आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद, द साइन्स आफ सेल्फ हीलिंग, डा. बसंत लाड़ पर आधारित)

आयुर्वेद एक प्राचीन व प्रभावी भारतीय चिकित्सा पद्धति है। यह न केवल रोगों को ठीक करने के लिये बल्कि एक स्वस्थ एवं सुखमय जीवन शैली का साधन भी हो सकती है। यह निम्न लिखित सिद्धान्तों पर आधारित है।
1. शरीर पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश (ईथर) से बना है।
2. शरीर में तीन प्रकार के दोष हो सकते हैं। ये हैं वात (वायु व ईथर), पित्त (जल व पृथ्वी) व कफ (जल व अग्नि) । हर शरीर में इन तीनों का अनुपात जन्म के समय ही निर्धारित हो जाता है, जिसे प्रकृति कहते है। यह अनुपात ही व्यक्ति का गुण व स्वभाव निर्धारित करता है। निर्धारित अनुपात का असंतुलित हो जाना ही रोगों को जन्म देता है। ये दोष व्यक्ति के शरीर व मन को अलग अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं। संक्षेप में ये प्रभाव निम्नानुसार हैं।
वात – ये मानसिक तंत्र, श्वास तंत्र, इन्द्रियाँ, रस प्रवाह, शरीर संचालन आदि को संचालित करता है। इसके प्रमुख गुण ठंडा, हल्का, अस्थिर, अनियमित, सूखा खुरदरा आदि हैं। इसके बढ़ने से मानसिक तनाव, रक्तचाप, गैस व व्याकुलता बढ़ जाती है। जबकि इसकी कमी मानसिक शिथिलता, कब्ज, रक्त संचय व विचार शून्यता पैदा करती है। वृद्धावस्था मे प्रायः यह बढ़ जाता है।
पित्त – यह पाचन रस (बाइल) को पाचन क्रिया व मेटाबोलिस्म (रस प्रक्रिया) के लिये प्रयोग करता है। इसका संबंध शरीर के तापमान, भूख, प्यास, बुद्धि, अनुभूति, क्रोध, घृणा व ईर्षा से है। यह एन्जाइम्स व हारमोन्स को नियन्त्रित करता है। इसके प्रमुख गुण गर्म,हल्का, तरल, नरम, साफ, रहस्यपूर्ण, तीक्ष्ण व बदबूदार हैं। इसके बढ़ने से छाले, हार्मोन्स का असंतुलन, खुजली, व परेशान करने वाले भाव पैदा होते हैं। इसकी कमी कमजोर पाचन, धीमे मेटाबोलिज्म व समझने की शक्ति में कमी का कारण होती है। 14 से 30 वर्ष की उम्र में इसकी बहुलता रहती है।
कफ – इसका संबंध माँस पेशियों की चिकनाई व पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों में पहुंचाने से है। यह उर्जा संतुलन, शारीरिक चिकनाई, लालच, क्षमा करने की आदत, लगाव, पाने अथवा हावी होने की इच्छा को नियन्त्रित करता है। यह अंगो को पोषित करने वाले द्रव व अंगो बनाने वाली कौषिकाओं का निर्माण करता है। इसके प्रमुख गुण तैलीय, ठंडा, भारी, स्थिर, गाढ़ा व चिकना हैं। इसके बढ़ने से कफ पैदा होता है व घटने से श्वास नली में सूखापन और पेट में जलन होती है।
बचपन में इसकी बहुलता रहती है।
स्वयं के दोष व प्रकृति में व्याप्त वस्तुओं के इन्हीं तीन दोषों का पारस्परिक प्रभाव एक जैसे लोगों का एक ही परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया का कारण है।
3. शरीर में रस, रक्त, माँस पेशियाँ, वसा (फेट), मज्जा (मेरो), अस्थि व शुक्र सात धातुएें होती हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में द्रवों के बहने के लिये तन्त्र होते है जिनहें श्रोत कहते है। उदाहरण स्वरूप प्रानवाह श्रोत, रसवाह श्रोत,रक्तवाह श्रोत आदि।
