मानव मस्तिषक परिवर्तनशील होता है

मानव मस्तिषक परिवर्तनशील होता है                                                                           (द ब्रेन चेन्जेस इटसेल्फ, लेखक नारमेन डोल्डगे पर आधारित)
मानव मस्तिषक एक जटिल संरचना है। प्रायः एसा माना जाता है कि मानव मस्तिषक एक अवस्था तक विकसित होने के बाद एक पहले से प्रोग्राम किये हुए कम्प्यूटर के समान कार्य करता है। हाल ही के शोध कार्य इस धारणा को झुठलाते है। कई प्रयोगों द्वारा ये सिद्ध हो चुका है कि मानव मस्तिषक परिवर्तनशील है व उसे बदला जा सकता है। इस प्रकार के प्रयोगों के कुछ सफल उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं –
1. श्रीमती चेरिल शुल्ट्ज हमेशा गिरती पड़ती रहती थीं। उनके मस्तिष्क के उस भाग का विकास नहीं हो पाया था जो शरीर का संतुलन बनाने में आवश्यक है। कान के अन्दरूनी भाग में तीन अर्ध चन्द्राकार छोटी नहरें होती हैं। इनमें भरे द्रव की हलचल वहीं स्थित रोंए महसूस कर मस्तिष्क को शरीर की स्थिती परिवर्तन की सूचना देतें है। इसी सूचना के आधार पर मस्तिष्क शरीर के अन्य अंगों को निरन्तर संतुलन बनाये रखने के निर्देश देता है। इस संरचना को वेस्टिब्यूलर सिस्टम कहते हैं। इसी वेस्टिब्यूलर सिस्टम के कार्य नहीं करने की वजह से श्रीमती शुल्ट्ज की यह समस्या थी।
श्रीमती शुल्ट्ज, वाई बाख रीता जो अपने समय के मानव मस्तिषक के परिवर्तनशील होने पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे थे के संपर्क में आर्इं। बाख के साथी बायोफिजिसिस्ट यूरी डेनीलोव ने श्रीमती शुल्ट्ज का विस्तृत अध्ययन कर एक हेलमेट नुमा उपकरण बनाया जिसमे गति परिवर्तन मापक (एक्सीलरोमीटर) लगा था। इस उपकरण को एक कम्प्यूटर एवं एक छोटी सी धातु की पट्टी से जोड़ा गया। हेलमेट सर पर पहन कर तथा पट्टी को जीभ पर लगा कर श्रीमती शुल्ट्ज से खड़ा होने को कहा गया। कम्प्यूटर मानीटर पर अपनी हलचल देखकर तथा जीभ द्वारा मस्तिष्क को प्रेषित संदेश की सहायता से वे कुछ ही दिनों के अभ्यास से खड़े होने लगी। आगे और अभ्यास करके वे बिना उपकरण की सहायता से सामान्य जीवन जीने लगी। उनके मस्तिष्क का प्रभावित भाग पुनः विकसित हो चुका था।
2. बारबरा एरोस्मिथ यंग का मस्तिष्क विकास असंतुलित था। उनके मस्तिष्क के अग्र भाग (फ्रन्ट लोब) का विकास तो सामान्य था किन्तु पृष्ठ भाग का बाँया हिस्सा छोटा था। इस कारण वे देख सुन तो सकती थी किन्तु उनकी सीखने की क्षमता नगण्य सी थी। उन्हें शब्द उच्चारण व चीजों को स्थान से संबद्ध करने में दिक्कत होती थी। घर के बाहर वे खो जाती थी व चीजों को रख कर भूल जाती थी। वे अंग्रेजी अक्षरों जैसे बी एवं डी तथा पी एवं क्यू में भेद करने में अक्षम थीं।
अपने मित्र बारबरा जोशुआ के मार्फत उन्हें एलेकजेन्द्र लूरिया व ल्योवा जाजेत्स्की द्वारा मस्तिष्क के परिवर्तनशील होने संबन्धी शोध के बारे में जानकारी मिली। इसी जानकारी के आधार पर उन्होंने अपने मित्र की सहायता से बहुत से कार्ड बनवाये जिन पर एक ओर अलग अलग समय बताती घड़ी की तस्वीर थी तथा पीछे की ओर तस्वीर में दर्शाया समय लिखा था।
