ध्यान की विधियाँ (स्वामी आदिश्वरानंदा की मेडीटेशन एन्ड इट्स प्रेक्टिस पर आधारित) अद्वैत आश्रम पब्लिशिंग डिपार्टमेंट

 

सार संक्षेप –

  1. योगा व वेदान्त की विचारधारा के अनुसार, ध्यान अपने उद्देशय से एकीकार होने की मानसिक क्रिया है। धारण करना (उद्देश्य पर केन्द्रित करना) इसकी प्रथम सीढ़ी है, जब यह धारणा सहज व निरन्तर हो जाती है तो वह ध्यान की स्थिति में पहुँच जाती है, तथा मस्तिष्क का बहाव सिर्फ उद्देश्य की ओर रहता है। ध्यान की चरम अवस्था समाधी है जिसमें मस्तिष्क उद्देश्य में लीन हो जाता है।
  2. सभी प्राणियों तीन इच्छायें प्रेरित करती है

– अमरत्व प्राप्ति की इच्छा

– असीमित ज्ञान प्राप्ति की इच्छा

– असीमित आनंद प्राप्ति की इच्छा

हम आशा व निराशा, हर्ष व विशाद, परिश्रम व आँसू तथा जीवन व मृत्यु से इन इच्छाओं की को पूरा करने में लगे रहते हैं।

  1. ध्यान हमें स्वयं को पहचानने में सहायक है। स्वयं को पहचानने की तीन स्थितियाँ है
  2. जब हम ध्यान में समय का ज्ञान खो देतें है।
  3. जब हम आसपास के वातावरण को भूल जाते है।
  4. जब हम हमारी चेतना खो देतें है। इस स्थिति में हम विदेह हो जाते हैं तथा एक असीम आनंद की अनुभूति करते हुए स्वयं के प्रकाश का दर्शन करते हैं।
  5. हमारे शरीर में सात सतहें है –
  6. मूलधारा (रीड़ का सबसे नीचे का भाग
  7. स्वाधिस्थान (जननांग)
  8. मनिपुरा (नाभि)
  9. अनहता (ह्मदय)
  10. विसुद्ध (गला)
  11. अजना (ललाट)
  12. सहरुारा (कपाल)

जब हमारा मस्तिष्क निचली तीन सतहों पर केन्द्रित रहता है तब वह काम व लोभ में लिप्त रहता है। चौथी सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने पर उसे प्रथम आध्यात्मिक ज्ञान का अहसास होता है। पाँचवी सतह पर केन्द्रित करने पर वह अज्ञान व भ्रम से मुक्त हो जाता है। छठी सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने से वह हमेशा ई·ार के दर्शन करता रहता है। सातवीं सतह पर मस्तिष्क केन्द्रित करने से अहम नष्ट हो जाता है। इस स्थिति में मनुष्य ब्राहृज्ञानी हो जाता है। यही समाधी की स्थिति है। यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रह सकती क्योंकि इस अवस्था में बाहरी संसार से संबंध कट जाता है।

  1. ध्यान तीन स्थितियों से गुजरता है, ये हैं जागृत, स्वपनावस्था तथा गहन निद्रा अवस्था। इन तीनों स्थितियों में हम हमारा मस्तिष्क सक्रिय रहता है। एक चौथी अवस्था भी है (तुरिया) जिसमें हम आत्मा में लीन हो जाते हैं। यह अवस्था अकल्पनीय है, न हम मस्तिष्क में कल्पना कर सकते हैं, ना ही किसी वस्तु से तुलना कर सकते हैं तथा ना ही इसका वर्णन कर सकते हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क सक्रिय नहीं रहता है।
  2. ध्यान का उद्देश्य हमारे अन्दर ईश्वर को अनुभव करने का है। हमारा मन ही सभी बाहरी दिव्यता दर्शाता है। हमारे मन की शक्ति को केन्द्रित कर ही हम ईश्वर को देख सकते हैं। तर्क, प्रेम, समर्पण व प्राणायाम हमारे मस्तिष्क को नियन्त्रित करते हैं। नियन्त्रित मस्तिष्क ही मन के हर कोने को प्रकाशित करने वाला दीप है।
  3. ध्यान हमारे उल्हास को शांत करता है, हमें शान्ति प्रदान करता है तथा हमें वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखने की क्षमता प्रदान करता है। ध्यान में प्रगति को हम दूर से आने वाली घन्टियों की आवाज, कानों में गूँजते हुए मधुर स्वरों अथवा आसपास तैरते हुए प्रकाश से पहचान सकते हैं।
  4. योग द्वारा दर्शायी ध्यान विधि-