4. आयुर्वेद के अनुसार प्रकृति (स्वभाविक गुण) व विकृति ( दोषों के पारस्परिक प्रभाव से आये गुणों में बदलाव) मिलकर स्वास्थ का निर्धारण करतें है। चिकित्सा से पहले प्रकृति व विकृति की जानकारी जरूरी है। यह जानकारी चिकित्सक द्वारा संबन्धित प्रश्न पूछ कर एकत्र की जाती है। विकृति की जानकारी रोग की स्थिति व निहित दोष असंतुलन से जानी जाती है। चिकित्सा का उद्देश्य संतुलन को पुनर्स्थापित करना है। संतुलन बनाये रखना हमारे हाथ में और यही स्वस्थ व सुखी जीवन का आधार है।
5. आयुर्वेद के सिद्धान्त हमें संतुलन बनाये रखने में मार्ग दर्शक का कार्य करते हैं। प्रायोगिक तौर पर हम भोजन, दिनचर्या, तनाव प्रबन्धन तकनीक एवं व्यायाम द्वारा अपने स्वास्थ को नियन्त्रित कर सकते है।
पुरुष व प्रकृति उर्जा के रूप हैं। पुरुष नर शक्ति तथा निर्गुण है, जबकि प्रकृति सगुण। ब्राहृाण्ड प्रकृति की उपज (संतान) है। प्रकृति जन्म देती है जबकि पुरुष इन रचनाओं को उर्जा प्रदान करती है। यह उर्जा सत्व (सुगंध), रजस (गतिविधि) व तमस (जड़ता अथवा इनर्शिया ) तीन प्रकार की होती है। ये तीन उर्जायें जीवन का आधार हैं। प्रकृति में ये संतुलित स्थिति में रहती हैं। इनका संतुलन बिगड़ने पर ये तीनों गुणों के आपसी टकराव से ब्राहृाणड के नष्ट होने की स्थिति आ सकती है। यह विकृति सबसे पहले अंहकार के रूप में प्रगट होती है जो सत्व से मिलकर पाँच इन्द्रियों व पाँच प्रचालन अंगों में आरगेनिक संसार बनाती है। यही अंहकार तमस के साथ मिलकर पाँच भूतों में इनआर्गेनिक संसार बनाती है। रजस उर्जा इन्हें आपस में मिलाने का कार्य करती है। इस प्रकार सत्व व तमस पोटेन्शियल उर्जा हैं जिन्हें कायनेटिक क्रियाशील उर्जा की आवश्कता होती है। हम सत्व को ब्रह्मा (उत्पादक), रजस को विष्णु (पालन कर्ता) व तमस को महेश (विनाश कर्ता) कहते हैं।
5. आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य में धार्मिक, वित्तीय, सृजन व स्वतन्त्रता ये चार प्रवत्तियाँ होती हैं। इन्हें प्राप्त करने का आधार संतुलित स्वास्थ्य है। आयुर्वेद, योग व तन्त्र को भारत में सदियों से इसके लिये अपनाया गया है। आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। योग स्वयं को जान कर सत्य तक पहुँचने का साधन है। तन्त्र उर्जा को नियन्त्रित करने का साधन है। तीनों साधन मनुष्य को दीर्घ आयु, ताजगी व स्वयं को जानने में सहायक हैं। इन तीनों को साधकर अंतिम लक्ष्य तक पहुँचना हर व्यक्ति के लिये संभव नहीं है। किन्तु आयुर्वेद की सहायता हर व्यक्ति स्वस्थ व दीर्घायु हो सकता है। मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के संदर्भ में आयुर्वेद को आधार, योग को शरीर व तन्त्र को मस्तिष्क माना गया है, इस प्रकार ये आपस में एक दूसरे पर निर्भर है।
6. ईथर, वायु, अग्नि, जल, व पृथ्वी ये तत्व क्रमशः श्रवण (जीभ, स्वर तन्त्रि व मुँह), छूने (चर्म व हाथ), देखने ( आँखें व पैर), स्वाद (जीभ व जननांग) व गंध ( नाक व मल मार्ग) की इव्द्रियों से संबंध रखते हैं। वात पित्त व कफ हर प्रकार की शारीरिक व मानसिक गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। सात प्रकार की शारीरिक संरचनायें वात, पित्त, कफ, वात-पित्त, पित्त-कफ, वात-कफ व वात-पित्त-कफ होती हैं। इन सात मूल संरचनाओं के कई रूप सूक्ष्म प्रतिशत से परिवर्तित हो सकते हैं, इस कारण गुणों में विविधता आ जाती है।
