भारत में आपदा प्रबन्धन

आपदा कभी भी कह कर नहीं आती है यह एक पुरानी कहावत है। इससे निपटने के लिये संयम, त्वरित निर्णय व युद्ध स्तर पर कार्य क्षमता का होना आवश्यक है। हाल ही में उत्तराखन्ड में जो आपदा आई उसका परिणाम स्तब्ध कर देने वाला था। पूरे देश में अभी तक इस पर बहस जारी है कि आपदा किस कारण से आई। राजनीतिक दोषारोपण भी काफी हुए। यहाँ तक कि न्यायतन्त्र को भी राहत कार्य में दखल देने को मजबूर होना पड़ा। कई राजनेताओं ने इस अवसर का लाभ अपनी छबि सुधारने के लिये भी उठाया। किन्तु हमारे आपदा प्रबन्धन में कहाँ कमी रह गई व हमारे आपदा प्रबन्धन तन्त्र को कैसे और प्रभावी बनाया जाय इस और किसी का ध्यान गया हो ऐसा समाचार देखने सुनने को अभी तक नहीं मिला।
जापान में कुछ समय पूर्व लगभग इसी स्तर की आपदा सुनामी व उसके प्रभाव स्वरूप परमाणु संयन्त्र से रिसाव के रूप में आई थी। जिस कुशलता व गति से सरकार और वहाँ की जनता ने आपदा प्रबन्धन में सहयोग किया उसकी प्रसंशा पूरी दुनिया में हुई थी। क्या हम इससे कुछ सीख नहीं ले सकते।
वैसे तो मेरा अपना तो आपदा प्रबन्धन का कोई अनुभव नहीं है, किन्तु सहज बुद्धि के अनुसार निम्न लिखित बातों पर यदि ध्यान दिया जाये तो हम बेहतर आपदा प्रबन्धन कर सकते है।
आपदायें दो प्रकार की हो सकती हैं। पहली वे आपदायें जिसके लिये किसी न किसी रूप में मनुष्य जिम्मेदार है, जैसे बाँध से अचानक पानी छोड़ना, बाँध का टूट जाना, किसी पुरानी इमारत का गिर जाना,परमाणु संयन्त्र से रिसाव अथवा खुले गड्डे में किसी बच्चे का गिर जाना आदि। दूसरी वे आपदायें जिसके लिये प्रकृति जिम्मेदार है, जैसे तूफान का आना,बाढ़ का आना, भूकम्प का आना अथवा जमीन व पहाड़ खिसकना आदि।
दोनों प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिये सबसे आवश्यक बात है हमारी इन आपदाओं से निपटने की तैयारी। तैयारी में सबसे पहले जरूरत है आपदा क्षेत्र की पहचान। हर क्षेत्र को दोनों प्रकार की आपदाओं की संवेदनशीलता के अनुसार चिन्हित करना जरूरी है। स्थानीय प्रशासन को इसके लिये प्रशिक्षित करना चाहिये तथा इसे कम से कम साल में एक बार पुनर्रीक्षण कर स्थानीय जनता को सूचित करना चाहिये। तैयारी की दूसरी जरूरत हर गाँव व मोहल्ले मे एक दो स्वयंसेवकों की पहचान व उन्हें वहाँ की संभावित आपदा से निपटने के लिये प्रशिक्षित करने की। आसपास के स्वयंसेवको की आपसी जानकारी भी एकदूसरे के पास होने से अतिरिक्त सहायता मिलने में आसानी हो सकती है। प्रशिक्षण में संभावित आपदा का पूर्वाकलन व उससे निपटने के उपायों का समावेश जरूरी है। स्थानीय स्वयंसेवकों के पास आपदा के समय किसको संपर्क करना है उसकी जानकारी व
संपर्क करने का साधन होना आवश्यक है। संभव हो तो एक रेडियो फोन उपलब्ध कराये जायें। स्वयं सेवक अपने पास जरूरत की वस्तुओं की सूची प्रथमिकता के आधार पर बना कर रखें ताकि आपद स्थिति में चूक नहीं हो। हर संभावित आपदा क्षेत्र में आपत्काल में स्थानीय निवासियों के लिये सुरक्षा निर्देश लिखित रूप में दर्शाये जायें व उनके प्रति जागरुकता पैदा की जाये।
इन स्थानीय स्तर की तैयारियों के अतिरिक्त शासकीय स्तर पर भी तैयारियाँ आवश्यक है। शहर व जिला स्तर पर एक संयोजक हो, किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। लेकिन आपदा के समय सिर्फ आपदा प्रबन्धन ही उसकी प्राथमिकता हो इसके लिये उसे किसी अन्य आदेश की आवश्कता न हो। आपात स्थिति में आवश्यक वस्तुएें यथा खाद्य सामग्री, दवायें व यातायात के साधन आदि कहाँ से प्राप्त करना है यह जानकारी उसके पास होनी चाहिये। संयोजक के आपात अधिकारों की जानकारी संभावित स्श्रोतों को होनी चाहिये। वस्तुओं व सेवाओं का उचित मूल्य आपद स्थिति से निपटने पर संयोजक द्वारा चुकाना आवश्यक है। यह धन सरकार प्रदान करे। अन्य सहायता समूहों व मीडिया से समन्वय का कार्य भी सिर्फ संयोजक ही करे। जिला संयोजको के लिये राज्य स्तरीय अधिकारी को आपदा प्रबन्धन की जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। इस अधिकारी के लिये भी आपदा प्रबन्धन प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिये। इस अधिकारी का प्रमुख कार्य आवश्यकतानुसार बाह्र सहायता यथा सेना को बुलाना, हवाई यातायात प्रबन्ध आदि व राज्य व केन्द्र सरकार को स्थिति जानकारी देना व आवश्यक धन उपलब्ध कराना आदि हों। सभी प्रकार की पूर्व चेतावनियों की
जो उस राज्य से संबन्धित हो एक प्रति सीधे राज्य के आपदा प्रबन्धक को भेजना आवश्यक हो।
इन तैयारियों के अतिरिक्त वैज्ञानिक जानकारियाँ एवं विश्लेषण करने वाले विभागों से आपदा संबन्धित तथ्य व जानकारी समय पर संबन्धित राज्य के आपदा प्रबन्धकों को सार रूप में उचित समय सीमा में सीधे भेजी जायें। इन तैयारियों के अलावा सबसे अधिक जरूरी है मानव जनित आपदाओं को रोकना। राज्य व केन्द्र स्तर पर सभी बड़ी योजनाओं की मंजूरी के पहले संभावित खतरों का विश्लेषण व उससे निपटने के उपायों की जानकारी राज्य के आपदा प्रबन्धक के पास अवश्य ही होना जरूरी है। यहाँ यह माना जा रहा है कि योजना की स्वीकृति देते समय संभावित खतरों का विश्लेषण समुचित रूप से किया जाता है व एक सीमा से अधिक खतरे वाली योजनाओं को स्वीकृति प्रदान नहीं की
जाति है। इसी प्रकार स्थानीय मकानों की स्वीकृति स्थानीय संभावित खतरों व मकानों की सुरक्षा के मापदन्डों के अनुसार ही दी जानी चाहिये। ये मापदंड संबन्धित विभागों को विषेशज्ञों की सहायता से राज्य के आपदा प्रबन्धन द्वारा उपलब्ध करवाना चाहिये व आवश्यकता अनुसार। इसके अतिरिक्त स्थानीयप्रसाशनीय स्वयंसेवक स्तर पर निम्न लिखित सावधानियाँ बरती जा सकती है जैसे:-
1. बड़ी इमारतों व मार्केट स्थलों में बिजली, लिफ्ट व आग संबन्धी सुरक्षा उपायों का निर्धारित समय पर आकलन।
2. बाँधों व झीलों में से पानी छोड़ने की पूर्व सूचना जारी करना। यथा संभव ग्राह्र क्षेत्र में वर्षा के अनुसार पहले से आकलन कर धीरे धीरे पानी छोड़ना।
3. धार्मिक अवसरों पर भीड़ की अपेक्षानुसार प्रबन्ध करना ताकि भगदड़ की नौबत न आये।
4 गड्डों को खुला न छोड़ना।
5. पुरानी व ठीक रखरखाव रहित इमारतों पर निगरानी व समय रहते खाली करवाना। आदि।
अन्त में उक्त सभी उपायों को प्रभावी तभी बनाया जा सकता जब शासन तन्त्र में दृढ़ इच्छा शक्ति हो तथा सरकार पर जनता का विश्वास हो।

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