग भी बढ़ रही है। यह एक बाजारीकरण का जाल है जिसमें सरकार, मीडिया व व्यापारी की साझेदारी है। सरकार व व्यापारी नौकरी पेशा लोगों का वेतन बढ़ा कर बाजार में माँग बढ़ाते हैं व व्यापारी मीडिया की सहायता से बड़े बड़े विज्ञापनों की मदद से ग्राहकों को आकर्षित कर मनचाहा लाभ कमाते हैं और भोगवाद को बढ़ावा देते हैं।

सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का कर्ज है। उधार ले कर घी पीने वालों की तर्ज पर सरकार ने अपने कर्म चारियों के वेतन व सुविधा में लगातार वृद्धि की है लेकिन जिम्मेदारी व कार्य कुशलता में लगातार गिरावट ही आई है। क्या भुगतान व कार्य निष्पादन में समन्वय लाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यही हालत जन प्रतिनिधियों के वेतन, भत्तों, उनको दी जाने वाली विकास निधि पर भी लागू होती है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि 5 वर्ष पूरे करने पर जन प्रतिनिधियों को आजीवन पेन्शन सुविधा का मिलना चाहे काम के नाम पर किसी ने कुछ भी नहीं किया हो।

आज कल गरीब किसानों की भलाई के नाम पर कर्ज माफ करना, गरीबों को मुफ्त में पैसे बाँट कर समाज सेवा की वाह वाह लूटना सरकार के लिये फेशन सा हो गया है। लेकिन क्या ये लोगों को अकर्मण्य होने के लिये प्रेरित नहीं करता हैं। सीधे साधे शब्दों में एक प्रकार से यह सरकारी भीख ही है। सरकार को जरूरतमन्दों की सहायता अवश्य ही करना चाहिये, लेकिन इस प्रकार कि वे स्वावलम्बी बन सकें न कि दया के पात्र। देश की आर्थिक उन्नति सभी के सशक्तीकरण से ही संभव है।

मँहगाई से पिछले कुछ वर्षों से सभी त्रस्त है। खाद्य पदार्थों की बरबादी, वस्तुओं के मूल्यों के नियन्त्रण पर सरकार का अक्षम होना व अपने ही खर्च पूरे करने के लिये करों में लगातार बढ़ोत्री करते रहना तो मँहगाई के कारण है हीं। उससे भी बढ़ा कारण मँहगाई का है कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत। आश्चर्य की बात है कि जब से कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत हुई है उसमें शामिल लगभग सभी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं लेकिन केन्द्रीय मंत्री जी मीडिया में बयान देतें हैं कि मँहगाई का कारण यह नहीं है। क्या यह एक प्रकार की होर्डिंग नहीं है।

बल्कि इसमें तो पड़े पड़े माल के पैसे इधर उधर कर लोग मुनाफा भी कमा लेतें हैं।

रही भ्रष्टाचार की बात तो भ्रष्टाचार मूल कारण तो सरकार से गलत तरीके से काम करवाना ही है। चाहे इसमें दूसरों का हक मारा जाये, अथवा पैसे देने वाले का आर्थिक लाभ हो या फिर कार्य कानून के दायरे से बाहर हो। भ्रष्टाचार की जड़ तो सरकार अथवा सरकारी विभाग ही हैं। मूल (वेतन) से अधिक कमाई के श्रोत को खत्म करने की अपेक्षा हम किसी भी सरकार से कैसे कर सकते है। आश्चर्य नहीं है कि सरकार पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर हजारों के घोटाले का आरोप लगाकर सरकार के प्रतिनिधि उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलने के लिये अयोग्य करार बतला देतें हैं और आरोप छानबीन करने के नाम पर सालों के लिये दब जाते हैं। कोई दृढ़ इच्छा शक्ति व्यक्ति ही शीर्ष पर आकर इससे देश को मुक्ति दिला सकता है।

जहाँ तक आम भारतीय का सवाल है तो भारतीय अर्थ व्ववस्था को सुधारने में वे काफी योगदान कर सकते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि मँहगाई,भ्रष्टाचार व अपव्ययता के लिये हम भी जिम्मेदार है। सिर्फ निम्न लिखित बातों पर ध्यान देने की जरूरत है-

  1. बाजार से चीजें सिर्फ ब्रान्ड देखकर नहीं अपितु उसकी उचित मूल्य व गुणता के आकलन के आधार पर ही खरीदें। अपने देश मे बनी चीजों की अधिक बिक्री से ही देश का विकास संभव है।
  2. जहाँ तक संभव हो मकान के अलावा कोई भी वस्तु उधार अथवा किश्तों पर न लें।
  3. यथा संभव हर माह कुछ बचत अवश्य ही करें।
  4. बच्चों को मँहगीं नही अच्छी शिक्षा दिलवायें।
  5. हर माह बजट बना कर खर्च प्लान करें।
  6. यथा संभव गलत कार्य न करें

वेद साहित्य (विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित)