7. वात्त प्रकृति वाले व्यक्ति – पित्त प्रधान व्यक्तियों का शरीर कम विकसित रहता है। उनका सीना सपाट व नसें व धमनियाँ दिखाई देती हैं। उनका रंग गेहुँआ, त्वचा ठंडी, खुरदरी, सूखी व पटी हुई होती है। वे न बहुत अधिक नाटे न अधिक लम्बे होते हैं। वे दुबले व उभरे अस्थि जोड़ वाले होते हैं। उनके कम व काले तिल, कम व घुंघराले बाल होते हैं एवं पलकें पतली व नेत्रों में चमक नहीं होती है। उनकी आँखें छोटी, धंसी हुई व सक्रिय एवं पुतलियाँ सूखी व धुधंली होती हैं. उनके नाखून भुरभुरे व खुरदरे होते है, नाक मुड़ी हुई व उपर उठी हुई होती है। उनकी भूख व पाचन शक्ति बदलती रहती है। वे मीठे, खट्टे व नमकीन के लिये व्याकुल रहते हैं व गर्म पेय पसंद करते है। उन्हें पसीना व पेशाब कम आती है तथा मल सूखा, कठोर व कम होता है। उन्हें नींद कम व उखड़ी हुई आती है। ये सृजनशील, सक्रिय, सावधान व अधीर होते हैं। वे जल्दी जल्दी चलते व बोलते हैं किन्तु जल्दी थक भी जाते हैं। वे जल्दी समझने वाले किन्तु जल्दी भूलने वाले होते हैं। उनका मन अस्थिर, उनमें इच्छा शक्ति, सहन शक्ति, आत्मविश्वास तथा निर्भीकता की कमी होती है। उनकी तर्क शक्ति कमजोर होती है, ये जल्दी घबराने व डरने तथा चिंता करने वाले होते हैं। ये शीघ्र कमाने व खर्च करने की प्रवृत्ति के कारण प्रायः गरीब होते हैं।
पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति – ये मध्यम लम्बाई, दुबले व कोमल शरीर वाले होते हैं। इनका सीना व माँस पेशियाँ भी मध्यम उभार वाली होती हैं। इनके तिल व मस नीले अथवा भूरे लाल रंग के होते हैं। इनका रंग ताम्र वर्ण, हल्का पीला, हल्का लाल या साफ हो सकता है। इनकी त्वचा नरम, हल्की गर्म व कम झुर्रियों वाली होती है। इनके बाल पतले, रेशमी, लाल या भूरे तथा जल्दी सफेद होने अथवा गिरने लगते हैं। इनकी आँखें भूरी या ताम्र वर्ण, तीखीं व पुतलियाँ थोड़ी उभरी हुई व नम होती हैं। इनके नाखून नर्म व नाक तीखी एवं उसका अग्र भाग लालिमा लिये होता है। इनकी शारीरिक गतिविधियाँ, पाचन शक्ति तेज होती है जिससे भूख अधिक लगती है। ये मीठा, कसैला व कड़वा स्वाद पसंद करते हैं व शीतल पेय का आनन्द लेते हैं। इन्हें नींद तोड़ी कम किन्तु गहरी आती है। इनके मल मूत्र की मात्रा अधिक व पीलापन लिये, मल नर्म व पतला होता है। इन्हें पसीना खूब आता है, ये गर्मी, धूप, व अधिक मेहनत सहन नहीं कर पाते। ये बुद्धिमान, जल्दी समझलेने वाले व अच्छे वक्ता होते हैं। इनमें नफरत, जलन व क्रोध की ओर झुकाव होता है तथा ये महत्वाकांक्षी होते हैं व नेतृत्व करना पसंद करते हैं। ये संपत्ति पसंद करने वाले, प्रायः पैसे वाले व वैभव का प्रदर्शन करने वाले होते हैं।
कफ प्रकृति वाले व्यक्ति – इनका शरीर अच्छा विकसित होता है किन्तु इनमें मोटापे की अधिक संभावना रहती है। इनका सीना चौड़ा व तना हुआ होता है। मांस पेशियाँ अच्छी विकसित होती हैं। ये गोरे व चमकदार होते हैं व त्वचा तैलीय,चमकदार, नर्म, ठंडी व पीलापन लिये होती है। इनकी आँखें गहरी काली या नीली,चमकीली, आकर्षक व पुतलियाँ सफेद होती है। इनकी भूख सामान्य, पाचन क्रिया कुछ धीमी होती है तथा ये कम खाते हैं। इन्हें तीखा,कड़वा व कसैला स्वाद पसंद आता है, मल नरम व पीलापन लिये होता है। ये धीरे चलते हैं। इनकी नींद गहरी व लम्बी होती है। ये प्रायः स्वस्थ, प्रसन्न शांत, सहनशील क्षमावान व स्नेही होते हैं। ये थोड़े लालची, चाहने वाले व हक जताने वाले होते हैं। ये समझने में कुछ समय लगाते है किन्तु बाद में याद रखते हैं। ये धन कमाते हैं व एकत्र करते हैं.