– योग वास्तविकता को पुरुष व प्रकृति में विभाजित करता है। हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, मस्तिष्क व बुद्धि प्रकृति है। पुरुष इन सबसे परे हम स्वयं है। हमारा पुरुष शरीर, इन्द्रियों, मस्तिष्क, बुद्धि व आनंद की पाँच परतों (कोषों) से ढँका रहता है। प्रकृति व पुरुष, मन व पदार्थ मिलकर हमारा व्यक्तित्व व विविधता प्रदान करते है।

– अज्ञानता, अहं, लगाव, घृणा एवं जीवन का मोह हमारे सभी दुःखों का कारण हैं। बार बार दोहरायी गई सोच व विचार हमारे मन व शरीर में बस जातें हैं। ये हमारी आदतों को जन्म देते हैं तथा हमारे व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं, जिन्हें हम संस्कार कहते हैं। ये हमारे चित्त में पाँच अवस्थाओं बस जाते हैं। पहली निष्क्रिय अवस्था। दूसरी सुप्त अवस्था, उचित वातावरण जैसे प्रशंसा व पुरस्कार मिलने पर ये उभर आती हैं तथा दंड आदि के प्रतिकूल वातावरण में नियन्त्रित रहती हैं। तीसरी अवस्था में ये दबी हुई किन्तु ताकतवर रहती हैं। चौथी अवस्था में ये हमारे स्वयं के विपरीत अनुभवों के कारण स्वनियन्त्रण से शिथिल पड़ जाती हैं।

ये स्वप्रयास से पुनर्जीवित की जा सकती हैं। पाँचवीं अवस्था इनसे ऊपर उठने की है जो लगातार ध्यान द्वारा ही संभव है।

– इस प्रकार लगातार ध्यान द्वारा हम आध्यात्मिक संस्कारों को जागृत कर सकते हैं तथा विरोधी संस्कारों को नियंत्रित कर सकते हैं। स्वब्राह्म्य से साक्षातकार कर लेने बाद मानव वृत्ति जैसे इच्छा व ललक समाप्त हो जाती हैं।

– योग के अनुसार कुविचारों को सुविचार से, कुकल्पना को सद्कल्पना से बिना सोचे समझे उद्बोधन को सोच समझकर बोलने से एवं गलत शारीरिक स्थिति को सही शारीरिक स्थिति अपनाकर ही नियन्त्रित किया जा सकता है। इन सबके लिये मस्तिष्क को नियन्त्रण में रखने का प्रयास जरूरी है।

– सफल नियन्त्रण के लिये जरूरी है कि हम हमारे मस्तिष्क को ध्यान की ओर मोड़कर स्वंय को पहचानने का नियन्त्रित प्रयास करें।

– योग हमें आसनों के माध्यम से हमारे उद्वेलित शरीर इन्द्रियों व मन को शान्त करना सिखाता है। प्राणायाम मस्तिष्क को शान्त करता है तथा गलत विचारों व वृत्तियों को नियन्त्रित करने के लिये ध्यान द्वारा आदर्श संस्कारों को विकसित करना सिखाता है।

– योग के अनुसार निम्न लिखित आठ कदम स्वयं को पहचानने के लिये आवश्यक हैं –

  1. यम (अंकुश) द्वारा अहिंसा, सत्य, लालच का त्याग, पुरस्कार अथवा उपकार लेने का त्याग तथा पवित्र आचरण की आदत डालना।
  2. नियम (संयम) स्वच्छता, संतोष, सादगी, धर्म ग्रन्थों का अध्ययन व कर्मों के फल को ईश्वर पर छोड़ देने जैसे पाँच आचरणों का पालन।
  3. आसन यह शरीर को स्थिर व आरामदायक रखने में सहायक है। यह मस्तिष्क को केन्द्रित करने में भी सहायक है। आसन में रीड़ को सीधा रखना चाहिये जिससे ध्यान के समय नाड़ी से प्रवाह ऊपर की ओर उठसके।
  4. प्राणायाम श्वास ब्राम्ह ऊर्जा का भाग है। नियन्त्रित व लयबद्ध श्वास द्वारा मन शान्त हो जाता है।
  5. प्रत्याहरा (वैराग्य) इच्छानुसार इन्द्रियों से विरक्त होना।
  6. धारण, मन को एक वस्तु पर केन्द्रित करना।
  7. ध्यान, इसकी शुरुआत तब होती है जब धारण लगातार व सहज हो जाये।
  8. समाधि, जब ध्यान निरन्तर होकर ध्यान की विषय वस्तु में लीन हो जाये। समाधि दो प्रकार की होती है –