इन कार्डों की मदद से यंग ने अकेले घड़ी में सही समय जानने का अभ्यास किया। इस प्रकार के अभ्यास से उन्हें स्थान को चीजों से संबद्ध करने की क्षमता में आशातीत सुधार हुआ। इससे प्रेरित होकर यंग ने अपनी अन्य कमियों के लिये भी सफल प्रयोग किये। इन सफलताओं से उत्साहित होकर यंग ने जोशुआ के साथ मिलकर इसी प्रकार की अक्षमता वाले बच्चों के लिये एक स्कूल खोला। यह संभवतया पहला उदाहरण था पीड़ित ने अपने स्वयं के मस्तिष्क को सफलतापूर्वक पुनः सक्रिय किया।

मानव मस्तिष्क
3. मिशाइल मर्जेनिख अथवा मर्ज जैसा कि उनके साथ काम करने वाले उन्हें
बुलाते थे, ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रयोगों से सिद्ध किया कि शिजोफेर्निया (एक ऐसी बीमारी जिसमें रोगी ऐसी चीजों की कल्पना करता है जो होती ही नहीं हैं) मस्तिष्क के अभ्यास द्वारा ठीक की जा सकती है। उन्होंने ब्रोन मेपिंग तकनीक का प्रयोग कर अलग अलग गतिविधियों को मस्तिष्क के विभिन्न भागों से संबद्ध किया।
न्यूरोन के तीन भाग होते हैं। डेनड्राइड्स जिसमें पेड़ की तरह शाखायें होती हैं न्यूरोन्स से संकेत ग्रहण करता हैं सेल बाडी जो उसे जीवित रखता है और जिसमें डीएनए होता है। तथा तीसरा भाग एक्सान जो एक जीवित तार होता है जिसकी लम्बाई अलग अलग हो सकती है (कुछ माइक्रोन से 2 मीटर तक)। ये तार अपने पड़ोसी न्यूरोन तक बिजली संकेत (3 से 300 किमी प्रति घन्टा की गति से) ले जाने का काम करते हैं। ये संकेत दो प्रकार के होते हैं न्यूरोन को सक्रिय अथवा अवरुद्ध करने वाले। न्यूरोन अपने पास आने वाले उचित मात्रा में प्राप्त संकेतों के आधार पर सक्रिय अथवा अवरुद्ध हो जाते हैं। एक्सान व डेनड्राइड्स के बीच थोड़ी सी दूरी होती है जिसे सिनेप्स कहते है। एक्सान के अन्त में बिजली संकेत सिनेप्स में एक रसायन छोड़ते हैं। यही रसायन डेनड्राइड्स पहुँच कर निश्चित करता है कि पड़ोसी न्यूरान सक्रिय होगा अथवा अवरुद्ध। न्यूरान्स का आपस में जुड़ना का अर्थ उनके एक साथ सक्रिय होने अथवा अवरुद्ध होने पर निर्भर करता है।
मनुष्य का मस्तिष्क दो भागों में बाँटा जा सकता है पहला केन्द्रीय भाग (सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम) तथा दूसरा सहायक तन्त्र (पेरिफेरल सिस्टम) जो केन्द्रीय भाग से संदेश ले जाता अथवा केन्द्रीय भाग को संदेश पहुँचाता है।
मर्जेनिख ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि आपसी परिवर्तित (उदारणार्थ तर्जनी व
अंगूठे) सहायक तन्त्र ब्रेन मेपिंग में कोई बदलाव नहीं लाये। उन्होंने यह भी पाया कि यदि शरीर के किसी हिस्से को मस्तिष्क के संबन्धित भाग से अलग कर दिया जाये तो उस भाग में दूसरे पड़ोसी सहायक यंत्र कब्जा कर लेते हैं। इन प्रयोगों से फ्रायड की उस विचार धारा की पुष्ठी होती है कि आपस में जुड़े न्यूरान्स एक साथ क्रियाशील होते है व अलग अलग क्रियाशील होने वाले न्यूरान्स आपस में जुड़े नहीं होते हैं।
यह पाया गया है कि बचपन में एक नाजुक समय होता है जब बच्चे तेजी से सीखते हैं। अन्य कई कारणों में से एक मुख्य कारण इस काल में बीएनडीएफ (ब्रेन डिराइव्ड न्यूरोट्रापिक फेक्टर) का अधिक मात्रा में होना है जो मस्तिष्क विकास के लिये महत्वपूर्ण है। बीएनडीएफ मस्तिष्क के उस भाग(न्यूक्लियस बसालिस) को क्रियाशील बनाता है जो ध्यान केन्द्रित करता है, वह भविष्य के लिये मस्तिष्क में न्यूरान्स जोड़ने, बिजली सिगनल्स की गति बढ़ाने (न्यूरान्स पर एक पतली सी
तैलीय सतह बना कर) तथा अन्त में नाजुक काल को बन्द करने में मदद करता है। अधिक मात्रा में बीएनडीएफ उत्पन्न होने से न्यूक्लियस बसालिस अवरुद्ध हो जाता है।
मर्जेनिख ने ऐसी तकनीक का विकास किया, जिसको फास्ट फारवर्ड के नाम से जाना जाता है। इस तकनीक द्वारा प्रोढ़ लोगों में सीखने का नाजुक काल फिर से पैदा किया जा सकता है। यह तकनीक आटिज्म, अल्जीमर (भूलने की बीमारी) व अन्य ऐसी ही कमियों के उपचार में प्रभावी है।
4. मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है, भी परिवर्तनशील हैं। बढ़े लोंगों के रोज के व्यवहार में बचपन के सेन्टीमेन्ट्स की झलक प्रायः देखने को मिल जाती है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। नशीली दवायें व खुशी के भाव डोपेमाइन सिस्टम की सक्रिय होने की सीमा नीचे कर देते है जिस
कारण छोटी सी बात से बहुत अधिक खुशी महसूस होती है। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरानस लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है।
डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।
5. एडवर्ड टाउब ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध करके दिखाया कि रुकावट पैदा कर प्रभावित अंगो को उपयोग में लाने का उपचार संभव है। उन्होंने एक बंन्दर की बाँयें हाथ की संदेश वाहक नली को काटकर अलग कर दिया। इसके उपरान्त उन्होंने उसके दाँये हाथ को बाँध कर निष्क्रिय कर दिया। यह पाया गया कि बन्दर ने अपना बाँया हाथ काम में लेना शुरु कर दिया। फिर बाँये हाथ को कुछ महीनों के लिये बाँध दिया गया। उस हाथ को खोलने पर बन्दर अपने बाँये हाथ को पुनः काम में लेने लगा। इस प्रकार टाउब ने सिद्ध कर दिया कि मस्तिष्क को यह याद रखने से रोका जा सकता है कि प्रभावित अंग उपयोगी नहीं है। कई अंग असक्रिय सिर्फ इसलिये हो जाते है कि मस्तिष्क में यह बैठ जाता है कि वह उपयोग लायक नहीं है। आगे चल कर टाउब ने रुकावट पैदा कर उपचार की तकनीक पर आधारित एक उपचार केन्द्र खोला व कई प्रकार की कमियों का सफलता पूर्वक उपचार किया।
6. मोटापे से ग्रस्त (आबसेसिव कम्पल्सरी डिसआर्डर) लोग प्रायः चिन्ता ग्रस्त रहते है। छोटी सी बात से वे डर के भाव में जकड़ जाते हैं। इसके लिये मस्तिष्क के तीन भाग कार्य करते हैं। कुछ गलत होने का भाव हमारे मस्तिष्क के सामने के हिस्से (आरबिटल फ्रन्टल कोरटेक्स) में पैदा होते हैं। वहाँ से संकेत गहरे अन्दर स्थित गायरस में जाते है। सिन्गुलेट गायरस चिन्ता का भाव पैदा करता है कि यदि गलती को ठीक नहीं किया तो कुछ बुरा हो सकता है। वह हमारे दिल व मन में भी संकेत द्वारा सिरहन (सेन्सेशन) सी पैदा करता है। मस्तिष्क का गहरा केन्द्रीय भाग (कौडेट न्यूक्लियस) जो विचारों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में मदद करता है वह मोटापे से ग्रस्त लोगों में चिपचिपा सा हो जाता है जिसके कारण वे भय का यह भाव उनसे चिपक जाता है।