8. तीन प्रकार का प्रभाव निम्नानुसार होता है-
सत्व – सुगंध, समझ, पवित्रता, स्पष्टता, करूणा व प्रेम। इस प्रवृत्ति वालों का शरीर स्वस्थ व व्यवहार एवं चेतन्य शुद्ध होता है। वे आस्तिक, ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले तथा पवित्र लोग होते हैं।
रजस – गतिविधि, आक्रमकता व बहिर्मुखता। रजस दिमाग वाले कामुक सोच के होते हैं। इस प्रवृत्ति के लोग व्यापार, धन, अधिकार, गौरव व पद को महत्व देते हैं। वे धन का उपभोग पसंद करते हैं व बहिर्मुखी होते है। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं किन्तु आस्था बदलते सकते हैं तथा राजनीति करने वाले होते हैं।
तमस – अज्ञान, जड़ता, भारीपन, सुस्ती। इस प्रवृत्ति के लोग आलसी, स्वार्थी व दूसरों को हानि पहुँचाने वाले होते हैं। वे नास्तिक होते हैं व प्रायः दूसरों का आदर नहीं करते हैं। वे अहंकारी होते हैं।
9. स्वास्थ्य सामान्य स्थिति है व रोग असामान्य। शरीर के अन्दर की स्थिति का बाहरी वातावरण से लगातार पारस्परिक प्रभाव होता है। जब ये दोनों असंतुलित हो जाते हैं तो रोग हो जाता है। आन्तरिक स्थिति को बदलकर संतुलन लाया जा सकता है। आयुर्वेद इसका मार्ग बतलाता है।
सामान्य स्थिति में मल मूत्र व पसीने का संतुलन होता है, इन्द्रियाँ ठीक से कार्य करती हैं व शरीर, मन व चेतन्य आपसी सामन्जस्य एकरूप से कार्य करते हैं। रोग व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कफ प्रकृति के लोगों को कफ जनित रोग जैसे टांसिल्सस, साइनसाइटिस, दमा,व फेफड़ों में जमाव आदि प्रायः होते हैं.
