आज का इंसान आखिर क्या चाहता है

आज का इन्सान आखिर चाहता क्या है

आज हम लोग अपनी उन्नति का बखान करते नहीं थकते। मेडिकल साइन्स वाले कहते
है हमने मनुष्य बनाने का रहस्य जान लिया है। अब हम दिये हुए गुणों के अनुसार मानव
भ्रूण अथवा अन्य किसी भी जानवर का बीज का प्रारूप तैयार कर सकते है। भौतिक
शास्त्री प्रकृति की उत्पत्ति की गुत्थी को सुलझाने का दावा कर रहे हैं। आज हम ब्राम्हांड
के किसी भी कोने में पहुँच सकने का दावा भी करते हैं। सुख सुविधा के सब साधन
जुटाने का काम तो हम निरन्तर कर ही रहें हैं। लेकिन क्या ये प्रयत्न वास्तव में जिस
उद्देश्य से किये गये थे उसे पूरा करने में सहायक हुए है इस पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह
आज लगा हुआ है।

क्या आज लोग दुनिया के किसी भी कोने में पिछले सौ साल की तुलना में अधिक सुखी
व सन्तुष्ट है। ये एक विडम्बना ही है कि जैसे जैसे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा व सहुलियत के
साधन बढ़ाने के प्रयास किये उतनी ही उसकी असुरक्षा की भावना व चिन्तायें बढ़ती गई।
विकास की ये विसंगतियाँ लगभग हर क्षेत्र में आज देखने को मिलती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में
आज साधनों के साथ बीमारियाँ बढ़ रही है। सुख सुविधाओं के साथ बैचेनी बढ़ रही है।
संचार साधनों में प्रगति के साथ दिलों की दूरियाँ बढ़ रही हैं। परिवाहन साधनों की प्रगति
के साथ दुर्घटनायें बढ़ रही है। चाँद तक तो हम आज हफ्ते भर में पहुँच सकते हैं लेकिन
पड़ोसी तक पहुँचने में महीनों निकल जाते हैं। ये प्रगति मानव को कहाँ ले जायेगी कह
पाना मुश्किल है।

ये बदलाव क्यों आया इस पर गौर करने की आवश्कता है। यह जरूरत इसलिये है भी
कि यदि हम परिवर्तन की दिशा बदलना चाहें तो हमें क्या करना चाहिये यह हम जान
सकें। आज का समाज जिस ओर अग्रसर है उसके मूल में सोच में आया एक महत्वपूर्ण
बदलाव है। और यह बदलाव है हमारे सोच का स्वयं पर केन्द्रित होना। पहले हमारी सोच
का आधार हुआ करता था त्याग, दूसरों की भलाई, मुसीबत में दूसरों की सहायता, बड़ों
का सम्मान, दया,प्यार आदि आदि। इसके अतिरिक्त लोग समाज में अपनी छबि के प्रति
कफी सचेत रहते थे। अतः पहले प्रायः लोग किसी भी कार्य को करने के पहले सोच को
उपरोक्त आधारों पर तोल लेते थे। समाज के अलावा धर्म की भी मनुष्य के व्यवहार में एक
अहम भूमिका होती थी। लोग भगवान से डरते थे व हर कार्य को पाप व पुण्य के तराजू में
तौल कर निर्णय लेते थे।