श्वारत्ज ने मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिये एक उपचार तकनीक का सफलता पूर्वक विकास किया। इसमें आरबिटल कोरटेक्स व सिन्गुलेट गायरस के बीच संबन्ध को अलग कर दिया जाता है, जिससे कौडेट न्यूक्लियस सामान्य तरीके से कार्य करने लगता है। कौडेट न्यूक्लियस को स्वयं के प्रयास से उपयोगी कार्यों में व खुशी प्रदान करने वाली गतिवधियों में ध्यान लगाकर भी सामान्य बनाया जा सकता है।
7. अक्सर वे लोग जो किसी कारण अपने हाथ अथवा पैर गँवा देते है एक काल्पनिक अंग की उपस्तिथि महसूस करते रहते है। इसका अहसास उन्हें जीवन भर दर्द महसूस कराता रहता है। वी एस रामचन्द्रन ने यह सोचा कि इस को भी मस्तिष्क के परिवर्नशील होने से समझा जा सकता है। इस आधार पर उन्होंने एक प्रयोग किया। एक विशेष डिजाइन से तैयार काँच लगे ढाँचे में प्रतिबिम्ब के द्वारा उन्होंने मस्तिष्क को काल्पनिक हाथ को सही हाथ के होने का आभास कराया। काफी लम्बे अभ्यास के बाद यह पाया गया कि उस व्यक्ति के मस्तिष्क से काल्पनिक हाथ होने की बात निकल गई। इस प्रयोग द्वारा उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सही तरीके का उपयोग कर मस्तिष्क से शारीरिक कमी के अहसास को दूर किया जा सकता है।
रामचंद्रन के अनुसार दर्द का अहसास मस्तिष्क में पैदा होता है तथा वह प्रभावित
अंग में महसूस होता है। उनके अनुसार दर्द का संकेत नर्वस सिस्टम द्वारा प्रवाहित होता है। ये संकेत रीढ़ की नलियों के रास्ते के द्वारों से गुजरता है। मस्तिष्क इन द्वारों को संकेत के महत्व के आधार पर खोलता है। जितने अधिक द्वार खुलते हैं दर्द उतना ही बढ़ता जाता है। मस्तिष्क संकेत को एन्ड्रोफिन जो शरीर के द्वारा बनाया गया एक प्रकार का दर्द निवारक है, छोड़ कर संकेत को रोक कर दर्द को रोक भी सकता है। उन्होंने अपनी इस विचारधारा को संक्षेप में इस प्रकार बतलायाः
दर्द अवयव के स्वास्थ्य की स्थिति बतलाने वाला एक विचार मात्र है न कि चोंट की प्रतिक्रिया।
एक आस्ट्रेलियन वैज्ञानिक जी एल मौसले ने तो रोगी द्वारा प्रभावित अंग को कल्पना में हिलाने डुलाने के माध्यम से दर्द निवारण की तकनीक भी सफलता पूर्वक विकसित कर ली।
8. पास्कुअल लेओने पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने ट्रान्सक्रेनियल मेगनेटिक स्टीमुलेशन (टी एम एस) का प्रयोग किया। टी एम एस का उपयोग से मस्तिष्क के किसी भाग को सक्रिय अथवा निष्क्रिय किया जा सकता है। यह मेगनेटिक स्टीमुलेशन की फ्रीक्वेन्सी व तीव्रता पर निर्भर करता है। उनहोंने इस तकनीक द्वारा ब्रोन मेपिंग कर यह पाया कि एक अंधे व्यक्ति में ब्रेल लिपी पढ़ने वाली उँगली का मोटर कोरटेक्स क्षेत्रफल अन्य उँगलियों की अपेक्षा बड़ा था। उन्होंने यह भी पाया कि क्षेत्रफल उपयोग के अनुसार बदलता है।
इसी खोज के आधार पर व्यक्ति के मस्तिष्क में अवयवों को चलाने वाले नक्शे (मोटर मेपिंग) को विचारों में बदलने वाली मशीन का भी आविष्कार किया गया। इन मशीनों का उपयोग पूरी तरह से लकवा ग्रस्त लोगों को अपने विचारों द्वारा वस्तुओं को चलाने के लिये किया जाता है। यह सिद्ध करता है हमारी कल्पना व कार्य आपस में जुड़े हुए है।
