अनश्वरता

 

बचपन में कई बड़े बुजुर्गों व उपदेशकों प्रायः कहते हुए सुना था कि शरीर नश्वर है। जानवरों को मरते व वस्तुओं को टूटते देखकर मन में विश्वास सा बैठ गया था कि पृथ्वी पर कोई भी वस्तु हमेशा के लिये नहीं है। सब नश्वर है अतः किसी भी वस्तु से मोह नहीं करो, ऐसा ही जन साधारण का मन था। परिणाम स्वरूप लोग आपस में मिल बाँट कर खाते थे। समाज आपसी सामन्जस्य था व लोग संतोषमय जीवन व्यतीत करते थे। लोग थोड़े में ही संतोष कर खुश रहते थे।

फिर कुछ बड़ा होने पर विज्ञान में पढ़ाया गया कि पदार्थ (मेटर) अनश्वर है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। पुराने विश्वास को तोड़ने के लिये नये नये तर्क दिये गये। पदार्थ का रूप बदल सकता है जैसे पानी से भाप या लकड़ी से कोयला, लेकिन वह नष्ट नहीं होता है। तर्क सटीक लगे लोगों को मानना पड़ा कि पदार्थ अनश्वर है।लोगों के मानस परिवर्तन ने उनकी जीवन शैली को प्रभावित किया। लोगों में संचय पृवत्ति बढ़ गई। लोग वर्तमान के साथ भविष्य की चिन्ता करने लगे।  पदार्थों ने नया रूप लेना शुरू किया, बाजार में संचय लायक वस्तुओं की बाढ़ सी आगई। संचय का मोह बढ़ने लगा, उदारता सिमटने लगी। समाज में संचित संपत्ति का आदर होने लगा। नये सम्मान के मापदंड़ ने लौगों में सम्मान जनक स्थान पाने के लिये होड़ सी पैदा कर दी। येन केन प्रकारेण संचय की ललक ने भ्रष्टाचार, लूट, चोरी व बेईमानी जैसी बीमारियाँ समाज में पैदा कर दी। नयी आर्थिक व्यवस्था ने समाज को गरीब व अमीर दो धड़ों में बाँट दिया।

कालेज तक आते आते आइन्सटीन का सापेक्षता का सिद्धान्त विज्ञान में पढ़ाया गया। शायद ही कुछ लोगों को ये सिद्धान्त पूरी तरह समझ आया हो। किन्तु इसका एक पहलू कि पदार्थ व उर्जा का आपस का निकट का संबंध है जल्दी ही कई लोगों की समझ में अच्छी तरह आ गया। अधिकतर लोगों ने उर्जा को शक्ति से जोड़ लिया। फिर तो शक्ति संचय की मानों होड़ लग गई। देश, संगठन, एवं व्यक्तिगत स्तर पर शक्ति संचय के प्रयास भी युद्ध स्तर पर किये जाने लगे। देशों को अपनी जनता की रक्षा के लिये शक्ति की जरूरत थी, संगठन को अपना प्रभुत्व दिखाने के लिय व व्यक्तिगत स्तर पर अपनी संचय शक्ति बढ़ाने या संचित धन की रक्षा के लिये। शक्ति संचय की प्रतिस्पर्धा का परिणाम यह रहा कि आज विस्फोटकों का भंडार पूरे भू मंडल को नष्ट करने में सक्षम है। धन संचय व शक्ति संचय के आपसी ताल मेल ने एक ऐसे वर्गों के समूह को जन्म दे दिया है जो अपने स्वयं की विचार धारा को कानून का रूप देकर पूरे राष्ट्र या विश्व पर थोपने में लगे हुए हैं।अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिये इन्हें निर्दोष व असहाय लोगों की निर्मम हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं है। आतंक फैलाना ही इनका एक मात्र उद्देश्य है। वर्चस्व स्थापना की होड़ ने मानव अधिकार की रक्षा के नाम पर महाशक्तियों ने पृथ्वी पर एकाधिकार मान रखा है।  यह प्रतिस्पर्धा मानवता को कितना गिराने के बाद रुकेगी, कहना मुश्किल है।

इसको रोक पाने का एक मात्र उपाय है नश्वरता के सिद्धान्त की पुनर्स्थापना। हमारे ऋषि मुनियों ने सब कुछ शून्य में मिल जाने की कल्पना की थी, आज उसी विचार धारा को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

शायद कबीर जी ने ऐसी ही स्थिति की कल्पना कर निम्न लिखित दोहे की रचना की होगी –

गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान।

जब आये संतोष धन सब धन धूरि समान।।