– संप्रज्ञानता मस्तिष्क में प्रश्न उपजते है (सवितर्क) जिनका वह समाधान

सोचता है (सविचारक), तत्पश्चात वह स्वभाविक रूप से निर्विचार होकर आनंद दायी (सानंद) हो जाती है।

– असंप्रज्ञानता यह मस्तिष्क की सभी गतिविधियों पर रोक लगाने के प्रयास से प्राप्त होती है। इसमें मन में सिर्फ अव्यक्त अहसास भर होता है।

  1. वेदान्त में ध्यान –

– वेदान्त के अनुसार ध्यान एक सघन मानसिक उपासना है। इसमें मन को लगातार शास्त्रो द्वारा अनुमोदित किसी पवित्र विषय पर केन्द्रित करना होता है। इससे संबन्धित विषय के विचार प्रवाह ही मन में आते हैं। सभी विरोधाभासी विचार समाप्त होकर अन्त में परम सत्य से साक्षातकार हो जाता है।

– ब्राहृ जो परम सत्य है, जिसे परमात्मा भी कहते हैं वह हम स्वयं हैं। वह स्वयं प्रज्ञ है।

– निर्गुण ब्रह्म स्वयं को समय व अन्तरिक्ष में सगुण ब्रह्म के रूप में व्यक्त करता है। वह एक सृजन कर्ता, पालन कर्ता अथवा विनाश कर्ता का रूप धारण कर लेता है। मनुष्य द्वारा उपासना किये जाने वाले देवताओं के नाम सगुण ब्रह्म को नाम देने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है।

– स्वयं को पहचानने का प्रयास करने वालों को ध्यान लगाने लायक बनने के लिये निम्नलिखित चार अनुशासन का पालन आवश्यक है –

  1. सत्य और भ्रम का अन्तर समझना, सिर्फ ब्रह्म ही सत्य है।
  2. इच्छाओं का त्याग।
  3. मन को नियन्त्रित करना, इन्द्रियों को वश में करना, सांसारिक आनंद से विरक्ति, धीरज रखना, धार्मिक साहित्य में आस्था तथा ब्रह्म में मस्तिष्क को केन्द्रित करना, इन छह गुणों की आदत डालना।
  4. सभी बन्धनों से मुक्त होने की तीव्र इच्छा।

– बीमारी, संशय व अनिर्णय तथा मन की चंचलता स्वयं को पहचान पाने

में रुकावट हैं।

– उपरोक्त चार अनुशासन वेदान्त ध्यान के आधार हैं। इसके अतिरिक्त वेदान्त ध्यान की तीन अवस्थायें वर्णित करता है। ये हैं योग्य गुरु को सुनना, ब्रह्म पर सुने हुए विचारों पर चिन्तन करना तथा ध्यान लगाना यानि सिर्फ चिर ब्रह्म संबन्धी विचारों को निरन्तर मन में रखना तथा अन्य सभी शरीर, मन, इन्द्रियों व अहम संबन्धी विचारों का त्याग करना।

– वेदान्त के अनुसार समाधि दो प्रकार की होती है। एक सविकल्प समाधि जिसमें साधक को ध्यान की विषय वस्तु का ज्ञान रहता है। दूसरी निर्विकल्प

जिसमें साधक स्वयं को भूल कर ब्रह्म में लीन हो जाता है।

  1. वेदान्त साधकों को तीन श्रेणियों में बाँटता है। उत्कृष्ट साधक वे हैं जो अज्ञान द्वारा थोपी गई सभी सीमाओं को नकार कर ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करते हैं। मध्यम साधक वे हैं जिन्हें गुरु ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के लिये मन्त्र जाप का निर्देश देतें है। निम्न श्रेणी में वे साधक आते हैं जिन्हें किसी साकार इष्ट को ध्यान में रख कर ऊँ का जाप करने का गुरु निर्देश देते हैं।
  2. वेदान्त के अनुसार ध्यान की विषय वस्तु ये हो सकती हैं –
  3. ईश्वर, जो स्वयं में है तथा महान शिक्षक है

