क्या ये विकास है?

 

अर्थ शास्त्रियों ने पूरी मानव आबादी को तीन भागों में बाँट रखा है। ये भाग हैं विकसित, विकासशील व अविकसित। इस विभाजन का आधार रखा गया है प्रतिव्यक्तति आय, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, क्रय शक्ति व सेहत। विकसित देशों के अर्थ शास्त्रियों द्वारा निर्धारित इस विभाजन को लगभग पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया है।

किन्तु क्या यह विभाजन सही है? क्या अन्य कोई और किसी क्षेत्र की संपत्ति नापने का आधार नहीं हो सकता है? क्या इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है? इन सब प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सकते है, यदि हम वास्तविक संपदा को समझने का प्रयास करें।

मनुष्य अपनी जरूरत की वस्तुओं को प्रकृति से प्राप्त करता है। हवा, पानी, धूप, खनिज व भोजन आदि हमें प्रकृति से ही मिलता है। लगभग सभी ओद्योगिक उत्पाद भी प्रकृति से प्राप्त खनिज अथवा प्रकृतिक उत्पादों से ही बनते हैं। अतः यह आवश्यक है कि संपदा का मापदंड भी यही होना चाहिये।

बहुत पहले एक वैज्ञानिक लेख में विकास का मापदंड उस देश में प्रति व्यक्ति कितने एकड़ पृथ्वी के उत्पाद का उपयोग होता है बताया गया था।

पृथ्वी पर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार कुल 11.8 बिलियन हेक्टेयर उत्पादक क्षेत्र के हिसाब से प्रति व्यक्ति 1.8 हेक्टेयर उपलब्ध क्षेत्र है। अतः प्रति व्यक्ति इतने क्षेत्रफल का उत्पाद हर व्यक्ति को मिलना चाहिये। इसकि तुलना में नीचे तालिका में कुछ देशों के प्रतिव्यक्ति उपलब्ध क्षेत्रफल व प्रतिव्यक्ति क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग की जानकारी दी गई है। तालिका से स्पष्ट है कि अधिकतर विकसित व विकासशील देश अविकसित देशों के प्राकृतिक साधनों का दोहन कर रहे हैं।

यह दुर्भाग्य है कि आधुनिक औद्योगिकरण के कारण प्राकृतिक उत्पादों की तुलना में औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। यह भी आश्चर्य की बात है कि गुणता व उत्पादकता में सुधार के नाम पर विकसित मशीनों ने औद्योगिक उत्पादों की कीमतों की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्र में में अनेक उत्पाद ऐसे बनाये जाते हैं जो मानव हितों के विरुद्ध जाते हैं।

 

 

क्रमांक देश प्रतिव्यक्ति हेक्टेयर  क्षेत्रफल उत्पाद का उपयोग प्रति व्यक्ति प्राकृतिक साधन उपलब्धता
1 अमेरिका 8.22 3.76
2 रूस 5.59 6.79
3 फ्रान्स 5.14 3.11
4 चीन 3.38 0.94
5 भारत 1.15 0.45
6 मध्य अफ्रिकन रिपब्लिक 1.24 7.87
7 कांगो 1.29 10.91
8 अर्जेनटिना 3.14 6.94
9 पेरागुवे 4.16 10. 52

 

औद्योगिकरण से सर्वाधिक नुकसान मानव हितों का निम्न क्षेत्रो में हुआ है –

  • विनाश कारी हथियार- न्यूक्लियर बम, रसायनिक शस्त्र व उनके दूर तक मारक क्षमता के साधन, स्वचालित व शक्तिशाली हथियार। इस कारण कई देशों को अपने नागरिकों के उत्थान के बदले सीमा सुरक्षा पर अधिक  साधन खर्च करना पढ़ता है। आतंकवाद फैलने में भी हथियारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • नशीले पदार्थ- लगभग सभी देशों में प्रतिबन्ध के बावजूद नशीले पदार्थों का धंधा पूरे विश्व में फैला हुआ है। एक ओर इसके कारण जहाँ कई युवा जिन्दगियाँ बर्बाद हो रही है वहीं इससे अर्जित धन आतंकियों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • पर्ययावरण की बर्बादी- यातायात साधनों जनित वायु प्रदूषण, औद्योगिक अपशिष्ट द्वारा जल व वायु प्रदूषण, ओजोन सतह की क्षति तथा हानिकारक रसायनों का उपयोग के कारण पूरा विश्व आज मानव जाति के भविष्य के लिये चिन्तित है।

तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य आज जिस डाल पर बैठा है उसी को काटने में लगा है।

मन क्या है?

 

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते है कि आज पकोड़े खाने का मन है अथवा पिकनिक पर जाने का मन है। कई बार लोग कहते हैं कि कुछ करने का दिल नहीं है या किसी भी चीज में मन नहीं लग रहा है। कभी सुनने को मिलता है कि मन उदास है या दिल खुश हो गया। लोग यह भी कहते हैं कि मन को बस में रखना चाहिये।

दिल और मन का संबंन्ध क्या है? दिल का कार्य तो शरीर में रक्त का संचालन करना भर है तथा मन नाम का तो शरीर का कोई भाग नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार तो सुख, दुःख अथवा इच्छा का नियंत्रण मस्तिष्क ही करता है। फिर मन की उत्पत्ति कैसे हुई?

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव मस्तिष्क का हाईपोथाल्मस  भाग जो त्वरित (इन्सटिंकिटिव) व्यवहार को प्रभावित करता है तथा एमिग्डाला जो भावों व चिंताओं को प्रभावित करता है। मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम  में स्थित खुशी केन्द्र (प्लेजर सेन्टर) भावों को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खुशी केन्द्र एक प्रकार से मस्तिष्क के लिये पुरस्कार सिस्टम डोपेमाइन सिस्टम के भाग हैं। इसे ग्लोबलाइजेशन कहते है। सीखने की प्रक्रिया में कई न्यूरानस लम्बे समय के लिये आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह लम्बे समय का दुःख (डिप्रेशन) इन न्यूरान्स को अलग कर देता है जो चीजों को भूलने मे मदद करता है। मस्तिष्क में नयी चीजों को याद रखने की जगह बनाना जरूरी है, इसके लिये भूलना आवश्यक है। डोपेमाइन जहाँ उकसाता है आक्सीटोसिन चित्त शान्त करता है, मन में कोमल भावनायें पैदा करता है व विश्वास पैदा करता है। आक्सीटोसिन भावनात्मक संबंन्धों (जैसे माँ का बच्चों को दूध पिलाना) के समय उत्पन्न होता है। यह भूलने में मददगार होता है।

हमारे मस्तिष्क में एक साथ हजारों गतिविधियां चलती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिये एक तन्त्र जरूरी है जिससे हम अपने दिमाग पर नियंत्रण रख सकें। बिना नियंत्रण के हम पागल हो जायेंगे। हमारे मस्तिष्क का एक बढ़ा भाग गतिविधियों को रोकने का काम करता है। यदि ऐसा नहीं हो तो अनावश्यक प्रवृत्तियाँ व आवेग पूरी तरह से हम पर हावी हो जायेंगें व सामाजिक व पारिवारिक संबंधो को तहसनहस कर देंगें।

शायद इसी नियत्रण तन्त्र को हम लोग मन या दिल के नाम से जानते हैं।

विचारणीय ये है कि नियन्त्रण तन्त्र विकसित कैसे होता है?