पित्त प्रकृति के लोगों को पित्त जनित रोग गालब्लेडर, लीवर, एसिडिटी, छाले, चर्म संबंधी व सूजन आदि रोग प्रायः होते हैं।
वात प्रकृति के लोगों को वात जनित रोग जैसे गैस, पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द, लकवा, व नसों का दर्द आदि रोग प्रायः होते हैं।
खान पान, जीवन शैली, व वातावरण यदि उसी दोष से मिलता हो तो वे असंतुलन पैदा कर पहले शारीरिक स्तर पर और बाद में मानसिक स्तर पर विकृति पैदा करते हैं। जैसे वात डर, तनाव व निराशा का कारक है। पित्त क्रोध, घृणा व जलन तथा कफ अधिकार, लालच, व मोह के कारक हैं। इस प्रकार भोजन, आदतों व वातावरण का हमारे शारीरिक व मानसिक रोगों से सीधा संबंध है।
10. तीनों दोषों की हानि अमा (टाक्सिन्स) को पैदा करते जो पूरे शरीर में फैलकर कमजोर स्थानों पर जमा हो जाते हैं, जहाँ वे रोग पैदा करते हैं।
पित्त पेट में अग्नि (जठराग्नि) जो अमलीय होती है तथा भोजन को पचाने व पोषक तत्वों को ग्रहण करने के लिये आवश्यक है। इसका संबंध वात से भी है क्योंकि वायु शरीर की अग्नि प्रज्वलित कर अग्नि को शरीर के हर कोष तक पहुँचाती है। इस तरह पोषक तत्व हर कोष तक पहुँचते हैं जो उनके रख रखाव व प्रतिरोध तंत्र के लिये जरूरी है। अग्नि अनचाहे बेक्टिरिया व अमा को पेट व आतों में नष्ट करती है। इस प्रकार वह इन अंगों की रक्षा करती है। शारीरिक गतिविधियाँ, दीर्घायु, बुद्धि, समझ आदि अग्नि पर निर्भर है। अग्नि के सही प्रकार से कार्य करने से शरीर ठीक प्रकार से संचालित होता है। यदि त्रिदोषों में अससंतुलन होता है तो उसका सीधा असर अग्नि पर पड़ता है व निरोध क्षमता कमजोर हो जाती है। इस कारण भोजन ठीक से पच नहीं पाता व बड़ी आँत में चिपचिपे व बदबूदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। यह अमा रक्त कोषिकाओं को बन्द कर देता है और अंततः टाक्सिन्स में बदल जाता है। समय के साथ ये टाक्सिन्स शरीर के कमजोर भागों में जमा हो होकर अंगों में अवरोध, निष्क्रिययता व कमजोरी पैदा करते हैं। अंततः यह मधुमेह, जोड़ के दर्द या ह्मदय के रोग जैसी बीमारियों के रूप में प्रगट होता है।
11. सब रोगों की जड़ अमा है। जीभ पर सपेद पर्त अमा की अधिक मात्रा में उपस्थिति दर्शाती है। अधिक सक्रिय अग्नि भी हानिकारक होती है। यह पोषक तत्वों को जला देती है जिससे दुर्बलता जाती है व निरोध शक्ति कम हो जाती है।
टाक्सिन्स भावनात्मक कारणों जैसे दबाये हुए गुस्से, डर, चिन्ता से भी पैदा हो सकते हैं। इससे गैस बनने से अंगों में दर्द हो सकता है। अतः भावों व नैसर्गिक तकाजे जैसे छींक आदि को दबाना नहीं चाहिये।
मंद अग्नि से एलर्जी भी हो सकती है। पित्त प्रकृति वालों को पित्त कारक भोजन जैसे गर्म व मसालेदार खाने से बचना चाहिये, घृणा व गुस्सा दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। कफ प्रकृति वालों को कप कारक भोजन जैसे दूध उत्पाद खाने से बचना चाहिये, लगाव व लालच दबाने से भोजन का असर बढ़ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार हमें भावों को दबाने के बजाय अपने से अलग पहचान कर मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिये।
आयुर्वेद के अनुसार तीनों मलों (मल, मूत्र व पसीने) का सही उत्सर्जन स्वास्थ के लिये जरूरी है। इनका उत्सर्जन संबंधित अंगों के सही प्रकार से कार्य करते रहने के लिये जरूरी है। पानी पीने की मात्रा, भोजन का प्रकार, बाह्र तापक्रम, मानसिक व शारीरिक स्थिति मलों के उत्सर्जन को प्रभावित करते है।