लेओने अपने विभिन्न प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हमारा मस्तिष्क हमेशा एक विशिष्ट कारक श्रंखला (आपरेटर सिरीज) में रहता है। यह कारक ऐसी जानकारी पर काम करता है जो साधारण जानकारी जैसे देखने, छूने अथवा सुनने से अधिक निराकार है। ये कारक श्रंखला आकार, गति अथवा स्थान से संबद्धता जैसी जानकारी के आधार पर कार्य करता है। कारक प्रतिस्पर्धा के आधार पर चुना जाता है। हम अपनी कल्पना से कारक को प्रभावित कर सकते हैं। किन्तु पूरी प्रक्रिया समझना अभी बाकी है।
9. कान्डेल एक मस्तिष्क वैज्ञानिक ने समुद्री घोंघे (एल्पीसिया नामक स्नेल) का अध्ययन किया। इसके न्यूरान का आकार लगभग एक मिलीमीटर होता है जिसे नग्न आखों से देखा जा सकता है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि हल्के विद्युत शाक सेन्सरी व मोटर न्यूरान्स के बीच सिनेप्टिक संबंन्ध दृढ़ करते हैं। इस प्रकार उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भय सिनेप्स में अधिक मात्रा में मेसेन्जर केमिकल उत्पन्न कर संकेतों को अधिक शक्तिशाली बना देता है।
कान्डेल ने यह भी पाया कि घोंघे को यह सिखाया जा सकता है कि इस प्रकार के शाक नुकसानदायक नहीं हैं। इस अध्यन से यह भी पता चला कि अस्थायी याददाश्त स्थायी याददाश्त में कैसे बदलती है।
हमारे जीन्स दो कार्य करते है। एक कार्य अपने आप को बनाना, इस क्रिया पर हमारा कन्ट्रोल नहीं रहता है। दूसरे कार्य में एक सेल जिसमें सभी जीन्स होते है किसी एक जीन को सक्रिय कर देता है जिससे एक नया प्रोटीन बन जाता है तथा उस सेल के स्वभाव में बदलाव आ जाता है। यह कार्य हम क्या सोचते व करते हैं, इस पर निर्भर करता है। इस प्रकार हमारे मस्तिष्क का विकास हम किस प्रकार पाले गये हैं इस से काफी प्रभावित रहता है। द्वितीय युद्ध के अध्यन से यह पता चलता है कि वे बच्चे जिनको नाजुक समय में अपनी माँ के प्यार से वंचित रहे, वे उनका मानसिक व भावनात्मक विकास कम हुआ।
मस्तिष्क विशेषज्ञों के अनुसार दो प्रकार की याददाश्त होती है। एक प्रक्रियात्मक अथवा अनतर्निहित याददाश्त। यह उस समय काम आती है जब हम कौई प्रक्रिया या स्वतः होने वाले काम को सीखते है। ये प्रायः अनजाने में प्रयोग में आ जाती है।
दूसरे प्रकार की स्पष्ट याददाश्त होती है जो हमें हमारे कार्य, संबंध, समय आदि की जानकारी देती है। इसका विकास लगभग 26 माह की आयु से शुरु होता है।
मस्तिष्क मे अँगूठे के बराबर दाँयीं व बाँयीं ओर दो भाग होते हैं, जिन्हें हिप्पोकेम्पस कहते हैं। ये स्पष्ट याददाश्त को दीर्घ कालिक स्पष्ट याददाश्त में बदलतें है।
अवसाद (डिप्रेशन) की दवायें अधिक मात्रा में स्टेम सेल्स बनाती है जो हिप्पोकेम्पस में जाकर न्यूरान्स बन जाते हैं। मनोचिकित्सा से भी मस्तिष्क में स्पष्ट बदलाव लाया जा सकता है।
हमारी निद्रा के दो भाग होते हैं, जिसमें एक तेज आँखों की हलचल (रेपिड आई मूवमेन्ट या रेम) निद्रा होती हैं। हम अधिकतर सपने इसी नींद में देखते हैं। छोटे बच्चों में यह नींद मस्तिष्क के विकास के लिये जरूरी है। छोटे बच्चे बड़ो की अपेक्षा इस नींद में अधिक समय बिताते हैं। रेम दीर्घ कालिक स्पष्ट याददाश्त को बढ़ाने में बहुत मददगार होती है।