वेद शब्द विद (ज्ञान) संज्ञा से बना है। इसमें संपूर्ण ज्ञान निहित माना जाता है। वेद संस्कृत भाषा का प्राचीन ग्रंथ है। मूलतः यह लिखित भाषा के उद्भव से पूर्व में श्रुति के रूप में उपलब्ध था जिसमें समय के साथ श्लोक जुड़ते गये। इस कारण इसे स्मृति भी कहा जाता है। महाभारत के अनुसार ब्रह्माजी ने इसे रचा था।
वेदों के चार अंग माने गये हैं। ये हैं –
1. संहिता – मंत्र
2. आरण्यक – बलि व बलि विधियाँ
3. ब्राह्मण – बलि विधियों की व्याख्यायें
4. उपनिषद – ध्यान, आध्यात्म व वैचारिक लेख
कुछ विद्वान पाँचवाँ अंग उपासना को भी मानते हैं।
वेद के श्रुति रूप का उद्भव अधिकतर पाश्चात विद्वान 1500 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानते है। यद्यपि कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार इसका उद्भव 7000 से 5000 वर्ष पूर्व का मानते है। वेदों का श्रुति अथवा स्मृति रूप वर्ष 1000 ई तक प्रचलित रहा ऐसा अनुमान है।
ताड़पत्रों व वृक्षों के तनों से निर्मित छाल पर लिखित होने के कारण लिखित पान्डुलिपि मुश्किल से 150-200 वर्ष तक ही संरक्षित रह पाती थी इसलिये इसकी पहली प्रति कब लिखी गई कहना मुश्किल है। संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वव्द्यालय में 1400 सदी की मूल प्रति उपलब्ध है। किन्तु नेपाल में 11वीं सदी तक की प्रतियाँ उपलब्ध है।
पुरातन विश्वविद्यालयों जैसे नालन्दा, तक्षिला व विक्रमशिला में वेदों व वेदान्गों (वेदों से जुड़े अन्य विषय) की शिक्षा दी जाती थी।
वैदिक साहित्य में चार वेदों के मूल रूप (संहिता) के अतिरिक्त आरण्यक (विभिन्न संस्कारों का वर्णन), ब्राह्मण (संहिता व अनुष्ठानों की विवेचना व विस्तृत वर्णन), तथा उपनिषद् (वेदों पर हुए सम्मेलनों की चर्चाओं का वर्णन) को भी माना जाता है।
वैदिक समय के श्रोता सूत्र व ग्राह्र सूत्र वैदिक साहित्य से अलग हैं किन्तु वैदिक संस्कृति का ही हिस्सा माने गये हैं।
कई उपनिषदों की रचना वैदिक काल (150 वर्ष ई. पूर्व) के बाद हुई है।
आजकल ऋगवेद का सिर्फ एक ही रूप उपलब्ध है जबकि साम, अथर्व व यजुर्वेद के कई रूप उपलब्ध है।
ब्राह्मण, आरण्यक व उपनिषद में संहिताओं की विवेचना व वाद विवाद के रूप में परम ब्राहृ व आत्मा की खोज का दार्शनिक वर्णन सम्मिलित है। यह हिन्दु धर्म की बाद की विचार धारा है। इससे प्रभावित होकर आदि शंकराचार्यजी ने वेदो को कर्म खन्ड व ज्ञान खन्ड की ओर मोड़ दिया।
बाद के वैदिक साहित्य में काफी अंश वैदिक काल के बाद के भी जोड़े गये हैं। मेक्समुलर के अनुसार वैदिक साहित्य को श्रुति व अन्य को स्मृति माना गया है। यह विभाजन स्पष्ट नहीं है, क्योंकि एक ही उपनिषद् के कई संस्करण मिलते है। ब्रााहृण आरण्यक व उपनिषद् का भेद भी समय के साथ क्षीण होता गया।
ऋगवेद –
ऋगवेद संहिता सबसे पुराना है, इसमें 1028 स्तोत्र है तथा 10600 श्लोक है। इन्हें दस मन्डलों में रखा गया है। स्तोत्र वैदिक देवताओं की स्तुतियाँ है। ये रचनायें सप्तसिन्धु (पंजाब) से लेकर उत्तर पश्चिम के भारतीय ऋषियों द्वारा कई शताब्दियों में पूरी की गयीं। अग्नि इन्द्र आदि देवताओं के स्तोत्र श्लोकों की घटती संख्या के आधार पर क्रम में रखे गये हैं। आरम्भ में देवताओं की प्रसंशा से बाद में विषय ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति के प्रश्नों की ओर मुड़ जाता है। ऋगवेद के पौराणिक विवरण, भाष्य व अनुष्ठान मध्य एशिया, इरान व हिन्दकुश (अफगानिस्तान) के साहित्य से काफी मिलते हैं। शायद इसलिये कि इन क्षेत्रों से विद्वान ज्ञान की खोज में भारत आते थे।
सामवेद –
सामवेद संहिता में 1549 पद हैं। केवल 75 मंत्रों को छोड़ कर सभी ऋगवेद से लिये हैं। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं, पहला राग संग्रह व दूसरा कविता संग्रह की तीन पुस्तकें (अर्सिका)। राग संग्रह अर्सिका का ही गायन रूप है। ऋगवेद के समान सामवेद अग्नि व इन्द्र स्तुति से आरम्भ होकर अमूर्त रूप में ऋगवेद के काफी निकट आ जाता है। श्रुति होने के कारण जल्दी स्मरण होने के लिये शायद इसे गायन रूप दिया गया है। इसमें कई कवितायें एक से अधिक बार लिखी हैं। कोथुमा या रनयानिया एवं जैमिनिया दो रूप ही बचे हैं जो पुजारियों द्वारा गायन के संग्रह हैं।
यजुर्वेद –
यजुर्वेद गद्य मंत्रों का संग्रह है। इस में अनुष्ठान करवाने वाले पंडितो के लिये निर्देशों व मंत्रों का संकलन है जो यज्ञ जैसे अनुष्टान के समय प्रयोग किये जाते थे। सबसे पुराने संकलन में 1875 अनुच्छेद हैं। यजुर्वेद संहिता की भाषा व विषय ऋगवेद से अलग है। यह वैदिक काल के अनुष्ठानों की जानकारी का प्रमुख श्रोत है। इसके कृष्ण व शुक्ल दो रूप हैं। कृष्ण रूप अव्यवस्थित जबकि शुक्ल रूप व्यवस्थित है। शुक्ल रूप में संहिता व ब्राह्मण (संहिता की व्याख्या) अलग अलग है। कृष्ण यजुर्वेद के चार (मैत्रयाणी, कथा, कपिश्थला कथा व तैत्रीय) तथा शुक्ल यजुर्वेद के दो (कण्व व मध्यांदिना) संकलन बचे हैं। यजुर्वेद के बाद के संकलनों में अनुष्ठानों का स्थान अधिकतर उपनिषदों ने ले लिया है जो अलग अलग हिन्दु धाराओं का आधार है।