2 ईश्वर, परमब्रह्म

  1. ईश्वर का अवतार
  2. विराट पुरुष, ब्रह्मांडीय पुरुष
  3. ऊँ, गायत्री मंत्र, वेद शलोक जैसे प्रज्ञानम ब्रह्म, अहं ब्रह्मांस्मि, अयं आत्म ब्रह्म, तत् त्वाम असि आदि पवित्र शब्द
  4. कथा उपनिषद् के अनुसार मन व पदार्थ एक ही वस्तु से बने हैं। अलग अलग आवृत्ति की प्राण की तरंगें उसमें ठोस, तरल, अच्छा अथवा बुरा आदि गुणों के रूप में दिखती हैं। तरंगें प्रगट रूप में जैसे किसी चलित वस्तु में, अप्रगट रूप में जैसे सुगंध, प्रकाश अथवा अन्धकार में या अप्रत्यक्ष रूप जैसे आलस्य, अशान्ति व प्रसन्नता के रूप में परिलक्षित हो सकती हैं।
  5. वेदान्त के अनुसार तरंगें तीन समूहों में बाँटी जा सकती हैं –
  6. तामस जैसे आलस्य ये शरीर की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं
  7. राजस जैसे इच्छा अथवा लगाव के कारण मन की अस्थिरता, इससे अहंम पैदा होता है जिस कारण स्वयं के ज्ञान में विकार आ जाता है
  8. सात्विक जैसे मन की शान्ति, यह पवित्र माना जाता है, क्योंकि यह

स्वयं की छबि को सबसे कम विकृत करता है

  1. हमारी तरंगें दूसरों को प्रभावित करती हैं तथा दूसरों से प्रभावित होती हैं। इन तीनों प्रकार की तरंगों का समन्वय हमारा चरित्र निश्चित करता है। तीनों प्रकार की तरंगें हमारे मस्तिष्क में हमेशा रहती हैं। अलग अलग समय में अलग प्रकार की तरंगें प्रबल हो सकती है। पवित्र स्थान सात्विक तरंगों को विकसित करने में सहायक होते हैं। अधिकतर पवित्र स्थल अपनी शान्त प्रकृति खोते जा रहे हैं।
  2. हमारा भोजन हमारे शरीर व मन को प्रभावित करता है, क्योंकि स्वभाव से दोनों पदार्थ हैं। हमारे भोजन का बड़ा हिस्सा मल के रूप में निकल जाता है, मध्य भाग से रक्त बनता है तथा सबसे उत्तम भाग हमारे मस्तिष्क मे चला जाता है। कुछ

खाद्य पदार्थ हममे तामस भाव पैदा करते है कुछ राजस तथा कुछ सात्विक भाव। भौजन की शुद्धता के लिये सामग्री व आध्यात्मिक शुद्धता दोनों जरूरी हैं। भोजन में तीन तरह की अशुद्धियाँ संभव हैं

– जातीय शुद्धि, प्याज व लहसुन उदाहरण के तौर पर उकसाने वाले पदार्थ हैं

– निमित्त अथवा धूल, बेक्टीरिया, थूक आदि से संक्रमणित भोजन

– आश्रय अथवा नैतिक अशुद्धता, इस प्रकार की अशुद्धि किसी अपवित्र, दुराचारी अथवा दुष्ट व्यक्त के बनाने व छूने से आ जाती है।

  1. ध्यान केन्द्रित करने का एक परखी हुई विधि है स्व विश्लेषण द्वारा नकारना है। विश्लेषण व नकारने के सात चरण हैं –
  2. अन्तर्मन में ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र आग पैदा करना। उसमें इच्छाओं,

लगाव व अनिशचित्ताओं की आहुति दें। स्वनियन्त्रण व नियमों का कठोरता से पालन करें

  1. मस्तिष्क को स्वतन्त्रता से भटकने दें। यह आभास कि आप मन को

भटकते हुए देख रहे है, उसका दायरा सिमटकर स्वयं की पहचान पर

केन्द्रित हो कर रह जायेगा

  1. धीरे धीरे सप्रयास हर विचार को पूर्ण चेतन में लीन कर दें
  2. अपने शरीर को रथ, आत्मा को उसका स्वामी, बुद्धि को उसका सारथी