12. रोगी की जाँच – आयुर्वेद में रोगी की जाँच प्रायः नाड़ी, मूत्र व अंगों के द्वारा की जाती है। इनमें प्रमुख हैं –
नाड़ी – नाड़ी की जाँच तीन उँगलियों तर्जनी (वात दोष), मध्यमा (पित्त दोष) व अनामिका (कफ दोष) से की जाती है। तीनों नाड़ियों की एक सी चाल तीनों दोषों का संतुलन दर्शाती है। किसी नाड़ी का तेज व धीमा होना संबंधित दोष की अधिकता व कमी दर्शाती है।
सीधे हाथ की ऊपर वाली वात नाड़ी तेज हो तो बड़ी आँत व नीचे वाली हो तो फेफड़े में जमाव, इसी प्रकार ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी गाल ब्लेडर नीचे वाली तेज लीवर एवं ऊपर वाली तेज कफ नाड़ी ह्मदय संबंधी (पेरी कार्डियम) समस्या दर्शाती है।
बाँये हाथ की वात नाड़ी ऊपर वाली तेज हो तो छोटी आँत व नीचे वाली ह्मदय, ऊपर वाली तेज पित्त नाड़ी पेट तथा नीचे वाली तेज स्प्लीन एवं ऊपर की तेज कफ नाड़ी ब्लेडर व नीचे वाली तेज किडनी की समस्या दर्शाती है। (हल्के से छूने से ऊपर वाली नाड़ी व दबा कर छूने से नीचे वाली नाड़ी की गति पता चलती है)।
अलग अलग समय नाड़ी गति बदलती रहती है। नाड़ी की जाँच की योग्यता प्रशिक्षण व अभ्यास के बाद ही आती है।
मूत्र परीक्षण – मूत्र का नमूना सवेरे बीच धारा से साफ पात्र में लेना चाहिये।
रंग – कालापन लिये भूरा वात दोष, गहरा पीला पित्त दोष, धुन्धला कफ दोष एवं लाल रंग रक्त दोष बतलाता है। सामान्य रंग हल्का पीला होता है।
बर्तन में एक बूँद तिल के तेल की डालें —
यदि बूँद फैलती है तो उपचार आसान
यदि बूँद बीच तक डूबती है तो उपचार कठिन
यदि बूँद नीचे बैठ जाती है तो उपचार बहुत कठिन
यदि बूँद लहरों में फैलती है तो वात दोष
यदि बूँद कई रंगों में फैलती है तो पित्त दोष
यदि बूँद कई मोती जैसी बूँदो में फैलती है तो कफ दोष
बदबूदार मूत्र टाक्सिन्स की उपस्थिति व मीठी सुगंध मधुमेह दर्शाता है। मूत्र त्याग के समय जलन पथरी व कम मूत्र उच्त रक्तचाप का द्योतक है।
आयुर्वेद के अनुसार सवेरे बीच की धार का मूत्र प्राकृतिक रेचक (मुलायम करने वा) व टाक्सिन्स को नष्ट करने वाला है। सवेरे इसका एक कप सेवन लाभकारीहै।
पसीना – पसीना चर्बी तंतों से पैदा होता है तथा शरीर का तापमान बनाये रखने के लिये जरूरी है। यह त्वचा नर्म व उसकी लचक एवं रंग बनाये रखता है। अधिक पसीने से संक्रमण (फफूँदीय) हो सकता है तथा कम पसीना सूखी व दरार वाली त्वचा कर देता है।
मूत्र व पसीना दोनों का संबंध किडनी से है, स्वस्थ शरीर में दोनों का संतुलन जरूरी है। एक के बढ़ने से दूसरे की मात्रा कम हो जाती है।
जीभ, आखों, चेहरे, होंठ व नाखून का अध्ययन भी रोग समझने में सहायक है
जीभ की जाँच – हल्का पीलापन खून की कमी, पीला रंग गालब्लेडर में बाइल अधिक व किडनी की समस्या। नीलापन ह्मदय रोग। सफेद रंग टाक्सिन्स की संबंधित अंगों में अधिकता। जीभ का अंगों से संबंन्ध इस प्रकार है –
पीछे बाँयें बाँयीं किडनी, बीच आँत व दाँयें दाँयीं किडनी
मध्य भाग बाँयें स्प्लीन, बीच पेन्क्रिया व पेट व दाँयें लीवर
आगे बाँयें बाँयां फेफड़ा , बीच ह्मदय व दाँयें दाँयां फेफड़ा
उभार व गड्डे संबंधित अंगों की खराबी दर्शाते हैं।
इसके अतिरिक्त भावों का संबंध भी दोषों व अंगों से है। जैसे डर का वात व किडनी से, क्रोध का पित्त व लीवर से तथा लालच एवं ईर्षा का कफ व ह्मदय एवं स्प्लीन से।