अथर्व वेद –
अथर्व वेद संहिता अथर्वान व अग्निरस कवियों द्वारा रचित है। इसमें 760 स्तोत्र है, जिसमें से 160 ऋगवेद में भी है। अधिकतर स्तोत्र स्वरबद्ध हैं लेकिन कुछ गद्य में भी है। दो संस्करण पैप्पलदा व आनुक्या अभी बचे हैं। आरम्भिक वैदिककाल मैं इसे वेद नहीं माना गया था, बाद में ईसा से करीब 500 वर्ष पूर्व इसे वेद मान लिया गया (रचना के करीब 400-500 वर्ष बाद)। कुछ विद्वान इसे जादुई फार्मुले वाला वेद मानते हैं जिसे अन्य कई विद्वानों ने गलत बतलाया है। इसकी संहिताओं में तत्कालीन प्रचलित अन्धविश्वासों, राक्षसों द्वारा रोपित रोगों तथा जड़ी बूटियों से बनी दवाईयों की विधियाँ समाहित हैं। केनेथ जिस्क के मतानुसार धार्मिक दवाओं व लोक इलाज के उद्भव का यह सबसे पुराना अभिलेख है। अथर्ववेद संहिता की कई पुस्तकों में जादुई अनुष्ठान रहित दार्शनिक चिन्तन व ब्राह्मविद्या का वर्णन है। यह वैदिक काल की संस्कृति, रीति रिवाज, आस्थाओं, आकांक्षाओं व निराशाओं को दर्शाता है। राजा व शासन के दायित्व व परेशानियाँ भी इसमें सम्मिलित है। काफी ऋचायों में विवाह व दाह संस्कार का वर्णन हैं। इसमें संस्सकारों के अर्थ पर व्याख्या भी मिलती है।
वेदों की भाषा कठिन है, सभी के लिये इन्हैं समझना कठिन है। इन की भाषा टीका, सहित संहिताओं के वर्णन के साथ कल्पित कथायें, दर्शन व किवदंती ब्रााहृणों में मिलते है। हर स्थानीय वैदिक शाखा का अपना ब्राह्मण हुआ करता था। अब केवल 19 (2 रिगवेद, 6 सामवेद, 10 यजुर्वेद व 1 अथर्ववेद संबन्धी) ही बचे हैं। इनकी रचना 700 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानी जाती है। इनके विषयों में एक ही वेद के बारे में भिन्नता पायी जाती है।
आरणयक में अनुष्ठानों के वर्णन के साथ सांकेतिक अनुष्ठानों पर वाद विवाद व दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। कुछ विद्वान इसे वन में जाकर अध्ययन करने वाले ग्रन्थ मानते हैं तो अन्य वानप्रस्थाश्रम किये जाने वाले अनुष्ठानों की नियमावली मानते हैं।
उपनिषदों का केन्द्र ब्राहृ व आत्मा की खोज के दर्शन पर केन्द्रित है। इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इन्हें हिन्दू धर्म व संस्कारों का आधार माना जाता है। आरण्यकों को कर्म खंड व उपनिषदों को ज्ञान खंड भी माना जाता है।
ईसा से करीब 100 वर्ष पूर्व वेदांगो का उदय हुआ। इनका उद्देश्य उस समय के लोगों के समझने लायक बनाना था। वेदांगो के 6 विषय उच्चारण, छन्द गायन, व्याकरण, शब्द साधन (व्युत्पत्ति), भाषा विज्ञान, धर्म संस्कार व समय ज्ञान एवं खगोल विद्या थे। वेदांग का उद्भव वैसे तो वैदो के सहायक ज्ञान पाने के लिये हुआ था, किन्तु आगे चलकर यह कला, संस्कृति व हिन्दू दर्शन का आधार बन गया। उदाहरण स्वरूप कल्प वेदांग अध्ययन से धर्म सूत्र होता हुआ धर्म शास्त्र में परिवर्तित हो गया।
परिशिश्ट –
यह वेदों पर सहायक टिप्पणियाँ है जो वैदिक साहित्य का तार्किक व कालक्रम सहित विस्तार है। वैसे तो सभी वेदों के परिशिष्ट हैं किन्तु सर्वाधिक अथर्व वेद पर आधारित हैं।
उपवेद-
इन्हें वेदों के तकनीकी विषय का प्रायोगिक साहित्य माना जाता है। चरणव्यूह के अनुसार चार उपवेद हैं-
1. धनुर्वेद (ऋगवेद आधारित)
2. स्थापत्य (आर्किटेक्ट) वेद (यजुर्वेद आधारित)
3. गंधर्ववेद (नृत्य व गान) (सामवेद आधारित)
4. आयुर्वेद (अथर्ववेद आधारित)
कुछ वैदिक काल के बाद के साहित्य में नाट्य शास्त्र, महाभारत व पुराणों को पाँचवाँ वेद माना गया है। नाट्य शास्त्र के बारे में ऐसा माना जाता है कि शब्द ऋगवेद, गायन सामवेद, भंगिमा यजुर्वेद व भाव अथर्ववेद से लिये गयें हैं।
पुराण-
पुराण लोक कथाओं,किंवदंतियों आदि पर आधारित विविध विषयों का साहित्य है। सभी प्रमुख देवताओं जैसे विष्णु, शिव, देवी आदि के नाम पर 18 महापुराण व 18 पुराण हैं जिनमें 40000 से अधिक स्तोत्र हैं। इसमें भागवत् पुराण का हिन्दू धर्म में अत्यधिक प्रभाव है। पौराणिक साहित्य भक्ति आन्दोलन के साथ घुलमिल गया। द्वैत व अद्वैत दोनों विचार धाराओं में महा पुराणों की व्याख्यायें मिलती है।
पाशचात्य देशों में संस्कृत का अध्ययन सत्रहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में आर्थर शोपेनहाउर ने वेदों की (विशेषकर उपनिषदों) ओर ध्यान आकर्षित किया। संहिताओं का अंग्रेजी रूपान्तरण उन्नीसवीं सदी के अंत तक हो चुका था।
राल्फ टी एच ग्रिफिथ के अनुसार वेद सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जिसके लिये पश्चिम हमेशा पूर्व का ऋणी रहेगा।
पाशचात्य देशों व भारत के वैदिक अध्ययन में एक महत्व पूर्ण अन्तर यह है कि जहाँ भारतीय विद्वानों ने इसे आद्यात्मिक रूप से अध्ययन किया पास्चात्य विद्वानों ने विज्ञान के दृष्टिकोण से इनका अध्ययन किया।
संदर्भ
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विश्व सरकार