तथा मन को उसकी लगाम मानें। साधक को मस्तिष्क को केन्द्रित कर

स्वयं की पहचान शरीर के अन्दर आत्मा(ब्रह्म) से करनी चाहिये।

  1. आत्मा का प्रकाश शरीर, मन, बुद्धि व आनंद से ढँका रहता है। इन

परतों को हटाकर ही आत्मा को पूरी तरह प्रकाशित देख सकते हैं।

  1. स्वयं को ब्रह्मान्ड का एक हिस्सा माने। शरीर विराट पुरुष का हिस्सा है,

प्राण ब्रह्मान्डीय शक्ति व मस्तिष्क ब्रह्मान्डीय मस्तिष्क का भाग है। आत्मा

ब्रह्मात्मा अथवा स्वयं का भाग है

  1. साधक इन्द्रियों व शारीरिक आनंदों को दोष मान कर इनसे अपने

मन को हटाये। ध्यान के लिये आसन, निश्चित समय,एकान्त व शान्त

वातावरण महत्वपूर्ण हैं।

  1. ध्यान की अन्य विधियाँ हैं –

– स्वयं का विश्लेषण, ये विधि उनके लिये है जो निराकार ब्रह्म पर ध्यान लगाते है। इसमें साधक

  1. स्वयं के अन्दर हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्जवलित होने का अनुभव करता है
  2. भटकते हुए मस्तिष्क पर नजर रखता है
  3. आत्मा की परतों (शरीर, प्राण, मन, बुद्धि व मोक्ष) को नकारता है।
  4. परम ब्रह्म को अपने अन्दर महसूस करता है
  5. स्वयं को ब्रह्मान्ड का हिस्सा मानता है
  6. विरक्ति के विचारों को जगाते हुए भौतिक सुखों से दूर हो जाता है

– रहस्मय उपासना, अपने इष्ट को हृदय में रखकर मानसिक आराधना।

– जप, निर्धारित समय व स्थान पर रोज मंत्रों की निर्णित संख्या में दोहराना

– प्राणायाम अथवा श्वास का नियन्त्रण

  1. प्राणी के श्वास लेने की गति का उसकी जीवित रहने की अवधि से सीधा संबंन्ध है। मनुष्य श्वास गति पहले करीब 12-13 प्रति मिनिट होती थी तथा औसत आयु 100 वर्ष, आजकल 15-16 है तथा आयु 80 वर्ष। इसी प्रकार हाथी की 11-12 आयु 100 वर्ष, कछुए की 4-5 आयु 150 वर्ष, बन्दर की 31-32 आयु 20 वर्ष तथा खरगोश की 38-39 आयु 8 वर्ष।
  2. प्राणायाम पाँच क्रियाओं को प्रभावित करता है –

– प्राण, श्वास क्रिया (इसका स्थान ह्मदय है)

– अपान मल उत्सर्जन क्रिया

– समान पाचन क्रिया

– उदान भोजन, निद्रा व मृत्यु के समय शरीर से प्राण निकलने की क्रिया (इसका स्थान गला है)

– व्यान रक्त संचार क्रिया (इसका स्थान पूरा शरीर है, ये रोग से बचाव करता है

  1. प्राणायाम में श्वास अन्दर खींचने को पूरक (मैं ब्राहृ स्वरूप हूँ विचार लाना), रोके रखने को कुम्भक (ब्रह्म स्वरूप विचार में स्थिरता) तथा बाहर छोड़ने को रेचक (संसार से विरक्ति) कहते है।
  2. प्राणायाम हमारी सुप्त कुन्डालिनी को शुस्मना नाड़ी में ऊपर उठाकर जागृत अवस्था में लाने में सहायक है।
  3. प्राणायाम में पूरक, कुम्भक व रेचक का समय अनुपात 1, 4 व 2 बताया गया है। समय की गणना मन में गिनकर अथवा ऊँ या गायत्री मंत्र की आवृति से की जा सकती है। समय धीरे धीरे बड़ाया जा सकता है। ऊँ के उच्चारण को एक सेकन्ड मानकर साधारण प्रणायाम का समय 12, 48 व 24 सेकन्ड, मध्यम