10. केज व एरिक्सन पहले न्यूरोनल स्टेम सेल्स को खोजने वाले वैज्ञानिक थे। ये सेल बँटकर न्यूरान अथवा ग्लाइल सेल में बदल जाते हैं, जो मस्तिष्क में न्यूरान्स की सहायता करते हैं। ये स्टेम सेल्स वृद्ध व्यक्ति के मस्तिष्क के उस भाग में सक्रिय पाये जाते हैं जो गंध को महसूस करता है (ओलफेक्ट्री बल्ब)। किन्तु मस्तिष्क के वे भाग जो भावों को नियंत्रित करते हैं (सेप्टम), हिलने डुलने को नियंत्रित करतें हैं (स्ट्रीएटम) या रीढ़ नियंत्रण करते हैं में निष्क्रिय पाये जाते हैं।
यह भी पाया गया है कि उम्र के साथ मस्तिष्क में गतिविधियाँ एक ओर खिसकने लगती हैं। उम्र के साथ मस्तिष्क का आधा (दाँयां अथवा बाँया) भाग दूसरे की अपेक्षा अधिक प्रभावशील होने लगता है। वह गतिवधि जो पहले एक हिस्से में होती थी बाद में दोनों हिस्सों में होने लगती है। इससे ऐसा लगता है कि मस्तिष्क अपनी कमजोरी को स्वयं सुधारने की कौशिश करता है।
डाक्टर करानास्की ने यह सिद्ध किया कि व्यायाम हमारे ह्मदय व मस्तिष्क की रक्त वाहिनी कोशिकाओं को ताकतवर बनाने में सहायक है। परिणाम स्वरूप जो व्यक्ति साइकल चलाना, घूमना या अन्य ह्मदय को ताकत देने वाले व्यायाम करते हैं वे अपने हमउम्र अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक मानसिक तौर पर सक्रिय महसूस करते हैं। यह भी पाया गया है कि व्यायाम बी एन डी एफ (जो मस्तिष्क के विकास के लिये जरूरी है) का उत्पादन बढ़ाता है। चुनौतीपूर्ण मानसिक गतिविधियाँ हमारे हिप्पोकेम्पल न्यूरोन्स को सक्रिय रखने में सहायक हो सकती हैं।
11. मिशेल मेक केवल आधे मस्तिष्क के साथ पैदा हुई थी। जब वह पेट में ही थी तब उसकी मस्तिष्क के बाँये भाग में रक्त पहुँचाने वाली कौशिका (कारोटिड आरटरी) बन्द हो गई थी। इस कारण मस्तिष्क का बाँयें भाग का विकास नहीं हो पाया। सबसे पहले उसकी माँ केरोल ने देखा कि मिशेल निष्क्रिय रहती थी, शायद ही कोई आवाज निकालती ना ही किसी चीज की ओर नजरें घुमाती। उन्होंने यह भी पाया कि मिशेल का दायाँ हिस्सा लकवा ग्रस्त था। कई बार अस्पतालों के चक्कर लगाने से कोई लाभ नहीं मिला। उस समय उपलब्ध केट स्केन सुविधा कुछ निर्णय तक पहुँचने लायक साफ दृश्य देने में असफल थी।
कुछ दिनों बाद केरोल ने मिशेल को खाना खिलाते समय अपने हाथ के साथ नजर घुमाते देखा। बाद में सड़क पर जा रही मोटर साईकल की ओर ध्यान देते देखा। इसी बीच केरोल ने डा. जार्डन ग्राफमेन का एक लेख देखा जिसमें उन्होंने मस्तिष्क की समस्याओं के बारे में प्रचलित कई मान्यताओं को ठुकराते हुए मस्तिष्क के परिवर्तनशील होने की बात लिखी थी। केरोल मिशेल को नेशनल
इन्सटीट्यूट आफ हेल्थ ले गई जहाँ डा. ग्राफमेन डायरेक्टर थे। डा. ग्राफमेन की सहायता से मिशेल ऐसी कई गतिवधियाँ सीख पाई जो बिना मस्तिष्क के बाँये भाग वालों के लिये संभव नहीं होता है। डा. ग्राफमेन का मानना था कि मिशेल के मस्तिष्क के दाँये भाग में गतिविधियों का अच्छा विकास इसलिये संभव हुआ क्योंकि उसे रोकने के लिये मस्तिष्क का बाँया भाग नहीं था।
हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। बिना नियंत्रण के हम पागल हो जायेंगे। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें व सामाजिक व पारिवारिक संबंधो को तहसनहस कर देंगें।

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