आधुनिक समाज और धर्म

विश्व में सभी धर्मों का उद्भव समाज के उत्थान के लिये व मानव मूल्यों की स्थापना के लिये ही हुआ है। यह सामाजिक चिन्तकों द्वारा समाज में आपसी सामंजस्य एवं व्यवस्था को स्थापित करने हेतु बनाई गई एक आचार संहिता है।
समाज की आवश्यकतायें समय के साथ बदलती हैं। लेकिन धर्म का स्वरूप आज भी थोड़े बहुत फेर बदल के साथ पुरातन ही है। अतः आज धर्म को लोग एक परंपरा के रूप में ही लेते हैं। धर्म गुरु भी विश्व भर में इसे इसी रूप में अपने अपने तरीके से आगे बड़ाने का प्रयास कर रहें हैं।
इन प्रयासों में समय के साथ कई विकृतियाँ जैसे अन्धविश्वास, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, धन व बल संग्रह की प्रवृत्ति आदि साफ दिखती हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो धर्म आज एक व्यवसाय हो गया है।
धर्म के पथ प्रदर्शक के रूप में आज भी हजारों वर्ष पूर्व रचित ग्रन्थों को ही माना जाता है। ये धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, कुरान, बाइबल आदि निसंदेह अपने समय के महत्वपूर्ण एवं महान रचनायें हैं। लेकिन आज के सामाजिक संदर्भ में इनका कितना महत्व है इस पर विचार करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
ये आश्चर्य की बात है कि आज के विद्वान इन ग्रन्थों की मीमान्सा तो अपने तरीके से समय समय पर करते रहते है। लेकिन किसी भी विद्वान ने एक नये सिरे इन विषयों पर विचार करने की आवश्कता महसूस नहीं की। यही एक कारण है जिसकी वजह से आज धर्म का मूलभूत आधार जो सामाजिक उत्थान से जुड़ा था वह उससे अलग हो गया है।
ऐसा नहीं है कि समाज सुधार के प्रयास नहीं हो रहें हैं। ऐसे कई महापुरुष हुए हैं और आज भी हैं जिन्होनें अपना संपूर्ण जीवन समाज की उन्नति व सुधार के लिये समर्पित कर दिया है। किन्तु ये प्रयास मानव सेवा को धर्म मान कर किये गये प्रयास हैं और उनका प्रतिफल भी एक सीमित सीमित स्वरूप में ही रहा है।
आज धर्म के नाम पर कई आयोजन करोड़ों रूपये लगा कर विश्व भर में आयोजित किये जातें हैं। लोग उसमे अपना योगदान धन व समय लगा कर देतें भी हैं। लेकिन समाज पर इन आयोजनों का प्रभाव एक सामाजिक मिलन से अधिक कुछ देखने को नहीं मिलता है।
यह भी देखने में आता है कि लोग करोड़ों रूपये खर्च कर कई प्रकार के अनुष्ठान आयोजित करते हैं। इनका उद्देश्य मात्र अपना समाज में महत्व दिखाने अथवा अपना अपराध बोध कम करने के लिये अधिक समाज की भलाई के लिये कम होता है।
आज धार्मिक प्रतिष्ठानों के पास अपार संपदा है एवं धार्मिक गुरु एवं विद्वानों के पास
सभी प्रकार के साधन एवं सुविधायें। लेकिन सामाजिक मूल्य आज इतिहास के निम्नतर स्तर पर हैं। पुराने विद्वानों ने भगवान अथवा ईश्वर को सर्व व्यापी, पाप व पुण्यों का हिसाब रखने वाला व अन्त में मनुष्य को उसके कर्मो के अनुसार दन्ड अथवा पुरस्कार देने वाला स्थापित किया था। लोगों में यह भावना घर कर गई थी कि ईश्वर का न्याय सटीक व बिना किसी भेदभाव के होता है। अतः अधिकतर लोग भगवान अथवा ईश्वर से डरते थे एवं नियन्त्रित आचरण करते थे। इस कारण समाज में एक व्यापक स्तर पर समन्वय व शान्ति बनी रही। यदा कदा कुछ लोग दुराचरण करते थे तो सामाजिक व्यवस्था उसे दण्ड देती थी।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्तिथियों में तेजी से बदलाव आया है। आज शक्ति संपन्न वर्ग यह मानता है कि वह कुछ भी गलत कर सकता है। एक उचित अनुष्ठान अथवा यथोचित भेंट किसी धर्मस्थल पर चढ़ा कर वह ईश्वर से अपने किये की क्षमा माँग सकता है। ईश्वर से क्षमा मिले या नहीं उसका अपराध बोध तो कम अवश्य ही हो जाता है। और वह उससे भी बड़े अनेतिक कार्य की योजना बनाने में लग जाता है। शक्ति व साधन के बल पर प्रायः ये लोग सामाजिक व्यवस्था के दण्ड से भी बच जाते हैं। इस वजह से ईश्वर की निस्पक्षता पर लोगों का विश्वास कम हुआ है। परिणाम स्वरूप शक्ति साधन हीन लोग भी दुराचरण निडर होकर करने लगे है। यही वजह है कि मानव मूल्य आज निम्नतर स्तर पर हैं।
भगवान से क्षमा माँगने अथवा अपने अपराध बोध को दबाने वाले श्रदधालुओं की बढ़ती संख्या के फल स्वरूप ही आजकल धार्मिक स्थलों की संख्या व उनका स्तर तेजी से बढ़ रहा है। और उतनी ही तेजी से बढ़ रही है सामाजिक अपराधों की संख्या एवं उनके आकार।
धर्म व अपराध की एक साथ प्रगति आज के समाज में धर्म की सार्थकता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।
इसलिये आज आवश्कता है धर्म को नये सिरे से परिभाषित करने की। यह सौभाग्य की बात है कि आज धार्मिक संगठन साधन संपन्न है और धार्मिक विद्वानों की भी विश्व में कमी नहीं है। आज जरूरत है तो सिर्फ इतनी कि विश्व भर के विद्वान व धर्म संस्थान मिल कर इस विषय पर ध्यान केन्द्रित करें। और शोध करें एक ऐसे नये धर्म की जो मानव मूल्यों की व एक सभ्य समाज की पुनस्र्थापना में सहायक हो सके।

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