24, 96 व 48 सेकन्ड तथा गहन 36, 144 व 72 सेकन्ड बताया गया है।

  1. ध्यान की प्रगति के 12 संकेत –
  2. रहस्यमय अनुभूति

साधक अपने अन्दर एक के बाद एक बर्फ गिरना, चमकीले धुँए, तेज हवा, तैरती आग अथवा चमत्कृत कर देने वाली बिजलियाँ आदि महसूस होती है। कभी कभी ध्यान के समय हीरे से निकलते हुए शीतल प्रकाश या चंद्रमा भी दिखता है। इस प्रकार का अहसास ध्यान की प्रगति दर्शाता है।

  1. कुन्डालिनी का ऊपर उठना

वेदान्त के अनुसार 14 लोक होते है। सात उच्च लोक उठते क्रम में हैं भूर् (पृथ्वी), भुव, स्वः (स्वर्ग), महः, जनः तपः व सत्य। निचले सात लोक हैं गिरते क्रम में अताल, विताल, सुताल, रसातल, तलातल, महातल व पाताल। यह सभी लोक मनुष्य के शरीर में स्थित हैं। पृथ्वी को रीड़ के मूल(मूलाधार) में स्थित माना जाता है। ये लोक आध्यात्मिक रूप से कमल के रूप में हर केन्द्र पर महसूस किये जा सकते हैं। मूलाधार पर कमल चार पंखुड़ी वाला होता है तथा सांसारिक इच्छाओं व व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है। दूसरा स्वाधिस्थान (जननांग) सिन्दूरी रंग का छह पंखुड़ी वाला होता है। यह पशु प्रवृत्ति के रूप में परिलक्षित होता है। तीसरा मणिपुरम (नाभि) स्थित घने बादल के रंग का दस पंखुड़ी का होता है। यह भावनओं के रूप में दृश्य को धुँधला करता है। चौथा अनाहत(ह्मदय) स्थित लाल ज्वाला के रंग का बारह पंखुड़ी का होता है। यह आध्यात्मिक व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है। पाचवाँ विसुधा (गला) स्थित भूरे बैंगनी रंग का सोलह पंखुड़ी वाला होता है। यह शुद्धता के रूप में परिलक्षित होता है। छठा अजना (भोहों के मध्य) स्थित दो पंखुड़ी का सफेद रंग का होता है। यह सत्य के रूप में परिलक्षित होता है। सातवाँ सहररा (सिर के ऊपर) स्थित हजार पंखुड़ी वाला चमकीला सफेद रंग का होता है। यह परम सत्य एवं मुक्त्ति के रूप मे परिलक्षित होता है। जैसे जैसे कुन्डालिनी का केन्द्र स्थल ऊपर उठता जाता है साधक के व्यवहार में उसके अनुसार परिवर्तन होने लगते हैं। निचले सात लोकों की स्थिति पैरों में होती है।

  1. क्रिया की शीघ्रता

योग के अनुसार मस्तिष्क पाँच प्रकार के होते हैं। क्षिप्त (अस्थिर), मूढ़ (नासमझ), विक्षिप्त (कभी कभी स्थिर),एकाग्र (केन्द्रित) तथा निरुद्ध (संयत)। आखिरी दो प्रकार के व्यक्ति ही ध्यान करने योग्य होते हैं। प्रगति की चार दशायें होती है। प्रारम्भिक, कौशिश करने की, माहिर व उत्तम। योग व वेदान्त के अनुसार

12 सेकन्ड के लिये विषय पर केन्द्रित करना धारण की एक इकाई है। इसका बारह गुना यानि 144 सेकन्ड ध्यान की एक इकाई है। तथा इसका बारह गुना यानि 1728 सेकन्ड समाधि की एक इकाई है।

  1. वैराग्य की सीमा

वैराग्य की चार अवस्थायें हैं –

  1. यात्मना, इस अवस्था में साधक को भान होता है कि इन्द्रीय सुख अवान्छनीय हैं तथा वह उन्हें त्यागने का प्रयास करता है।
  2. व्यतिरेक, इस अवस्था में उसके समझ में साफ तरह से आ जाता है कि किन इच्छाओं को दबाना है।
  3. एकेन्द्रिय इस अवस्था में साधक सुख, दु:ख, लगाव, आदर एवं अनादर से

ऊपर उठ जाता है।

  1. वशीकर, इस अवस्था में साधक स्वेच्छा से सभी सुखों व कष्टों से दूर रहता है।
  2. एकाग्रता की स्थिति

– इस स्थिति तक पहुँचने पर अन्य सभी विषय वस्तु को छोड़ कर साधक सिर्फ ध्यान की विषय वस्तु में रम जाता है।