आज पूरी दुनिया में आतंकवाद, आन्तरिक मतभेद, अपराधों की बहुलता व धार्मिक प्रतिद्वन्दिता का माहौल है। अपने आर्थिक, भोगोलिक व अन्य स्वार्थों के चलते कई देशों की सरकारें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में अन्य देशों में अशान्ति का वातावरण पैदा करने का प्रयास करती रहती हैं। एक देश के अपराधी दूसरे देश में शरण लेकर देश के कानून से बचे रह कर अपराधों का संचालन खुले रूप से करते हैं। विभिन्न देशों के अलग अलग कानूनों का ऐसे अपराधी भरपूर लाभ उठाते हैं।
पूरे विश्व में राजनीतिज्ञ इन समस्याओं से निपटने के प्रयास अपने अपने तरीके से कर रहे हैं किन्तु अपराध हैं कि बढ़ते ही जा रहे है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी देश इन समस्याओं से ग्रस्त हैं। अतः आवश्यक है कि सभी देश मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें।
समस्या का समाधान निकालने से पहले इन समस्याओं के कारण ढूँढना आवश्यक है। यूँ तो सामाजिक विचारक कई कारण बतलाते रहतें हैं। लेकिन ये कारण या तो एक क्षेत्र विशेष के लिये लागू होते है अथवा एक संकीर्ण दृष्टि से विश्लेषित सोच की उपज है। यदि हम समूचे मानव समाज की दृष्टि से वृहत विश्लेषण करें तो आज की समस्याओं के मूल में इन कारणों को पायेगें –
1. विध्वंसकारी हथियारों की उपस्थिति से कई क्षेत्रों में भय का वातावरण। कुछ देशों ने वैज्ञानिक व धन बल से संहारक हथियारों का आविष्कार कर उत्पादन करना शुरु किया। इनको शक्ति का प्रतीक बनाकर दूसरे देशों या विरोधी तत्वों को बेच कर अधिक धन अर्जित करने का साधन बनाया। परिमाम स्वरूप कई देश गलत तरीकों से धन अर्जित करने वालों को प्रोत्साहन देकर ये साधन जुटाकर शक्ति बढ़ाने लगे। बढ़ती शक्ति के कारण उपजित अंहकार ने विवादों को बढ़ाया।
2. हथियारों की आसान उपलब्धता ने अपराधियों की ताकत में कई गुना इजाफा किया इस कारण सरकार व अपराधियों में प्रतिद्वन्दिता को बढ़ाया।
3. धार्मिक अनुनायियों की संख्या को वर्चस्व का प्रतीक मानकर भय, लालच व जबरन धर्म परिवर्तन ने एक नयी सामाजिक प्रतिद्वन्दिता को जन्म दिया जिसने आज उन्माद का रूप ले लिया।
4. प्राकृतिक साधनों को सीमित मान कर ताकतवर देशों की विश्व के साधनों को अपने नियन्त्रण में लेने की प्रतिस्पर्धा ने भी विवादों को विश्वव्यापी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उपरोक्त कारणों के मद्देनजर यदि हम आज की समस्याओं को देखें तो किसी एक देश के लिये अकेले इन समस्याओं से लड़ना संभव नहीं है। सभी देश मिलकर ही इन समस्याओं से मानव समाज को मुक्त कर सकते है। अतः आवश्यकता है कि सभी तरह की राजनीतिक व भौगोलिक
सीमाओं को तोड़ कर पूरे विश्व में एक सरकार स्थापित कर दी जाये। यह इस प्रकार संभव हो सकता है –
1. संयुक्त राष्ट्रसंघ पहले से ही एक ऐसी संस्था है जिसको विश्व सरकार में परिवर्तित किया सकता है। जरूरत सिर्फ सभी के अधिकार बराबर करने की है। शेष देशों को सदस्यता के लिये आमन्त्रित किया जा सकता है।
2. विश्व सरकार के लिये संविधान कुछ प्रजातन्त्रिय देशों के संविधानों से उपयुक्त अंशों को लेकर आसानी से वनाया जा सकता है। यह सभी पर एक जैसा लागू होगा। आज कल यातायात व संचार माध्यमों से पूरे विश्व में एक सरकार चलाना आसानी से संभव है।

