ए मेरे वतन के लोगों

26 जनवरी 13 को सवेरे दूरदर्शन पर बताया कि लता जी द्वारा 1963 में सीमा पर गाये हुए इस गाने ने 50 साल पूरे किये। यह गाना देश प्रेम का प्रतीक बन गया है। प्रायः हर राष्ट्रीय पर्व पर यह सुनने को मिल जाता है। यह गाना सुनकर आज भी सीमा पर तैनात सैनिकों के लिये हर देशभक्त नागरिक का मन सम्मान से भर जाता है। लेकिन मेरे मन को इस बार इस गाने ने देश की दशा पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि 66 वर्षों की स्व सत्ता में हम किस मुकाम पर आ पहुँचे हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इन 66 वर्षों में हमने आर्थिक, विज्ञान, कृषि, कला व इन्जीनिरिंग आदि क्षेत्रों तेजी से प्रगति की है। और इस प्रगति का लाभ अधिकांश जनता तक पहुँचा भी है। पिछले कुछ सालों में प्रायः हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार व बेईमानी ने जिस प्रकार पाँव पसारे हैं इस कारण आज प्रायः हर देशभक्त भारतीय अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। नैतिक मूल्यों का यह पतन सारी प्रगति पर ग्रहण के समान है।
पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े बड़े घोटाले उजागर हुए जिनमें सरकार के प्रतिनिधियों की संलिप्तता संन्देह के दायरे में आई। सदनों में इन मुद्दों पर हंगामेदार चर्चायें हुई कुछ मंत्रियों ने त्यागपत्र दिये तो कुछ ने अपने को देने से बचा लिया। हाल ही के कुछ वर्षों में महिलाओं की अस्मिता पर हमले की जैसे बाढ़ आ गई। इसमें भी कुछ नेतागण सदन में अश्लील एमएमएस देखते पकड़े गये तो कुछ नेताओं की रंगरेलियों की सीडी मीडिया में प्रचलित पाई गर्इं।संसद में प्रश्न पूछने के लिये सांसद पैसे लेते हैं। समाचारों पर भी विश्वसनीयता कम होती जा रही है। दलित व अशक्त लोगों पर अत्याचार, हत्यायें व लूटपाट तो आज देश में आम बात है। समाचार चेनलों पर प्रायः सुनने को मिलता है कि करीब करीब सभी पार्टियों से गंभीर अपराध से आरोपित लोग सदन में चुनकर आगयें है, और इनकी संख्या लगभग 30-35 प्रतिशत तक पहुँच चुकि है। नैतिक मूल्यों का यह पतन आज की एक गंभीर समस्या है।
इस नैतिक अवमूल्यन की जिम्मेदार यदि कोई है तो सिर्फ राजनीतिक पार्टियाँ ही हो सकती है फिर वह राष्ट्रीय स्तर की हों अथवा प्रादेशिक स्तर की। सभी पार्टियाँ आज जोड़ तोड़, जातिवाद, भाई भतीजा वाद, साम्प्रदायिकता,धनबल अथवा बाहुबल द्वारा सत्ता हथियाने में व्यस्त हैं। इस प्रकार बनी हुई सरकार से लोग नैतिक आचरण की आशा भी कैसे कर सकते हैं। पिछले वर्ष एक नई आशा की किरण के रूप में अन्ना जी व उनकी टीम ने जन जागरण का काफी हद तक सफल प्रयास किया। लेकिन राजनेताओं ने पूरी ताकत लगा कर आन्दोलन के अग्रणी सदस्यों पर लांछन लगा कर व फूट डाल कर उसे कमजोर कर दिया है। लेकिन यह आन्दोलन देश की जनता व विशेष तौर पर युवाओं को जाग्रत करने में अवश्य ही सफल रहा है। यह इसी का परिणाम था कि दिल्ली में पिछले दिनों एक युवती पर बर्बर हादसे का विरोध करने व न्याय दिलाने के लिये ये युवा स्वतः ही सड़कों पर कई दिनों तक ठिठुरती सर्दी में भी डटे रहे।
युवाओं में आयी यह जाग्रति देश की दशा बदलने में सक्षम है।
प्रजातन्त्र में सत्ता वास्तव में जनता के हाथ में होनी चाहिये लेकिन आज ये राजनीतिक पार्टियों की बन्धक बन कर रह गई है। आज के जागरुक युवा यदि ठान लें तो परिस्थिति में बदलाव ला सकतें है और देश को पार्टियों के मकड़ जाल से मुक्त करा सकते है। आवश्यकता सिर्फ एक प्रयास करने भर की है।
इस वर्ष कुछ राज्यों में व अगले वर्ष केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। युवाओं को चाहिये कि ये इस अवसर का उपयोग एक क्रान्तिकारी बदलाव लाने के लिये करें एवं प्रजातन्त्र को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करें। आज का युवा संचार माध्यम के द्वारा तेजी से आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम है। शक्ति एवं जोश की उसमें कमी नहीं है। अपनी इसी ताकत को वे चुनाव क्रान्ति के रूप में बदल सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि उन्हें हर विधान सभा व लोकसभा के लिये एक इमानदार उम्मीदवार की पहचान करने की। इस उम्मीदवार का चयन बिना किसी जाति,सामाजिक स्तर अथवा गाँव शहर से संबद्धता पर विचार किये बिना अपने क्षेत्र में एक अच्छी छबि व स्वीकारिता के आधार पर ही हो। युवा ही उसके लिये प्रचार करें। प्रचार भी शोर रहित व्यक्तिगत स्तर पर हो। और युवा ही क्षेत्र के मत दाताओं को वोट के लिये निकलने के लिये प्रेरित करें। ये उम्मीदवार निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ें जिसका सिर्फ एक पाइन्ट एजेंडा हो वह सही मायनों में प्रजातन्त्र के मूल्यों की पुनस्र्थापना। आज जिस प्रकार का आक्रोश जन मानस में है उससे इस तरह के प्रयास को जनता का साथ मिलने की पूरी संभावना है। यदि युवा अपने प्रयास में
सफल होते हैं तो यह देश के लिये दूसरी आजादी होगी।

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