  1. ध्यान की स्थिति

ध्यान की चार अवस्थायें है, पहली चुप रहने की, दूसरी बच्चों सी सरलता, तीसरी शिथिलता व चौथी स्वयं को भूल जाना जैसे गहरी नींद।

  1. ध्यान मे डूबने की गहराई

इसको सात सतहों में बाँटा जाता है, जैसे सवितर्क (मन में शंका या प्रश्न होना), निर्वितर्क (निशंक), सविचार ( इन्द्रियों के प्रति चेतना), निर्विचार (अचेतन मन), सानंद (आनंद का अनुभव करना), अस्मिता (स्वयं में ब्रह्म का अनुभव ) एवं समाधि (स्वयं को ब्रह्म मे लीन करना)।

  1. कुम्भक का अनुभव शारीरिक बैचेनी श्वास अशान्ति में परिलक्षित होती है। श्वास को रोके रखना अन्दर की शान्ति का प्रतीक है। यह तभी प्रभावशील हो सकती है जब अध्यात्म से प्रेरित हो कर अभ्यास किया जाये।
  2. विरक्ति की गहराई

इसकी सात अवस्थायें मानी गई हैं-

– शुभेच्छा, अच्छे व पवित्र लोगों की संगत तथा ज्ञान प्राप्ती की इच्छा

– विचर्ण, ध्यान व स्वनियन्त्रण का प्रयास

– तनुमानस, सांसारिक सुखों से विरक्ति तथा धयान में सहजता

– सत्वपत्ती, उद्देश्य की समझ व अन्य विचारों की क्षीणता

– असमसक्ति, आन्तरिक आनंद का अनुभव इच्छाओं से ऊपर उठना

– पदार्थभाविनि, केवल ध्यान की विषय वस्तु को समर्पण

– तुर्यग, स्वयं में लीन हो जाना

मान्डुक्य उपनिषद के अनुसार पहली तीन जागृत अवस्थायें हैं, चौथी स्वप्नावस्था है, पाँचवीं निद्रावस्था, छठी गहन निद्रावस्था एवं सातवीं परम अनुभूति की मुक्त अवस्था है।

  1. स्वयं को पहचानने की स्थिति

ध्यान का चरम लक्ष्य पर अलग अलग चरणों में पहुँच पाते हैं। पहले चरण में ज्ञात होता है कि सत्य हमारे भीतर ही है। दूसरे चरण में लगाव, द्वेष, व कष्टों से मुक्ति। तीसरे चरण में स्वयं में समाहित हो जाना। चौथे चरण में मुक्त भाव से ब्रह्म व सम्बन्धों के बीच विचरण। पाँचवें चरण में शरीर व मस्तिषक की आवश्यकता समाप्त होने की अनुभूति। छठे चरण में अनुभवों की विस्मृति व सातवें व अन्तिम चरण में आत्मलीन हो जाना।

  1. आध्यात्मिक भावों का अनुभव आध्यात्मिक समर्पण के भावों के आठ स्तर माने जाते हैं। ये हैं अचेतनता, पसीना आना, रोमांच, गला भरआना, कँपकपाहट, पीला पड़ जाना, आँसू आ जाना व मूर्छा। इनकी चार स्थितियाँ मानी गई हैं। पहली सुलगना इसमें 1-2 भावों का अनुभव होता है जिन्हें दबाया जा सकता है। दूसरी चमकना इसमें 2-3 भावों का अनुभव होता है जिन्हें नियन्त्रित किया जा सकता है। तीसरी ज्वलंत इसमें 4-5 भावों का अनुभव होता है जिन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। चौथी प्रज्जव्लित इसमें 5 से अधिक भावों का तीव्र अनुभव होता है।
  2. मानसिक शक्ति एवं उपलब्धि

काफी अधिक ध्यान में प्रगति के उपरान्त उपासक को कई प्रकार एवं विभिन्न तीव्रता की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है। ये हैं –

  1. परोक्ष दर्शन
  2. परोक्ष श्रवण
  3. दूर संवेदन
  4. आत्म ज्ञान
  5. स्वयं को अत्यधिक शक्तिशाली बनाने की क्षमता।
  6. स्वयं को अदृश्य, छोटा अथवा बड़ा करने की क्षमता।
  7. डर, भूख, प्यास आदि पर विजय।

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