मानव समस्याओं को कम करने के लिये संविधान में निम्न पहलुओं को सम्मलित करना जरूरी है –
1. साधारण हथियारों जैसे बन्दूक (स्वचालित नहीं) व पिस्तौल को छोड़ कर अन्य हथियारों का उत्पादन तुरन्त बन्द कर इन उद्योगों का उपयोग आवश्यक वस्तुओं के निर्माण के लिये किया जाये। वर्तमान हथियारों को शीघ्र नष्ट किया जाये। सीमायें समाप्त हो जाने से इन हथियारों की प्रासंगिकता समाप्त हो जायेगी।
2. प्राकृतिक साधन जहाँ हैं वहाँ रहने वालों की संपत्ति होगें। वहाँ रहने वाले लोग ही उनका विक्रय सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर कर सकेगें।
3. न्यूनतम व अधिकतम आय का अन्तर 10 गुना से अधिक नहीं होगा। इससे अधिक आय पर सरकार का अधिकार होगा। यह आर्थिक विषमता को समाप्त कर सामाजिक सामन्जस्य बढ़ाने के लिये जरूरी है।
4. पूरे विश्व में एक जैसा पाठ्यक्रम होगा, भाषा का माध्यम क्षेत्रानुसार अलग हो सकता है लेकिन एक विश्व भाषा चुनकर सबको जरूर सिखाई जाये। अधिकृत शिक्षण संस्थाओं के अतिरिक्त सभी प्रकार की कोचिंग प्रतिबंधित की जाये।
5. किसीको भी मुफ्त में कुछ नहीं दिया जाये। निशक्तों व दिव्यागों से यथा संभव काम लेकर पारिश्रमिक अक्षमता के अनुपात में अधिक दिया जाये। इससे उनके आत्म सम्मान में वृद्धि होगी।
6. लोगों को अपनी आस्था के अनुसार धर्म पालन करने की स्वतन्त्रता हो। स्कूलों में सभी धर्मों को पढ़ाई में शामिल किया जाये जिससे अपनी आस्था के अनुसार युवा अपना धर्म चुन सकें। किसी भी प्रकार के प्रलोभन देकर, भय से व उकसाकर धर्म परिवर्तन करवाना दंडनीय अपराध हो।
7. सार्वजनिक रूप से किसी की निन्दा करना व अपशब्द कहना दंडनीय अपराध हो।
8. धार्मिक स्थलों की आय पर सरकार का अधिकार हो। रखरखाव व प्रबंधन कर्मचारियों का वेतन तय मानकों से सरकार दे।
9. समाज के लिये हानिकारक विषय वस्तु जैसे दुर्भावना फैलाने वाले भाषण, उत्तेजक चित्र व लेख आदि वेब साइट पर डालना दंडनीय अपराध हो।
इस विश्व सरकार से निम्न लिखित लाभ तो अवश्य ही अपेक्षित हैं –
1. देशों की सीमायें समाप्त हो जाने से सीमा शुल्क (कस्टम) व आव्रजन (माइग्रेशन) की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी जिससे समय व मानव श्रम की बचत होगी।
2. एक संविधान, एक विश्व (कामन) भाषा व एक जैसी शिक्षा होने से सभी सामाजिक श्रेणियों के लोगों का आपसी मेलजोल बढ़ेगा। वैश्विक स्तर पर सामाजिक उन्नति की प्रबल संभावना।
3. बिना रोक टोक अथवा बिना सीमा शुल्क के व्यापार से कीमतों में कमी एवं उपलब्धता में सुधार अपेक्षित।
4. सीमाओं के हट जाने से सीमा सुरक्षा खर्च की बचत का उपयोग लोक कल्याण में किया जाना संभावित।
5. आर्थिक असमानता कम होने से समाज में संतोष में बढ़ोतरी व अपराधों में कमी अपेक्षित।
विश्व सरकार गठन में विभिन्न देशों, विशेष रूप शक्ति संपन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षौ का अहम् बाधक हो सकता है। पूरे विश्व की भलाई के लिये यदि ये अहम् से उपर उठ कर सभी इस दिशा में पहल करें तो हमारे ऋषि मुनियों का वसुधैव कुटुम्बकम का सपना साकार हो सकता है।