13. आयुर्वेद के अनुसार व्यक्ति के गुणों का संबंध उसकी गतिविधियों से है। गुण अन्तर्निहित शक्ति है जबकि गतिविधि गत्यामक शक्ति। चरक ने इनके दस विपरीत जोड़ों की पहचान की है (कुल 20 गुण)। वात, पित्त व कफ के अपने अलग गुण होते है –
वात – हल्का, सूक्ष्म, सूखा, चलित, खुरदरा व ठंडा। पतझड़ के मौसम में प्रभाव बढ़ जाता है।
पित्त – गर्म, सूखा, गतिशील व व्याप्त हो जाने वाला (भेदक)। गर्मी में प्रभाव बढ़ जाता है।
कफ – द्रवीय, भारी, ठंडा, चिपकने वाला व धुन्धला। सर्दी में प्रभाव बढ़ जाता है।
इनके गुणों से विपरीत खाद्य पदार्थ लगातार लेने से असंतुलन पैदा होता है।
चरक द्वारा पहचाने गुण व उनके प्रभाव इस प्रकार हैं –
1. गुरु (भारी) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। पौषक तत्व बढ़ाता है किन्तु साथ ही भारीपन, शिथिलता व आलस्य का कारक है।
2. लघु (हल्का) कफ कम करता है व वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है। पाचन में सहायक, मोटापा कम करने वाला, सफाई करने वाला हे। ताजगी, सतर्कता व जागरुकता बढ़ाता है।
3. धीमा (मवा) कफ बढ़ाता है व वात पित्त घटाता है। शिथिलता, धीमी कार्य गति, ढिलाई व सुस्ती कारक है।
4. तेज (तीक्ष्ण) कफ घटाता है व वात पित्त बढ़ाता है। छाले व फोडे फुन्सी का कारण है। शरीर पर तुरन्त असर करता है। कुशाग्रता व समझ बढ़ाता है।
5. ठंडा (शीतल) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त घटाता है। सर्दी, अकड़न, बेहोशी, डर, जकड़ाव व संवेदनहीनता कारक है।
6. ऊष्ण वात व कफ घटाता है एवं पित्त व अग्नि बढ़ाता है। गर्मी, पाचन क्रिया, प्रक्षालन, फैलाव, सूजन, क्रोध व घृणा पैदा करता है।
7. तैलीय (स्निग्ध) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। चिकनापन, नमी, चिकनाई (घर्षण कम करना), शक्ति बढ़ाता है एवं लगाव व प्रेम में सहायक।
8. सूखा (रुक्ष) वात व अग्नि बढ़ाता है पित्त व कफ घटाता है। शुष्कता, समावेश कब्जियत व घबराहट बढ़ाता है।
9. चिपचिपा (स्लक्षणा) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। चिकनापन, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
10. खारा वात व अग्नि बढ़ाता है व पित्त व कफ घटाता है। त्वचा व हड्डी में दरार, असावधानी व दृढ़ता बढ़ाता है।
11. कुन्द (सनर) कफ बढ़ाता है व वात पित्त व अग्नि घटाता है। मजबूती, गाढ़ापन व शक्ति वर्धक।
12. द्रव पित्त व कफ बढ़ाता है व वात एवं अग्नि घटाता है। गलाने वाला, द्रवीकरण करने वाला है तथा लार वर्धक, करुणा वर्धक व संगकता वर्धक है।
13. नर्म (म्रुआ) पित्त व कफ बढ़ाता है व वात व अग्नि घटाता है। कोमलता, नजाकत, तनावहीनता, मृदुता, प्रेम व चाहत बढ़ाता है।
14. कठोर (कठिन) वात व कफ बढ़ाता है व पित्त एवं अग्नि घटाता है। कठोरता, शक्ति, दृढ़ता, संवेदनहीनता व स्वार्थपरता बढ़ाता है।
15. स्थिर कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। स्थिरता, रुकावट, सहारा, कब्ज व विश्वास को बढ़ावा देता है।
16. चल वात, पित्त व अग्नि बढ़ाता है व कफ घटाता है। गति, कंपन, अधीरता व अनास्था बढ़ाता है।
17. सूक्ष्म (कोमल) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। सूक्ष्म कौषिकाओं मे पहुँचने वाला तथा भावनाओं व संवेदवशीलता बढ़ाने वाला।
18 स्थूल (ठोस) कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। रुकावट व मोटापा बढ़ाता है।
19. धुन्धला कफ बढ़ाता है व वात, पित्त एवं अग्नि घटाता है। हड्डी की दरारों को भरने वाला व समझ व कल्पना शक्ति को कम करने वाला।
