हिन्दु धर्म

(इवाल्यूशन आफ हिन्दुइज्म इन इन्डिया, क्लाउस क्लोस्टरमायर,वन वल्र्ड आक्सफोर्ड पर आधारित)
हिन्दू धर्म किसने स्थापित किया यह ज्ञात नहीं है। जहाँ पश्चिम में हिन्दू धर्म को एक जीवन शैली माना जाता है, भारत में इसे कई रूपों में देखा जा सकता है।
1. हिन्दु धर्म का उद्गम –
मूल रूप से यह वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता है। विदेशी लोगों ने इसे हिन्दू धर्म का नाम दिया। मूल रूप में यह सभी वस्तुओं को नियन्त्रित करता है, यह एक व्यापक व समय के साथ अपरिवर्तित नियमों का संग्रह है जो भारतीय समाज का निर्देशन करता है तथा जीवन के सभी पहलुओं का नियन्त्रण करता है। सामान्यतह यह माना जाता है कि 150 वर्ष बीसी में वैदिक आर्य भारत आर्कटिक सर्कल (स्केन्डीनेविया, उक्रेन, पर्सिया, टर्की आदि) से बसने के लिये आये। रिग्वेद की लिपि व जोरोस्ट्रियन एवेस्टा की भाषाओं में काफी समानता है। हाँलाकि रिग्वेद में पुरानी पीढ़ी के लोगों का बाहर से आकर बसने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हिन्दु धर्म के और अधिक पुराने होने के काफी सबूत मिलते है।
2. वेद हिन्दु ग्रन्थ –
हिन्दु धर्म का सर्व प्रथम विवरण श्रुति के रूप में मिलता है। ज्ञान को सिर्फ सुनकर व याद रख कर ही प्राप्त किया जा सकता था। यह ज्ञान भी सिर्फ ऋषि – मुनियों (रिग) तक ही सीमित था। कई हजार वर्षों बाद बाहरी आक्रमण के चलते वेदों को लिपि बद्ध किया गया। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में प्रमुख इस प्रकार है-
– संहिता – रिग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।
– ब्राह्मण – ऐत्रेय आसेवलण्या, तान्डव्य सदविम्सा, तैत्रयी सतपथ, गौपथ आदि।
– उपनिषद – ऐत्रेय, केनाचन्डोग्य, तैत्रयी ईशकथा, प्रश्नमुकुन्द आदि।
रिगवेद के मन्त्र बदले नहीं जा सकते हैं व उनका उपयोग बलि(यज्ञ) में होता है।
यजुर्वेद में यज्ञ विधि का वर्णन है।
सामवेद में वेद रिचाओं प्रभावशाली बनाने के लिये उच्चारण की विधि दी गई है।
अथर्ववेद में तन्त्र व अवतारों का वर्णन है जो यज्ञ से संबन्धित नहीं है।
– स्मृति – मनु, याग्यवल्क, विष्णु आदि
– इतिहास – रामायण व महाभारत
– पुराण 18 महापुराण
– वैष्णव पुराण (सत्व) विष्णु, नारद, भागवत्, गरूड़, पद्म व वराह।
– शैव पुराण (रजस) मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद व अग्नि।
– ब्रह्म पुराण (तमस) ब्राहृा, ब्राहृान्ड, ब्राहृवैवर्त, मार्कन्डेय, भविष्य व वामन।
3. वैदिक जीवन व्यवस्था –
एक हिन्दु अपने जीवन में वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करता है। सामान्य दैनिक
चर्या जैसे सूर्योदय के पहले उठना, नहाना, संन्ध्या व गायत्री जप करना, भोजन करने से पहले ईश्वर को अर्पित करना, गाय को भोजन देना तथा अतिथि को भगवान मानना आदि के अतिरिक्त जीवन की चार अवस्थायें परिभाषित की गई हैं।
– ब्रह्मचर्य – 6-8 वर्ष की आयु से लगभग 18 वर्ष तक गुरु आश्रम में ब्राहृचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना।
– गृहस्थाश्रम – प्रायः यह विवाह पश्चात आरम्भ होता है। यह समय सांसारिक धन (अर्थ व काम) अर्जन का है, किन्तु यह इमानदारी व नियमानुसार होना चाहिये।