बुलंदियों तक पहुँचाने वाले 9 चमत्कारी मंत्र (दी सीक्रेट लेटर्स आफ ए मांक हू सोल्ड हिज सफारी पर आधारित) लेखकः राबिन शर्मा, प्रकाशकः जैयको बुक्स

सामाजिक दबावों के चलते हम प्रायः अपनी वान्छित राह से कब भटक जाते हैं
पता ही नहीं चलता है। नीचे लिखे नौ मंत्र हमें सही राह दिखाकर बुलन्दियों को
छूने में मददगार हो सकते हैं।
1. स्वयं को पहचाने –
स्वयं को पहचानना आसान नहीं है। हमें ईश्वर ने सबसे बड़ी देन के रूप में अपनी एक पहचान दी है। हम स्वयं को अपनी जिन्दगी जीने के लिये समर्पित करें यह हमारा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने जैसा होगा। हमें सामाजिक दबाव में न आकर हमें अपने अनुसार, अपने आदर्शों व अपने स्वप्नों को साकार करने प्रयास करते हुए जीना चाहिये। हमें हमारे अन्दर छुपी उम्मीदों, इच्छाओं हमारी ताकत व कमजोरियों को जानने का प्रयास करना चाहिये। हमें मालूम होना चाहिये हम कहाँ तक पहुँचे व किस आरे जा रहे हैं। हमारा हर निर्णय व हर कदम हमारे अपने जीवन को सच्चाई, इमानदारी व केवल अपने अनुसार जीने के समर्पण से निर्धारित होना चाहिये। इस प्रकार हम अवश्य ही उम्मीद से
अधिक सफल जीवन जी सकेगें।
2. डर को गले लगायें –
प्रायः अदृश्य डर का अहसास हमें आगे बढ़ने से रोकता है। इसके चलते हम एक आराम दायक स्थिति में सिमट कर रह जाते हैं। वास्तव यह सबसे कम सुरक्षित स्थिति है. जीवन में सबसे बड़ा खतरा कोई खतरा नहीं उठाना ही है। हम जब हर बार किसी खतरे का सामना करते हैं, तो हमें वह शक्ति वापस मिल जाती है जो हमने डर के कारण खो दी थी। डर के दूसरी ओर हमारी ताकत होती है। हर बार जब हम आगे बढ़ने अथवा उन्नती के लिये कठिनाईयों का सामना करते हैं, डर के बन्धन कमजोर होने लगते हैं। जितना हम डर का सामना करेगें हम अपने को उतना ही मजबूत पायेगें। इस प्रकार निडर व ताकतवर होकर हम अपने सपनों को साकार कर सकेगें।
3. दयालु बने –
जिस प्रकार हमारे शब्द हमारे विचारों को व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार हमारे कर्म हमारे विश्वास को प्रकट करते हैं। चाहे जितना भी नगण्य हो, हमारा किसी के प्रति व्यवहार दर्शाता है कि हम स्वयं व अन्य सभी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। यदि हम किसी का अनादर करते हैं तो स्वयं का अनादर करते हैं। यदि हम किसी पर संदेह करते हैं तो स्वयं पर संदेह करते हैं। यदि हम दूसरों के प्रति कठोर हैं तो स्वयं के प्रति कठोर हैं। यदि हम हमारे आसपास के लोगों की सराहना नहीं कर सकते तो स्वयं को भी नहीं सराह सकते। हर व्यक्ति जिसके संपर्क में हम आते हैं अथवा हम जो भी करते हैं हमें आशा से अधिक दयालु, अपेक्षा से अधिक उदार व जितना संभव हो उससे अधिक सकारात्मक
होना चाहिये। दूसरों से संपर्क का हर क्षण हमारे लिये हमारे उच्च मूल्यों को दर्शाने व हमारी सह्मदयता से प्रभावित करने का एक अवसर है। इस प्रकार हम एक समय एक व्यक्ति बेहतर इन्सान बनाकर विश्व को बेहतर बना सकते हैं।
4. रोज थोड़ा सुधार करें –
हम जिस प्रकार छोटे छोटे काम करते हैं उसी तरह सभी कार्य करते हैं। यदि हम छोटे छोटे काम अच्छी तरह से करते हैं तो बड़े काम में भी उत्कृष्ट ही रहेगें। इस प्रकार उत्कृष्ट निष्पादन हमारी आदत बन जाती है। इससे भी अधिक यह जानना जरूरी है कि हमारा हर प्रयास अगले कदम की आधारशिला है, इस प्रकार हम थोड़ा थोड़ा करके विशाल उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं, हमाराआत्मविश्वास बढ़ता है और हम असाधारण सपनों को साकार कर सकतें है। बुद्धिमान लोग यह समझते हैं हर रोज थोड़ा सा सुधार लम्बे समय में अनअपेक्षित सफलता के शिखर पर पहुँचाते है।
5. अच्छे से अच्छा जीवन जियें व अच्छे से अच्छा काम करें –
कोई भी काम छोटा नहीं होता है। हर परिश्रम हमारी प्रतिभा दर्शाने , एक कलाकृति बनाने, व हमारी क्षमता दिखाने का एक मौका होता है। हमें पिकासो की तरह लगन, समर्पण, दिल से व उत्कृष्टता से हमारा काम करना चाहिये। इस प्रकार न केवल हमारी उत्पादकता दूसरों के लिये प्रेरणा स्त्रोत बन जायेगी बल्कि हमारे आसपास के लोगों के जीवन को भी प्रभावित करेगी। जीवन को सुन्दरतम तरीके से जीने का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हम वही करें जो हमारे लिये मायने रखता हो, तथा उसमें इतनी दक्षता प्राप्त कर लें कि देखने वाले हम पर से नजर नहीं हटा पायें।
6. अपना वातावरण स्वयं चुनें –
हम अपने आप को हमारे आसपास के वाताववरण से अलग नहीं कर सकते हैं। इसलिये हमें हमेशा सचेत रहना चाहिये कि हम किस वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रभावित हों। यह एक बुद्धिमता की निशानी है कि हम वही जगह चुनें जो हमें प्रोत्साहित करे अथवा उर्जा प्रदान करे व ऐसे लोगों का साथ चुनें जो हमारा उत्साह वर्धन करे व प्रगति में सहायक हों। हमारे कार्य स्थल या व्यक्तिगत जीवन में यही सकारात्मक मित्र अथवा साथी हमे हमारे चरम उत्कर्ष तक पहुँचाने में मददगार होगें।
7. छोटी छोटी खुशशियों का आनंद लें –
अधिकतर लोग उनके लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण जीवन में क्या है तभी जान पाते है जब बहुत देर हो चुकी होती है, तब वे इस बारे मे कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वे अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय को ऐसी चीजों को प्राप्त करने में लगा देतें है जिसका महत्व अंत में नगण्य है। समाज हमें हमारे जीवन को भौतिक वस्तुओं से भर लेने की ओर आकर्षित करता है, किन्तु हमारा अन्तस
जानता है कि वास्तविक खुशी वही है जो हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाये व हमें आगे बढ़ने में सहायता करे। हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ कितनी ही अनुकूल अथवा कठिन हों, हम सभी के पास ढेरों छोटी छोटी खुशियाँ बिखरी रहती है जिनको हम गिन सकते हैं। जैसे ही हम इन खुशियों का हिसाब रखने लगते है हमारा जीवन खुशियों से भर जाता है। हमारा मन आभार से भर जाता है, व
हमारा हर दिन एक बड़ा उपहार सा लगने लगता है।
8. जीवन का लक्ष्य प्रेम है –
हम कितना अच्छा जीवन जीते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आपके मन में कितना प्यार है। हमारा दिल दिमाग से अधिक समझदार है, उस पर भरोसा करें व उसकी बात मानें।
9. क्षमता से बड़े लक्ष्य को पाने का प्रयास करें –
पृथ्वी पर कोई भी अतिरिक्त व्यक्ति जीवित नहीं है, हममें से हरएक किसी न किसी उद्देश्य अथवा कार्य विशेष से यहाँ है। इसलिये अपने स्वयं व उनके लिये जिन्हें आप बहुत प्रेम करते हैं अपने जीवन को सुन्दरतम बनाईये। खुश रहें और जीवन का खूब आनंद लें। सिर्फ अपनी शर्तों पर सफलता प्राप्त करें, ना कि समाज द्वारा सुझाई गई शर्तों पर। इससे भी अधिक जरूरी है कि अपने आप को
महत्वपूर्ण बनायें। स्वयं को उपयोगी बनायें, व अधिक से अधिक लोगों की सहायता करें। इस प्रकार हम में से हरएक साधारण जीवन से असाधारण उँचाईयों  तक पहुँच सकते हैं व एक मिसाल कायम कर सकतें हैं।