20. साफ (विसद) कफ घटाता है व वात, पित्त एवं अग्नि बढ़ाता है। शान्त करने वाला व अकेलापन एवं भटकाव पेदा करने वाला।
14. पंच तत्वों का संबंध भी अंगों से होता है। ईथर का दिमाग से, हवा का फेफड़ों से, अग्नि का आँत से, पानी का किडनी से एवं पृथ्वी का ह्मदय से।
15. आयर्वेद में कई रोगों जैसे छाती में बलगम, आँत में बाइल, पेट में गैस आदि की अधिकता को दूर करने के लिये पंचकर्मो का प्रयोग निर्धारित है। इससे शरीर, मस्तिष्क व भावों की सफाई की जाती है। ये पाँच क्रियायें हैं – वमन, रेचक (पेट साफ करने वाली औषधी), दवायुक्त वस्ति (एनिमा), नाँक में दवा डालना व रक्त शुद्धि।
16. आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ रहने के लिये सही खानपान जरूरी है। इसके अलावा स्वस्थ दिनचर्या, योग व श्वास के व्यायाम महत्वपूर्ण हैं। आध्यात्मिक कार्य प्रणाली की समझ समरसता व सुख दायक होती है।
भोजन व्यक्तिगत प्रकृति के अनुकूल होना चाहिये। अपनी प्रकृति व विभिन्न खाद्य पदार्थों का संबंध जानकर ही सही खानपान निर्धारित किया जा सकता है।
इसमें स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा व कसैला) तथा प्रकार (भारी, हल्का, गर्म या ठंडा असर कारक, तैलीय अथवा सूखा आदि)का ध्यान रखना चाहिये। भौजन चुनने में मौसम का भी ध्यान रखना जरूरी है।
मार्ग दर्शन के लिये सामान्य दिशा निर्देश यहाँ संक्षेप में दिये हैं। व्यक्ति विषेश को अपने दोष की अधिकता, एलर्जी, अग्नि की प्रबलता व मौसम को ध्यान में रखते हुए स्वयं निर्धारित करना चाहिये।
1. वात प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये अधिक मात्रा में मेवे, सेव, तरबूज,आलू, टमाटर,बैंगन, आइसक्रीम, माँस, मटर व हरा सलाद हानिकारक हैं। इसके विपरीत मीठे फल, अवाकेडो, नारियल, ब्रााउन चाँवल, लाल पत्ता गोभी, केले, अंगूर, चेरी व संतरे लाभ दायक हैं।
2 पित्त प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये मसालेदार भोजन, मूँगफली का मक्खन, खट्टे फल, केले, पपीता, टमाटर,व लहसुन अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत आम, संतरे, नाशपाती, आलूबुखारा, अंकुरित व हरा सलाद, सूर्यमुखी के बीज, मशरूम व शतावरी (एक प्रकार की साग) लाभ दायक हैं।
3 कफ प्रमुख प्रकृति के व्यक्तियों के लिये केले, तरबूज, नारियल, खजूर, पपीता, अनानास व डैरी उत्पाद अधिक मात्रा में हानिकारक हैं। इसके विपरीत मेवे, अनार, क्रेनबेरी, बासमती चाँवल, अंकुरित सलाद, व चिकन लाभ दायक हैं।
भौजन तन,मन व चेतन का पौषक है, सही ढ़ग से भौजन करना महत्वपूर्ण है। भौजन सीधे बैठकर, एकाग्र मन से ( टीवी, बातचीत व पुस्तकों के व्यवधान रहित) व प्यार से स्वाद लेकर व चबाकर करना चाहिये।
पेट में तिहाई मात्रा भौजन, तिहाई पानी व तिहाई हवा की होना चाहिये। पानी का शरीर में संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। फलों के रस के रूप में भी पानी ले सकते हैं किन्तु भौजन के साथ नहीं। भौजन के बीच थोड़ा थोड़ा पानी अमृत समान होता है। यह पाचन में सहायक होता है।
शरीर में अपनी जरूरत के अनुसार विटामिन्स पैदा करने की क्षमता है। प्रकृति व अग्नि की स्थिति समझे बिना बाह्य विटामिन्स का सेवन शरीर में विटामिन्स की अधिकता (हाइपरविटामिनोसिस) का कारण बन सकता है।

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