बचपन से लेकर पूरी उम्र हमें अपने परिवेश से अपने व अन्य  व्ययक्तियों से संबन्धी प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं। इनमें प्रशंसा, बुराई, वर्जना, प्रोत्साहन, अपमान, गुस्सा, प्रेम, घृणा आदि सम्मलित हैं। इन प्रतिक्रियाओं को हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप ग्रहण करता है। इसको हम साधारण शब्दों में अनुभव भी कह सकते हैं। ये अनुभव ही व्यक्ति के नियंत्रण तन्त्र को दिशा देते है। जिसे हम मन कह सकते हैं।

फर्ज़ या आत्मतुष्टि

 

चालीसवें दशक अथवा उससे पहले पैदा हुअे बच्चों को सादा जीवन जीने व संतोष करने का पाठ मानों घुट्टी में पिला कर बड़ा किया जाता था। समय के साथ संम्पन्नता व बढ़ती सुविधाओं के कारण जीवन शैली में बदलाव अवश्य ही आये। पर  उनमें से अधिकतर आज भी सादा जीवन शैली को अपना आधार मानते है। वे फिजूल खर्ची से बच कर प्रायः भोग विलासिता से दूर रहने का प्रयास करते हैं।

७० के दशक के बच्चों को तुलनात्मक रूप से बेहतर परवरिश अवश्य ही मिली। किन्तु सादगी व मितव्ययता तब भी अवश्य ही सिखाई गई। प्रायः बच्चे माता पिता के साथ अपनी बात निडर होकर रख सकते थे। इस कारण आपसी निकटता पुराने समय से अधिक थी। सीमित होता परिवार भी इसका एक कारण हो सकता है। अधिकतर ये बच्चे अतः अपने से अलग रह रहे माता पिताओं से भावनात्म रूप से निकटता से जुड़े है। तथा सतत संपर्क बना कर कुशल क्षेम पूछते रहते हैं। यह निश्चय ही अलग रह रहे माता पिताओं के लिये बच्चों की निकटता का अहसास कराता है तथा आवश्यकता पढ़ने पर सहारे का भरोसा दिलाता है। यह सहारा उन्हे अकेले होने का अहसास नहीं होने देता है व वे आराम से अपने जीवन को स्वेच्छा जी पा रहे हैं।

इसी बीच अधिकतर बच्चों ने आर्थिक प्रगति कर उच्च वर्ग की जीवन शैली अपना ली है। बच्चों का सुख संपन्न जीवन माता पिताओं के लिये अवश्य ही प्रसन्नता का विषय है। किन्तु बच्चे जब माता पिता के घर जब कुछ समय बिताने आते है तो उन्हें उनका रहन सहन काफी निम्न स्तर का लगता है। सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। यह एक प्रकार का अपराध बोध सा महसूस करते हैं। तथा परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अपने जैसी सुख सुविधा का प्रबन्ध करने का प्रयास करते हैं। एक और जहाँ यह संतोष का विषय है कि बच्चे अपने माता पिता के बारे में सोचते हैं। वहीँ दूसरी ओर उनकी मान्यता से अलग होने से प्रायः ये अतिरिक्त सुविधायें उचित उपयोग में नहीँ आ पाती है। कुछ सीमा तक माता पिता के लिये यह असुविधा जनक भी हो जाता है।

यह समझ पाना मुश्किल है कि इसे बच्चों का अपने माता पिता के प्रति फर्ज़ माना जाये उनके लिये अपनी आत्मतुष्टि।

 

उलझन

गहरी सोच में डूबी अनामिका शायद अपनी जिन्दगी का हिसाब मन ही मन लगा रही थी। चेहरे पर छाया अवसाद व आँखों में छायी उदासी से लग रहा था मानों खुशियों ने साथ वर्षों पहले छोड़ दिया हो। अचानक दरवाजे की घन्टी बजी देखा तो पति सोमेश काम से लौट आये। खुले दरवाजे से बिना कुछ बोले, सर झुकाये अन्दर चले गये। अनामिका इसकी अभ्यस्त थी, उसने दो कप चाय बना कर एक कप बैठक में पति के लिये रख दिया व दूसरा स्वयं लिये डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। थोड़ी देर में बिटिया विनीता काम से लौटी व सीधी अपने कमरे में चली गई। उसे कमरे में चाय देकर अनामिका रात के भोजन की तैयारी में जुट गई। रात को खाने पर भी आपस में तीनों के बीच कोई बात नहीं हुई। बेटा सौरभ विदेश में है व माह में एक आध बार फोन पर हाल चाल पूछ लेता है।

किन्तु पहले ऐसा नहीं था। पाँच बहनों और दो भाईयों में घर में सबसे छोटी होने के कारण सबके लाड़ प्यार में वह पली बड़ी। बिना दहेज के ब्याह कर ससुराल इस आशा से आई कि परिवार में सबकी सेवा कर दिल जीत लेगी । गृह विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई घर चलाने में काफी सहायक सिद्ध हुई। पहले सौरभ फिर विनिता ने आकर उसके जीवन में अपार खुशियाँ भर दी।वह अपने को सौभाग्यशाली समझने लगी। शादी के २० वर्ष मानों पंख लगाकर उड़ गये।

अचानक मानों परिवर्तन की धीमी बयार ने जैसे जीवन की नौका को झकझोरना शुरू कर दिया। बच्चे बड़े होकर अपने हम उम्र मित्रों में व्यस्त रहने लगे। पति कार्य की अधिकता के चलते अथवा पुराने मित्रों के साथ समय बिताने के बहाने अधिक समय बाहर ही बिताने लगे। घर आने पर चुपचाप खाकर सो जाना। देरी से आने का कारण पूछने पर काम के बोझ का बहाना। सभी की उपेक्षा ने मन में संशय के बीज बो दिये। अधिक बार पूछताछ करने पर वहम की बीमारी के बहाने डाक्टर से इलाज के नाम पर सेडेटिव्स दिये जाने लगे। परिणाम स्वरूप आपसी वाद विवाद कब झगड़ों में बदल गया पता नहीं चला। सुस्ती, शंका व परिवार से कटने के तनाव ने उसके विवेक को प्रभावित किया नतीजतन उसके व्यवहार में एक चिड़चिड़ापन आने लगा। समय के साथ इलाज का स्वरूप मानसिक रोग के इलाज में बदल गया।

पति के अपने पर्यटन संबन्धी व्यवसाय के चलते विकसित वाक्चातुर्य से आसपड़ोस व परिवार में सभी को मानसिक रोगी होने व मनोचिकित्सक से इलाज चलने के बारे में आश्वत कर दिया। परिणाम स्वरूप सभी ने संशय भाव से दूरी बना ली। संबन्धियों से बातचीत समझाइश अथवा सहानुभूति तक सीमित रह गई। आरम्भ में अपनों से क्रोध मिश्रित व्यथा को बाँटने के प्रयास भी किये। किन्तु पति के पास समझाने के लिये तिल को ताड़ बनाने जैसे कई उदाहरण थे। परिणाम स्वरूप करीब करीब सभी ने उसके मानसिक रोग को स्वीकार लिया। परिस्थितियों के इस मकड़जाल में फँसी वह बच्चों के ३० वर्ष पार करने के बाद भी विवाह के लिये राजी न होने के लिये स्वयं को जिम्मेदार मान वह स्वयं को भी मानसिक रोगी मानने को विवश है।

इस इन्तजार में कि कोई चमत्कार शायद उसे इस उलझन से बाहर निकाल पाये।

महिलाओं की सुरक्षा

 

कुछ वर्ष दिल्ली में हुए दिल दहला देने वाले हादसे पर पूरा देश हतप्रभ था । सभी संवेदनशील लोग अलग अलग तरीके से अपनी नाराजगी व गुस्सा जाहिर कर रहें थे। राजनीतिक, सामाजिक स्तर व दूरदर्शन पर लगातार इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिये कठोर कानून व दोषियों को कठोर दण्ड के प्रावधान करने के लिये दबाव बनाया जा रहा था। लोग कई दिनों तकसे सड़कों पर उतर आये थे।

इन सब के बीच लगातार महिला वर्ग की अस्मिता पर हमले जारी हैं। इसलिये जरूरी है कि समस्या के मूल में जाकर इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया जाये।

महिलाओं व पुरुष का आपसी आकर्षण प्राकृतिक है। समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये अलग अलग समय पुरुषों व महिलाओं पर कई प्रकार की बन्दिशें लगाइ जाती रही हैं। इन बन्दिशों के कारण आज से कुछ दशाब्दियों पहले तक काफी हद तक समाज अनुशासित रहा। यदाकदा अपवाद स्वरूप यदि कोई घटना सार्वजनिक होती तो समाज के मान्य प्रतिनिधि जैसे पंचायत तुरन्त ही दोनों पक्षों को सुन कर दोषी को दण्डित कर देते थे। इससे भी अधिक दण्ड होता था दोषी को समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखना। सामाजिक बन्धन इतना प्रगाढ़ होता था कि समाज की नजरों में गिरना न सिर्फ दोषी बल्कि उसके परिवार वालों को भी मृत्यु से भी अधिक भयभीत करने वाला लगता था। यही भय लोंगों को अपने बच्चों को अनुशासन में रखने के लिये प्रेरित करता था। यह व्ववस्था लगभग पूरे विश्व में लागू थी। इस संदर्भ में समाज का अर्थ स्थानीय समाज यथा मोहल्ला, बस्ती अथवा गाँव अधिक सटीक बैठता है।