नयी पीढ़ी

 

हमेशा से ही बुजुर्गों का यह मानना रहा है कि उनका बचपन अथवा युवावस्था का समय आज की अपेक्षा अधिक अच्छा था। अधिकतर लोग यह मानते हैं कि आज की पीढ़ी आलसी, निरंकुश व संस्कारहीन है। किन्तु यह मूल्यांकन पुराने मानकों पर आधारित है। अपने ३० वर्ष के कार्यकाल, ५ वर्ष तकनीकि कालेजों में अध्यापन काल व सामाजिक एवं पारिवारिक संपर्को के चलते मैंने दो या तीन नयी पीढ़ियों को काफी निकट से समझने का प्रयास किया है। इस अनुभव के आधार पर मैंने इनमें ये विशेषतायें पायीं है:-

१. बुद्धिमान

हर नयी पीढ़ी में बौद्धिक विकास बढ़ता जा रहा है। सीखने की क्षमता में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। तर्क शक्ति बढ़ रही है। इसका प्रमाण जन्म से ही देखने को मिल जाता है। जहाँ पहले नवजात शिशु दो हफ्ते तक आँख भी नहीं खोल पाते थे, आजकल बच्चे पहले दिन से ही नजरें घुमाकर वातावरण का जायजा लेने लगते हैं। दो तीन दिन में तो वे सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को पहचानने लगते हैं।

२. जिज्ञासु

जानने व समझने की पृवत्ति हर पीढ़ी के साथ बढ़ रही है। आजकल की पीढ़ी आधुनिक व सूचना प्राद्योगिक उपकरणों का उपयोग बचपन से ही सहज रूप से कर पहले की अपेक्षा अधिक जानकारी रखती है। उपलब्ध जानकारी का उपयोग वह अच्छी तरह करना भी जानती है। उनका सामान्य ज्ञान ४० वर्ष पूर्व हम उम्र बच्चों की तुलना में कई गुना अधिक है।

३. आत्मविश्वास

नयी पीढ़ी के आत्मविश्वास उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। आज के बच्चे व युवा आसानी से हार स्वीकार नहीं करते। ऐसा कोई काम नहीं जिसके लिये वे कौशिश न करें। उनमें अजनबी से बात करने में न कोई झिझक दिखती है ना ही मंच पर प्रदर्शन का कोई भय। आजकल के बच्चों को चुनौतियाँ पसंद हैं तथा वे जोखिम उठाने के लिये तत्पर रहते हैं।

४. स्वतन्त्र विचार क्षमता

युवा पीढ़ी में अपनी स्वयं की परख क्षमता है। जिससे वे स्वयं अपने लिये अच्छे बुरे का निर्णय लेने में सक्षम हैं। प्रायः उनके निर्णय सही पाये गये हैं। इसके बावजूद वे अनुभवों का आदर करते हैं व जरूरत महसूस होने बड़ो की सलाह लेने में संकोच नहीं करते। हाँलाकि अंतिम निर्णय उनका स्वयं का ही होता है।

५. जीने की कला

नयी पीढ़ी जीवन के हर पल को जीना अधिक अच्छी तरह से जानती है। कोई भी उत्सव व आयोजन हो उसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। गरबा, गणेशोत्सव व दुर्गा पूजन का विस्तार इसका प्रमाण है। पर्यटन में भी युवा वर्ग का बाहुल्य आसानी से देखा जा सकता है।

६. सतत सुधार का प्रयास

नयी पीड़ी हर क्षेत्र में लगातार नये आयाम स्थापित करने में लगी है। गाने का मंच हो या नाच का छोटे छोटे बच्चों के अनूठे अंदाज हैरत में डाल देतें हैं। प्रतिभा खोज के मंच पर कई प्रदर्शन तो असंभव से ही लगते हैं। सतत सुधार व चुनौतियों से जूझना नयी पीढ़ी का स्वभाव बन गया है।

७. प्राथमिकता साफ

नयी पीढ़ी अपनी प्राथमिकता के बारे में अधिकतर दुविधा में नहीं रहती है। वह अच्छी तरह से जानती है कि उन्हें कहाँ जाना है और क्या प्राप्त करना है। किसी की सलाह या दबाव उन्हें अपने मार्ग से नहीं डिगा सकता है।

८. संवाद कुशलता

नयी पीढ़ी प्रायः किसी भी व्यक्ति के सामने अपनी बात सहज व सीधे से रख सकती है। संवाद की यह कुशलता उन्हें जीवन में सामाजिक, व्यवहारिक व कार्य क्षेत्र में सफल होने में बहुत मददगार होती है।

९. उर्जा

नयी पीढ़ी में उर्जा की उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। आज के बच्चे व युवा थकना तो जैसे जानते ही नहीं। सवेरे से देर रात तक उन्हें व्यस्त देखा जा सकता है।

ये ही गुण हैं जो भविष्य के प्रति मानव आशाओं को जीवित रखे हुए हैं। आवश्यकता सिर्फ यह है कि वे अपने मार्ग से न भटकें।

 

 