– वानप्रस्थाश्रम – जब बच्चे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जाते हैं तब माता पिता परिवारिक जिम्मेदारियों से विरक्त होकर धार्मिक कार्यों में मन लगाने लगाते हैं।
– सन्यासाश्रम – इसमें लोग घर छोड़कर जंगल में तपस्या कर परलोक सुधारने के प्रयास में लग जाते हैं।
समाज को चार वर्णों में बाँटा गया था
ब्राह्मण – समाज के हित में वेदों का अध्ययन व अध्यापन करना तथा यज्ञ पूजा आदि करवाना। जीविका के लिये दान दक्षिणा पर निर्भर रहे हैं।
क्षत्रिय – ये योद्धा व शासक होते हैं, तथा समाज की रक्षा करते हैं। बदले में कर के रूप में दूसरों से धन या सेवा प्राप्त करते है।
वैश्य – ये कृषि, कारीगरी तथा व्यापार आदि से धन अर्जित करे है।
शूद्र – ये लोग अकुशल काम या उच्च वर्ग की सेवा कर बदले में कुछ दन अर्जित कर लेते है।
5. वैदिक रीतिरिवाज
यज्ञ (बलि)को आवश्यक माना जाता था। सबसे उत्तम बलि मनुष्य की मानी जाती थी। श्रोत सूत्र सैकड़ों जानवरों की सामूहिक बली के लिये प्रयोग किये जाते थे तथा व्यक्तिगत बलि के लिये गृहसूत्र का प्रयोग होता था। गर्भ में आने से मृत्यु तक सोलह संस्कार शरीर व जीवन की शुद्धता के लिये जरूरी बताये गये है। वैदिक रीति का मुख्य हिस्सा कर्ममार्ग है, कर्म का अर्थ बलि माना गया है। मीमान्सा में इसे न्याय संगत बताया गया है। ब्रााहृणों में बताया गया कि स्वर्ग प्राप्ति के लिये अग्निस्तोमा नामक यज्ञ जरूरी है। उपनिषदों में बलि की निन्दा की गई है तथा कर्मों को महत्ता दी गई है। मनुस्मृति में विभिन्न पापों के लिये अलग अलग योनियों में पुनर्जन्म का वर्णन है।
6. हिन्दु धर्म का सार
हिन्दु धर्म के मुख्य ग्रन्थ पुराण, गीता, महाभारत व रामायण माने जाते है। रिग्वेद में विष्णु (इन्द्र के छोटे भाई) को प्रमुख देव बताया गया है। इनके दस अवतार (मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिम्ह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि) माने गये हैं। हिन्दु धर्म में चार प्रमुख सम्प्रदाय है। श्रीनिवास या रामानुज, ब्राहृ या माधव, कुमार या निम्बारक और रुद्र या विष्णुस्वामी अथवा वल्लभ। शुरुआती मध्ययुग में भारत में शैव संप्रदाय प्रमुख हो गया था। मार्कन्डेय के शिवजनबोध में शिव सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन है। इसके अनुसार प्रमुख तत्व हैं। स्वामी (पति), बन्धनों में जकड़ा मनुष्य (पशु) व बन्धन (पाश)। बन्धन कर्मों, माया व अहं का है। इससे मुक्ति के लिये मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करना (विद्या), संस्कारों का पालन (क्रिया), तप (योग) व धार्मिक कार्य करना (कार्य) चाहिये। देवी पूजा हमेशा ही हिन्दु संस्कृति का हिस्सा रहा है। प्रकृति व देवी से हमेशा शक्ति को जोड़ा गया है साथ ही तन्त्र मन्त्र को भी।
7. हिन्दु दार्शनिक खोज
पुरातन काल से ही भारत अपने ज्ञान के लिये जाना जाता रहा है। पारसी, ग्रीक व रोमन यहाँ के साधु सन्यासियों से सीखने को आतुर थे। 18 वीं सदी में जब पहली बार अंग्रेजी में उपनिषदों का अनुवाद हुआ तो योरोपीय विद्वानों ने इन ग्रंथों की खूबसूरती को सराहा।
हिन्दु दार्शिकता की दो धारायें है –
आस्तिक – सान्ख्य योग, न्याय विशेषिका, व वेदान्त (पूर्व व उत्तर मीमान्सा)
नास्तिक – बौद्ध व जैन विचार धारा
8. योग दर्शन