इस व्यवस्था की सफलता के मूल कारण के बारे में यदि हम ध्यान दें तो वे थे –

1 समाज में प्रतिष्ठा बनाये रखने की आवश्कता महसूस करना।

2 समाज में एक दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्कता।

3 परिवार में एक मुखिये का होने व अन्य सदस्यों का उस पर निर्भर होना।

4 धर्म में आस्था व अधर्म करने पर भगवान द्वारा दण्डित होने का डर।

5 शिक्षा में अनुशासन पर जोर।

6 धर्म व समाज में सदाचरण पर जोर।

7 समाज में अनुशासित लोगों का सम्मान।

इस व्यवस्था पर राजाओं, नवाबों व अंग्रेजों के शासन काल तक बहुत विशेष अंतर नहीं आया अतिरिक्त इसके कि कुछ शक्ति संपन्न लोग स्वेच्छारी हो गये तथा स्त्रियों पर जोर जबरजस्ती करने लगे। परिणाम स्वरूप निःसहाय समाज ने महिलाओं पर घर से बाहर अकेले निकलने पर बन्दिश लगा कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया। इसके बाद सामाजिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया वह था प्रजातन्त्र की स्थापना। लोगों को सरकार में अपने प्रतिनधि चुनने का अधिकार मिला। हर व्यक्ति अपने को शक्ति संपन्न समझने लगा। प्रजातन्त्र ने लोगों को स्वाधीनता अथवा स्वतन्त्रता के सुख को महसूस कराया। लोगों में आत्म विश्वास जागा और प्रगति की रफ्तार तेजी से बढ़ने लगी। धीरे धीरे लोग सामाजिक बन्धन को परतंत्रता समझ कर उससे भी मुक्त होने का प्रयास करने लगे। इन सब प्रयासों में स्वतन्त्रता कब स्वच्छन्दता में बदलने लगी यह कुछ लोगों को ही शायद समझ में आया। ऐसे लोगों की चेतावनी नक्कार खाने में तूती की आवाज सी दब गई। परिणाम स्वरूप सामाजिक व्यवस्था विकृत होने लगी। कुछ लोग अलग से शक्ति के केन्द्र बन कर उभरने लगे। ये शक्ति केन्द्र प्रायः कुछ राजनेता, बाहुबली, साधन संपन्न लोग अथवा धर्म गुरुओं के आस पास उभरे। ये शक्ति केन्द्र गैर कानूनी तरीके अपना कर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने लगे। अपने प्रभाव के बल पर ये कानून को खरीदने अथवा सबूतों को खत्म करने में सक्षम थे। अतः ये अपने को कानून से ऊपर मानने लगे। अपने विरोध में उठने वाली आवाजों को दबाने के लिये इन लोगों ने अपना

   भारत में शिक्षा समस्यायें व समाधान

                 

यह एक दुःखद स्थिति है कि विश्व में एक समय शिक्षा का समृद्ध केन्द्र माने जाने वाले भारत में शिक्षा की हालत दयनीय है।

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजो की देन है। उनका प्रमुख उद्देश्य युवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना था जिससे वे निष्ठा पूर्वक सरकार की सेवा कर सकें। अतः उनका मुख्य उद्देश्य उनको एक कार्य विशेष के योग्य बनाना था, जो वे जीवन पर्यंत करते रहें। उदाहरण स्वरूप कोई जीवन भर इन्जीनियरिंग, डाक्टर,  वकील अथवा लेखा जोखा करने का काम करेगा। स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयास अवश्य ही किये गये। लेकिन ये प्रयास जैसे यूनिफार्म लागू करना, मध्यान्ह भोजन देना अथवा १०वीं तक बच्चों को फेल नहीं करना सिर्फ अलंकिृत करने जैसे ही माने जाने चाहिये। इससे गुणता में कोई सुधार नहीं आया। एनसीइआरटी द्वारा प्रकाशित अधिकतर पुस्तकें समझने में बच्चों के लिये पहले की अपेक्षा कठिन लगती है। आज सरकारी स्कूल संसाधन की कमी, खराब परीक्षाफल व शिक्षकों को पढ़ाई के अलावा अन्य शासकीय सेवाओं में व्यस्त रखने के लिये अधिक जाने जाते हैं।

इसका परिणाम यह है कि आज निम्न मध्यम वर्ग भी अपने बच्चों को सामर्थ से अधिक फीस देकर निजी स्कूलों में भर्ती करना चाहता है।

अधिकतर निजी संस्थान व्यापार केन्द्र बन चुके हैं। फल स्वरूप राजनेता व उद्योगपतियों का निजी क्षेत्र में लगभग एकाधिकार है। इनका विकृत रूप कोचिंग संस्थानों के रूप में उभर आया है।

इस परिस्थिति के कारणों को खोजने का प्रयास करे तो हमें ये मौलिक कारण मिलेंगें।

१. शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटकना –

वास्तव में देखा जाय तो शिक्षा शब्द का चयन ही गलत है। हमारे मनीषियों ने इसे विद्या ग्रहण करना माना था। उन्होंने इसका उद्देश्य इस श्लोक में सटीक वर्णित किया है।

विद्या ददाति विनयं, विनयाति याति पात्रताम्,

पात्रतात धनमापनोति , धनात  धर्मं ततः सुखम्।

संक्षेप में विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धर्म व सुख मिलते हैं।

मूलतः विद्या हम ग्रहण करते हैं व शिक्षा दी जाती है। स्वेच्छा से ग्रहण की गई ही विद्या है। आज शिक्षा ज्ञान अर्जन के उद्देश्य से भटक कर प्रमाण पत्र व उपाधि अर्जन के मोहजाल में उलझ गई है। इसका सीधा असर देश का भविष्य कहलाने वाले लगभग ३० प्रतिशत बच्चों व युवाओं पर पढ़ता है।

२. स्कूल व उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश –

यह हास्यास्पद स्थिति है कि एक ओर तो स्कूली शिक्षा को आवश्यक किया हुआ है वहीं दूसरी ओर प्रवेश के लिये सबसे निचली कक्षा के लिये भी बच्चों का चयन किया जाता है। यह भी हास्यास्पद है कि कई उच्च शिक्षण संस्थान नियमित शिक्षण आकलन को मानक नहीं मानकर अलग से परीक्षा के आधार पर प्रवेश देती हैं। परिणाम स्वरूप कोचिंग का व्यापार फल फूल रहा है।

३. शिक्षण खर्च का एक छोटा हिस्सा ही शिक्षा खर्च-

सभी शिक्षण संस्थाओं में अन्य प्रभारों के कारण शिक्षा पर कुल शुल्क का सिर्फ १५-२० प्रतिशत ही वास्तव में शिक्षा पर खर्च हो पाता है। बस, पुस्तकों, यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन आदि खर्चे तुलनात्मक रूप से अधिक हैं।

४. स्कूल की दूरी

बच्चों को प्रायः विशेष कर निजी स्कूलों के दूर होने के कारण आने जाने में २-२.३० घन्टे का समय व्यर्थ व थका देने वाला होता है।

५. परीक्षा का मानसिक दबाव

अच्छे नम्बर की होड़ ने परीक्षा को विद्यार्थी के ज्ञान अर्जन का अनुमान लगाने के साधन न होकर एक प्रतियोगिता बना दिया है। जिससे किसी भी प्रकार से दूसरों से आगे निकलने की भावना प्रबल हो गई। परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से गलत उपाय अपनाये जाने लगे। फलतः परीक्षाफल की विश्वसनीयता ही समाप्त हो गई। पुनर्मूल्याकंन परीक्षाओं के चलन ने प्रतियोगिता संस्कृति को और बढ़ावा दिया, जिससे कोचिंग व्यवसाय चल निकला।

६. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा

कुछ शहर व कस्बों के स्कूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो अधिकतर सरकारी स्कूल दुर्व्यवस्था व भ्रष्टाचार के चलते बीमार हालत में ही हैं।

७. शिक्षण लाभ का व्यवसाय

उपरोक्त कारणों ने शिक्षण को एक लाभप्रद व्यवसाय बना दिया। शिक्षा के विस्तार के नामपर निजी संस्थानों को लुभाने के लिये इस क्षेत्र की आय को कर मुक्त घोषित किया गया। फलतः राजनेता व उद्योगपतियों ने इसे अपना गढ़ बना लिया।

पता नहीं स्थिति का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों को ये समस्यायें क्यों नहीं दिखती?

इन मूल समस्याओं से उबरने के लिये शिक्षण व्यवस्था में बड़े व मूल भूत सुधार की जरूररत है। नीचे दिये सुझाव शिक्षा को पुनः ज्ञान अर्जन का साधन बनाने में सहायक हो सकते हैं।

  • पाँच साल तक बच्चों को किसी भी प्रकार के स्कूल में नहीं भेजा जाय। केवल सीमित समय ही टीवी या अन्य उपकरणों के लिये निर्धारित किया जाये। बच्चों में बाहर खेलने व आपस में मिलने जुलने की आदत डालें। प्रेरक कहानियाँ सुनायें। चीजों को साझा करना सिखायें। नौकरी पेशा माता पिताओं के लिये यही सुविधा झूलाघरों में हो।
  • पाँच वर्ष की उम्र में बच्चों को पहली कक्षा में स्कूल में बिना किसी चयन प्रक्रिया के लिया जाये। कक्षा ५ तक मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्माण व भाषा एवं अंक ज्ञान हो। होमवर्क न देकर पुस्तक पठन को प्रोत्साहन दिया जाये। तथा बच्चों की रुचि जानने का प्रयास किया जाये। कम से कम १५ मिनट सामूहिक व्यायाम अवश्य ही करवाया जाये। छोटे व सरल सृजन कार्य करवाये जायें। परीक्षा न लेकर आकलन रिपोर्ट तैयार की जाये। कुल स्कूल समय ४ घन्टे से अधिक न हो।
  • कक्षा ५ से ८ तक भाषा व गणित के साथ अन्य विषय ज्ञान व एक अन्य भाषा जोड़ सकते हैं। विभिन्न प्रकार की कला में कार्य करने का बच्चों को अवसर देकर रुचि का आकलन किया जाये। बच्चों के लिये आगे के लिये संभावित क्षेत्र का आकलन किया जाये। जिला स्तर पर कक्षा ८ की परीक्षा ली जाये। अन्य परीक्षा स्कूल स्तर पर हों। अधिक से अधिक बच्चों को विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर प्रदान किये जायें। स्कूल का कुल समय ६ घन्टे से अधिक न हो। होमवर्क केवल कला संबन्धित कार्य हो।
  • कक्षा ८ के बाद से कुशलता कार्यक्रमों की शुरुआत भी की जाये। जिससे छात्र आगे पढ़ाई अथवा कुशलता में से एक अपनी पसंद अनुसार चुन सकें। कुशलता कार्यक्रमों में उद्यमिता व स्वव्यवसाय स्थापना पर बल दिया जाय। कुशलता कार्यक्रमों से भी उच्च व्यवसायिक शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश का प्रावधान हो।
  • निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के शिक्षण पर प्रतिबन्ध हो। किन्तु निर्धारित कार्यक्रमों में प्रवेश पर उम्र का बन्धन न हो ताकि सभी अपनी योग्यता में सुधार कर सकें।
  • परीक्षाफल में अंकों के अतिरिक्त संक्षिप्त चरित्र वर्णन भी शामिल हो। गलत साधन का प्रयोग दण्डनीय अपराध हो। एक कक्षा में ४० से अधिक बच्चे न हों।
  • सभी निर्धारित कार्यक्रमों के लिये अधिकतम फीस निश्चित की जाये। अन्य किसी प्रकार का शुल्क न लिया जाय।
  • नौकरी के लिये सिर्फ शैक्षणिक योग्यता चयन का आधार हो। अधिकारी वर्ग के लिये इन्टरव्यू लिये जा सकते हैं।
  • सभी स्तर के अध्यापकों को समाज में आदर दिलाने के लिये उन्हे विशेष सामाजिक सुविधा दी जाये। शिक्षण आवश्यक सेवा घोषित की जाये ताकि शिक्षकों से अन्य सेवायें न ली जा सकें व वे हड़ताल पर भी न जा सकें। शिक्षकों के चयन का आधार पढ़ाने में रूचि व चरित्र मुख्य रूप से हो।

उपरोक्त प्रयत्नों से शिक्षा व्यवस्था को ज्ञान अर्जन के साथ एक अच्छा नागरिक बनाने का माध्यम बनाया जा सकता है।

एक आम भारतीय की व्यथा

मैं यदि अपने आप को एक आम भारतीय कहूँ तो मेरे ख्याल में किसी को भी किसी प्रकार का एतराज नहीं होना चाहिये। मैंने अपना लगभग 70 सालों के जीवन के हर साल को एक आम भारतीय की तरह से ही जिया है। एक आम भारतीय परिवार में 7 भाई बहनों में मेरा जन्म हुआ। छोटे छोटे कस्बों की धूल भरी गलियों मे खेल कूद कर मैंने अपना बचपन बिताया। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की। किशोर अवस्था में अनाज, राशन व बीमार होने पर सरकारी अस्पताल की लाईनों में एक आम आदमी की तरह खड़ा रहा। मास्टर जी से पिटाई, थोड़ी सी गलती पर बड़ों से डाँट सब कुछ तो आम था। किस्मत ने मेहरबान होकर इन्जीनियर बना दिया। लेकिन इसमें भी कोई नयी बात नहीं है बहुत से आम भारतीय पहले भी और बाद में भी इन्जीनीयर किस्मत के बलबूते इन्जीनीयर बनते रहें हैं। आज भी मैं नगरपालिका में सम्पत्ति कर देने के लिये तो कभी बिजली का बिल भरने के लिये व बीएसएनएल में टेलीफोन का बिल देने के लिये व ऐसी ही कई अन्य जगह लाईन में लगा अन्य आम भारतीयों से सामाजिक संम्पर्क बढ़ाते हुए दिख जाता हूँ। मेरे एक आम भारतीय साबित होने के लिये इतना पर्याप्त है।
हाँलाकि मैंने जन्म तो गुलाम भारत में ही लिया, लेकिन समझ स्वतन्त्र भारत में ही आई। बचपन में स्कूलों में देश के आजाद हो जाने के लाभ घुट्टी की तरह पिलाये गये। अतः जरूरी था कि मैं स्वतन्त्र देश का एक आम नागरिक होने पर गर्व महसूस करूँ। जी जान से एक अच्छा नागरिक बनने के लिये जो भी स्कूलों में सिखाया गया था उसका पालन करने की कौशिश की। यह प्रयास आज भी उसी उत्साह के साथ जारी है। वयस्क उम्र में पहुँचते ही हर चुनाव में अपना दायित्व पूरा करने प्रायः सबसे पहले ही पहुँच जाता हूँ। अपने पसन्दीदा उम्मीदवार की जीत से खुश व हार से मायूस हो जाता हूँ। समय पर सब तरह के टेक्स व प्रायः बिना बिल के कोई बड़ा खर्चा नहीं करता हूँ, ताकि मैं देश की प्रगति में किसी प्रकार का बाधक नहीं बनूँ।
पिछले बीस वर्षों तक तो मुझे अपनी शिक्षा की यथार्थता पर काफी गर्व भी था कि वाकई जो भी सिखाया उसके अनुसर देश वास्तव में तेजी से तरक्की कर रहा है। देश के आजाद होने का लाभ भी आम लोगों तक पहुँच रहा है। हम हर क्षेत्र में आत्म निर्भर हो रहें है। आम भारतीय की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है। जब देश के नेतागण भाषण में बोलते थे कि भारत ने इतनी तरक्की कर ली है कि हर भारतीय सर उठा कर कह सकता है कि मैं भारतीय हूँ तो गर्व से सर उठ जाता था।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश प्रगति कर रहा है ऐसा प्रचार तो हो रहा है लेकिन वह गोरान्वित होने का अहसास पैदा नहीं कर पा रहा है। आज का आम भारतीय एक अनजान डर से सहमा हुआ है। मैं आतन्कवादी डर अथवा किसी दूसरे देश से आक्रमण के डर की बात नहीं कर रहा हूँ। हमारे देश की सेना के जवानों पर आम भारतीय को नाज व पूरा भरोसा है। मेरा इशारा आम भारतीय के उस डर की ओर है जो हर रोज अखबारों व टेलीवजन चेनलों पर निरन्तर छपती व दिखलाई जाने वाली खबरों की है, जिसमें चोरी, लूट, दंगे, आत्महत्या, हत्या, भ्रष्टाचार व बलात्कार आदि के अलावा कुछ पढ़ने अथवा देखने को नहीं मिलता। आज का आम भारतीय भयग्रस्त है कि उसका बेटा या बेटी शाम को स्कूल अथवा कालेज से वापस सकुशल लौटेगें या नहीं। मेरा इशारा निरन्तर बढ़ती मंहगाँई की और भी है जिससे आम भारतीय त्रस्त है।
ऐसा नहीं है कि पहले ये सब नहीं होता था। लेकिन पहले ये खबरें यदा कदा ही सुनने में आती थीं, लेकिन प्रसाशन की क्षमता पर आम भारतीयों को भरोसा था। इसके प्रमाण स्वरूप उसकी सफलता के समाचार भी प्रायः पढ़ने सुनने को मिल जाते थे। आम भारतीय की व्यथा है कि आजकल प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिये है। आला अधिकारी बयान देतें हैं कि इस प्रकार की घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना असंभव है, तो कोई कहता है कि वे भगवान नहीं है जिन्हें पहले से पता लग जाये कि कहाँ क्या होने वाला है और वहाँ जाकर घटित रोक लें। मन्त्रीगण यह तो नहीं बता सकते हैं कि मंहगाँई कब तक कम होगी लेकिन मंहगाई कब बढ़ने वाली है इसकी भविष्य वाणी अवश्य कर सकतें हैं। अब तो लगता है आम भारतीय की सहायता भगवान भी नहीं करतें हैं।

मानव विकास, मानवता का ह्लास

 

मनुष्य अपने को सभी प्रणियों से श्रेष्ठ मानता आया है। उसके पास इसका समुचित कारण भी है और वह है उसका मस्तिष्क। इस मस्तिष्क का उपयोग मनुष्य ने अपनी सुरक्षा, अपने भौतिक व आध्यात्मिक विकास के लिये सफलता पूर्वक किया है। आज हमारे पास ऐशो आराम के समस्त साधन उपलब्ध हैं, हम पूरे ब्राम्हान्ड में विचरण करने में सक्षम हैं तथा संचार माध्यमों द्वारा पूरे विश्व से जुड़े हुए है। लेकिन क्या हम वास्तव में सुखी, सुरक्षित एवं सन्तुष्ट हैं। आज की सच्चाई यही है कि पूरे विश्व में मनुष्य अपने को तनाव ग्रस्त व असुरक्षित महसूस करता है। इस विसंगति को समझने के लिये मानव विकास के इतिहास को समझना आवश्यक है।

डारविन के अनुसार मनुष्य वानर जाति का ही विकसित रूप है। जंगल में उसने अपने आप को अपने से अधिक शक्तिशाली प्राणियों से घिरा हुआ पाया व सुरक्षा के लिये संगठित होकर रहना सीखा इस प्रकार समाज का उदय हुआ। इकठ्ठे काबिले को जंगल में रहने के लिये पर्याप्त जगह न होने व अधिक सुरक्षित स्थान की खोज में जंगल से बाहर आकर बसने से गाँवों का विकास आरम्भ हुआ। इस तरह शुरूआत में मानव विकास मानवता के हित को ध्यान में रखकर हुआ। इसलिये इस दौर में मानव व मानवता का विकास समानान्तर रूप से हुआ।

विकास के दूसरे दौर में विकास का केन्द्र सुख सुविधा के साधन, समाज संगठन,व शक्ति का विकास रहा। जिसके परिणाम स्वरूप शस्त्रों का विकास, घरों का विकास, काबिले का मुखिया, काबिले की सुरक्षा के उपायों का विकास, खाद्य पदार्थों की विविधता का विकास, कृषि व शिकार औजारों का उत्पादन, मनोरंजन के साधनों का हुआ। इस दौर में भी मुख्यतः विकास मानव जाति के विकास से जुड़ा रहा और मानवता का विकास भी साथ साथ चला। समाज में शान्ति व सुरक्षा के नियमों का विकास हुआ जिसे काबिले के सदस्यों ने मन से स्वीकार किया। परिवहन साधनों के विकास ने काबिलों को आपस में मिलने का अवसर प्रदान किया परिणाम स्वरूप संचार साधन,शिक्षा, खेल व कौशल के विस्तार के उपायों के आवष्कारों ने विकास की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

विकास के अगले चरण में मनुष्य में एक छोटा सा बदलाव आया। यह था ईर्षा

की भावना का उत्पन्न होना। कुछ लोगों को लगा कि कबीले के नेता के पास विशेष शक्ति व सम्मान है और उस पद को पाने के लिये प्रतिस्पर्धा आरम्भ होने लगी।

पहले जहाँ नेता सर्व सम्मति से अनुभव व ज्ञान के आधार पर चुना जाता था, अब उस पद को अपने बाहुबल के आधार पर हासिल किया जाने लगा। परिणाम स्वरूप नये नेता ने अपने विरोधियों व समर्थकों में भेद करना शुरु कर दिया। यहाँ से मानवता के पतन का आरम्भ हुआ। सहयोग के कई अन्य लाभों को देखते हुए यह भाव बहुत ही सीमित रूप में ही रहा। विकास के इस चरण में भी मानव तेजी से अपने भोजन, मौसम व जानवरों से सुरक्षा व आराम के साधन जुटाने में लगा रहा। परिणाम स्वरूप साधनों की विपुलता के कारण संग्रह करने की प्रवत्ति पैदा हुई। संग्रह ने धीरे धीरे लालच व संपन्नता का रूप ले लिया, परिणाम स्वरूप अन्य लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। यह भेद भाव आगे चल कर मालिक व चाकर के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ इसने विकृत होकर गुलामी का रूप ले लिया। कुछ सहृदय समाज विचारकों के वर्षों के प्रयासों से गुलामी से तो मानवता को मुक्ति मिल गई किन्तु मनुष्य की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया। मानवता के पतन का यह दूसरा चरण था।

विकास के अगले दौर में एक ओर जहाँ मनुष्य ने अपने बुद्धि बल से विज्ञान में नये आयाम स्थापित किये, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चिन्तकों ने मानवता की रक्षा के लिये, धर्म, सामाजिक सह अस्तितव के लिये नियम व नियमों का उल्लघन करने पर दंड का प्रावधान किया। मानवता के पतन को रोकने व आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिये खेल प्रतियोगितायें व मिलन समारोहों के आयोजन शुरू हुआ। विकास और मानवता के उत्थान के इस दौर को हम मानव विकास का स्वर्ण युग मान सकते हैं। मानव विकास के इस चरण में ज्ञान का तेजी से विकास हुआ। भाषा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान की सभी विधायें, गणित, साहित्य,व्यापार, व शिक्षा के क्षेत्र में मानव तेजी से अग्रसर हुआ। साथ ही समाज का विस्तार भी हुआ। कबीले से गाँव, शहर, राज्य व देश के रूप में उसका विस्तार हुआ। विस्तार के साथ ही सामाजिक संगठन में बदलाव आया। राज्य के शासक के लिये व्यवस्था बनाये रखने के लिये कई प्रतिनिधियों को रखना व सुरक्षा के लिये सेना को रखना आवश्यक हो गया। इस प्रकार शक्ति के विकेन्द्रीकरण का आरम्भ हुआ। सामाजिक विकास के इस दौर में शक्ति को सम्मान का मापदन्ड माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप एक और जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर लोग छोटी छोटी बात पर एक दूसरे के प्राण लेने को तैयार रहते थे वहीं शासक गण अन्य शासकों को नीचा दिखाने के लिये युध्द के लिये हजारों लोगों को मौत के मुँह में झोंकने को तत्पर थे। मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु बन गया। यह मानवता के पतन का एक नया दौर था। मनुष्य शक्ति प्रदर्शन में इतना अन्धा हो गया था कि खुद के संहार के लिये विज्ञान का उपयोग से घातक अस्त्र जैसे तोप, बारूद, बम व अन्ततः परमाणु बम विकसित कर लिये। हिरोशिमा व नागासाकी इस विध्वंस की मिसाल है। शक्ति संचय के लिये धन भी जरूरी था अतः शक्ति के बल पर धन संचय की परंपरा आरंभ हुई। एक ओर शासक गण जबरन कर वसूलने लगे तथा दूसरी ओर चोर लुटेरे छल बल से धन चुराने लगे। धन व शक्ति इस प्रकार सम्मान व भय का कारण बन गये। शासक व व्यापार के जुड़ाव के कारण ही ब्रिाटेन अपना विस्तार पूरे विश्व में कर पाया। भारत वासियों ने उस समय के अत्याचार को भोगा है। बेईमानी व भ्रष्टाचार भी इसी दौर की देन है।

काफी समय तक धर्म ने समाज में बुराईयों का विस्तार रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तथा सामाजिक बुराईयाँ कुछ ही शक्ति संपन्न लोगों तक ही सीमित रही। धर्म के अतिरिक्त समाज का प्रभाव भी काफी हद तक इन बुराईयों के विस्तार को रोकने में सक्षम रहा। किन्तु समय के साथ धर्म प्रचारक व प्रतिनिधि भी लालच व शक्ति संचय के मोह में ऐसे फँसे कि आजकल अधिकतर लोगों का धर्म से विश्वास ही उठ गया। तो अन्य लोगों ने भगवान को ही हैसियत अनुसार भेंट चढ़ाकर पाप से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोज लिया। वहीं वैश्वीकरण से समाज का इतना विस्तार हो गया कि सामाजिक बन्धन बिल्कुल शिथिल हो गये। परिणाम स्वरूप मनुष्य आज निर्बाध लालच, बेईमानी, व्यभिचार, लूट आदि में आकन्ठ डूब गया है। मानवता सिसक रही है और दूर दूर तक कोई उसको धीरज देने वाला दिखाई नहीं दे रहा है।

गीता मे कहा गया है कि पृथ्वी पर जब भी धर्म की हानी होती है और अत्याचार बढ़ जाते है तो भगवान धर्म की स्थापना के लिये धरती पर अवतार लेते हैं। शायद समय के साथ भगवान की सहनशक्ति का विस्तार हो गया है। और कितना समय मानवता का यह पतन जारी रहेगा।

भारत की अर्थ व्यवस्था

 

इसमें कोई संदेह नहीं की भारत विविधता से भरा विशाल देश है। यहाँ अलग अलग राज्यों की भोगोलिक, नेसर्गिक, सान्सकृतिक,सामाजिक व आर्थिक स्थितियों में भारी अन्तर है। इन कारणों से यहाँ का वित्तीय प्रबन्धन आसान नहीं है। प्रायः हर बजट के पूर्व,  पूरे देश में मंहगाँई व टेक्स की दोहरी मार से ग्रसित लोगों में आशा की किरण सी फूटती है व बजट में मिली छोटी मोटी राहतों की खुशी रेत में गिरी कुछ ओंस की बूंदों की तरह थोड़े समय में गायब हो जाती है। हमारे नेता भारत को विश्व में एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में बताते नहीं थकते। वहीं समाचार पत्र, दूरदर्शन व व्यवसायिक पत्रिकायें वित्त मंत्री द्वारा आर्थिक सुधारों के गुणगान करते नहीं थकते। लेकिन आज भारत की वित्तीय स्थिति की सच्चाई यही है कि करीब 30 प्रतिशत जनता को दो समय का भरपेट भोजन नहीं मिलता है व अधिकतर मध्य वर्ग मँहगाई, भ्रष्टाचार व कालाबजारी से त्रस्त है। पिछले कुछ  दस वर्षों तक सरकार के मुखिया स्वयं एक वित्त विशेषज्ञ थे। अपने पिछले वित्त मंत्री के कार्यकाल में उनके द्वारा शुरु उदारी करण की नीतियों को ही भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक ताकत बन कर उभरने का श्रेय दिया जाता है। यह एक विडम्बना ही है कि इन दस वर्षों में स्थिति बद से बदतर ही हुई है। शायद उनकी भी कुछ मजबूरियाँ होगीं। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार से लोगों की मँहगाई कम करने के लिये कदम उठाने की उम्मीद थी।  यह सरकार फिलहाल कई मौलिक सुधारों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है। इसका परिणाम दीर्घ अवधि में ही दिखाई देगा। निकट भविष्य में अधिक की आशा भी नहीं करनी चाहिये।

आज अधिकतर भारतीय जनता की हालत का कारण समझने के लिये किसी विशेषज्ञ की शायद आवश्यकता भी नहीं है। 50 के दशक में स्कूल में वित्त प्रबन्धन के कुछ मूलभूत सिद्धान्त सिखाये गये थे जो आज भी मुझे अच्छी तरह से याद हैं। उनमें प्रमुख ये हैं –

  1. रोटी, कपड़ा व मकान परिवार की मूल आवश्यकता है।
  2. जरूरी वस्तुओं की कमी होने पर मँहगाई बढ़ती है।
  3. अनावश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से उनकी खपत में कमी आती है।
  4. जितनी चादर हो उतने पैर फैलाओ।
  5. उधार लेकर ऐश मत करो।
  6. भविष्य के लिये थोड़ी थोड़ी बचत अवश्य करो।

लेकिन आज ये मूल सिद्धान्त सरकार व भारतीय शायद भूल गये हैं।

सरकार की बात करें तो मूल आवश्यकता की चीजों पर मँहगाई सबसे अधिक है लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कोई तरीका उनको नहीं सूझता है। कुछ वर्ष पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि भन्डार ग्रहों में अनाज सड़ाने से अच्छा है कि सरकार उस अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट दें। इस पर सरकार की प्रतिक्रिया थी कि यह संभव नहीं है। लेकिन अनाज को भन्डार ग्रहों में सढ़ने से बचाने के लिये भी सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। यदि सरकार अनाज का भन्डारन सही तरीके से नहीं कर पाती है तो फिर अनाज खरीदती ही क्यों है। हर साल सरकार किसानों की मदद के नाम पर न्यूनतम मूल्य जो बाजार भाव से काफी कम होता है निर्धारित करती है। और लाखों करोड़ रूपये में किसानों से अनाज खरीदती है। और उसे सड़ने के लिये छोड़ देती है। सिर्फ अनाज ही क्यों हर साल लाखों टन फल, सब्जियाँ भी सढ़ जाती है। क्या हमारा देश इतनी खाद्य पदार्थों की बरबादी का भार वहन कर सकता है।

आर्थिक प्रबन्धन के लिये मूलभूत आवश्यकता है संसाधनों का कुशलता पूर्वक उपयोग। मुझे याद है एक बार उस समय प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी ने कहा था कि देश में 1 रुपया खर्च करने पर 15 पैसे का ही लाभ जनता को मिलता है। आज तो यह गिर कर 4 पैसे भी शायद ही रहा हो। इस को सुधारना क्या सरकार का दायित्व नहीं है।

उदारीकरण से आर्थिक प्रगति के गुणगान सरकार व मीडिया करते नहीं थकता है। लेकिन इसके परिणाम का यदि आम जनता पर असर हम देखें तो हमारे बच्चे कोका कोला, पेप्सी, चिप्स व अन्य ऐसी ही वस्तुओं को खाकर अपनी सेहत खराब कर रहें है। अमीर बच्चे तो मोटापे के शिकार हो रहे हैं। वहीं गाँव व गरीब बच्चों के इस प्रकार के शौक ने तो घर की अर्थ व्यवस्था को ही बिगाड़ कर रख दिया है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उदारी करण से पहले जो पेन्ट शर्ट 200-300 रूपये मे मिल जाता था उसकी कीमत अचानक 800-900 रुपये होगई थी। आज कीमत 2500-3000 रुपये है। यही हाल खाद्य पदार्थों पर छपी कीमतों का है। मुझे आश्चर्य हुआ जब एक दुकान दार ने मुझे मैदे का एक पेकेट जिसकी छपी कीमत करीब 40 रु. थी, उसके उसने सिर्फ 22 रु. लिये। क्या ये सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह उत्पादों पर सही मूल्य अंकित करना सुनिश्चित करे। यह आश्चर्य की बात है कि छपे हुए मूल्य से काफी कम मूल्य पर सरकार को उत्पाद शुल्क स्वीकार्य है। यही कारण है कि कई बड़े बड़े शो रूम साल भर 30 से 70 प्रतिशत कीमत की सेल लगाते रहते हैं।

किसी भी अर्थ व्यवस्था में क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कार, पेट्रोल, व अन्य उपकरणों के दाम बढ़ते जाते है और इनकी माँग भी बढ़ती जाती है। सिर्फ कार ही क्यों अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों के साथ माँग भी बढ़ रही है। यह एक बाजारीकरण का जाल है जिसमें सरकार, मीडिया व व्यापारी की साझेदारी है। सरकार व व्यापारी नौकरी पेशा लोगों का वेतन बढ़ा कर बाजार में माँग बढ़ाते हैं व व्यापारी मीडिया की सहायता से बड़े बड़े विज्ञापनों की मदद से ग्राहकों को आकर्षित कर मनचाहा लाभ कमाते हैं और भोगवाद को बढ़ावा देते हैं।

सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का कर्ज है। उधार ले कर घी पीने वालों की तर्ज पर सरकार ने अपने कर्म चारियों के वेतन व सुविधा में लगातार वृद्धि की है लेकिन जिम्मेदारी व कार्य कुशलता में लगातार गिरावट ही आई है। क्या भुगतान व कार्य निष्पादन में समन्वय लाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यही हालत जन प्रतिनिधियों के वेतन, भत्तों, उनको दी जाने वाली विकास निधि पर भी लागू होती है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि 5 वर्ष पूरे करने पर जन प्रतिनिधियों को आजीवन पेन्शन सुविधा का मिलना चाहे काम के नाम पर किसी ने कुछ भी नहीं किया हो।

आज कल गरीब किसानों की भलाई के नाम पर कर्ज माफ करना, गरीबों को मुफ्त में पैसे बाँट कर समाज सेवा की वाह वाह लूटना सरकार के लिये फेशन सा हो गया है। लेकिन क्या ये लोगों को अकर्मण्य होने के लिये प्रेरित नहीं करता हैं। सीधे साधे शब्दों में एक प्रकार से यह सरकारी भीख ही है। सरकार को जरूरतमन्दों की सहायता अवश्य ही करना चाहिये, लेकिन इस प्रकार कि वे स्वावलम्बी बन सकें न कि दया के पात्र। देश की आर्थिक उन्नति सभी के सशक्तीकरण से ही संभव है।

मँहगाई से पिछले कुछ वर्षों से सभी त्रस्त है। खाद्य पदार्थों की बरबादी, वस्तुओं के मूल्यों के नियन्त्रण पर सरकार का अक्षम होना व अपने ही खर्च पूरे करने के लिये करों में लगातार बढ़ोत्री करते रहना तो मँहगाई के कारण है हीं। उससे भी बढ़ा कारण मँहगाई का है कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत। आश्चर्य की बात है कि जब से कमोडिटी एक्सचेन्ज की शुरूआत हुई है उसमें शामिल लगभग सभी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं लेकिन केन्द्रीय मंत्री जी मीडिया में बयान देतें हैं कि मँहगाई का कारण यह नहीं है। क्या यह एक प्रकार की होर्डिंग नहीं है।

बल्कि इसमें तो पड़े पड़े माल के पैसे इधर उधर कर लोग मुनाफा भी कमा लेतें हैं।

रही भ्रष्टाचार की बात तो भ्रष्टाचार मूल कारण तो सरकार से गलत तरीके से काम करवाना ही है। चाहे इसमें दूसरों का हक मारा जाये, अथवा पैसे देने वाले का आर्थिक लाभ हो या फिर कार्य कानून के दायरे से बाहर हो। भ्रष्टाचार की जड़ तो सरकार अथवा सरकारी विभाग ही हैं। मूल (वेतन) से अधिक कमाई के श्रोत को खत्म करने की अपेक्षा हम किसी भी सरकार से कैसे कर सकते है। आश्चर्य नहीं है कि सरकार पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों पर हजारों के घोटाले का आरोप लगाकर सरकार के प्रतिनिधि उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलने के लिये अयोग्य करार बतला देतें हैं और आरोप छानबीन करने के नाम पर सालों के लिये दब जाते हैं। कोई दृढ़ इच्छा शक्ति व्यक्ति ही शीर्ष पर आकर इससे देश को मुक्ति दिला सकता है।

जहाँ तक आम भारतीय का सवाल है तो भारतीय अर्थ व्ववस्था को सुधारने में वे काफी योगदान कर सकते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि मँहगाई,भ्रष्टाचार व अपव्ययता के लिये हम भी जिम्मेदार है। सिर्फ निम्न लिखित बातों पर ध्यान देने की जरूरत है-

  1. बाजार से चीजें सिर्फ ब्रान्ड देखकर नहीं अपितु उसकी उचित मूल्य व गुणता के आकलन के आधार पर ही खरीदें। अपने देश मे बनी चीजों की अधिक बिक्री से ही देश का विकास संभव है।
  2. जहाँ तक संभव हो मकान के अलावा कोई भी वस्तु उधार अथवा किश्तों पर न लें।
  3. यथा संभव हर माह कुछ बचत अवश्य ही करें।
  4. बच्चों को मँहगीं नही अच्छी शिक्षा दिलवायें।
  5. हर माह बजट बना कर खर्च प्लान करें।
  6. यथा संभव गलत कार्य न करें

वेद साहित्य (विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित)

वेद शब्द विद (ज्ञान) संज्ञा से बना है। इसमें संपूर्ण ज्ञान निहित माना जाता है। वेद संस्कृत भाषा का प्राचीन ग्रंथ है। मूलतः यह लिखित भाषा के उद्भव से पूर्व में श्रुति के रूप में उपलब्ध था जिसमें समय के साथ श्लोक जुड़ते गये। इस कारण इसे स्मृति भी कहा जाता है। महाभारत के अनुसार ब्रह्माजी ने इसे रचा था।
वेदों के चार अंग माने गये हैं। ये हैं –
1. संहिता – मंत्र
2. आरण्यक – बलि व बलि विधियाँ
3. ब्राह्मण – बलि विधियों की व्याख्यायें
4. उपनिषद – ध्यान, आध्यात्म व वैचारिक लेख
कुछ विद्वान पाँचवाँ अंग उपासना को भी मानते हैं।
वेद के श्रुति रूप का उद्भव अधिकतर पाश्चात विद्वान 1500 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानते है। यद्यपि कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार इसका उद्भव 7000 से 5000 वर्ष पूर्व का मानते है। वेदों का श्रुति अथवा स्मृति रूप वर्ष 1000 ई तक प्रचलित रहा ऐसा अनुमान है।
ताड़पत्रों व वृक्षों के तनों से निर्मित छाल पर लिखित होने के कारण लिखित पान्डुलिपि मुश्किल से 150-200 वर्ष तक ही संरक्षित रह पाती थी इसलिये इसकी पहली प्रति कब लिखी गई कहना मुश्किल है। संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वव्द्यालय में 1400 सदी की मूल प्रति उपलब्ध है। किन्तु नेपाल में 11वीं सदी तक की प्रतियाँ उपलब्ध है।
पुरातन विश्वविद्यालयों जैसे नालन्दा, तक्षिला व विक्रमशिला में वेदों व वेदान्गों (वेदों से जुड़े अन्य विषय) की शिक्षा दी जाती थी।
वैदिक साहित्य में चार वेदों के मूल रूप (संहिता) के अतिरिक्त आरण्यक (विभिन्न संस्कारों का वर्णन), ब्राह्मण (संहिता व अनुष्ठानों की विवेचना व विस्तृत वर्णन), तथा उपनिषद् (वेदों पर हुए सम्मेलनों की चर्चाओं का वर्णन) को भी माना जाता है।
वैदिक समय के श्रोता सूत्र व ग्राह्र सूत्र वैदिक साहित्य से अलग हैं किन्तु वैदिक संस्कृति का ही हिस्सा माने गये हैं।
कई उपनिषदों की रचना वैदिक काल (150 वर्ष ई. पूर्व) के बाद हुई है।
आजकल ऋगवेद का सिर्फ एक ही रूप उपलब्ध है जबकि साम, अथर्व व यजुर्वेद के कई रूप उपलब्ध है।
ब्राह्मण, आरण्यक व उपनिषद में संहिताओं की विवेचना व वाद विवाद के रूप में परम ब्राहृ व आत्मा की खोज का दार्शनिक वर्णन सम्मिलित है। यह हिन्दु धर्म की बाद की विचार धारा है। इससे प्रभावित होकर आदि शंकराचार्यजी ने वेदो को कर्म खन्ड व ज्ञान खन्ड की ओर मोड़ दिया।
बाद के वैदिक साहित्य में काफी अंश वैदिक काल के बाद के भी जोड़े गये हैं। मेक्समुलर के अनुसार वैदिक साहित्य को श्रुति व अन्य को स्मृति माना गया है। यह विभाजन स्पष्ट नहीं है, क्योंकि एक ही उपनिषद् के कई संस्करण मिलते है। ब्रााहृण आरण्यक व उपनिषद् का भेद भी समय के साथ क्षीण होता गया।
ऋगवेद –
ऋगवेद संहिता सबसे पुराना है, इसमें 1028 स्तोत्र है तथा 10600 श्लोक है। इन्हें दस मन्डलों में रखा गया है। स्तोत्र वैदिक देवताओं की स्तुतियाँ है। ये रचनायें सप्तसिन्धु (पंजाब) से लेकर उत्तर पश्चिम के भारतीय ऋषियों द्वारा कई शताब्दियों में पूरी की गयीं। अग्नि इन्द्र आदि देवताओं के स्तोत्र श्लोकों की घटती संख्या के आधार पर क्रम में रखे गये हैं। आरम्भ में देवताओं की प्रसंशा से बाद में विषय ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति के प्रश्नों की ओर मुड़ जाता है। ऋगवेद के पौराणिक विवरण, भाष्य व अनुष्ठान मध्य एशिया, इरान व हिन्दकुश (अफगानिस्तान) के साहित्य से काफी मिलते हैं। शायद इसलिये कि इन क्षेत्रों से विद्वान ज्ञान की खोज में भारत आते थे।
सामवेद –
सामवेद संहिता में 1549 पद हैं। केवल 75 मंत्रों को छोड़ कर सभी ऋगवेद से लिये हैं। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं, पहला राग संग्रह व दूसरा कविता संग्रह की तीन पुस्तकें (अर्सिका)। राग संग्रह अर्सिका का ही गायन रूप है। ऋगवेद के समान सामवेद अग्नि व इन्द्र स्तुति से आरम्भ होकर अमूर्त रूप में ऋगवेद के काफी निकट आ जाता है। श्रुति होने के कारण जल्दी स्मरण होने के लिये शायद इसे गायन रूप दिया गया है। इसमें कई कवितायें एक से अधिक बार लिखी हैं। कोथुमा या रनयानिया एवं जैमिनिया दो रूप ही बचे हैं जो पुजारियों द्वारा गायन के संग्रह हैं।
यजुर्वेद –
यजुर्वेद गद्य मंत्रों का संग्रह है। इस में अनुष्ठान करवाने वाले पंडितो के लिये निर्देशों व मंत्रों का संकलन है जो यज्ञ जैसे अनुष्टान के समय प्रयोग किये जाते थे। सबसे पुराने संकलन में 1875 अनुच्छेद हैं। यजुर्वेद संहिता की भाषा व विषय ऋगवेद से अलग है। यह वैदिक काल के अनुष्ठानों की जानकारी का प्रमुख श्रोत है। इसके कृष्ण व शुक्ल दो रूप हैं। कृष्ण रूप अव्यवस्थित जबकि शुक्ल रूप व्यवस्थित है। शुक्ल रूप में संहिता व ब्राह्मण (संहिता की व्याख्या) अलग अलग है। कृष्ण यजुर्वेद के चार (मैत्रयाणी, कथा, कपिश्थला कथा व तैत्रीय) तथा शुक्ल यजुर्वेद के दो (कण्व व मध्यांदिना) संकलन बचे हैं। यजुर्वेद के बाद के संकलनों में अनुष्ठानों का स्थान अधिकतर उपनिषदों ने ले लिया है जो अलग अलग हिन्दु धाराओं का आधार है।
अथर्व वेद –
अथर्व वेद संहिता अथर्वान व अग्निरस कवियों द्वारा रचित है। इसमें 760 स्तोत्र है, जिसमें से 160 ऋगवेद में भी है। अधिकतर स्तोत्र स्वरबद्ध हैं लेकिन कुछ गद्य में भी है। दो संस्करण पैप्पलदा व आनुक्या अभी बचे हैं। आरम्भिक वैदिककाल मैं इसे वेद नहीं माना गया था, बाद में ईसा से करीब 500 वर्ष पूर्व इसे वेद मान लिया गया (रचना के करीब 400-500 वर्ष बाद)। कुछ विद्वान इसे जादुई फार्मुले वाला वेद मानते हैं जिसे अन्य कई विद्वानों ने गलत बतलाया है। इसकी संहिताओं में तत्कालीन प्रचलित अन्धविश्वासों, राक्षसों द्वारा रोपित रोगों तथा जड़ी बूटियों से बनी दवाईयों की विधियाँ समाहित हैं। केनेथ जिस्क के मतानुसार धार्मिक दवाओं व लोक इलाज के उद्भव का यह सबसे पुराना अभिलेख है। अथर्ववेद संहिता की कई पुस्तकों में जादुई अनुष्ठान रहित दार्शनिक चिन्तन व ब्राह्मविद्या का वर्णन है। यह वैदिक काल की संस्कृति, रीति रिवाज, आस्थाओं, आकांक्षाओं व निराशाओं को दर्शाता है। राजा व शासन के दायित्व व परेशानियाँ भी इसमें सम्मिलित है। काफी ऋचायों में विवाह व दाह संस्कार का वर्णन हैं। इसमें संस्सकारों के अर्थ पर व्याख्या भी मिलती है।
वेदों की भाषा कठिन है, सभी के लिये इन्हैं समझना कठिन है। इन की भाषा टीका, सहित संहिताओं के वर्णन के साथ कल्पित कथायें, दर्शन व किवदंती ब्रााहृणों में मिलते है। हर स्थानीय वैदिक शाखा का अपना ब्राह्मण हुआ करता था। अब केवल 19 (2 रिगवेद, 6 सामवेद, 10 यजुर्वेद व 1 अथर्ववेद संबन्धी) ही बचे हैं। इनकी रचना 700 से 500 वर्ष ई. पूर्व मानी जाती है। इनके विषयों में एक ही वेद के बारे में भिन्नता पायी जाती है।
आरणयक में अनुष्ठानों के वर्णन के साथ सांकेतिक अनुष्ठानों पर वाद विवाद व दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। कुछ विद्वान इसे वन में जाकर अध्ययन करने वाले ग्रन्थ मानते हैं तो अन्य वानप्रस्थाश्रम किये जाने वाले अनुष्ठानों की नियमावली मानते हैं।
उपनिषदों का केन्द्र ब्राहृ व आत्मा की खोज के दर्शन पर केन्द्रित है। इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इन्हें हिन्दू धर्म व संस्कारों का आधार माना जाता है। आरण्यकों को कर्म खंड व उपनिषदों को ज्ञान खंड भी माना जाता है।
ईसा से करीब 100 वर्ष पूर्व वेदांगो का उदय हुआ। इनका उद्देश्य उस समय के लोगों के समझने लायक बनाना था। वेदांगो के 6 विषय उच्चारण, छन्द गायन, व्याकरण, शब्द साधन (व्युत्पत्ति), भाषा विज्ञान, धर्म संस्कार व समय ज्ञान एवं खगोल विद्या थे। वेदांग का उद्भव वैसे तो वैदो के सहायक ज्ञान पाने के लिये हुआ था, किन्तु आगे चलकर यह कला, संस्कृति व हिन्दू दर्शन का आधार बन गया। उदाहरण स्वरूप कल्प वेदांग अध्ययन से धर्म सूत्र होता हुआ धर्म शास्त्र में परिवर्तित हो गया।
परिशिश्ट –
यह वेदों पर सहायक टिप्पणियाँ है जो वैदिक साहित्य का तार्किक व कालक्रम सहित विस्तार है। वैसे तो सभी वेदों के परिशिष्ट हैं किन्तु सर्वाधिक अथर्व वेद पर आधारित हैं।
उपवेद-
इन्हें वेदों के तकनीकी विषय का प्रायोगिक साहित्य माना जाता है। चरणव्यूह के अनुसार चार उपवेद हैं-
1. धनुर्वेद (ऋगवेद आधारित)
2. स्थापत्य (आर्किटेक्ट) वेद (यजुर्वेद आधारित)
3. गंधर्ववेद (नृत्य व गान) (सामवेद आधारित)
4. आयुर्वेद (अथर्ववेद आधारित)
कुछ वैदिक काल के बाद के साहित्य में नाट्य शास्त्र, महाभारत व पुराणों को पाँचवाँ वेद माना गया है। नाट्य शास्त्र के बारे में ऐसा माना जाता है कि शब्द ऋगवेद, गायन सामवेद, भंगिमा यजुर्वेद व भाव अथर्ववेद से लिये गयें हैं।
पुराण-
पुराण लोक कथाओं,किंवदंतियों आदि पर आधारित विविध विषयों का साहित्य है। सभी प्रमुख देवताओं जैसे विष्णु, शिव, देवी आदि के नाम पर 18 महापुराण व 18 पुराण हैं जिनमें 40000 से अधिक स्तोत्र हैं। इसमें भागवत् पुराण का हिन्दू धर्म में अत्यधिक प्रभाव है। पौराणिक साहित्य भक्ति आन्दोलन के साथ घुलमिल गया। द्वैत व अद्वैत दोनों विचार धाराओं में महा पुराणों की व्याख्यायें मिलती है।
पाशचात्य देशों में संस्कृत का अध्ययन सत्रहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ। उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में आर्थर शोपेनहाउर ने वेदों की (विशेषकर उपनिषदों) ओर ध्यान आकर्षित किया। संहिताओं का अंग्रेजी रूपान्तरण उन्नीसवीं सदी के अंत तक हो चुका था।
राल्फ टी एच ग्रिफिथ के अनुसार वेद सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जिसके लिये पश्चिम हमेशा पूर्व का ऋणी रहेगा।
पाशचात्य देशों व भारत के वैदिक अध्ययन में एक महत्व पूर्ण अन्तर यह है कि जहाँ भारतीय विद्वानों ने इसे आद्यात्मिक रूप से अध्ययन किया पास्चात्य विद्वानों ने विज्ञान के दृष्टिकोण से इनका अध्ययन किया।
संदर्भ
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वर्मा शिवराम आप्टे- दि प्रेक्टिकल डिक्शनरी, देखिये अपौरुषेय
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