मनुष्य अपराध क्यों करता है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, ऐसा बचपन से सुनते व पढ़ते आये हैं। किन्तु आज जिस प्रकार अपराधों के किस्से अखबारों व टीवी समाचारों में रोज सुनने को मिलते हैं, उससे तो यही लगता है कि मनुष्य पुनः अपने आदि काल की और लोट रहा है। आज मनुष्य पूरी तरह संवेदन हीन हो कर किसी भी प्रकार अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है। आज सामाजिक बन्धन अथवा कानून उसके इस प्रयास में बाधक नहीं है। बढ़ते अपराध यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि मनुष्य आखिर अपराध करता क्यों है।
मनुष्य की हर गतिविधि मस्तिष्क द्वारा ही संचालित होती है, अतः अपराध का मस्तिष्क से संबंध अवश्य होना चाहिये। मानव मस्तिष्क एक जटिल संरचना है। विशेषज्ञों का मानना है मनुष्य के मस्तिष्क में एक समय में हजारों विचार आते रहते हैं। हमारे दिमाग के बाँये हिस्से का एक बड़ा भाग इन पर नियंत्रण रख कई विचारों को रोकने का कार्य करता है। इस तन्त्र के कमजोर हो जाने अथवा बन्द हो जाने पर मनुष्य विवेक हीन होकर कुछ भी कर सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क के कई भाग सक्रिय व निष्क्रिय होते रहते हैं। यह बहुत कुछ उसके परिवेश व भावों पर निर्भर करता है। कई परिस्तिथियों में मनुष्य अपना विवेक गवाँ बैठता है। संभवतः इसी परिस्थितिवश मनुष्य अपराध कर बैठता है। प्रश्न अब यह उठता है कि आजकल इस तरह की पृवत्ति में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है।

1. ऐसा माना जाता है कि बच्चे तेजी से सीखते हैं। इस काल को बोलचाल की भाषा नाजुक काल भी में कहा जाता है। तेजी से सीखने का प्रमुख कारण बीएनडीएफ (ब्रोन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में पाया जाना है। यह मस्तिष्क के विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिषक के उस भाग (न्यूक्लियस बसालिस)को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध भी हो जाता है व सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है। बच्चों पर आजकल बढ़ते बस्तों का बोझ व माता पिता की बच्चों को हर प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने का दबाव भी बीएनडीएफ की मात्रा को प्रभावित कर सकता है जिससे सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जो बच्चे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते वे नकारात्मक मानसिकता के शिकार हो सकते है। अपनी असफलता का कारण दूसरों को मानते हुए
बदले की भावना मन में पाल सकते हैं।
2. मनुष्य के स्वभाव को मस्तिष्क में दो चीजें प्रभावित करती हैं। पहला डोपेमाइन सिस्टम जो मस्तिष्क मे स्थित खुशी के केन्द्र क्रियाशील बनाता है। यह स्थिति उकसाने का कार्य करती है। नशा करने, जुआँ खेलने व अन्य उकसाने वाली गतिविधियाँ डोपेमाइन को बढ़ाने का काम करती हैं। इस मनोदशा में मनुष्य की विवेकशीलता कम हो जाती है। दूसरी आक्सीटोसिन जो चित्त को शान्त करता है, मन में कोमल भावना व विश्वास पैदा करता है। भावनात्मक संबन्ध, रचनात्मक गतिविधियाँ
आक्सीटोसिन को बढ़ाने सहायक होती है। यह स्थिति भूलने में भी मददगार होती है, व दुःख से उबरने में सहायक होती है। आज की आपाधापी की जीवन शैली, बिखरते परिवार व कमजोर सामाजिक संबन्धों के चलते यह स्वाभाविक ही है कि अधिकतर लोगों में डोपेमाइन सिस्टम
अधिक प्रभावी रहता है।
3. आज के सामाजिक परिवेश में जहाँ ऐशोआराम के साधन सुख, संपन्नता व समाज में आदर पाने के मापदन्ड हों। सभी प्रकार के मीडिया ललचाने वाले विज्ञापनों तथा अपराधों व अपराधी के बच निकलने के समाचारों को 24 घन्टे दिखातें हों। तथा सिनेमा, टीवी व इन्टरनेट पर उकसाने वाली जानकारी आसानी से सुलभ हो ऐसे माहोल में निराश मानसिकता व डोपेमाइन अघिकता वाले लोग अपराध में लिप्त हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

अपराध में लिप्त होने के उपरोक्त कारणों को समझने के बाद इस समस्या का निदान आसान हो जाता है। स्कूल, परिवार व समाज अपने परिवेश में भावनात्मक दृढ़ संबन्ध बनाकर इस समस्या के निराकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। सभी प्रकार के मीडिया सकारात्मक प्रकार की
सामग्री को प्राथमिकता देकर लोगों में सही मानसिकता बनाने में सहायक हो सकते हैं। और सबसे अधिक आवश्यकता है प्रारम्भिक शिक्षा में परीक्षा पास करने अथवा बहुत सारे विषय पढ़ाने से अधिक बच्चे के पूरे व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देने की। किताबी ज्ञान से अधिक आवश्कता है दया,
ईमानदारी, मेहनत व लगन से कार्य करने की भावना, टीम भावना, दूसरों की सहायता जैसे मानव मूल्यों के विकास की। साथ ही जरूरत है रुचि अनुसार किसी न किसी प्रकार की कुशलता के विकास की, जिससे वह अपनी प्रारम्भक जीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बन सके। शिक्षा का
विस्तार लोग अपनी रुचि व सुविधा के अनुसार कर सकें इसके लिये उम्र का बन्धन विद्यालय में प्रवेश के लिये नहीं होना चाहिये। कुछ हद तक पत्राचार पाठ्यक्रमों की सुविधा है लेकिन नियमित शिक्षा का अपना अलग महत्व है।