सान्ख्य दुःखो के निवारण में सहायक है। इसके अनुसार पुरुष व प्रकृति (वस्तु) दोनों अलग हैं। इन दोनों का मिलन व्यक्ति को स्वयं की प्रकृति का आभास कराता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्, रज व तम) का हर व्यक्ति में असंतुलित समावेश होता है। सभी दुःखों का कारण ये असन्तुलन ही है। योग के आठ (यम, नियम, आसन, प्रामायाम, प्रत्याहार, ध्यान व मोक्ष) रूपों के पालन से व्यक्ति प्रकृति के आकर्षण से मुक्त हो सकता है।
9. शंकराचार्य व उनका अद्वैत वेदान्त
उपनिषद विशेषकर भद्रायण के वेदान्तसूत्र में काफी बिखरे हुए वाक्यों में है। इनको समझने के लिये व्याख्या करना जरूरी है। 9वीं और 14वीं शताब्दी के बीच वेदान्त की दस शाखायें विकसित हुई, जिनकी स्वयं की व्याख्या (भाष्य व टीका) है। इनमें प्रमुख चार हैं –
– शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त
– रामानुजाचार्य का विशिष्ट वेदान्त
– माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
– वल्लभाचार्य का पुष्टि मार्ग
आदि शंकराचार्य (788- 820 बीसी) हिन्दु धर्म को बुद्ध धर्म के समानान्तर परिभाषित किया। उन्होने जगत को माया नहीं माना। उनके अनुसार ईश्वर के दो रूप थे। एक जिसकी हम पूजा करते हैं (सगुण)। दूसरा परम शक्तिमान निराकार (निर्गुण)। उनके द्वारा रचित विवेक चूड़ामणि के अनुसार बन्धन या मुक्ति स्वयं के मस्तिष्क पर निर्भर है।
मुक्ति के लिये ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत है जिसे सदाचरण, सुखों के त्याग व मुक्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा से ही पाया जा सकता है। आजकल चार शंकराचार्य पीठ (मठ) हैं।
10. कई लोग शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त को बौद्ध धर्म का छिपा रूप मानते थे। 9वीं शताब्दी में श्रीरंगम में नाथमुनि ने तमिल प्रबंधन के भक्त कवियों (अल्वर) को मान्यता देकर उनके गीतों को को पूजा में उपयोग करने की स्वीकृति देदी। पिता द्वारा विरासत में मिली पंकार्ता (पूजा विधि) व इन भक्तिगीतों ने भविष्य के अधिक रूढ़ि वादी श्रीनिवास पन्थ की नींव रखी। उनके विद्वान पौत्र ने कई ग्रन्थों की रचना कर वैष्णव वेदान्त को संगठित किया। अपनी मृत्यु शैया पर रामानुजाचार्या को बुलाकर अपनी तीन इच्छायें पूरी करने का वचन लिया। ये थीं व्यास व परसुराम (विष्णु पुराण के रचियता) मुनियों की प्रतिष्ठा पुनस्र्थापित करना, नम्मालवर (प्रमुख अलवर) के गीतों को जीवित रखना व ब्राहृसूत्र की व्याख्या करना। श्रीरंगम में रामानुजाचार्य ने कई सुधार व पूजा विधि का पुनर्गठन किया। वैष्णव संप्रदाय के विस्तार में उन्हें शैव राजा के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें भागकर मैसूर जाना पड़ा जहां का शासक उनका शिष्य बन गया। बाद में श्रीरंगम लौट कर श्रीरंगम के आचार्योंकी वैषणव वेदान्त मठाधीषों के रूप में स्थापना की। वे 120 वर्षों तक जीवित रहे व ब्राहृसूत्र की आधिकारिक व्याख्या लिखी। उन्होंने वैष्णव मंदिरों पूजा विधि निर्धारित की। आज श्रीनिवास समुदाय कापी बड़ा है तथा दो केन्द्रों में विभाजत है। कान्चीपुरम दक्षिण क्षेत्र के लिये व श्रीरंगम उत्तर क्षेत्र के लिये।
11. माधवाचार्य का द्वैत वेदान्त
माधवाचार्य जी (1238-1317) का जन्म उडीपी गाँव में हुआ। वे पहले अद्वैत वेदान्त के शिक्षक अच्युतप्रेक्षा के शिष्य बने। बावजूद प्रायः मत भिन्नता के वे गुरू का आदर पाने में सफल रहे व उन्हें आनंदतीर्थ नाम मिला। रामानुजाचार्य से अलग उन्होनें स्वयं का द्वैत वेदान्त स्थापित किया। मनुष्य व परमेश्वर में उन्होनें पाँच मुख्य अन्तर बतलाये। दोनों के बीच बिम्ब प्रतिबिम्ब का संबन्ध माना। परमेश्वर मूल रूप है, तथा मनुष्य उसका परावर्तित रूप है। अज्ञान ही बन्धन का कारण है तथा ईश्वर ही उससे मुक्ति दिला सकता है। वे एक प्रभावी लेखक थे तथा रिग्वेद व महाभारत के एक भाग की व्याख्या की। वे विष्णु के प्रबल समर्थक थे तथा विरोधी उनसे भय खाते थे।
12. वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग
वल्लभाचार्य (1481-1533) एक तेलगु ब्रााहृण थे, उन्होंने एक नये वैष्णव वेदान्त पुष्टिमार्ग की स्थापना की। वे भागवत् पुराण को नयी उचाँईयों तक ले गये। उनका मानना था कि संन्यास का अत्यधिक पतन हो चुका है, तथा पूजा पारिवारिक माहौल में की जानी चाहिये। उनके उपदेश का सार था कि ईश्वर की प्रसन्नता के कारण को जाना जा सकता है। पुष्टिमार्ग उदार व सबके लिये खुला है। इसमें ईस्वर के साथ को आनंददायी माना
गया है, तथा नाथ जी (मूर्ती जो वल्लभाचार्य को गिरिराज में मिली थी) की सेवा में विश्वास किया जाता है। बाद में वेदान्त का ज्ञान क्षीण होकर केवल गुरु विशेष की संस्था, पूजा विधि व प्रेरक भक्ति साहित्य का महत्व रह गया।
13. हिन्दु धर्म का अन्य धर्मों से सामना
स्वयं से अलग हुए धर्मों जैसे बौद्ध व जैन धर्म के अतिरिक्त हिन्दु धर्म को 14वीं शताब्दी से मुस्लिम आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अलग हुए धड़ों से मुकाबला जहाँ केवल बहस तक सीमित था, मुसलमानों ने जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। उन्होंने कई मन्दिरों को नष्ट किया तथा उँचे पद सिर्फ मुसलमानों को दिये। हालाकि बाद में अकबर ने हिन्दुओं को बराबर का
स्थान देने का प्रयास किया, लेकिन हिन्दुओं ने अपने को घेरा हुआ पाया फलतः वे कठोर व अन्तर्मुखी हो गये। 15वीं सदी के अन्त तक यूरोप के लोंगों के आक्रमण शुरू होने पर उसे क्रिश्चन मिशनरियों से सामना हुआ। 1857 में ब्रिाटिश साम्राज्य में आने से मिशनरी गतिविधियाँ (प्रोटेस्टेन्ट) काफी बढ़ गई। मिशनरी स्कूल खोले गये क्रिश्चन साहित्य का भारतीय भाषाओं में हुआ तथा चर्चों में धर्म परिवर्तन सभायें होने लगी। उस समय धर्म परिवर्तन साफ तौर पर लाभकारी था तथा ईसाइयों की संख्या लगातार बड़ने लगी। कुछ हिन्दुओं को ईसाइ धर्म की कुछ बातें अच्छी लगी और वे अपनी परंपरा बदलने लगे। राजा राम मोहन राय(1772-1833) ने सती प्रथा उन्मूलन व विधवाओं के जीवन सुधार आरम्भ किया। दयानंद सरस्वती ने ईसाइ धर्म का खुलकर विरोध किया व आर्यसमाज की स्थापना की।
14. पश्चिम सभ्यता का हिन्दु धर्म की प्रतिक्रिया
जहाँ राजा राममोहन राय व महात्मा गाँधी ने पश्चिम विचारधारा के कई बिन्दुओं को स्वीकार किया, सामान्य प्रतिक्रिया उसके विरुद्ध ही थी। राजा राममोहन राय ने पटना के मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी व कम्पनी की नौकरी की वे अपने वैष्णव पिता से अलग हो गये। उन्होंने स्वयं को हिन्दु धर्म के सुधार के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों को बढ़ावा देकर विज्ञान की शिक्षा पर बल दिया। रामकृष्ण परमहंस (1834-1886) गरीब ब्रााहृण परिवार में जन्मे थे। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगा तथा पिता व भाई की मृत्यु उपरान्त वे काली मठ में पुजारी बन गये। वे देवी के अनन्य भक्त बन गये जनेऊ त्याग कर वे अछूतों में देवी का रूप देख कर उन्हें गले लगाने लगे। उनका सभी धर्मों में विश्वास था तथा उनके उपदेश का केन्द्र था कि ईश्वर ही सब कुछ करता है। धीरे धीरे उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने विवेकानंद में नारायण का रूप देखा जो लोंगो का दुःख दूर करे के लिये आये हैं। उन्होंने विवेकानंद के शरीर पर अपना पैर रखकर उनको ईश्वर के दर्शन की शक्ति दी। बेरोजगारी से परेशान विवेकानंद ने अनुभव किया कि ईश्वर द्वारा दी गई वस्तु, प्रेम, न्याय व दुःख सभी के लिये संसार में अपना स्थान है। उन्होंने अपना जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया।
तीर्थ यात्रा के दौरान कन्याकुमारी में उन्हें समझ में आया कि आजकल के संन्यासी को व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिये जिससे समाज का भला हो सके। इस प्रकार सामाजिक उत्थान के साथ व्यवहारिक शिक्षा के विचार की शुरुआत हुई। 1893 में शिकागो की विश्व धर्म सबा में में अमेरिकन बन्धुओं से अनुरोध किया कि वे भारत में मिशनरी के स्थान पर अध्यापक व तकनीकी विशेषज्ञ भेजे। अपने भाषण के बाद वे सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने गये। फोर्ड की सहाया से स्थापित रामाकृष्ण सान्स्कृतिक केन्द्र में लगातार सम्मेलन व सभायें होती रहती हैं। महातमा गाँधी ने भी ने पश्चिम विचारधारा से प्रभावित होकर छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष किया। वे स्त्रियों के मनोबल व आध्यात्मिक शक्ति में बरोसा रखते थे। इन सभी ने भीतर रह कर ही हिन्दु धर्म में सुधार लाने का प्रयास किया।
उसके उपरान्त हिन्दु धर्म का राजनीति करण शुरू हो गया और वह एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरा। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1909 में पहली हिन्दु राजनीतिक पार्टी हिन्दु
महासभा का गठन किया जो मुस्लिमों की कट्टर विरोधी थी। जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टी दूसरी बड़ी हिन्दु पार्टी है। इसके अतिरिक्त 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 1964 में विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल आदि आक्रमक संगठन बन गये।
16. हिन्दु धर्म के आधुनिक चेहरे
रमन महर्षि(1879-1950), अरविन्दो घोष (1872-1950), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888- 1975), भक्त वेदान्त स्वामी (1896-1977, इस्कान के संस्थापक), श्रीकृष्णप्रेम वैरागी (1895-1965), सत्य सांई बाबा (1926-2011), आनन्दमयी माँ (1896-1983) आदि आधुनिक नाम है जिनके काफी अनुयायी रहे है।
17. हिन्दु धर्म के लिये आज की चुनौती
आज हिन्दु धर्म केवल रस्मों तक सीमित रह गया है। अधिकतर संत व पुजारी ब्राहृ ज्ञान त्याग कर सान्सारिक सुखों में लिप्त रहते हैं। लोग देवी देवताओं की पूजा भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिये करते हैं। ब्राहृ की अथवा स्वयं की खोज की ओर प्रेरित करना ही आज की हिन्दू धर्म के लये सबसे बड़ी चुनौती है।

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