विज्ञान की प्रगति के साथ मनुष्य की तर्क शक्ति का विकास हुआ, और उसके साथ ही
पाप पुण्य से विश्वास डगमगाने लगा। साथ ही धर्म के पंडितों ने पाप कर्म की काट के
लिये दान, अनुष्ठान आदि उपाय खोज निकाले जिससे लोगों के मन से गलत कार्य करने
के बाद होने वाला अपराध भाव का बोझ दूर नहीं तो कम अवश्य ही होने लगा। शायद
भगवान से डर दूर होने के साथ ही समाज का डर भी नहीं रहा। परिणाम स्वरूप शुरु हुई
धन एवं शक्ति संग्रह की एक ऐसी दौड़, जिसमें कुछ भी करना जायज था। उदेश्य रह
गया तो सिर्फ एक, वह यह कि किसी भी सूरत में मुझे सबसे आगे निकलना हैं। शक्ति व
धन संग्रह की इस दौड़ ने मनुष्य का ध्यान स्वयं पर केन्द्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धन व शक्ति किसके पास कितनी है, यह दिखलाने का एक ही तरीका हो सकता है। वह
है उसका प्रदर्शन। और इस प्रकार शुरु हुआ धन व शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला। कोई
बड़े बड़े मन्दिर बना रहा है तो कोई बड़ी बड़ी धर्मशाला। कोई विशाल धार्मिक आयोजन
कर रहा है तो कोई प्रतिद्वन्दी को नीचा दिखाने का षडयन्त्र रच रहा है। गलत कार्य करने
पर जो दन्ड का विधान प्रशासन ने बनाया है वह भी आज शक्ति व धन के प्रदर्शन के
प्रभाव से नहीं बच पाया और समय के साथ इसने भ्रष्टाचार का विकराल रूप ले लिया।
कहतें हैं कि पाप की कमाई बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। यही कारण है कि आज दुराचार
सड़क पर आ गया है। आज हत्या, लूट व बलात्कार आम है। नैतिकता का इतना
अवमूल्यन हो गया है कि 2-3 साल की बच्ची का भी दुराचार का शिकार होना आम बात
हो गई है। आज शक्ति व धन संग्रह की होड़ व उसके प्रदर्शन में दया, धर्म, परोपकार
आदि मानव मूल्य जो एक सभ्य समाज का आधार हुआ करते थे वह प्रायः लुप्त हो गये
हैं।

ऐसा नहीं कि पहले अनैतिक कार्य करने वाले लोग नहीं होते थे, लेकिन वे कुछ गिने चुने
व मार्ग से भटके लोग ही हुआ करते थे। लोग उन्हे पापी और दुष्ट मान लेते थे और
भरोसा रखते थे कि ईश्वर उनको दन्ड अवश्य ही देगा। उनका उदाहरण देकर वे बच्चों
को गलत राह पर न चलने का पाठ पढ़ाते थे। लेकिन आज चारों ओर अनैतिकता का
साम्राज्य है। और अधिकतर लोग आज यह मानते हैं कि सफलता के लिये धन व शक्ति
का होना जरूरी है, वे किसी भी सूरत में इन्हें पाना चाहते हैं।

अवश्य ही इस प्रकार पायी सफलता अन्दर ही अन्दर व्यक्ति को कचोटती रहती है जिस
कारण बहुत कुछ पा लेने के बावजूद वह सुख एवं सन्तोष महसूस नहीं कर पा रहा है।
आखिर इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता क्या है। समस्या का हल मूल कारण दूर
करने में ही है। आज आवश्यकता है मनुष्य को अपना ध्यान स्व से हटा कर दूसरों पर
केन्द्रित करने की।

एक सीधा सा तरीका हो सकता है सिर्फ इन्तजार करने का। जो हो रहा है उसे होने दें।
मनुष्य का स्वभाव है कि वह कुछ समय बाद हर चीज से ऊब जाता है, और कुछ नया
करना चाहता है। इसकी पूरी संभावना है समय के साथ मूल्य फिर बदलें और फिर समाज
के सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें। हाँ यह सब होने में कितनी सदियाँ लगेगी कह
पाना कठिन है।

दूसरा तरीका वैज्ञानिक हो सकता है। यह सम्भव है कि कुछ वर्षों में विज्ञान में हम इतनी
प्रगति कर लें कि मनुष्य के मस्तिष्क को नियन्त्रित करने का उपाय खोज निकालें। तब
मनुष्य के मस्तिष्क को जैसा चाहे ढाल सकें। यदि मस्तिष्क को भावना शून्य ही कर दिया
जाय तो सुख दुःख से परे एक मशीनी समाज का निर्माण समस्या को जड़ से ही समाप्त
कर देगा।

तीसरा तरीका हो सकता है नये सिरे से भगवान के समकक्ष अथवा उनसे भी बड़कर
एक नयी सर्वव्यापी, निष्पक्ष शक्ति रूप की प्रतिष्ठा जिसका डर मनुष्य के ह्मदय में पुनः बैठ
सके।

यह डर मनुष्य को अपने विवेक का उपयोग दूसरों की भलाई के लिये प्रेरित करेगा और
पुनः एक ऐसे समाज जिसमें हर व्यक्ति दूसरों की भलाई एवं उन्नति के बारे में सोचे व
अपने कर्मों का आधार बनाये। निश्चित ही ऐसे समाज में अमन चैन के अतिरिक्त कुछ
और हो ही नहीं सकता है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *