हमारे भविष्य का आकलन

 

जिज्ञासा मनुष्य का स्वभाव है। जिज्ञासा ही विकास का आधार है। इसी जिज्ञासा के चलते हम आज इस मुकाम तक पहुँच पाये हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य में भविष्य के प्रति उत्सुकता रही है। भविष्य जानने की ललक ने ही ज्योतिष, जन्म कुन्डली, हस्त रेखा शास्त्र, न्यूमरालाजी, टेरा कार्ड आदि जैसी कई विधाओं को जन्म दिया। वैज्ञानिकों ने इन विधाओं को पूरी तरह भले ही न स्वीकारा हो, किन्तु विश्व भर में जन मानस पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा है। वैज्ञानिक भी आखिर मनुष्य ही है अतः उन्होंने भी भूत व भविष्य जानने की विधियाँ खोज ही निकाली। विज्ञान में भरोसा रखने वाले इन विधियों का प्रयोग इतिहास, व्यापार व सामाजिक विषयों पर बड़े विश्वास के साथ करते हैं। आईये हम जानने का प्रयास करते हैं कि विज्ञान में विश्वास रखने वाले सामाजिक चिन्तको के अनुसार २०५० में हम कहाँ होगे ?

 १. लोगों का आकलन     

२०१० में पी आर सी (पीइडब्ल्यू रिसर्च सेन्टर) व स्मिथसनियन पत्रिका ने अमेरिका वासियों से किये गये सर्वे में लोगों ने बताया –

  • अधिकतर लोगों ने विज्ञान में उन्नति जारी रहने की बात कही। ८० प्रतिशत लोगों का मानना था कि कम्प्यूटर मनुष्य की तरह बोलने लगेगें।
  • ७०प्रतिशत लोगों का मानना था कि केन्सर का इलाज खोज लिया जायेगा।
  • ६६प्रतिशत लोगों का मानना था कि नकली अंग असली जैसे कार्य करने लगेगें।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि स्पेस यात्रा ४० सालों में सबके लिये सुलभ हो जायेगी।
  • इसके अलावा अधिकतर लोगों का मानना था कि लुप्त प्रजातियोँ को वापस ले आया जायेगा व अन्य ग्रह पर जीवन खोज लिया जायेगा।
  • ४८ प्रतिशत लोगों का मानना था आदमी की नकल बनाई जा सकेगी।
  • ४० प्रतिशत लोगों के अनुसार विचार पढ़ने की तकनीक विकसित हो जायेगी।
  • उर्जा के बारे में अधिकतर लोगों का मानना था कि उर्जा का नया स्रोत खोज लिया जायेगा।  ७२ प्रतिशत लोगो ने उर्जा को गहरी समस्या बताया।
  • अधिकतर लोगों का मानना था कि एक और विश्व युद्ध हो सकता है।
  • भविष्य के बारे में चिन्ता करने वाले लोगों की संख्या १९९९ के १९ प्रतिशत क मुकाबले बढ़कर ३६प्रतिशत हो गई।

२. जनसंख्या

२०५० तक संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि पृथ्वी पर ९.१अरब लोग होगें।यह अनुमान इस तथ्य पर आधारित है कि वर्तमान में जनसंख्या १२ वर्षों में १ अरब बढ़ रही है। जनसंख्या सभी देशों में एक सी नहीं बढ़ कर कुछ देशों मे आबादी काफी घनी हो सकती है। उदाहरण के लिये अफ्रीका की आबादी २ अरब तक पहुँच सकती है। यह सौ वर्षों में लगभग नौ गुना बढ़ौतरी है।

देश परिवर्तन एक गंभीर समस्या बन जायेगी। केनेथ जानसन, न्यू हेम्पशायर विश्व विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर के अनुसार २०५० तक अमेरिका अल्पसंख्यक बहुलता वाला देश बन जायेगा। दि टेलीग्राफ ने एक लेख के माध्यम से बताया कि प्रवासियों के कारण यूरोप पूरी तरह से बदल जायेगा। यह एक टाइम बम है जिसे राजनेता ध्यान नहीं दे रहें।

इसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पढ़ेगा। कुछ देशों जैसे नीदरलेन्ड में इसका प्रभाव दिखने लगा है। यहाँ मुस्लिम विरोधी नेताओं का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।

३. पानी की समस्या:

बढ़ती जनसंख्या के लिये पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या होगी। भारत ने अनुमानित खपत दुगुनी हो जाने के हिसाब से प्रबन्ध करने के प्रयास आरम्भ कर दिये हैं। इन्टरनेशनल वाटर एण्ड सेनीटेशन सेनटर के अनुसार अरब देशों में समस्या गंभीर रहेगी।माइक हाईटावर व सुज़ाने पियर्स जो जल विशेषज्ञ है के नेचर में प्रकाशित लेख के अनुसार पानी की उपलब्धता अर्थव्यवसथा के लिये विशेष जरूरत होगी। पानी की पीने के साथ ही उद्योग, कृषि, उर्जा व खनन में बड़ी मात्रा में जरूरत होती है। सरकारों को पानी के सही उपयोग व उचित प्रबन्धन पर ध्यान देना जरूरी है।

४. भौजन की समस्या

९ अरब लोगों के भोजन का प्रबन्ध करना एक बड़ी समस्या बन जायेगी। आज भी करीब १ अरब लोगों को जरूरत के अनुसार भोजन नहीं मिल पाता है। अगले करीब २५ वर्षों खाद्य उत्पादन में लगभग ७० प्रतिशत वृद्धि की जरूरत होगी जो एक कठिन लक्ष्य है। हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि यह संभव हो पायेगा।यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सभी देशों को कृषि क्षेत्र में निवेश व शोध करने की जरूरत है। विकसित व खाद्य बाहुल्य देशों को जरूरत मन्द देशों की सहायता के लिये तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ेगी। भोजन की कमी का सर्वाधिक असर बच्चों के विकास पर पड़ेगा।

 ५. वातावरण

वातावरण संबंधी कई समस्यायें जैसे उजड़ते जंगल, घटती खेती की जमीन, शहरी करण, वायु एवं जल प्रदूषण, कचरा निष्पादन, व मौसम मे तेज बदलाव मनुष्य के लिये गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले मानसूनी जंगल (जो आक्सीजन पैदा करते हैं) आज करीब १.६.एकड़ प्रति सेकन्ड की दर से खत्म हो रहे हैं।

६. सामाजिक समस्यायें:

यह अन्दाजा लगाना मुश्किल है कि अपराधों जैसे चोरी डकैती हत्या या महिलाओं से छेड़छाड़ आदि में कितनी बढ़ौतरी होगी। महामारी जैसी बीमारी फैलने से प्रभावितों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की संभावना हो सकती है। तकनीकि विकास आर्थिक अपराधों की गंभीरता बड़ा सकता है। विश्व युद्ध यदि हुआ तो महाविनाशकारी होगा। अब तक की सामाजिक पतन की दशा देखकर तो यही लगता है कि समाज पतन के गर्त की ओर बढ़ता रहेगा।  ७. उम्मीद की किरण :

इन सब समस्याओं के बीच उम्मीद की एक चमकीली किरण नजर आती है वो यह कि मनुष्य हमेशा बदलाव की ओर आकर्षित हुआ है। शायद अगल २५ वर्षों में बुराइयों से ऊब कर अच्छाईयों को अपनाले व समाज में पुनः आपसी प्रेम व भाईचारा स्थापित हो जाये। फिलहाल तो हमें ऐसा ही मान लेना  चाहिये।

 

 

 

 

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